Saturday, 25 March 2017

कविता ने जना है मुझे!

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कविता ने जना है मुझे!
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मै कविता को नहीं जनता,
कविता ने जना है मुझे!
और फिर, बढ़ चला मैं
निरंतर अपने पथ पर,
लड़खड़ाता, गिरता-परता
कविता रुपी अपनी जननी को पीछे छोड़;
उस सन्तान की भाँति,
जो जीवन की दौड़ में
माँ-बाप को पीछे छोड़,
निकल जाते हैं दूर कहीं,
वहाँ, जहाँ से वापस नहीं लौटा जा सकता,
या फिर कह लें,
वापस लौटने की चाह नहीं रह जाती,
इसलिए कि उसकी नज़रों में
वापस लौटने की ज़रुरत नहीं रह जाती!
इसलिए अब
मुझे लगता है
कि न तो मैं कविता को जनता,
और न ही कविता मुझे;
अगर कभी उसने जाना भी हो, तो
वह शायद कविता ही जाने!
कहीं ऐसा तो नहीं
कि कल फिर कविता की ज़रुरत हो,
और फिर तबतक कविता निकल जाए
मुझसे दूर, हाँ, बहुत दूर,
इतनी दूर,
जहां से वह लौट नहीं सकती,
उस माता-पिता की तरह
जो बच्चों से दूर निकल
भविष्य के अनंत गर्भ में विलीन हो जाते हैं;
और जहाँ पर मैं जा नहीं सकता,
उस बच्चे की तरह,
जिसने माता-पिता के रहते
उसे भुला दिया, पर 
उनके जाने के बाद उन्हें याद कर रहा हो,
उन्हें पाने को बेचैन हो!
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Friday, 24 March 2017

विभूमंडलीकरण: वैश्वीकरण से राष्ट्रवाद की ओर वापसी (Reverse Trend of Globalisation)


         विभूमंडलीकरण (Deglobalisation)

विभूमंडलीकरण (Deglobalisation) से आशय:
विभूमंडलीकरण (Deglobalisation) से आशय है वैश्वीकरण से उलटी दिशा में वापसी, अर्थात् वैश्वीकरण से वापस राष्ट्रवाद के रास्तों पर लौटना (Reverse Trend of Globalisation)। मंदी-बाद के परिदृश्य में दुनिया वैश्वीकरण की दिशा से लौटती दिख रही है, या फिर यूँ कह लें कि हर देश का नेतृत्व वैश्वीकरण से उलटी दिशा में चलने का संकेत देता हुआ अपने देश की जनता को यह सन्देश देने की कोशिश में लगा है कि वैश्वीकरण से राष्ट्रवाद की ओर वापसी उसकी सारी समस्याओं का समाधान है।
नव-आर्थिक उदारवाद से मोहभंग की प्रक्रिया का शुरू होना:
1980 के दशक में मेक्सिको क्राइसिस की पृष्ठभूमि में लैटिन अमेरिकी देशों को संकट से बाहर निकालने के नाम पर आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण(LPG) के मॉडल को लागू करने की दिशा में पहल की गयी, लेकिन इक्कीसवीं सदी के आरम्भ तक आते-आते नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों की परिणति बढ़ती हुई सामाजिक-आर्थिक असमानता एवं जॉबलेस ग्रोथ की स्थिति के कारण उच्च बेरोजगारी दर के रूप में हुई और इसने इस मॉडल से मोहभंग के आधार को तैयार किया. इसी की पृष्ठभूमि में 2000 के दशक की शुरुआत में दस लैटिन अमेरिकी देशों ने वामपंथ की ओर रुख किया, यद्यपि अर्जेंटीना, ब्राजील, चीली, ग्वाटेमाला और वेनेजुएला में भ्रष्टाचार के उच्च स्तर एवं आर्थिक हेराफेरी के आरोपों के बीच वामपंथ से मोहभंग की स्थिति भी देखने को मिली है।
राष्ट्रवाद के नाम पर नियंत्रण का खेल:
आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में एक विशिष्ट प्रकार का राष्ट्रवाद संरक्षणवाद की वकालत करता हुआ दूसरे मुल्क के प्रति नफ़रत की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है। यही आप्रवासियों के प्रति नफ़रत, किसी देश में काम करने वाली कंपनियों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार-कोटा, घरेलू उद्योगों एवं घरेलू उत्पादों को संरक्षण प्रदान करने के लिए संरक्षणवादी नीतियों की वकालत आदि के रूप में प्रकट हो रहा है। फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया आदि देशों में ऐसे राजनीतिक दल और ऐसे नेतृत्व की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है जो इस तरह के एजेंडे को आगे रखते हुए वहाँ के लोगों को अतीत के गौरव एवं महानता की पुनर्बहाली और सुनहले भविष्य का सपना दिखा रहे हैं।
