Tuesday, 20 October 2020

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में गहराता तनाव: तुर्की

 

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में गहराता तनाव: तुर्की

प्रमुख आयाम

1.  तुर्की: नवीन उभार:

a. तुर्की का उभार

b. तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा

c.  खिलाफत की चाहत और उम्मा

2.  तुर्की का उभार और भूमध्यसागरीय क्षेत्र:

a.    भूमध्यसागरीय क्षेत्र में तनाव

b.    अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की व्याख्या को लेकर मतभेद

c.     भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बढ़ता ध्रुवीकरण

d.    तुर्की की पहल

e.     ग्रीस-तुर्की तनाव

f.      संघर्ष की लम्बी परम्परा

g.    लीबिया: क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं की टकराहट

h.    फ़्रांस-जर्मनी का रूख

i.       यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया

j.       तुर्की की प्रतिक्रिया

3.  भारत-तुर्की सम्बंध

a. आजादी के बाद

b. 1980 के दशक में बदलाव के संकेत

c.  अर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की

d. द्विपक्षीय सम्बंध के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ

e. पाकिस्तान, तुर्की और कश्मीर

तुर्की: नवीन उभार

तुर्की का उभार:

तुर्की अपने आर्थिक उभार का इस्तेमाल क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए करना चाहता है और वह अपनी मुखर विदेश-नीति की बदौलत भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश में है। तुर्की का ब्लू होमलैंड सिद्धांत उसकी सामुद्रिक महत्वाकांक्षा और उसे पूरा करने के लिए अपनायी जाने वाली नौसैनिक रणनीति की ओर इशारा करता है। यद्यपि हाल में दुनिया के अन्य देशों की तरह तुर्की की अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाई है, लेकिन तुर्की पीछे हटने के लिए तैयार  नहीं है।

तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा:

यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि आर्थिक संकट से जूझ रहा तुर्की पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में मौजूद गैस को अवसर के रूप में देख रहा है। इतना ही नहीं, तुर्की की आतंरिक राजनीति में चुनौतियों का सामना कर रहे अर्दोगान के लिए भी यह एक राजनीतिक अवसर है। ध्यातव्य है कि अर्दोगान की एकेपी पार्टी ने संसद में अपना पूर्ण बहुमत खो दिया है। वे तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को उत्प्रेरित करते हुए अपने ऊपर बन रहे राजनितिक दबाव को कम करने की कोशिश में हैं और इसके लिए तुर्की राष्ट्रवाद का इस्तेमाल ढ़ाल के रूप में कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे इसके लिए पैन-इस्लामिज्म का इस्तेमाल तुर्क लोगों की धार्मिक भावनाओं को उभारने के लिए भी कर रहे हैं और इसके ज़रिए ये सऊदी अरब की सुन्नी दुनिया की बादशाहत को चुनौती दे रहे हैं। उनके इस काम में सहयोगी के रूप में सामने आ रहे हैं ईरान, पाकिस्तान, क़तर और मलेशिया जैसे देश। इसी आलोक में तुर्की ने आक्रामक विदेश-नीति को अपनाया है और लीबिया से लेकर यमन, सीरिया और क़तर तक अपनी महत्वपूर्ण सामरिक उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। स्पष्ट है कि अर्दोगान आक्रामक विदेश-नीति के सहारे आर्थिक बदहाली से लोगों का ध्यान भटकाकर अपनी गिरती लोकप्रियता को सँभालने की कोशिश में लगा हुआ है।

खिलाफत की चाहत और उम्मा:

अर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की पैन-इस्लामिस्म की अवधारणा से प्रेरित होकर ‘उम्मा’ के रूप में ऐसे वृहद् इस्लामी राज्य के निर्माण की आकांक्षा रखता है जो सौ करोड़ से अधिक आबादी वाले 57 देशों को एक राजनीतिक-सांस्कृतिक इकाई का रूप देगा। इसके ज़रिए अर्दोगान तुर्की के खोये हुए गौरव को एक बार फिर से पुनर्बहाल करते हुए नया खलीफ़ा बनना चाहते हैं। ध्यातव्य है कि शास्त्रीय इस्लाम आनुवंशिक राजशाही में यकीन नहीं करता है, और इसलिए उम्मा की संकल्पना एक खिलाफत के ज़रिये शरीयत के मुताबिक मुसलमानों के राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व की बात करती है।

ध्यातव्य है कि पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य के साथ जब खिलाफत की निर्णायक पराजय हो गई, तो अता-तुर्क मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने एक उदार, धर्मनिरपेक्ष एवं आधुनिक लोकतंत्र के रूप में तुर्की की नींव रखी। लेकिन, वे अपने समक्ष मौजूद चुनौतियों से वाकिफ थे और उन्हीं चुनौतियों के मद्देनज़र उन्होंने पहले खुद को या किसी ऐसे कमजोर को खलीफा घोषित करने की योजना बनाई, जो उनके हाथों में वास्तविक शक्तियाँ रहने दे, पर तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें खिलाफत समाप्त करनी पड़ी और इसी के साथ भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में उसके सम्मान एवं मर्यादा की पुनर्बहाली और रक्षा के लिए चलने वाले मुसलमानों के आंदोलन तो खत्म हो गए। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि खिलाफत के लिए मुस्लिम दुनिया की चाहत समाप्त हो गयी। प्रमाण हैं मिस्र के शाह फुआद और वहाबी कबीला सरदार सऊद, जिन्होंने बाद में पश्चिमी ताकतों की मदद से सऊदी अरब की स्थापना की, के द्वारा खलीफा बनने के असफल प्रयास।

 

तुर्की का उभार और भूमध्यसागरीय क्षेत्र का तनाव

 

पिछले डेढ़ दशकों के दौरान शेल ऑयल एवं गैस की खोज ने दुनिया के देशों की ऊर्जा-सुरक्षा हेतु मध्य-पूर्व पर निर्भरता को भी कम किया और मध्य-पूर्व की अहमियत को भी कम किया। इसके कारण यह उम्मीद की जा रही थी कि तेल एवं गैस के प्रमुख स्रोत होने के कारण टकराव एवं संघर्ष की दृष्टि से दुनिया के सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र के रूप में उभरकर सामने आए खाड़ी-क्षेत्र को राहत मिलेगी, लेकिन दूर-दूर तक ऐसा होता नहीं दिखाई पड़ रहा है। व्यवहार में हुआ सिर्फ इतना है कि मध्य-पूर्व के समीकरण बदल रहे हैं और टकराव के कारण भी बदलते हुए दिख रहे। हालात यहाँ तक पहुँचते दिख रहे हैं कि भूमध्य सागर दुनिया के दूसरे दक्षिणी चीन सागर में तब्दील होता दिखाई पड़ रहा है।

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में तनाव:

अब तेल की जगह प्राकृतिक गैस तनाव के नए मुद्दे के रूप में उभरकर सामने आया है, और प्राकृतिक गैस की अन्तर्निहित सम्भावनाओं के कारण पूर्वी भूमध्य सागरीय क्षेत्र टकराव एवं संघर्ष के कुरुक्षेत्र में तब्दील होता दिख रहा है। अनुमान है कि पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में साढ़े तीन ट्रिलियन क्यूबिक मीटर(TCM) गैस है, जिसमें 2.3 टीसीएम गैस की मिस्र, इजरायल और साइप्रस के आर्थिक क्षेत्र में मौजूदगी की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस क्षेत्र में गैस-संसाधनों की खोज के बहाने इस क्षेत्र के प्रमुख देश अपने-अपने सामरिक हितों को साधते हुए अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश में लगे हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे तुर्की को इसमें अपने लिए अवसर नज़र आ रहा है और तुर्की इस गैस-भंडार को अपनी ताकत बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की व्याख्या को लेकर मतभेद:

अब से तीन-चार दशक पहले तक समुद्रों से जुड़े आर्थिक हित सिर्फ मछलियाँ पकड़ने और जहाजों की आवाजाही तक सीमित माने जाते थे, लेकिन तेल-गैस और खनिजों के स्रोतों के रूप में उनकी अहमियत सामने आने पर धीरे-धीरे उन सामुद्रिक क्षेत्रों पर दावेदारी तेज हो रही है। इसने समुद्री मामलों के अंतरराष्ट्रीय कानून: यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ़ द सीज(UNCLOS) की अहमियत को बढ़ा दिया है और अब आलम यह है कि भू-सामरिक अवस्थिति और भू-सामरिक हितों के मद्देनज़र भूमध्यसागरीय क्षेत्र से सम्बद्ध देशों की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं। तुर्की और चीन दुनिया के उन 15 देशों में हैं जो इस समुद्री क्षेत्र से सम्बद्ध अधिकारों से सम्बंधित इस यूएन कन्वेंशन को स्वीकार नहीं करते। तुर्की पूर्वी भूमध्य सागर के गैस वाले इलाके को अपने कॉन्टिनेंटल शेल्फ में मानता है और उसका यह कहना है कि वहाँ किसी अन्य देश का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन, ग्रीस का कहना है कि हर छोटे-बड़े देश की अपनी समुद्री-सीमा है और उसे अपने आर्थिक क्षेत्र में ड्रिलिंग का अधिकार है।

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बढ़ता ध्रुवीकरण:

भूमध्यसागरीय क्षेत्र में गैस-भंडारों पर अधिकार और इस क्षेत्र के देशों की सामुद्रिक सीमाओं के परिसीमन और उनके कॉन्टिनेल्टल शेल्फ़ को लेकर विवाद है। इस विवाद का लाभ उठाकर अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश में तुर्की ने अपने दावों को पुष्ट करने के लिए सन् 2019 में लीबिया की नेशनल अकॉर्ड सरकार (GNA) के साथ सामुद्रिक समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह समझौता भूमध्यसागर के उन क्षेत्रों में गैस-अन्वेषण अभियानों के बारे में था जिन्हें ग्रीस अपना मानता था। तुर्की ने लीबिया की सरकार से गैस-बँटवारे का समझौता किया और साइप्रस के तुर्क-बहुल उत्तरी हिस्से पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई है। मगर, क्षेत्र के अन्य देश उसकी राह रोकने को तत्पर हैं।