इंग्लैंड में ब्रेक्जिट और अमेरिका में ट्रम्प की जीत उस दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के उभार का संकेत दे रही है जो भूमंडलीकरण के भविष्य को लेकर धुँधली तस्वीरें निर्मित कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा ट्रांस-पेसिफ़िक पार्टनरशिप(TPP) एग्रीमेंट, ट्रांस-अटलांटिक ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप(TTIP) एग्रीमेंट और जलवायु समझौतों से अलग होने की घोषणा के साथ-साथ अमेरिका के द्वारा विभिन्न देशों के साथ संपन्न मुक्त व्यापार समझौतों की समीक्षा के संकेत इसी दिशा में संकेत कर रहे हैं। अमेरिका ही नहीं, यूरोपीय देशों में भी इस प्रक्रिया को देखा जा सकता है। यूनाइटेड किंगडम में यूनाइटेड किंगडम इंडिपेंडेंस पार्टी के निजेल फराज (Nigel Farage) के नेतृत्व में ब्रेक्जिट के लिए सफलतापूर्वक आन्दोलन चलाये गए और इसने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी जिसने यूनाइटेड किंगडम को बिखराव के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है और ब्रेक्जिट के विरोध में स्कॉटलैंड ब्रिटेन से अलग होने के प्रश्न पर दूसरे जनमत-संग्रह के मुहाने पर खड़ा है। स्काॅटलैंड की प्रथम महिला निकोला स्टुर्गन (Nicola Sturgeon) 'ब्रेक्जिट' को ''स्काॅग्््जिट' का रूप देने में लगी हैं! यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की माँग अब ब्रिटेन से बाहर निकलकर यूरोपीय संघ के एनी देशों में भी फ़ैल रही है। फ्रांस में नेशनल फ्रंट के मैरीन ले पेन के नेतृत्व में फ्रेक्जिट (Frexit) और नीदरलैंड में पार्टी फॉर फ्रीडम के गीर्ट विल्डर्स के द्वारा नेक्जिट(Nexit) के लिए आन्दोलन चलाया जा रहा है जो यूरोपीय संघ से जुड़ाव के प्रति यूरोपीय देशों में गहराते असंतोष की ओर इशारा करता है। उनके अन्दर यह अहसास गहराता जा रहा है कि यूरोपीय संघ से जुड़कर उन्होंने काफी कुछ गँवाया है। स्पष्ट है कि भारत, ब्रिटेन और अमेरिका की तरह ही फ्रांस, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी, फिनलैंड, नीदरलैंड और स्वीडेन जैसे यूरोपीय देशों में भी धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के राजनीतिक उभार की प्रक्रिया तेज़ हो रही है।
अप्रासंगिक होता वैश्वीकरण का मॉडल:
यद्यपि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचाना जल्दबाजी होगी, तथापि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भूमंडलीकरण के प्रति स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाएँ इस प्रश्न को जन्म दे रही हैं कि कहीं पिछले ढाई दशकों से चला आ रहा वैश्वीकरण का मॉडल अब अप्रासंगिक तो नहीं होने लगा है? पिछले ढाई दशकों के दौरान वैश्वीकरण द्वारा सृजित संभावनाओं के दोहन के पश्चात् विकसित देशों और उनके कॉर्पोरेट समूह को अब यह लगने लगा है कि वैश्वीकरण से लोगों के बढ़ते हुए मोहभंग के मद्देनज़र अपने हितों को साधने के लिए उन्हें अब नए साधन एवं नए रास्ते तलाशने होंगे अन्यथा उनका विकास अवरुद्ध होगा। इसका अंतर्विरोध यह है कि यह अपनी अंतर्राष्ट्रीय संभावनाओं को तो खुला रखना चाहता है, पर इसे पता है कि आनेवाले समय में अंतर्राष्ट्रीय अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उसे छूटें देनी होंगी जिसके लिए वह और वहाँ की जनता तैयार नहीं है। इसीलिये राष्ट्रवादी आकांक्षाओं और जन-अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साथ तालमेल उसकी मजबूरी है। इस प्रवृत्ति को अमेरिका एवं यूरोप से लेकर भारत एवं चीन तक देखा जा सकता है। राजनीतिक कॉरपोरेट नियंत्रित और संचालित वैश्विक पूँजीवाद को और आगे ले जाने में भूमंडलीकरण के वर्तमान स्वरूप की संदेहास्पद प्रासंगिकता कॉर्पोरेट पूँजीवाद को स्थानीय स्तर पर राष्ट्रवाद में नवीन संभावनाओं की तलाश के लिए भी विवश कर रही है।
वैश्वीकरण से उपजा असंतोष:
1980 के दशक में और उसके बाद विकसित देशों ने उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण का जो मॉडल आर्थिक संकट से बाहर निकालने एवं आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया को त्वरित करने के नाम विकासशील देशों के ऊपर थोपा, उसने चाहे आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया को त्वरित करते हुए भौतिक प्रगति के मुकाम पर पहुँचाया हो, पर इसके कारण दुनिया भर के लोगों के बीच गैर-बराबरी काफी ज्यादा बढ़ी है। इसने जहाँ अमीरों को और अमीर बनाया है, वहीं गरीबों को और अधिक गरीब बनाया है। इसका लाभ अत्यधिक अमीर (Super Rich) एवं मध्यम वर्ग को तो मिला है, पर अधिकाँश आबादी, विशेषकर औद्योगिक देशों में कामगार एवं निम्न-मध्यवर्ग और विकासशील देशों में गरीब, बेरोजगार एवं हाशिये पर के समूह से सम्बद्ध वंचितों की विशाल आबादी इसके लाभों से वंचित रही। एक तो इसने ‘जॉबलेस ग्रोथ’ अर्थात् रोजगार-विहीन संवृद्धि (Jobless Growth) की स्थित उत्पन्न की है, दूसरे जो थोड़े-बहुत रोजगार सृजित भी हुए, वे निम्न उत्पादकता वाले रोजगार थे। और, इससे भी महत्वपूर्ण यह हुआ कि इसने राष्ट्रीय सरकारों पर कॉर्पोरेट घरानों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों(MNC’s) एवं सीमा-पारीय कम्पनियों(TNC’s)  के शिकंजों को मज़बूत करते हुए उसे बेबस कर दिया है।
अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों उत्पन्न हुईं? भूमंडलीकरण ने ऐसे कॉर्पोरेट्स द्वारा निर्देशित सर्वव्यापी बाजार को निर्मित किया है जो आज अपनी लाभ-केन्द्रित सोच के साथ तमाम आर्थिक सिद्धांतों, नियमों एवं कानूनों और यहाँ तक कि राष्ट्र-राज्यों एवं वहाँ की सरकारों तक की गिरफ्त से बाहर निकलकर अपनी मनमानी पर उतर चुका है और सही मायने में आज यह राष्ट्र-राज्यों एवं उसकी सरकारों के नियमन एवं नियंत्रण से बाहर होकर उनके ही नियमन एवं नियंत्रण की स्थिति में पहुँच चुका है जिसके कारण राष्ट्र-राज्य एवं राष्ट्रीय सरकारें इसके समक्ष या तो असहाय हैं या फिर समर्पण की मुद्रा में, जिसने राष्ट्रों की संप्रभुता के प्रश्न को बड़ी शिद्दत के साथ जन्म दिया है। आज प्रश्न उठ रहा है कि संप्रभु कौन है : राष्ट्र-राज्य या फिर अकूत पूँजी के सहारे कॉर्पोरेट्स द्वारा निर्देशित सर्वव्यापी बाज़ार? बाजार की शक्तियाँ इतनी प्रबल हो चुकी हैं और इतने मुक्त रूप से काम कर रही हैं कि कोई भी देश या सरकार उन पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं है। कारण है और इसका उन कॉर्पोरेट्स के हाथों निर्देशित होना जिनके हाथों पूँजी संकेद्रित है। आज पाँच सौ बहुराष्ट्रीय कंपनियों(MNC’s) के पास दुनिया की आधी से ज्यादा पूँजी है जो पूँजी के भारी सकेंद्रण की ओर संकेत करता है। दुनिया के महज 1 प्रतिशत लोगों के द्वारा नियंत्रित इस पूँजी की आवाजाही दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक और अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्रक से दूसरे क्षेत्रक तक इन्हीं 1 प्रतिशत लोगों की जरूरतों के हिसाब से होता है। ये न तो राष्ट्र की सीमाओं में बंधी हैं और न ही राष्ट्रीय सरकारों द्वारा नियमन इनके लिए बहुत मायने रखता है। आज मीडिया और सूचना तकनीकी इसी पूँजी द्वारा संचालित होकर इसके हितों के हिसाब से मुद्दों के निर्धारण में लगी है ताकि राजनीतिक और आर्थिक  संबंधों को पुनर्परिभाषित करते हुए बाजार को अपने हिसाब से संचालित किया जा सके। इस तरह भूमंडलीकरण के इस दौर में विज्ञान और तकनीकी के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट एवं सोशल मीडिया पर एकाधिकार और नियंत्रण कायम करते हुए इस कॉर्पोरेट पूँजी ने आम लोगों को भ्रमित करते हुए वैश्विक स्तर पर अपने पक्ष में आमराय बनाते हुए भोगवादी संस्कृति के प्रसार को सुनिश्चित किया। आज इनके बीच का नापाक गठबंधन पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी से लेकर सामाजिक-आर्थिक समावेशन तक के प्रश्नों की उपेक्षा करते हुए अपने हितों के अनुरूप वैश्विक एवं राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ आर्थिक नीतियों के स्वरुप-निर्धारण में लगी है। यही कारण है कि वैश्वीकरण की तेज होती प्रक्रिया के साथ प्राकृतिक संसाधनों की कॉर्पोरेट-लूट की कोशिशें तेज होती चली गईं और इसी के साथ उनके खिलाफ बढ़ते असंतोष की पृष्ठभूमि में स्थानीय स्तर पर प्रतिरोधी आंदोलन भी, जिन्हें कॉर्पोरेट्स द्वारा राज्य-सत्ता, पुलिस एवं प्रशासन के माध्यम से दृढ़तापूर्वक कुचलने की पुरजोर कोशिशें जारी हैं। स्पष्ट है कि बाजार, पूँजी और तकनीक के इस खुले खेल ने देशों के सामाजिक ताने-बाने, सांस्कृतिक अस्मिता और मानवीय चेतना को बिखेर कर रख दिया है।