इसकी प्रतिक्रिया में जनवरी,2020 में ग्रीस, साइप्रस और इजरायल ने समुद्र के अंदर 1900 किलोमीटर की गैस-पाइपलाइन बनाने का समझौता किया और इटली, जॉर्डन एवं फिलस्तीन के साथ मिलकर एक ब्लॉक भी बना लिया। फ्रांस भी इस ब्लॉक की सदस्यता को इच्छुक है और इसके लिए उसने आवेदन कर रखा है। अगस्त,2020 में ग्रीस और मिस्र ने एक सामुद्रिक सीमा-समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसने तुर्की को नाराज़ किया। तुर्की ने इसकी प्रतिक्रिया में पूर्वी भूमध्यसागर में गैस-अन्वेषण अभियान की दिशा में पहल की। जहाँ तुर्की इस इलाके में ऑफ-शोर ड्रिलिंग को आगे बढ़ाने पर अड़ा हुआ है, वहीं फ्रांस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विवादित क्षेत्र में तुर्की के द्वारा किसी भी प्रकार की एकतरफा कार्रवाई उसके लिए अस्वीकार्य है। स्पष्ट है कि अधिकारों को मान्यता देने को लेकर हुए समझौतों ने भूमध्यसागरीय क्षेत्र में तनाव को बढ़ावा दिया है।

तुर्की की पहल:

अगस्त,2020 में तुर्की ने पूर्वी भूमध्यसागर में गैस-भंडार खोज की दिशा में पहल करते हुए नौसेना के बैकअप के साथ व्यापक सर्वेक्षण अभियान शुरू करवाया जिसके कारण भूमध्यसागरीय क्षेत्र में तनाव की परिस्थितियाँ निर्मित हुई। पूर्वी भूमध्यसागर के जिस इलाक़े में तुर्की ड्रिलिंग का काम कर रहा है, साइप्रस उस पर अपना दावा करता है। इन मुद्दों को लेकर साइप्रस और ग्रीस तुर्की का लगातार विरोध कर रहा है और इस मामले में फ़्रांस उसके साथ है। इसी बीच पूर्वी भूमध्यसागर में फ़्रांस, ग्रीस, इटली और साइप्रस का साझा सैन्य-अभ्यास भी शुरू हुआ।

ग्रीस-तुर्की तनाव:

तुर्की ने कहा है कि क्रीट द्वीप से ग्रीस के छह एफ़-16 जंगी जहाज़ों ने उस इलाक़े में घुसने करने की कोशिश की जहाँ तुर्की अपना ड्रिलिंग का काम कर रहा है, लेकिन तुर्की के एफ़-16 जंगी जहाज़ों ने उन्हें रोक दिया। तुर्की का दावा है कि वीडियो में यूनान के लड़ाकू विमानों को गैस खोजने के अभियान में लगे तुर्की के जहाज़ के नज़दीक आते देखा जा सकता है। उधर, ग्रीस ने तुर्की पर यह आरोप लगाया है कि क्रीट में बेस पर लौट रहे उसके एफ़-16 विमानों का रास्ता तुर्की के फाइटर जेट ने रोका। ध्यातव्य है कि तुर्की और ग्रीस, दोनों ही देश नाटो के सदस्य हैं। इसी बीच यूनाइटेड अरब अमीरात ने ग्रीस का साथ देने लिए कुछ एफ़-16 विमान क्रेटे एयरबेस पर भेजने का एलान किया गया। हालिया विवाद में जैसे-जैसे तुर्की के खिलाफ ज़्यादा देश लामबंद हो रहे हैं, वैसे-वैसे खुद को अलग-थलग महसूस करते तुर्की की आक्रामकता बढ़ती जा रही है। लेकिन, ऐसा माना जा रहा है कि गैस की खोज तात्कालिक कारण है।

संघर्ष की लम्बी परम्परा:

दरअसल, यह ग्रीस और तुर्की के बीच लम्बे समय से चले आ रहे संघर्ष का हिस्सा है। आधुनिक तुर्की राज्य की स्थापना से पहले यूनानियों और तुर्कों के बीच दुश्मनी का एक लंबा इतिहास रहा है। आधुनिक सन्दर्भों में देखें, तो ग्रीस-तुर्की विवाद सन् 1974 से ही जारी है, जब ग्रीस द्वारा समर्थित सैन्य-तख्तापलट के जवाब में तुर्की-लड़ाकों ने इस द्वीप पर हमला किया था और बाद में टर्किश रिपब्लिक ऑफ़ नॉर्दन साइप्रस की एकतरफा घोषणा कर दी गई थी। उम्मीद की जा रही थी कि तुर्की द्वारा यूरोपीय संघ की सदस्यता हासिल करने की प्रक्रिया शुरू होने पर साइप्रस-मुद्दा का हल सम्भव है, लेकिन तुर्की के यूरोपीय संघ में शामिल होने की संभावना टलने के बाद वह सम्भावना भी जाती रही। अब, ऊर्जा को लेकर शुरू हुई इस होड़ ने मामले को और उलझा दिया है।

लीबिया: क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं की टकराहट:

ग्रीस-तुर्की टकराहट के मूल में क्षेत्रीय भू-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता है जिसका विस्तार लीबिया से पूर्वी भूमध्य सागर के पार कहीं आगे तक है। लीबियाई गृह-युद्ध में संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित लीबिया सरकार को तुर्की ने भारी समर्थन दिया है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जनरल खलीफ़ा हफ़्तार के पक्ष में हैं। लीबिया में तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात आपस में छद्म ड्रोन-युद्ध में भिड़े हुए हैं जिसमें यूएई अपने चीन से लाए ड्रोन का इस्तेमाल करता है और तुर्की अपने देश में बने सशस्त्र ड्रोन का। यद्यपि लीबिया की नेशनल अकॉर्ड सरकार(GNA) तुर्की की सैन्य-शक्ति की बदौलत ही खुद को बचाए रखने में सफल रही है, पर लीबियाई गृहयुद्ध ने तुर्की और मिस्र के बीच की दुश्मनी को गहरा कर दिया है। इसी प्रश्न पर तुर्की की फ्रांस के साथ भी नौसैनिक तनातनी हुई जिसमें तुर्की-युद्धपोतों ने फ्रांसीसी नौसेना के द्वारा मालवाहक जहाज को रोके जाने पर हस्तक्षेप किया। ऐसा माना जा रहा था कि उस ज़हाज़ के जरिए लीबिया के तट से हथियार ले जाया जा रहा था। ग्रीस और तुर्की के बीच बढ़ते तनावों के मद्देनज़र फ्रांस ने ग्रीस के साथ एकजुटता दिखाने के किए दो युद्धपोतों और दो समुद्री जहाज़ों को भेजा है।

फ़्रांस-जर्मनी का रूख:

फ़्रांस ने भी नाटो और लीबिया में तुर्की की भूमिका और भूमध्यसागर में गैस-रिज़र्व को लेकर तुर्की महत्वाकांक्षा का विरोध किया है। फ्रांस ने ग्रीस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने की माँग करते हुए कहा कि साइप्रस के पास मौजूद गैस-भंडार और साइप्रस के कॉन्टिनेन्टल शेल्फ़ की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न विवाद में यूरोपीय संघ को ग्रीस और साइप्रस का साथ देना चाहिए। ध्यातव्य है कि जून,2020 में लीबिया को हथियार बेचने को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के मद्देनज़र फ़्रांस ने तुर्की के जहाज़ की जाँच करने की कोशिश की थी, जिसने फ़्रांस-तुर्की विवाद को जन्म दिया। फ्रांस ने इसे यूरोपीय संघ में शामिल देशों की संप्रभुता और उनके स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन पर हमला करार दिया।

उधर, जर्मनी का कहना है कि इस मामले को सुलझाने के लिए तुर्की और ग्रीस को बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए। जर्मनी इस विवाद में मध्यस्थता को तैयार है और उसकी पहल पर तुर्की और यूनान के विदेश मंत्रियों ने आपस में बात भी की, लेकिन भूमध्यसागरीय क्षेत्र में दोनों पक्षों के द्वारा अपने हक़ों की रक्षा के दावों के कारण मामला सुलझने की बजाय औऱ भी उलझ गया।

यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया:

यूरोपीय संघ बातचीत के ज़रिए इस समस्या के हल के पक्ष में है, लेकिन इस मामले में वह ग्रीस और साइप्रस के साथ है। भूमध्यसागरीय क्षेत्र में सैन्य-गतिरोध से आशंकित यूरोपीय संघ ने तुर्की को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की ने एकतरफ़ा कार्रवाई से बचते हुए ग्रीस और साइप्रस के साथ तनाव कम करने की कोशिश नहीं की, तो उस पर सम्बद्ध ड्रिलिंग-जहाजों, यूरोपीय संघ के बंदरगाहों के इस्तेमाल और ड्रिलिंग के काम से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंध सहित कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

तुर्की की प्रतिक्रिया:

तुर्की ने बातचीत के ज़रिए इस समस्या के हल के यूरोपीय संघ केप्रस्ताव से सहमति जतायी, लेकिन यूरोपीय संघ के द्वारा प्रतिबंधों की धमकी दिए जाने पर सख्त ऐतराज जताया। उसने कहा कि अगर यूरोपीय संघ पूर्वी भूमध्यसागर की समस्या का हल चाहता है तो उसे एक ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभानी होगी। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोगान ने नाटो प्रमुख जेन्स स्टोल्टेनबर्ग से कहा, “नाटो को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की अवमानना करने वाले और इलाक़े में शान्ति को भंग करने वाले एकतरफ़ा क़दमों का विरोध करना चाहिए।”

 