नवंबर,2016 में ‘द इकोनोमिस्ट’ में प्रकाशित
लेख ‘लीग ऑफ नेशनलिस्ट’ राष्ट्रवाद के राजनीतिक उभार की पड़ताल करते हुए कहा गया है कि आजकल दुनिया के विभिन्न हिस्सों में नए प्रकार के एकाधिकारवादी  सरकारों (Authoritarian Government) का उदय हो चुका है जो वैश्वीकृत मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से विपक्ष को समाप्तप्राय करने पर तुली हुई हैं और उसे बस इतना बचे रहने देना चाहती है ताकि लोकतंत्र होने का भ्रम बना रहे। इसके लिए उनके द्वारा मीडिया घरानों का प्रभावी इस्तेमाल किया जा रहा है और उन्हें नियंत्रित करने के लिए विज्ञापन से लेकर सत्ता की शक्ति और उसके द्वारा सृजित दबाव तक का सहारा लिया जा रहा है। इतना ही नहीं, इन एकाधिकारवादी सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा मीडिया को नियंत्रित करने के लिए अपने समर्थक कॉर्पोरेट्स हाउस एवं उद्योगपतियों-पूँजीपतियों का इस्तेमाल विरोधी मीडिया घरानों में निवेश एवं उनके अधिग्रहण के लिए किया जा रहा है।

वैश्विक आर्थिक संकट का उत्प्रेरक के रूप में:
वैश्वीकरण के इन अंतर्विरोधों को मुखर करने में 2008-09 के वैश्विक वित्तीय-सह-आर्थिक संकट और उसके बाद के परिदृश्य में अनिश्चित आर्थिक परिदृश्य की निरंतरता ने महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभायी क्योंकि अधिकांश देशों ने वैश्वीकरण की इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए आर्थिक संरक्षणवाद का सहारा लिया जिसने समस्या का समाधान देने के बजाय वैश्वीकरण के अंतर्विरोधों को और गहराने का काम किया। आज भी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की अनिश्चितता बनी हुई है और विशेष रूप से बढ़ते हुई बेरोजगारी की पृष्ठभूमि में रोजगार-अवसरों का सृजन आज भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। यूरोपीय संघ के देशों में तो बेरोजागारी की औसत दर देश के कुल कार्य-बल से दस फीसदी तक अधिक है, जबकि यूनान व स्पेन में यह आँकड़ा 20 फीसदी तक का है। युवाओं में, खासकर श्रम-बाजार में उतरने वाले नए युवाओं में बेरोजगारी दर करीब 25 फीसदी हो गई है। विकसित देशों से लेकर विकासशील देशों तक ऐसी नीतियों को अपनाने की गयी  और आज भी की जा रही है जो श्रमिक हितों के विरोध में जाती हैं। इसने श्रमिकों की मोल-भाव क्षमता को कमजोर किया है, फलतः ब्लू-कॉलर जॉब से लेकर ह्वाइट-कॉलर जॉब तक में संलग्न कामगारों की वास्तविक आमदनी में स्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमेरिका में तो 1970 के दशक के बाद से करीब 90 फीसदी कर्मियों की वास्तविक मजदूरी में कोई वृद्धि भी नहीं हुई है। विशेष रूप से भारत जैसे देशों में श्रमिक-हितों के प्रति संवेदनशील श्रम-कानूनों से बचने के लिए अब कम्पनियाँ अपनी ज़रुरत के हिसाब से एजेंसियों के जरिये श्रमिकों की भर्ती कर रही हैं जिसके कारण श्रमिकों की सुभेद्यता (Vulnerability) और भी बढ़ी है और वे इन श्रम एजेंसियों के हाथों शोषण के लिए अभिशप्त हैं।
बढ़ता हुआ सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव:
उदारीकरण और वैश्वीकरण ने एक ओर सरकारों पर दबाव निर्मित करते हुए सार्वजानिक खर्चों में कटौती का आधार तैयार किया, दूसरी ओर विकसित देशों से विकासशील देशों की ओर श्रमिकों के पलायन को जन्म दिया जिसके परिणामस्वरूप बुनियादी न्यूनतम सुविधाओं के साथ-साथ रोजगार-अवसरों को लेकर अप्रवासियों एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रतिस्पर्द्धा तेज हुई. इस प्रतिस्पर्द्धा में निम्न श्रम-लागत के कारण अप्रवासी स्थानीय लोगों की तुलना में प्रतिस्पर्द्धात्मक बढ़त की स्थिति में थे. इसने सांस्कृतिक टकराव को जन्म देते हुए स्थानीय लोगों में अप्रवासियों के प्रति असंतोष को जन्म दिया. इस असंतोष को उत्प्रेरित करने का काम किया विकासशील देशों से विकसित देशों की और माइग्रेशन के बढ़ते हुए दबाव ने.
इस्लामिक चरमपंथ की चुनौती:
यह परिदृश्य तब और जटिल हो गया जब पश्चिम एशियाई देशों में इस्लामिक स्टेट्स एवं अन्य चरमपंथी संगठनों के बढ़ते हुए प्रभाव ने टकराव एवं संघर्ष की स्थिति को जन्म देते हुए पश्चिम एशिया में राजनीतिक अस्थिरता को बढाने का काम किया और इसकी पृष्ठभूमि में पश्चिम एशिया से यूरोपीय देशों की ओर पलायन तेज होता चला गया. उधर इस बढ़ते हुए टकराव की पृष्ठभूमि में इन इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने अमेरिका एवं इन यूरोपीय देशों पर आतंकी हमले बढ़ा दिए. इस स्थिति में स्थानीय लोगों में न केवल मुसलमानों के प्रति असंतोष पैदा हुआ और उन्हें आशंका भरी नज़रों से देखा जाने लगा, वरन् स्थानीय लोगों ने इन्हें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा समझते हुए अपने राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल भी माना।
मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की विफलता:
उदारीकरण एवं वैश्वीकरण का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों के द्वारा न केवल राष्ट्रीय सरकारों एवं उसके बहाने सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों को, वरन् अपने हितों के अनुरूप राष्ट्रीय सरकारों द्वारा अपनाई जानेवाली नीतियों के विरोध को कम करने और उसे अप्रभावी बनाने के लिए विपक्षी दलों को भी साधा गया है। इसने नव-आर्थिक उदारवादी नीतियों की राजनीतिक स्वीकार्यता को बढाने का काम किया। फलतः राजनीति में गरीबों, शोषितों और वंचितों की आवाज़ उठाने वाला कोई शेष नहीं रह गया। इसके परिणामस्वरूप गरीबों, शोषितों एवं वंचितों का मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से विश्वास उठता चला गया। उन्हें लगने लगा कि अब उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही मुख्यधारा की राजनीति ने जो पॉलिटिकल स्पेस सृजित किया, उस पॉलिटिकल स्पेस को भरने की कोशिश आक्रामक रूप से दक्षिणपंथी और धुर राष्ट्रवादी पार्टियों के द्वारा की जा रही है और इनके द्वारा सत्ता-प्रतिष्ठानों के खिलाफ लोगों की नाराजगी को हवा देते हुए मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की विफलता को भुनाने का प्रयास किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप में ही रोजगार एवं मजदूरी संबधी चिंताओं को अभिव्यक्ति देते हुए लोगों को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की कोशिश की जा रही है ताकि आर्थिक संरक्षणवादी नीतियों के सहारे आप्रवासियों (Immigrants) की प्रतिस्पर्द्धा से संरक्षण प्रदान करते हुए अच्छे दिन और अतीत के गौरव की पुनर्बहाली का नारा दिया जा रहा है। इसके लिए  धार्मिक चरमपंथ एवं इसके खतरे को उभारते हुए नृजातीयता एवं सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न को भी दक्षिणपंथ के द्वारा हवा दिया जा रहा है। आज इसके द्वारा लोकलुभावन वादों एवं भविष्य के सुनहले सपनों के सहारे गरीबों, शोषितों एवं वंचितों की आवाज़ बनकर राजनीति की फसल काटने की कोशिश की जा रही है और वे अपनी इस कोशिश में बहुत हद तक सफल भी हैं। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें दुनिया में जहाँ भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था विद्यमान है, वहाँ अपने देश की हुकूमत से नाराज गरीब, शोषित और वंचित राजनीतिक लोकतंत्र के माध्यम से अपने असंतोष का इजहार कर रहे हैं।

Tuesday, 21 March 2017

अरुणाचल संकट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

      
               अरुणाचल संकट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु के रूप में 
मई,2016 में उत्तराखंड मामले में और जुलाई,2016 में अरुणाचल मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारतीय संवैधानिक इतिहास के साथ-साथ केंद्र-राज्य संबंधों में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु बनने जा रहा है. आने वाले समय में इसकी चर्चा उसी तरह होगी जिस तरह आज तक सरकारिया आयोग की अनुशंसाओं और बोम्मई केस,1994 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए फैसले की होती रही है. कई मायने में ये फैसले इनसे भी बढ़कर हैं, सन्दर्भ चाहे राज्यपाल की अधिकारिता और संविधान के दायरे को लांघकर उनकी अति-सक्रियता का हो या फिर स्पीकर की राजनीतिक पक्षधरता का.