भारत-तुर्की सम्बंध

तुर्की के साथ भारत के सम्बंध पारंपरिक रूप से अच्छे नहीं रहे हैं, पर हाल के वर्षों में इस सम्बन्ध में और भी गिरावट का रुझान दिखाई पड़ता है। विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारतीय विदेश-नीति की अमेरिका की ओर उन्मुखता, इसमें श्रेष्ठताबोध के लिए सृजित स्पेस और इसके कारण भारतीय विदेश-नीति में प्रबल राष्ट्रवादी आग्रह ने तुर्की ही नहीं, पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बंधों को भी प्रभावित किया है। इसके अलावा, घरेलू स्तर पर आक्रामक हिंदुत्व, जो कहीं-न-कहीं मुस्लिम-विरोध पर आधारित है, के उभार के कारण भी इस्लामिक देश भारत के बहुत सहज नहीं महसूस कर रहे हैं। उधर, खिलाफत की पुनर्स्थापना की तुर्की आकांक्षा, मध्य-पूर्व में तुर्की की भारत-विरोधी कैम्प से नजदीकियाँ, भारत की कीमत पर पाकिस्तान से बेहतर होता सम्बन्ध और इस कारण कश्मीर मसले पर तुर्की का आक्रामक रुख भारत को तुर्की के साथ सहज नहीं होने दे रहा है। यही वह पृष्ठभूमि है जो भारत-तुर्की सम्बन्ध पर पुनर्विचार की आवश्यकता को जन्म दे रही है।    

आजादी के बाद:

पश्चिम एशियाई मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर ए. के. पाशा कहते हैं, “वहाँ मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने ऑटोमन सुल्तान को हटाकर एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापित किया था, और नेहरू इस बात से काफ़ी प्रभावित थे कि पहली बार इतना बड़ा मुस्लिम राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष देश बनने जा रहा है।” तुर्की के साथ बेहतर सम्बंध की तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री की चाह को तब झटका लगा, जब द्विध्रुवीय दुनिया में तुर्की अमरीकी खेमे का हिस्सा बनता हुआ पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो में शामिल हो गया। शीतयुद्ध के दौर में भारत की तुर्की से दूरी बढ़ती चली गयी, और चाहे वो 1965 का भारत-पकिस्तान युद्ध हो या फिर सन् 1971 का, तुर्की ने पाकिस्तान की सैन्य-सहायता की। सन् 1974 में तुर्की ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अगुआ साइप्रस पर हमला किया, तो भारत ने साइप्रस का साथ दिया और गुटनिरपेक्ष नेताओं के साथ मिलकर तुर्की के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत तुर्की से दूर होता चला गया और पाकिस्तान तुर्की के नज़दीक।

1980 के दशक में बदलाव के संकेत:

1980 के दशक में जोर पकड़ती कश्मीर-समस्या और उसके  अंतर्राष्ट्रीयकरण की पृष्ठभूमि में राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री-काल में तुर्की के साथ बेहतर सम्बंधों की दिशा में पहल की गयी, ताकि भारत पर इस्लामिक देशों के दबाव को कम किया जा सके। ध्यातव्य है कि इसी समय तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों की पहल पर इस्लामिक सहयोग संगठन(OIC) ने कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति की पड़ताल के लिए एक समूह बनाया था। 1990 के दशक में भारतीय प्रधानमंत्रियों और तुर्की प्रधानमंत्री के एक दूसरे के यहाँ आना-जाना शुरू हुआ। इस दशक के अन्त में तुर्की के प्रधानमंत्री बुलंट येविट ने अपनी भारत-यात्रा के क्रम पाकिस्तान होते हुए भारत जाने से यह कहते हुए इनकार किया कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने लोकतांत्रिक सरकार का तख़्तापलट कर सत्ता हासिल की है। इस समय तक आते-आते ऐसा लगने लगा था कि तुर्की भारत के क़रीब आ रहा है।

अर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की:

लेकिन, सन् 2002 में पैन-इस्लामिज्म को मुद्दा बनाकर सत्ता में आने वाली जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी(AKP) और रेचेप तैय्यप अर्देगान के नेतृत्व में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। उनके नेतृत्व में आधुनिक उदार धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में तुर्की की वह पहचान बदलने लगी जो मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने निर्मित की थी। उनके नेतृत्व में तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा आकार ग्रहण करने लगी और इसके लिए तुर्की ने अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा की विरासत से दूरी बनाते हुए खुद को मुस्लिम देशों के सर्वमान्य नेता के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। इस दौरान तुर्की ने फ़िलिस्तीन से लेकर कश्मीर तक मुस्लिम समुदायों से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया।

द्विपक्षीय सम्बंधों में सन् 2016-17 में तुर्की में होने वाली बग़ावत ने भी कड़वाहट उत्पन्न की। तुर्की ने इस बग़ावत के लिए अमरीका और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए को जिम्मेवार ठहराया। तुर्की का यह कहना है कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए अमेरिका से सक्रिय तुर्की धार्मिक नेता फ़ेतुल्लाह गुलान का इस्तेमाल कर तुर्की में तख़्तापलट करना चाहता है। तुर्की की भारत से यह अपेक्षा थी कि वह भारत में सक्रिय गुलान मूवमेंट पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल करे और उसके स्कूलों एवं दफ़्तरों को बन्द करवाए। लेकिन, जब भारत ने उनकी बात मानी नहीं, तो फिर तुर्की का जोर कश्मीर मसले पर बढ़ता चला गया। फ़रवरी,2020 में भी राष्ट्रपति अर्दोगान ने पाकिस्तानी संसद को सम्बोधित करते हुए में कहा कि कश्मीर जितना अहम् पाकिस्तान के लिए है, उतना ही तुर्की के लिए भी। 

द्विपक्षीय सम्बंध के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ:

दरअसल भारत-तुर्की सम्बंध को न केवल पैन-इस्लामिज्म की चुनौतियों से, वरन् व्यापार-संतुलन के भारत के पक्ष में होने के कारण बढ़ते हुए द्विपक्षीय व्यापार-घाटे की चुनौतियों से भी निबटना है। तुर्की भारत से यह अपेक्षा करता है कि वह व्यापार-असन्तुलन से सम्बंधित उसकी चिंताओं का भी समाधान करे और मध्य-पूर्व में उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में भी सामरिक सहयोगी भूमिका का निर्वाह करे। लेकिन, समस्या यह है कि भारत तुर्की के लिए न तो सऊदी अरब सहित खाड़ी देशों, जिनसे तुर्की के हित एवं उसकी महत्वाकांक्षाएँ टकराती हैं, के साथ अपने सम्बंधों को दाँव पर लगा सकता है और न ही अपने सामरिक हितों के साथ समझौता करता हुआ अपनी एकता एवं अखंडता को दाँव पर लगा सकता है।   

दरअसल, तेल-गैस से वंचित तुर्की के पास थोरियम मौजूद है और वह उस थोरियम से परमाणु-ऊर्जा के उत्पादन में भारत का तकनीकी-सहयोग चाहता है, लेकिन भारत से उसे सकारात्मक संकेत नहीं मिले। इसके लिए सन् 2017-18 में अर्दोगान ने स्वयं दिल्ली की दो-दो बार यात्रा भी की, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। उन्होंने अपनी नाराज़गी यह कहते हुए प्रकट की, “भारत के साथ उम्मीद रखना बेकार है।” यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत से मोहभंग ने तुर्की को पाकिस्तान के कहीं और अधिक नज़दीक जाने के लिए विवश कर दिया और अगस्त,2019 में कश्मीर के मसले पर होने वाले प्रगति के बाद उसका भारत-विरोध मुखर होता चला गया जिसकी झलक सन् 2019-20 में संयुक्त राष्ट्र संघ में तुर्की के सम्बोधनों में और दिसम्बर,2019 में क्वालालम्पुर सम्मिट में तुर्की की बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी में मिलती है। फलतः आज मध्य-पूर्व में तुर्की उस सामरिक समीकरण का नेतृत्व कर रहा है जो उस गठबन्धन के विरोध में निर्मित हो रहा है जिसमें भारत शामिल है और जिसमें अधिकांशतः भारत-विरोधी शक्तियाँ मौजूद हैं।

पाकिस्तान, तुर्की और कश्मीर:

इधर, आर्थिक बदहाली का सामना कर रहा पाकिस्तान भारत और जम्मू-कश्मीर पर अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं है। उसने इस्लामिक देशों से समर्थन हासिल करने के प्रयास को तुर्की और मलेशिया का समर्थन मिला है। पाकिस्तान को तुर्की का समर्थन रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। तुर्की के वोल्कान बोजकिर संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले सम्मेलन के अध्यक्ष होंगे, और पाकिस्तान उनसे यह अपेक्षा कर रहा है कि उनका सहयोग संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म पर भारत के विरुद्ध उसकी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूती प्रदान करेगा। लेकिन, तुर्की से मेल-मिलाप बढ़ाने की कीमत उसे सऊदी अरब सहित अन्य अरब देशों के साथ रिश्तों पर असर के रूप में चुकानी पड़ेगी।

पाकिस्तानी अपेक्षाओं के अनुरूप सितंबर,2019 में टर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कश्मीर के मसले पर कहा, “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पिछले 72 सालों से कश्मीर समस्या का समाधान खोजने में नाकाम रहा है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बावजूद कश्मीर में 80 लाख लोग फँसे हुए हैं। भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या को बातचीत के ज़रिए सुलझाएँ।” इस साल संयुक्त राष्ट्र के 75वें स्थापना-दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर तुर्की ने एक बार फिर से कश्मीर के मुद्दे को उठाते हुए भारत को घेरने की कोशिश की। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन को बिना किसी संदर्भ के भारत के आंतरिक मामले पर बेमानी टिप्पणी का मौका बना लिया। उन्होंने कहा, “कश्मीर विवाद, जो दक्षिण एशिया की स्थिरता और शांति के लिए महत्वपूर्ण है, अभी एक ज्वलंत मुद्दा है।”