उत्तराखंड संकट की पृष्ठभूमि में भारत के राजनैतिक, संवैधानिक एवं न्यायिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति-शासन को असंवैधानिक घोषित करते हुए एक बर्खास्त-सरकार को पुनर्बहाल किया है. केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति-शासन के पक्ष में ‘राष्ट्रपति के समाधान’ का जो तर्क प्रस्तुत किया, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस तर्क के साथ उसे एक सिरे से ख़ारिज कर दिया कि “लोग ग़लत फ़ैसले ले सकते हैं, चाहे वे राष्ट्रपति हों या जज। ये कोई राजा का फ़ैसला नहीं है जिसकी न्यायिक समीक्षा नही हो सकती है।“ स्टिंग ऑपरेशन के सन्दर्भ में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि “अगर राष्ट्रपति भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर राज्यों में अपना शासन थोपने लगेंगे, तो कोई राज्य सरकार पांच मिनट से ज्यादा नहीं चल पाएगी।“ जब केंद्र सरकार फ़ैसले से पहले राष्ट्रपति-शासन हटाकर नई सरकार नहीं बनाने के सन्दर्भ कोई आश्वासन देने को तैयार नहीं हुई, उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस के. एम. जोसफ़ और जस्टिस वी. के. बिष्ट की बेंच ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के मामले में केंद्र सरकार को निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन वो प्राइवेट पार्टी जैसा व्यवहार कर रही है। ......अगर केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन ख़त्म कर सरकार बनाने की कोशिश करती है, तो ये न्याय का उपहास होगा।“ निश्चय ही अरुणाचल के घटनाक्रमों के आलोक में उत्तराखंड उच्च न्यायालय अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा था. उत्तराखंड हाइकोर्ट ने बाग़ियों की याचिका खारिज करते हुए स्पीकर के फ़ैसले पर मुहर लगाई और कहा  कि उन विधायकों ने अपने कृत्य से ख़ुद ही अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दी. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महीने भर से कम समय में यह साहसिक और ऐतिहासिक फैसला किया है जिसकी बाद में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा भी पुष्टि की गई। न्यायपालिका के इतिहास में उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश आने वाले समय में तमाम फैसलों का बुनियाद बनेगा और विरोधी दलों की राज्य सरकारों में राजनीतिक और संवैधानिक आत्मविश्वास पैदा करेगा।
अरुणाचल के मामले में  तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नयी सरकार को असंवैधानिक घोषित करते हुए पुरानी सरकार को पुनर्बहाल किया. और यह सब कुछ संभव हुआ है सरकार की बर्खास्तगी के महज सात महीने के भीतर. जस्टिस खेहर ने अपने फैसले में कहा कि जब राजनीतिक-प्रक्रियाओं की हत्या हो रही हो, तो कोर्ट मूक दर्शक बना नहीं रह सकता. इसके पहले ऐसा उदाहरण पाकिस्तान में मिलता है जब 1993 में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमत्री नवाज़शरीफ़ की बर्खास्त सरकार को वहां की सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दिया था। उस समय 1994 के एस. आर, बोम्मई फैसले में नवाज़शरीफ सरकार की बहाली का भी उदाहरण दिया गया था।
वैसे, न्यायपालिका के ऐसे कदमों की आहट अक्टूबर,2005 में ही सुनायी पड़ने लगी थी जब सुप्रीम कोर्ट की पांच-सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने छह महीने के अन्दर अपना फैसला सुनते हुए बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए राष्ट्रपति-शासन से सम्बंधित राष्ट्रपति के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया था.  लेकिन, जबतक यह फैसला आया तब तक चुनाव-प्रक्रिया शुरू होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इंकार कर दिया।  
सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय इस मामलों में भी अबतक के निर्णय से अलग था कि इस मामले की सुनवाई के दौरान इन घटनाक्रमों में केंद्र सरकार की सक्रिय भूमिका लगातार कोर्ट के निशाने पर रही. आनेवाले समय में सुप्रीम कोर्ट के इन निर्णयों को देखते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ कोई भी सरकार किसी प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करने से पहले कई कई बार सोचेगी.  
अरुणाचल मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
जस्टिस जगदीश सिंह केहर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एमबी लोकुर, न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति एनवी रमन शामिल हैं। उच्चतम न्यायालय ने नबाम रेब़िया एवं बमांग फ़ेलिक्स बनाम भारत संघ एवं अन्य वाद,2016 में सर्वसम्मति से लिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में जनवरी में अरुणाचल प्रदेश की तत्कालीन नबाम तुकी सरकार के गिरने के लिए जिम्मेदार राज्यपाल के सभी फैसलों को रद्द करते हुए  इन्हें संविधान का उल्लंघन करने वाला करार दिया तथा नबाम तुकी के नेतृत्व वाली बर्खास्त कांग्रेसी सरकार को बहाल करने का आदेश दिया। परिणामतः कोर्ट की नज़रों में सोलह दिसम्बर और उसके बाद स्पीकर की बर्खास्तगी, राष्ट्रपति शासन और फिर राष्ट्रपति शासन की वापसी की पृष्ठभूमि में कालीखो पूल के नेतृत्व में नयी सरकार का गठन जैसी घटनाएँ घटी ही नहीं. इसीलिये सुप्रीम कोर्ट ने इन घटनाओं पर विचार करने की ज़रुरत ही नहीं महसूस की. 
अरुणाचल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को निम्न सन्दर्भों में देखा जा सकता है:

A. राज्यपाल की भूमिका
1.    राज्यपाल के विवेकाधिकार के सन्दर्भ में संवैधानिक बेंच ने सरकारिया आयोग और पूँछी आयोग की रिपोर्टों के आलोक में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि अनुच्छेद 163(2) राज्यपाल को असीमित विवेकाधिकार नहीं प्रदान करता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल संवैधानिक विवेकाधिकार का इस्तेमाल तभी कर सकते हैं जब वे किसी संवैधानिक सिद्धांत पर आधारित हों, अन्यथा नहीं. लेकिन, यह राज्यपाल के अधिकार से बाहर है कि वह अपनी संवैधानिक स्थिति का इस्तेमाल करते हुए इन राजनीतिक विवादों को सुलझाने की कोशिश करे।
2.    संविधान सभा की बहसों के आलोक में संवैधानिक बेंच ने यह फैसला किया कि संविधान-निर्माताओं ने राज्यपाल को बिना मंत्रीपरिषद की सलाह के विधानसभा के निर्धारित सत्र को पहले बुलाने की शक्ति नहीं प्रदान की है, या फिर दूसरे शब्दों में कहें, तो इस शक्ति से राज्यपाल को वंचित रखा है. इसी पृष्ठभूमि में संवैधानिक बेंच ने अनुच्छेद 163(2) को अनुच्छेद 174 के साथ जोड़कर पढ़ते हुए विधानसभा के सत्र को निर्धारित तिथि 14 जनवरी 2016 से एक महीने पूर्व 16-18 दिसम्बर 2015 पहले बुलाने से सम्बंधित राज्यपाल के आदेश को असंवैधानिक मानते हुए खारिज कर दिया.
3.    अनुच्छेद 163 को अनुच्छेद 175 के साथ पढ़ते हुए संवैधानिक बेंच ने (16-18) दिसम्बर, 2015 के दौरान संपन्न अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के छठे सत्र की कार्यवाही के एजेंडे के निर्धारण से सम्बंधित राज्यपाल के निर्देश को भी असंवैधानिक माना.
4.    फलतः नौ दिसम्बर, 2015 को राज्यपाल द्वारा जारी निर्देश का अनुपालन करते हुए  जो भी कार्यवाही की गई, उसे खारिज कर दिया गया.
5.    संविधान के दायरे में रहते हुए गवर्नर राष्ट्रपति को समय-समय पर सूचना देते रहें, इसमें कुछ गलत नहीं है; लेकिन, खुद राजनीति में कूदना नैतिक रूप से और संवैधानिक तौर पर गलत है।
6.    सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल कानून का जिक्र करते हुए कहा कि दो तिहाई विधायकों के अलग होने पर ही उसे मान्यता दी जा सकती है। साठ सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 47 विधायक निर्वाचित हुए थे। इनमें से 21 ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया। यह संख्या कानूनी रूप से उन्हें अलग गुट की मान्यता प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः अवैध रूप से अलग हुए गुट को लेकर राज्यपाल की कार्रवाई को संवैधानिक रूप से मंजूरी नहीं दी जा सकती।
7.    अनुच्छेद 356 के तहत संवैधानिक ढांचे पर चोट पहुंचने का मामला बिलकुल अलग है। लेकिन, दल-बदल कानून का समस्त दायरा विधानसभा में निहित है। इसके लिए संविधान अंतिम उपाय है। जैसा कि 14 विधायकों ने अपनाया और सदस्यता समाप्त करने के आदेश को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी और स्थगनादेश हासिल किया।
8.    ‘पहले निर्णय से लेकर तीसरे निर्णय के मद्देनजर 15 दिसम्बर 2015 की यथास्थिति बहाल करने का आदेश दिया जाता है।
9.    जस्टिस मदन बी. लोकुर ने अपने ऑब्जर्वेशन में कहा कि राज्यपाल ने 14 दिसम्बर,2015 को मंत्रीपरिषद द्वारा भेजे गए प्रस्ताव की अनदेखी कर निर्वाचित सरकार को नीचा दिखलाया है क्योंकि इससे इस बात का संकेत मिलता है कि उस दिन राज्यपाल और निर्वाचित सरकार के बीच संवाद पूरी तरह से टूट चुका था, जबकि इस स्थिति से बचने के लिए संविधान-निर्माताओं ने उत्तरदायी सरकार की संकल्पना को स्वीकार किया था. असंवाद की इस स्थिति में उत्पन्न गतिरोध को दूर करने की दिशा में पहल की जिम्मेवारी राज्यपाल की बनती है.