Sunday, 18 October 2020

मध्य-पूर्व और भारत-ईरान सम्बंध

 

मध्य-पूर्व और भारत-ईरान सम्बंध

प्रमुख आयाम

1.  मध्य-पूर्व के बदलाव और ईरान:

a. सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता

b. मध्य-पूर्व में बनते नए समीकरण

c.  मध्य-पूर्व में चीन की बढ़ती सक्रियता

2.  चीन-ईरान सामरिक निवेश-समझौता:

a. आर्थिक-सामरिक साझेदारी प्रस्ताव

b. भारत पर असर

c.  पश्चिमी देशों की चिन्ताएँ

d. साझेदारी की पृष्ठभूमि

e. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा(INSTC) से सम्बद्ध प्रगति अवरुद्ध

f.   चीन के लिए अवसर

g. आगे का रास्ता इतना आसान नहीं

h. चीन के ज़रिये सन्देश

3.  भारत-ईरान:

a.    भारत-ईरान द्विपक्षीय सम्बंध

b. खाड़ी देश और ईरान की दुविधा में फँसा भारत

c.     द्विपक्षीय सम्बंधों के हालिया रुझान

d.    धीमे पड़ते कारोबारी सम्बंध

4.  चाबहार-विवाद:

a. चाबहार समझौता

b. चाबहार रेल-प्रोजेक्ट

c.  चाबहार रेल-प्रोजेक्ट से भारत के बाहर होने के कारण

d. चीन के हाथ जाने की आशंका

e. मध्य-पूर्व में बढ़ते चीनी प्रभाव को काउन्टर करने की रणनीति

f.   चाबहार परियोजना का सामरिक महत्व

g. चाबहार रेल-विवाद और ईरान

h. चाबहार रेल-विवाद और भारत

i.   भारतीय रक्षा-मंत्री की ईरान-यात्रा

j.   भविष्य में अमेरिकी दबाव में कमी की सम्भावना

k.    विश्लेषण

मध्य-पूर्व के बदलाव और ईरान

सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता:

सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत सन् 1979 में ईरान की क्रांति के ठीक बाद हुई थी। उस समय, ईरान ने सभी मुस्लिम देशों में राजशाही को हटा धर्म-शासन लागू करने का आह्वान किया था जिसने सऊदी शाही-शासन के मन में आमजन की ओर से बग़ावत की आशंका को जन्म दिया। सन् 1981 में ईरान पर इराक़ी हमले ने सऊदी अरब सहित खाड़ी देशों के साथ ईरान की दुश्मनी को स्थायी बना दिया। वर्तमान में सऊदी अरब यमन में ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहा है। सीरिया में ईरान राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ है, तो सऊदी सुन्नी लड़ाकों के साथ। जून,2017 में सऊदी के नेतृत्व वाले सहयोगी देशों ने इस आधार पर क़तर पर नाकेबंदी आरोपित किया कि क़तर ईरान-समर्थित विद्रोहियों की मदद कर रहा है।

मध्य-पूर्व में बनते नए समीकरण:

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ राकेश सूद कहते हैं, “ईरान, चीन, रूस, पाकिस्तान और तुर्की मध्य-पूर्व में साथ आते दिख रहे हैं। ....... रूस भी मध्य-पूर्व में अमरीका के ख़िलाफ़ अहम् ताक़त है। मध्य-पूर्व में रूस और चीन की लाइन अलग नहीं है।” पाकिस्तान-अमरीका संबंध में बदलावों के भारत पर असर की ओर इशारा करते हुए पाकिस्तानी रक्षा-विशेषज्ञ आयशा सिद्दिक़ा ने कहा, “पाकिस्तान ने अमरीका-तालिबान वार्ता में अहम् भूमिका निभाई, लेकिन पाकिस्तान को अमरीका से मिलने वाली सारी आर्थिक मदद बंद हो चुकी है। ...... पाकिस्तान संकट की घड़ी में चीन के अलावा किसी और से उम्मीद नहीं कर सकता। विश्व राजनीति के बदलते नए समीकरण में अमरीका, सऊदी अरब और भारत साथ हो गए हैं। ऐसे में पाकिस्तान अब चीन, रूस और ईरान के खेमे में जाता दिख रहा है।” यही कारण है कि राजनाथ सिंह और एस. जयशंकर के तेहरान दौरे को पाकिस्तान, ईरान, रूस, चीन और तुर्की के बनते गठजोड़ के आईने में भी देखा जा रहा है। भारत की चीन, तुर्की और पाकिस्तान से कभी दोस्ती नहीं रही, लेकिन रूस भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है और ईरान से भी उसके अच्छे संबंध रहे हैं। ऐसे में भारत की यह चिंता लाजिमी है कि ईरान और रूस से अपने संबंधों को ख़राब न होने दे।

मध्य-पूर्व में चीन की बढ़ती सक्रियता:

मध्य-पूर्व चीन के लिए ऊर्जा-सुरक्षा की दृष्टि से ही नहीं, वरन् चीनी उत्पादों एवं निवेश के बड़े बाज़ार की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में चीन वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपने लिए जिस भूमिका की अपेक्षा पालता है, वह अपेक्षा भी चीन के लिए मध्य-पूर्व को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना देती है। इसी के मद्देनज़र चीन की आर्थिक और सामरिक योजना का मकसद चीन और मध्य-पूर्व के बीच सामुद्रिक क्षेत्र पर आधिपत्य जमाना है। इसके लिए स्वेज नहर के पास जिबूती में चीन ने अपना पहला नौवहन बंदरगाह तैयार किया है। इसी प्रकार चीनी वितीय सहायता से अरब सागर में ग्वादर बंदरगाह (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) को विकसित किया गया है। इस दोनों बंदरगाहों के ज़रिये चीन होरमुज जलडमरू मध्य के रास्ते होने वाले नौवहन की निगरानी सुनिश्चित करना चाहता है और इस रास्ते अरब सागर एवं हिन्द महासागर तक पहुँच को प्रभावित करना चाहता है। अब उसकी पूरी-की-पूरी कोशिश ईरान को अपने प्रभाव में लेकर चाबहार तक पहुँचने की है। अगर ऐसा होता है, तो फारस की खाड़ी में चीन की सामरिक उपस्थिति और उसका सामरिक प्रभाव मज़बूत होगा।

इतना ही नहीं, चीन पूरे मध्य-पूर्व को अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव(BRI) के दायरे में लाने की कोशिश में है और इसके मद्देनज़र मध्य-पूर्व की अवसंरचनाओं में भारी मात्रा में निवेश को इच्छुक है। यह एक ओर मध्य-पूर्व के देशों के साथ चीन के आर्थिक-सामरिक हितों के एकीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करेगा, वरन् चीन को उत्पादक निवेश का बेहतर अवसर भी उपलब्ध हो सकेगा और चीनी उत्पादों की इस क्षेत्र के बाज़ारों तक आसान शर्तों पर तीव्र पहुँच संभव भी हो सकेगी। यही कारण है कि इस क्षेत्र में चीन सबसे बड़े कारोबारी साझेदार और सबसे बड़े निवेशक के रूप में उभरकर सामने आया है, तथा मध्य-पूर्व में भारत के लिए चीन से मुक़ाबला करना धीरे-धीरे और भी मुश्किल होता जा रहा है। एईआई चाइना ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रैकर के अनुसार, सन् (2005-19) के दौरान चीन ने मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में 55 अरब डॉलर निवेश किए; जबकि ऐडडेटा रिसर्च लैब के अनुसार, सन् सन् (2004-14) के बीच चीन ने 42.8 अरब डॉलर की आर्थिक मदद इन इलाक़ों में दी।

चीन-ईरान कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप अग्रीमेंट की लीक रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि अगर प्रस्तावित प्रोजेक्ट पर चीन और ईरान के बीच सहमति बनती है, तो चीन ईरान में 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगा। इसके अलावा, इस बात के संकेत मिले हैं कि ईरान के चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान के ज़ेरांज प्रान्त को जोड़ने वाले चाबहार रेलवे-प्रोजेक्ट के लिए भारत की जगह चीन को शामिल किया गया।

 

चीन-ईरान सामरिक निवेश-समझौता

ईरान-चीन आर्थिक-सामरिक साझेदारी प्रस्ताव:

मध्य-पूर्व में चीन, रूस और ईरान, ही देशों के हित अमेरिकी हित से टकराते हैं और इसीलिए मध्य-पूर्व में ये तीनों देश सामरिक भागीदार के रूप में सामने आए हैं। रूस ने ईरान के साथ रक्षा एवं आर्थिक सहयोग बढ़ा दिया है। उधर, चीन और ईरान ने अगले 25 वर्षों के लिए 400 अरब डॉलर का समझौता, यद्यपि इस प्रस्ताव को अभी ईरानी संसद से मंजूरी नहीं मिली है, किया है जिसमें आर्थिक, सामरिक, सुरक्षा और ख़ुफ़िया सहयोग की बात है। इस साझेदारी से ईरानी बंदरगाहों पर चीन का प्रभाव और दखल भी काफी बढ़ने की संभावना है।

भारत पर असर:

प्रस्तावित साझेदारी को ईरानी संसद की अनुमति मिलने की स्थिति में मध्य-पूर्व में भारतीय सामरिक हित प्रतिकूलतः प्रभावित होंगे, क्योंकि मध्य एशिया से लेकर अफगानिस्तान तक में भारत के प्रवेश के लिए ईरानी बंदरगाह महत्वपूर्ण हैं। ग्वादर और चाबहार की भौगोलिक निकटता के कारण चाबहार, जस्क और बंदर अब्बास बंदरगाह में चीनी निवेश और चीनी नौसेना की मौजूदगी भारत की मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित होगा। भारत पश्चिमी समुद्री-सीमा पर बुरी तरह से घिर जाएगा और समुद्री सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, इसलिए यह माना जा रहा है कि भारतीय की कूटनीति के लिए यह गंभीर चुनौती होगी। भारत की परेशानी यह भी है कि ईरान ने भारत के सहयोग से बनाए जाने वाले चाबहार-जाहेदान रेल-लाइन का निर्माण-कार्य खुद शुरू कर दिया है। भारत के लिए प्रस्तावित रेल-लाइन की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि रेल-लाइन के सहारे भारत अफगानिस्तान के हाजीगक तक व्यापारिक रास्ते को विकसित करने की योजना बना रहा है, लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध इस रेल-लाइन के विकास में भारतीय भागीदारी को लेकर बाधा बना हुआ है।