इस निर्णय का महत्व इस बात में है कि इसने राज्यपाल के विवेकाधिकार के बारे में अस्पष्टता को दूर किया जिसकी लम्बे समय से प्रतीक्षा थी और जो भविष्य में ऐसी ही स्थितियों में राज्यपाल पर  बाध्यकारी होगा. भविष्य में राजभवन राजनीति का अड्डा नहीं बनेगा या राजभवन से राजनीति नहीं की जा सकेगी. संवैधानिक बेंच की नज़रों में राज्यपाल का व्यवहार केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि यह स्पष्ट रूप से निष्पक्ष प्रतीत भी होना चाहिए। उत्तर-पूर्व के छोटे से राज्य अरुणाचल प्रदेश की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने के मसले पर संविधान पीठ का फैसला राज्यपाल के अधिकारों के बारे में मील का पत्थर साबित होगा। लेकिन, प्रश्न यह उठता है कि उत्तराखंड हो या अरुणाचल, दोनों ही मामलों में राज्यपाल कोर्ट के फैसले के बाद भी अपने पद पर बने रहे, तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का नैतिक मतलब क्या रह जाता है?
B.  स्पीकर की भूमिका:
इस फैसले का महत्व यहीं तक सीमित नहीं है. इस फैसले में स्पीकर की भूमिका को भी पुनर्परिभाषित किया गया है जिसका तत्काल प्रभाव उत्तराखंड मामले में देखने को मिला है जहाँ दलबदल के सन्दर्भ में उत्तराखंड विधानसभा के स्पीकर का निर्णय भी इस फैसले के आलोक में प्रश्न के घेरे में खड़ा किया गया है. इस मामले में अनुच्छेद 179(c) को दलबदल कानून में स्पीकर की भूमिका से जोड़कर देखते हुए इसकी पुनर्व्याख्या की गई है:
1.    जस्टिस दीपक मिश्रा ने अनुच्छेद 179(c) की व्याख्या करते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं की यह अपेक्षा थी कि स्पीकर या डिप्टी स्पीकर की बर्खास्तगी-प्रस्ताव पर मतदान के दौरान विधानसभा के सभी सदस्य मतदान में भाग लें. इसीलिये यदि विधानसभा के समक्ष स्पीकर को हटाये जाने का प्रस्ताव लंबित है, तो स्पीकर इस प्रस्ताव के निपटारे तक दलबदल से सम्बंधित मामलों में निर्णय नहीं सुनायेंगे.
2.    अनुच्छेद 179 स्पीकर को हटाने से सम्बंधित मसले में राज्यपाल को दखल का अधिकार नहीं देता है। विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने का काम विधायकों का है। अगर राज्यपाल इन सब बातों में दखल देता है, तो उसके हर कदम को संदेह की नजर से देखा जाएगा।
3.    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विधानसभा की कार्यवाही का एजेंडा तय करना राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। फिर भी, राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने विधानसभा-सत्र का एजेंडा तय किया।
4.    चौदह सदस्यों की सदस्यता रद्द करने से सम्बंधित स्पीकर के निर्णय को गोहाटी उच्च न्यायालय द्वारा अवैध करार दिए जाने को  सही माना क्योंकि निर्णय देते वक़्त स्पीकर के द्वारा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया.
5.    संवैधानिक बेंच ने स्पीकर द्वारा चौदह सदस्यों की सदस्यता रद्द किये जाने के आधार पर राज्यपाल के कृत्य के औचित्य को स्वीकार करने की बजाय कहा कि अगर स्पीकर ने चौदह सदस्यों की सदस्यता रद्द कर कुछ गलत किया है, तो उच्च न्यायालय में इसे चुनौती देते हुए इसका निराकरण संभव है. इस सन्दर्भ में राज्यपाल कुछ नहीं कर सकते हैं. 
इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो हम यह कह सकते है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला की संविधान सभा की बहसों और दलबदल कानून के आलोक में स्पीकर की भूमिका को पुनर्परिभाषित करता हुआ राज्यपाल-स्पीकर टकराव की संभावनाओं को टालता हुआ संविधान द्वारा निर्धारित दायरे में रहकर अपनी-अपनी जिम्मेवारियों के निर्वाह के मार्ग को प्रशस्त करता है.