पश्चिमी देशों की चिंताएँ:

ईरान-चीन के बीच साझेदारी संबंधी प्रस्ताव से यूरोपीए देश और अमेरिका भी सतर्क हैं, क्योंकि साझेदारी पर सहमति बनने के बाद ईरान होरमुज जलडमरूमध्य के पास स्थित जस्क बंदरगाह चीन के हवाले कर सकता है। होरमुज जलडमरूमध्य, जिस पर चीन अपने प्रभाव को कायम करने की कोशिश में लगा हुआ है, वैश्विक तेल-आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण रास्ता है। दरअसल, अमेरिकी जिद्द ने ईरान को चीन की तरफ जाने को मजबूर किया है। अमेरिका-सहित पश्चिमी ताकतें चाहती हैं कि ईरान चीन के पाले में न जाए, लेकिन वे ईरानी अर्थव्यवस्था के संकट पर ध्यान देने को तैयार नहीं हैं।

साझेदारी की पृष्ठभूमि:

प्रस्तावित आर्थिक-सामरिक भागीदारी पर बातचीत की शुरुआत सन् 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ईरान-दौरे के दौरान हुई थी। लेकिन, सन् 2018 के अंत में अमेरिका द्वारा ईरान पर फिर से आरोपित प्रतिबंधों ने ईरान को चीन की ओर बढ़ने के लिए विवश किया:

1.      अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान का तेल-निर्यात पच्चीस लाख बैरल प्रति दिन से ढाई लाख बैरल प्रति दिन पर सिमट कर रह गया।

2.      शेल तेल एवं गैस की खोज और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अवमंदन(SlowDown) के कारण तेल की गिरती कीमतों ने ईरान सहित मध्य-पूर्व की उन अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है जो तेल पर आधारित हैं। इससे ईरान के सामने गंभीर संकट खड़ा होना स्वाभाविक था।

अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा(INSTC) से सम्बद्ध प्रगति अवरुद्ध:

ईरान की चिंता रेल, सड़क एवं नौवहन की बहुपक्षीय व्यवस्था वाला उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा(NSTC) भी है। सन् 2002 में ईरान, भारत और रूस के बीच सहमति के बाद इस गलियारे के विकास पर खासा काम भी हुआ, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने गलियारे के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भारत के मुंबई से ईरान के बंदर अब्बास, चाबहार के रास्ते अजर-बैजान होते हुए रूस और यूरोप तक जाने वाला यह गलियारा ईरान के लिए खासा महत्त्वपूर्ण है। इस गलियारे का विस्तार प्रस्तावित चाबहार-जाहेदान रेल लाईन तक है।

ईरान पर दुबारा अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूस इस गलियारे से संबंधित कुछ योजनाओं से पीछे हट गया। ईरान में अजर-बैजान सीमा से तुर्कमेनिस्तान सीमा तक जाने वाली रेल-लाइन का विद्युतीकरण करने का काम रूसी रेलवे के पास था, लेकिन उसने काम शुरू नहीं किया। पिछले साल ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने को लेकर बैठक भी हुई थी, मगर जमीन पर दोनों मुल्कों के बीच सिर्फ सीरिया में रणनीतिक सहयोग नजर आया। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का फायदा उठाते हुए रूस ईरान के हिस्से वाले अंतराष्ट्रीय तेल-बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में लगा हुआ है। स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से ईरान में चल रही विकास-योजनाएँ प्रभावित हुई हैं और अमेरिकी दबाव में भारत और रूस जैसे देश प्रत्यक्षतः-परोक्षतः इन परियोजनाओं से अपना हाथ पीछे खींच रहे हैं।

चीन के लिए अवसर:

इन बदले हालात का लाभ उठाते हुए चीन ने अपने रणनीतिक स्वार्थ को साधने की कोशिश कर रहा है। उसकी पूरी कोशिश उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे को बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव से जोड़ने की है जिससे दोनों लाभान्वित होंगे क्योंकि चीन न केवल ईरान के रास्ते यूरोपीय बाजार तक पहुँच सकेगा, वरन् महत्वपूर्ण ईरानी बंदरगाहों पर प्रभाव कायम कर फारस की खाड़ी से अरब सागर तक अपना वर्चस्व बढ़ाएगा।

आगे का रास्ता इतना आसान नहीं:

ईरान-चीन सामरिक भागीदारी को लेकर ईरान में भी विरोधी स्वर उठे हैं, क्योंकि चीनी निवेश की प्रकृति और इसके सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीय अनुभव के कारण ईरान आशंकित है, अब यह बात अलग है कि ईरान की भी अपनी मजबूरियाँ हैं। इन्हीं आशंकाओं के कारण प्रस्तावित साझेदारी में कई पेंच फँस सकते हैं:

1.  ईरान का स्वाभिमान: चीन के साथ सामरिक साझेदारी में पेंच ईरान का स्वाभिमान है। ईरानी नेताओं का साफ मानना है कि चीन की छिपी शर्तें ईरान के स्वाभिमान और संप्रभुता दोनों को चोट पहुँचाएँगी। सामरिक साझेदारी में ईरान चीन की उन शर्तों को कतई नहीं मानेगा, जो जिनसे उसकी संप्रभुता पर आँच आए।

2.  चीनी निवेश, कर्ज और वर्चस्व के खेल से वाकिफ: ईरान चीन के निवेश, कर्ज और वर्चस्व के खेल को बखूबी समझता है, और वह चीनी निवेश और कर्ज के जाल में फँसे पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों की स्थिति से वाकिफ़ है। वह इस बात को जानता है कि जिन शर्तों पर चीन ने पकिस्तान में निवेश किया है, न तो उन शर्तों की जानकारी पाकिस्तानी संसद तक को है और न ही ये संसद एवं संसदीय समिति की अधिकारिता में आती हैं। और, यह स्थिति केवल पाकिस्तान की नहीं है, वरन् अंगोला, लाओस, श्रीलंका, मालदीव सहित उन तमाम देशों की है जो चीनी ऋण एवं निवेश के चक्रव्यूह में बुरी तरह से फँस चुके हैं। इसलिए ईरान चीन से सामरिकी भागीदारी करने से पहले शर्तों की गहन पड़ताल करेगा।

3.  सुन्नी अरब देशों के साथ चीन के बेहतर संबंध: ईरान सुन्नी अरब देशों: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि (जो न केवल चीन की ऊर्जा-सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, वरन् ये चीनी उत्पादों के लिए एक बड़े बाज़ार का काम भी करते हैं) के साथ चीन के अच्छे संबंधों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है। ध्यातव्य है कि चीन के तेल-आयात का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब से आता है और चीनी उत्पादों के लिए भी अरब जगत के देश बड़ा बाजार हैं।

चीन के ज़रिये सन्देश:

दरअसल, ईरान ने चीन से साझेदारी के ज़रिये यह सन्देश दिया है कि उसके पास तमाम विकल्प खुले हैं। ईरान इस बात को भली-भाँति समझता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान-चीन का द्विपक्षीय व्यापार 2019 में घट कर तेईस अरब डालर रह गया, जबकि 2016 में ईरान दौरे के दौरान जिनपिंग ने दावा किया था कि दोनों मुल्कों के बीच द्विपक्षीय व्यापार दस साल में छह सौ अरब डालर तक लेकर जाएँगे। ईरान यह समझ रहा है कि:

a.  उसके साथ साझेदारी बढ़ाने में चीन सिर्फ अपना हित देख रहा है।

b.  इसके जरिये वह फारस की खाड़ी तक आसानी से पहुँचना चाह रहा है, क्योंकि वर्तमान में चीन-अमेरिका व्यापार-युद्ध चरम पर पहुँच चुका है।

भारत-ईरान

भारत-ईरान द्विपक्षीय सम्बंध:

भले ही ईरान भारत का दूरस्थ पड़ोसी हो, पर भारत के ईरान के साथ पारम्परिक रूप से गहरे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बंध रहे हैं, उस समय से, जब यह पारसी देश था। आज भी ईरान से आये पारसी भारत और ईरान के बीच उस सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भारत में ईरान के बाद सबसे ज़्यादा शिया मुसलमान हैं और कुछ समय पहले तक भारत की सीमा ईरान से लगती थी। ईरान और भारत के बीच के इस सांस्कृतिक जुड़ाव को पारसियों और शियाओं के साथ-साथ सिखों ने भी आधार प्रदान किया है। ईरान में सन् 2011 की जनगणना के हिसाब से सिखों के साठ परिवार रहते हैं जो भारत-विभाजन से भी पहले से वहाँ रह रहे हैं और जिन्हें वहाँ पूरी धार्मिक आज़ादी प्राप्त है। ये वहाँ मुख्य रूप से व्यावसायिक गतिविधियों में लिप्त हैं और उनके बच्चे वहाँ के भारतीय स्कूल में अन्य विषयों के साथ-साथ फारसी भाषा का भी अध्ययन करते हैं।

लेकिन, सदियों से चले आ रहे इस परंपरागत ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बंध ने इन दोनों के बीच राजनीतिक-कूटनीतिक सम्बंधों के साथ-साथ गहरे कारोबारी-आर्थिक सम्बंधों को आधार प्रदान किया है। वर्तमान में इन दोनों के अंतर्संबंधों की व्याख्या निम्न सन्दर्भों में की जा सकती है:

1.      ऊर्जा-क्षेत्र: भारत अपनी ऊर्जा-ज़रूरतों(कच्चे तेल और गैस) को पूरा करने के लिए जिन चार-पाँच मुख्य देशों पर निर्भर हुआ करता है, कुछ समय पहले तक ईरान उनमें दूसरे स्थान पर था। और, ऐसा नहीं कि यह सम्बंध एकतरफा था। भारत ईरानी तेल और गैस-उद्योग में निवेश करने वाले देशों में शामिल हैं। इसके अलावा, ईरान भारत से दवाइयाँ, भारी मशीनरी, कल-पुर्जे और अनाज लेता है।

2.      कनेक्टिविटी अर्थात् पारगमन सुविधा: ईरान के रास्ते हमें अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे कई मुल्कों तक व्यापार-संपर्क बढ़ाने की सुविधा मिली है। अफगानिस्तान, खासतौर से चारों ओर से जमीन से घिरा हुआ देश है और पाकिस्तान के कारण हमारी उस तक पहुँच नहीं बन पाती, लेकिन अरब सागर होते हुए ईरान के जरिए भारत पाकिस्तान को बाईपास करता हुआ न केवल अफगानिस्तान तक, वरन् मध्य एशिया, रूस और यहाँ तक कि यूरोपीय देशों तक आसानी से पहुँच सकने में सक्षम है।

3.      कूटनीतिक संबंध: अफगानिस्तान, मध्य एशिया और मध्य-पूर्व में सामरिक तौर पर परस्पर सहयोगी इन दोनों देशों के साझा सामरिक हित हैं। गुटनिरपेक्ष भारत के सोवियत संघ के प्रभाव में और ईरान के अमेरिकी प्रभाव में होने के बावजूद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत 1950 के दशक से ही हो गई थी। 1990 के दशक में भारत और ईरान, दोनों ही देशों ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ नार्दर्न एलायंस की अशरफ गनी सरकार का समर्थन किया। दोनों अफगान-समस्या के क्षेत्रीय समाधान की हिमायत करते हैं और अफगानिस्तान में शान्ति एवं स्थिरता दोनों ही देशों के पक्ष में है। बलूचिस्तान के मसले पर दोनों देशों का रवैया भी इन्हें के दूसरे के करीब ले आता है। लेकिन, कई मामले ऐसे हैं जिनमें दोनों के बीच मतभेद भी रहे हैं। कश्मीर के मसले पर ईरान का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा है और कई बार उसके इस रुख ने भारत के लिए कूटनीतिक मुश्किलें खड़ी की हैं। इसी प्रकार ईरान के लिए उसका परमाणु-कार्यक्रम प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है और वह नाभिकीय शक्ति हासिल कर सुन्नी ताक़त पाकिस्तान की नाभिकीय शक्ति को प्रति-संतुलित करना चाहता है, ताकि शिया-सुन्नी विवाद में संतुलन बनाये रखा जा सके, लेकिन भारत परमाणु हथियारों से मुक्त मध्य-पूर्व की परिकल्पना करता है और इसीलिए वह ईरान की इस कोशिश के विरोध में है। जहाँ तक अफगानिस्तान का प्रश्न है, तो दोनों तालिबान के विरोध में हैं, पर जहाँ भारत ने अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो-सैनिकों की मौजूदगी का समर्थन किया, वहीं ईरान ने विरोध। इसी प्रकार जहाँ भारत-अमेरिका सम्बंध और इसका भारत-ईरान सम्बंध को प्रभावित करना ईरान को खटकता है, वहीँ चीन के साथ ईरान की बढ़ती हुई नज़दीकियाँ भारत को खटकती हैं। 

अमेरिकी प्रतिबन्ध और भारत-ईरान सम्बंध:

नवम्बर,2019 में ईरानी विदेश-मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने भारत को आश्वस्त करने की कोशिश की कि भारत और ईरान के रिश्ते तात्कालिक वैश्विक वजहों या राजनीतिक-आर्थिक गठबंधनों से नहीं टूट सकते, लेकिन उन्होंने भारत से ईरानी अपेक्षाओं की ओर इशारा करते हुए बतलाया कि भारत अमेरिकी दबावों के आगे झुकने से परहेज़ करे। उन्होंने यह कहा कि अगर भारत अमेरिकी दबाव के आगे झुकता हुआ ईरान से तेल नहीं ख़रीदता, तो ईरान भारत से चावल नहीं ख़रीदेगा। पहले ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन और इराक़ के कहीं ज़्यादा क़रीब है, और अब उसे यह लगता है कि भारत अरब देशों के कहीं अधिक करीब है। हाल में इजराइल के साथ संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के समझौते के प्रति भारत के नज़रिए और भारत-सऊदी अरब सम्बंध की गर्माहट उसकी इस आशंका को और भी पुष्ट कर रहे हैं। दरअसल, इस्लामिक क्रान्ति, इराक़-ईरान युद्ध और फिर नाभिकीय मसले पर अमेरिका-ईरान सम्बंधों में तनाव ने भारत-ईरान सम्बंध के सहज एवं स्वाभाविक विकास को प्रभावित किया और पारस्परिक ज़रूरतों के बावजूद उन्हें एक दूसरे के करीब आने नहीं दिया। ईरानी परमाणु-कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की आपत्ति है और वह नहीं चाहता है कि परमाणु-शक्ति हासिल कर ईरान मध्य-पूर्व में अपना दबदबा कायम करे।

दुविधा में फँसा भारत:

गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल(GCC) के देश मध्य-पूर्व में भारत के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर हैं। वित्त-वर्ष (2018-19) के दौरान बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व वाले गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल(GCC) के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार सन् 2005 के 5.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 121.25 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुँच गया और इस प्रकार यह भारत के साथ कारोबार करने वाला सबसे बड़ा ट्रेडिंग ब्लॉक, यहाँ तक कि आसियान और यूरोपीय संघ से भी बड़ा, बना। वित्त-वर्ष (2014-15) में यह 137.7 बिलियन डॉलर के स्तर पर था। वित्त-वर्ष (2018-19) में भारतीय आयात 79.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर रहा, तो भारतीय निर्यात 41.55 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर और व्यापार-घाटा 38.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर।  

इसके अलावा, खाड़ी के देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी हैं। मध्य-पूर्व में कोई टकराव होता है, तो इस मोर्चे पर भी भारत को झटका लग सकता है। विश्व बैंक के अनुसार, सन् 2019 में भारत ने 83 बिलियन अमेरिकी डॉलर बाह्य वित्त-प्रेषण के रूप में प्राप्त किया, लेकिन सन् 2020 में 20 प्रतिशत की गिरावट के साथ इसके 64 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर रहने की संभावना है। भारतीय वित्त-प्रेषण में मध्य-पूर्व के देशों का योगदान 53.5 प्रतिशत के स्तर पर है। कुल बाह्य वित्त-प्रेषण का 26.9 प्रतिशत यूनाइटेड अरब अमीरात से, 22.9 प्रतिशत अमेरिका से, 11.6 प्रतिशत सऊदी अरब से, 6.5 प्रतिशत क़तर से, 5.5 प्रतिशत कुवैत से और 3 प्रतिशत ओमान से आता है। करीब देश के बहार रह रहे 17.5 मिलियन अप्रवासी भारतीयों में 60 प्रतिशत से अधिक अप्रवासी भारतीय मध्य-पूर्व के देशों में रहते हैं।

द्विपक्षीय सम्बंधों के हालिया रुझान:

मध्य-पूर्व में ईरान ऐसी क्षेत्रीय शक्ति है जिसकी अनदेखी सम्भव नहीं है और जिसे हल्के में लेने की भूल कोई नहीं कर सकता है, अब चाहे वह भारत हो या चीन। अब समस्या यह है कि मध्य-पूर्व में भारत की सामरिक उलझनें बढ़ रही हैं और भारत मुश्किलों से घिरता दिखाई पड़ रहा है। पिछले कुछ समय से अमेरिका की ईरान-नीति भारत-ईरान द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर रही है, और ईरान को चीन के पाले में जाने के लिए विवश कर रही है। ईरान और चीन के बीच बढ़ती इन नज़दीकियों में पाकिस्तान अहम् भूमिका निभा रहा है, यद्यपि बलूचिस्तान के साथ-साथ शिया-सुन्नी मसले पर ईरान और पाकिस्तान के बीच गम्भीर मतभेद बने हुए हैं। इस प्रकार एक ओर ताक़तवर देशों: अमरीका, रूस और चीन की खेमेबंदी एवं सक्रियता, दूसरी ओर क्षेत्रीय शक्तियों: भारत, ईरान, सऊदी अरब और पाकिस्तान के सामरिक हितों एवं महत्वाकांक्षाओं की टकराहट ने मध्य-पूर्व को दुनिया के सर्वाधिक अस्थिर इलाक़े में तब्दील कर दिया है। वर्तमान में मध्य-पूर्व में भारत के सऊदी, ईरान और इजराइल तीनों के साथ अच्छे संबंध हैं, लेकिन ईरान की सऊदी और इजराइल से दुश्मनी किसी से छुपी नहीं है और कहीं-न-कहीं मध्य-पूर्व का यह समीकरण भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। आज जहाँ खाड़ी देश सहित अरब देशों का ध्यान इजराइल-फ़िलिस्तीन विवाद को सुलझाने से ज़्यादा ज़ोर ईरान के प्रभाव रोकने पर है, वहीं इजराइल भी ईरान को रोकने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ता है और इसके लिए ये दोनों कुछ भी करने को तैयार दिखते हैं।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें मध्य-पूर्व में चीन, रूस पाकिस्तान, तुर्की और ईरान एक धुरी निर्मित करते दिख रहे हैं, तो अमेरिका, भारत, इजराइल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दूसरी धुरी निर्मित करते। और, इन दोनों धुरियों के बीच पिस रहा है भारत-ईरान द्विपक्षीय सम्बंध, और इसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ती हुई दिख रही हैं। द्विपक्षीय संबंधों में आकार ग्रहण करते तनावों के प्रबन्धन के मद्देनज़र सितम्बर,2020 में पहले भारतीय रक्षा-मन्त्री राजनाथ सिंह ईरान के दौरे पड़ गए, और फिर भारत के विदेश-मंत्री एस. जयशंकर; ताकि द्विपक्षीय संबंधों में आ रही खटास को दूर किया जा सके।

धीमे पड़ते कारोबारी सम्बंध:

अगर इसके सापेक्ष ईरान की बात करें, तो 2018-19 में भारत का ईरान के साथ व्यापार 17.03 बिलियन अमेरिकी डॉलर था जिनमें पीओएल आयात 12.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था, लेकिन अप्रैल-नवम्बर,2020 के दौरान अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पेट्रोलियम उत्पादों के आयात के शून्य के स्तर पर रह जाने के कारण यह 90 प्रतिशत की गिरावट के साथ भारतीय आयात 1.29 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया। इसी अवधि के दौरान भारतीय निर्यात 36 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2.23 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव न केवल भारत के सामरिक हितों और उसकी ऊर्जा-सुरक्षा को सीधे-सीधे प्रभावित करेगा, वरन् खाड़ी क्षेत्र में रह-रहे करीब (85-90) लाख लोगों की जान-माल भी खतरे में होगी। अगर ईरान से भारत के संबंध ख़राब होते हैं, तो इस इलाक़े के तेल और गैस के 30 अरब डॉलर का कारोबार बर्बाद हो सकता है।

ईरान को इस बात से तकलीफ है कि अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बंधों की अनदेखी करते हुए भारत, जो दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा तेल-उपभोक्ता है, ने अमेरिकी दबाव में न केवल ईरान से तेल-आयात बन्द कर दिया है, वरन् उसने ईरान की विकास-परियोजनाओं से भी अपने हाथ पीछे खींचने शुरू कर दिए। इसके परिणामस्वरूप भारत के लिए तेल-निर्यातक देशों की सूची में कुछ समय पहले तक दूसरे-तीसरे स्थान पर रहने वाला ईरान आज परिदृश्य से गायब है और चालू वित्त-वर्ष में ईरान से तेल-आयात शून्य के स्तर पर पहुँच चुका है। ईरान का कहना है कि अगर भारत उसका तेल नहीं खरीदेगा, तो वह भारत से चावल, मसाले, चाय, औषधि और अन्य रासायनिक उत्पादों की खरीद नहीं करेगा।

चाबहार-विवाद

चाबहार समझौता:

चाबहार ओमान की खाड़ी के तट पर दक्षिण-पूर्वी ईरान में अवस्थित ईरान का इकलौता बंदरगाह शहर है, जो वहाँ के दूसरे सबसे बड़े प्रांत सिस्तान और बलूचिस्तान प्रान्त का शहर है। इस बंदरगाह के विकास के लिए सन् 2003 में ही भारत और ईरान के बीच सहमति कायम हुई थी  लेकिन ईरान पर अंतराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से रूकावटें आने लगीं। सन् 2016 में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी और अफ़ग़ानिस्तान के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते को मंज़ूरी मिली। इस मेमोरेंडा ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग(MOU) के तहत्:

1.  भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए 85 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि उपलब्ध करवानी थी और ईरान को 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर का क्रेडिट-लाइन उपलब्ध करवाना था।

2.  भारत को बंदरगाह के कुछ हिस्सों के विकास के लिए 10 साल की लीज़ मिली और उसे चाबहार रेल-लिंक के विकास की भी जिम्मेवारी सौंपी गयी।

3.  भारत चाबहार-हाज़ीगक रेलवे परियोजना के लिए भारत ने 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि उपलब्ध करवाने के प्रति भी प्रतिबद्धता व्यक्त की। ज़ाहेदान से अफ़ग़ानिस्तान की सीमा लगभग 40 किलोमीटर दूर है, और अगर ये रेल-लिंक बन जाता, तो मालगाड़ी से सामान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

4.  चाबहार विशेष आर्थिक क्षेत्र में 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के प्रस्ताव पर भी सहमति बनी।

5.  मध्य अफगानिस्तान में 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर की हाज़ीगक लौह एवं इस्पात खनन परियोजना में भारतीय कम्पनियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी थी।

स्पष्ट है कि भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम् ये परियोजनाएँ चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट से कहीं पहले अस्तित्व में आ गई थीं, लेकिन इसके बाद 2016 से पहले तक इस परियोजना में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई। इसके अलावा, अफ़ग़ानिस्तान, रूस और मध्य एशिया की तरफ़ कुछ और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट शुरू करने पर सहमति जताई गई थी। हालाँकि चाबहार पोर्ट के विकास में भारत ने बड़ी मुस्तैदी दिखाई और सन् 2018 में भारत ने पोर्ट के एक टर्मिनल का संचालन भी अपने हाथ में ले लिया। ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के रास्ते भारत का व्यापार सिर्फ इन्हीं देशों तक नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के साथ भी संभव हो सका है। हालाँकि अभी चाबहार बंदरगाह में भारत द्वारा निर्मित शहीद बहिश्ती टर्मिनल का परिचालन पूरी तरह शुरू नहीं हो सका है, लेकिन इसकी शुरुआत से सिर्फ नौ-दस माह में ही उसके जरिए हम दो लाख टन से ज्यादा कार्गो अन्य देशों तक भेज चुके हैं।

चाबहार रेल-प्रोजेक्ट:

मई,2016 में ईरान-भारत ने इस रेल-प्रोजेक्ट पर समझौता किया, लेकिन, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की वज़ह से भारत से फंड मिलने में देरी ने अन्ततः ईरान को इस प्रोजेक्ट को भारत से अपने हाथों में लेने के लिए विवश किया और जुलाई,2020 में इसे अपने हाथों में लेते हुए ईरान ने नेशनल डेवलपमेंट फंड के इस्तेमाल के ज़रिए इस प्रोजेक्ट को मार्च,2022 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया।

ईरान ने इस प्रोजेक्ट को ऐसे समय में अपने हाथ में लिया जब भारत-चीन संबंधों में तनाव चरम पर था और चीन के करीब पहुँचते ईरान ने उसके साथ 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रणनीतिक निवेश से सम्बंधित समझौता किया। ध्यातव्य है कि भारत-अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच सम्पन्न इस समझौते के तहत् भारत की ओर से इंडियन रेलवेज़ कंस्ट्रक्शन लिमिटेड(IRCON) ने इस रेल-प्रोजेक्ट के लिए सभी सेवाएँ, सुपर-स्ट्रक्चर वर्क और करीब 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की फाइनेंसिंग का वादा किया था।

चाबहार रेल-प्रोजेक्ट से भारत के बाहर होने के कारण:

यद्यपि सैद्धांतिक रूप से अमेरिका ने चाबहार पोर्ट और चाबहार रेल-प्रोजेक्ट को प्रतिबंधों से छूट दी थी, तथापि अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका में उपकरण-आपूर्तिकर्ता एवं पार्टनर के रूप में जुड़ने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ और कहीं-न-कहीं अमेरिका से आशंकित भारत भी इसको लेकर गम्भीर नहीं था। लेकिन, पश्चिम एशिया से सम्बंधित मामलों के अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ क़मर आग़ा इस प्रोजेक्ट में भारत की ओर से होने वाले विलम्ब के अलावा ईरान-चीन नजदीकी को इसका महत्वपूर्ण कारण मानते हैं। यह ख़बर ऐसे समय आई है जब भारत और चीन के बीच तनाव चरम् पर है और चीन-ईरान के बीच चार सौ अरब डॉलर के बीच सामरिक निवेश समझौता सम्पन्न हुआ है। आशंका यह भी है कि चीन के साथ बढ़ती नज़दीकी के कारण चाबहार बंदरगाह भारत के हाथ से निकलकर चीन के हाथ जा सकता है।

चीन के हाथ जाने की आशंका:

ऐसा माना जा रहा है कि ईरान ने चाबहार रेल-प्रोजेक्ट में चीन को भागीदारी प्रदान की है। इसलिए भारत को डर है कि भविष्य में चाबहार बंदरगाह के लीज के नवीनीकरण में मुश्किलें आएँ और यह पूरी तरह से भारत के हाथ से निकलकर जा सकता है। इस आशंका को इस बात से भी बल मिलता है कि ईरान ने खुद ही पिछले साल चीन द्वारा संचालित पाकिस्तानी ग्वादर बंदरगाह और चाबहार के बीच टाई-अप एवं चाबहार ड्यूटी फ्री ज़ोन का प्रस्ताव दिया था। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत के लिए सामरिक झटका होगा क्योंकि यह पश्चिम एशिया, जिसे पश्चिमी देश मध्य-पूर्व के नाम से पुकारते हैं, में चीन की सामरिक उपस्थिति को मजबूती प्रदान करेगी। चीन पहले से ही पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को संचालित कर रहा है और हाल में उसने स्वेज नहर के पास जिबूती में अपना पहला नौवहन बंदरगाह तैयार किया है।

मध्य-पूर्व में बढ़ते चीनी प्रभाव को काउन्टर करने की रणनीति:

चीन ने अब जिस तरह से मध्य-पूर्व में ईरान में प्रवेश किया है, उस चुनौती से भारत अकेला नहीं लड़ सकता। उसके लिए सामूहिक रणनीति की ज़रूरत है। कमर आग़ा का मानना है कि यह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमरीका समेत पश्चिमी देशों के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि अब पूरा ग्वादर से लेकर चाबहार और बंदर-ए-जस्क पोर्ट, जो चाबहार क़रीब 350 किलोमीटर दूर है, उन सब पर धीरे-धीरे चीन का कब्ज़ा होता रहेगा। उनका मानना है कि भारत अब भी ईरान को अपने एक मित्र देश के रूप में देखता है। उनके अनुसार, “भारत के साथ ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते हैं। भारत की कोशिश होगी कि वो अच्छे रिश्ते बने रहें और चाबहार बंदरगाह का काम चलता रहे और वो आगे इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ा रहे।” उन्होंने यह आशा जताई कि इरकॉन कम्पनी बाद में किसी वक्त इस प्रोजेक्ट को ज्वाइन कर ले। लेकिन, ‘ईरान में धर्म-तंत्र या फिर पश्चिमी तर्ज़ पर लोकतंत्र’ को लेकर चल रहे विमर्श का हवाला देते हुए अश्विनी मोहपात्रा ने कहा कि सम्भव है कि ईरान में सत्ता-परिवर्तन से इस रुख में कोई बदलाव आए।

चाबहार परियोजना का सामरिक महत्व:

भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार समझौता इस क्षेत्र में पाकिस्तान और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में समर्थ है। पाकिस्तानी बलूचिस्तान प्रान्त में अवस्थित ग्वादर बंदरगाह, चीन द्वारा संचालित, से चाबहार की दूरी सड़क के रास्ते से 400 किलोमीटर से कम और समुद्र से लगभग 100 किलोमीटर पड़ती है। इसके अलावा, चाबहार परियोजना अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का हिस्सा है। यह भारत के लिए रणनीतिक तौर पर एक महत्वपूर्ण परियोजना रही है जिसके तहत् भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग स्थापित करना चाहता है। इसके ज़रिए भारत  पाकिस्तान को बाईपास करता हुआ अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यहाँ तक कि यूरोप तक पहुँच सकता है।

जहाँ तक चाबहार रेल-प्रोजेक्ट की बात है, तो करीब 628 किलोमीटर लम्बी यह परियोजना ईरान के चाबहार पोर्ट को  अफ़ग़ानिस्तान-सीमा पर अवस्थित ज़ाहेदान से जोड़ता है। भारत पाकिस्तान को बाईपास करते हुए इस रास्ते का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान और फिर अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों, रूस और यहाँ तक कि यूरोप तक पहुँचने के लिए करना चाहता है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से 70 किलोमीटर दूर चाबहार पोर्ट को उसका जवाब माना जा रहा था। इसके अलावा, यह परियोजना भारत को ताज़िकिस्तान में खुद उसके द्वारा ही संचालित फ़रखोर एयरबेस तक सीधी पहुँच प्रदान करती है, वो भी कम लागत पर कम समय में। ध्यातव्य है कि चाहबहार के कारण शिपमेंट-लागत में 60 प्रतिशत की कमी और भारत से मध्य एशिया तक शिपमेंट समय में 50 प्रतिशत की कमी आएगी। चाबहार से यूरोप तक सामान पहुँचाने में केवल दो दिन लगेंगे। इसलिए चाबहार भारत के लिए आर्थिक रूप से भी अहमियत रखता है और इसके कारण इस क्षेत्र में न केवल भारतीय पहुँच आसान होगी, वरन् परिवहन-लागत कम होने के कारण उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बेहतर होगी।

चाबहार रेल-विवाद और ईरान:

ईरान ने यह कहते हुए चाबहार रेल-प्रोजेक्ट से भारत को बाहर निकले जाने की इस रिपोर्ट का खंडन किया कि “ईरान ने भारत के साथ चाबहार-ज़ाहेदान रेलवे के लिए कोई क़रार ही नहीं किया था।” ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी इरना ने एक ईरानी अधिकारी के हवाले से कहा, “सन् 2016 में समझौता केवल दो चीज़ों पर हुआ था: पोर्ट के विकास का और 15 करोड़ डॉलर के भारत के निवेश का।” इसी आलोक में चाबहार के लिए आए भारतीय निवेशों में से एक निवेश चाबहार रेलवे के बारे में भी था, पर ये समझौते का हिस्सा नहीं था।”

चाबहार रेल-विवाद और भारत:

भारत सरकार ने भी चाबहार रेल-प्रोजेक्ट पर मीडिया में आई ख़बरों को अटकलबाज़ी बताते हुए खारिज किया है। विदेश-मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि सन् 2016 के बाद से कठिनाइयों के बावजूद चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट में काफ़ी प्रगति हुई है और सन् 2018 के बाद से भारतीय कंपनी के द्वारा इस पोर्ट का संचालन किया जा रहा है। चाबहार रेल-परियोजना के बारे में उनका कहना है, “कुछ तकनीकी और वित्तीय मुद्दों को अंतिम रूप देने के लिए ईरान की ओर से किसी अधिकारी की नियुक्ति का इंतज़ार था, जो अबतक सम्भव नहीं हो पाया है। अब भी इस नियुक्ति का इंतज़ार हो रहा है।” फ़रज़ाद-बी गैस फ़ील्ड से भारतीय कंपनी ओएनजीसी के अलग होने की ख़बरों पर टिप्पणी करते हुए अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, “जनवरी,2020 में भारत को सूचित किया गया कि आगे से ईरान ही इस गैस-क्षेत्र को विकसित करेगा और भारत को आगे चलकर शामिल किया जाएगा।”

भारतीय रक्षा-मंत्री की ईरान-यात्रा:

यह कहा जा रहा है कि भारत ने फ़ारस की खाड़ी में व्याप्त अस्थिरता से चिंतित होकर और अफ़गानिस्तान की सुरक्षा के मद्देनज़र अपने रक्षा-मन्त्री को ईरान भेजा, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि तो भारत-ईरान के बीच बढ़ती दूरी के आलोक में ही तैयार हो गयी थी। भारतीय रक्षा-मंत्री शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में हिस्सा लेने मास्को गए थे और वहाँ से लौटते हुए पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम नहीं होने के बावजूद ईरानी रक्षा-मंत्री आमिर हातमी के अनुरोध पर तेहरान पहुँचे। भारत-चीन सीमा-तनाव, ईरान-चीन की बढ़ती नज़दीकियों और अफगान-तालिबान शान्ति-वार्ता के बीच दोनों देशों के रक्षा-मंत्रियों की इस अहम् मुलाक़ात में अफ़गानिस्तान समेत क्षेत्रीय सुरक्षा से सम्बद्ध मसलों पर द्विपक्षीय सहयोग की सम्भावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों के रक्षा-मंत्रियों की बातचीत में जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई, उनका सरोकार दोनों के हितों से है। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात और अफगानिस्तान से अमेरिका के निकल जाने के बाद वहाँ जिस तरह से तालिबान का राज चलेगा, उसको लेकर दोनों देश चिन्तित हैं और वह किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। तालिबान को पाकिस्तान का पूरा समर्थन है और पाकिस्तान किसी भी तरह से भारत को अफगानिस्तान के विकास की प्रक्रिया से अलग करना चाहता है।

भविष्य में अमेरिकी दबाव में कमी की सम्भावना:

अमेरिकी राष्ट्रपति-चुनाव के दौरान जो तस्वीर उभरती दिखाई पड़ रही है, उससे इस बात का संकेत मिलता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी  जो. बाइडन के नेतृत्व में अमेरिका की ईरान-नीति वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीति से भिन्न होगी। अगर अमरीका में डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार बनती है और जो. बाइडन सत्ता में आते है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वे अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करेंगे, भले ही पुनर्निर्धारित शर्तों के साथ, क्योंकि वे प्रेसिडेंशियल डिबेट के दौरान इस ओर इशारा कर चुके हैं। अगर ऐसा होता है, तो ईरान को लेकर भारत की दुविधा कम होगी, लेकिन शायद तबतक अधिक देर हो जाए। वर्तमान में ईरान को भारत की ज़रुरत कहीं अधिक है।   

विश्लेषण:

भले ही इस रिपोर्ट को भारत और ईरान दोनों ने खारिज किया है, पर दोनों का स्पष्टीकरण वाला बयान तकनीकी प्रकृति वाला है जो स्वीकार एवं अस्वीकार, दोनों की संभावनाओं को समाहित करता है। इससे इतना तो संकेत मिल ही जाता है कि भारत-ईरान द्विपक्षीय सम्बंध संक्रमण की अवस्था से गुजर रहे हैं और आनेवाले समय में ईरान में भारत की मुश्किलें बढ़ने जा रही हैं। पश्चिम एशियाई मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर ए. के. पाशा के अनुसार, दरअसल तटस्थता भारत-ईरान के बीच के पारंपरिक सम्बंधों की बुनियाद रही है जो भारत-अमेरिकी सम्बंधों की बढ़ती हुई निकटता के कारण हिलती हुई दिख रही है। अमेरिकी दबाव के कारण भारत चाहकर भी ईरान के लिए कुछ कर पाने में असमर्थ है और अब ईरान को यह बात समझ में आने लगी है कि भारत के साथ दोस्ती उसके लिए फ़ायदेमंद नहीं है।” आशंका तो यह भी जताई जा रही है कि अगर द्विपक्षीय संबंधों की यही दिशा रही, तो चाबहार पोर्ट की लीज़ का एक्सटेंशन भी मुश्किल होगा।  

दरअसल, भारत और ईरान दोनों एक दूसरे की ज़रुरत हैं, और दोनों में से कोई भी एक दूसरे को खोने की स्थिति में नहीं है। न तो भारत कभी यह चाहेगा कि ईरान चीन, पाकिस्तान और तुर्की के पाले में चला जाए और न ही ईरान कभी चाहेगा कि उसका पारंपरिक एवं महत्वपूर्ण सहयोगी भारत पूरी तरह से अमरीका या पश्चिमी देशों के पाले में चला जाए। इसलिए बदलते वैश्विक हालात में भारत और ईरान एक दूसरे की उपयोगिता से इनकार नहीं कर सकते। पर, अमेरिकी प्रतिबंधों को झेल रहे ईरान की ज़रूरतें और भारत की अमेरिका-परस्ती इन दोनों को एक दूसरे के साथ सहज नहीं होने दे रही है, यह भी कटु सत्य है।