Tuesday, 4 February 2020

नागरिकता-संशोधन अधिनियम,2019 (पार्ट वन)


नागरिकता-संशोधन अधिनियम,2019
प्रमुख पहलू
1.  नागरिकता अधिनियम,1955
2.  नागरिकता-संशोधन अधिनियम,2019: विविध पहलू
a. संशोधन की दिशा में पहल
b. प्रमुख प्रावधान
c.  नागरिकता संशोधन विधेयक,2016 से भिन्नता
d. पक्ष में तर्क
e.  भारत की रिफ्यूजी-नीति में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु
f.   अधिनियम के सकारात्मक पक्ष   
नागरिकता अधिनियम,1955:
नागरिकता अधिनियम,1955 आप्रवासियों को देशीयकरण के जरिये नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान करता है, लेकिन इसके लिए आप्रवासियों को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। यह अधिनियम उन शर्तों को पूरा करने की स्थिति में आप्रवासियों को देशीयकरण के जरिये नागरिकता प्राप्ति हेतु आवेदन करने की अनुमति प्रदान करता है। अधिनियम के अनुसार, इसके लिये अन्य बातों के अलावा:
a.  उन्हें आवेदन की तिथि से 12 महीने पहले तक भारत में निवास,
b.  और 12 महीने से पहले 14 वर्षों में से 11 वर्ष भारत में बिताने
की शर्त पूरी करनी होगी। लेकिन, मौजूदा क़ानून के तहत् भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है। मतलब यह कि देशीयकरण के द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की सुविधा केवल वैध आप्रवासियों को दी गयी है, न कि अवैध आप्रवासियों को। स्पष्ट है कि नागरिकता अधिनियम,1955 अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता है। इसके लिए अधिनियम के अंतर्गत अवैध आप्रवासी के रूप में ऐसे व्यक्ति को परिभाषित किया गया है:
a.  जिसने वैध पासपोर्ट या यात्रा-दस्तावेज़ों के बिना भारत में प्रवेश किया हो, या
b.  जो अपने निर्धारित समय-सीमा से अधिक समय तक भारत में रहता है।
इसी प्रकार पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम,1920 विदेशियों को अपने साथ पासपोर्ट रखने के लिये बाध्य करता है, जबकि विदेशी अधिनियम,1946 भारत में विदेशियों के प्रवेश एवं प्रस्थान को नियंत्रित करता है। इसी आलोक में संशोधित अधिनियम अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता और इससे सम्बद्ध लाभों को प्रदान करने के लिये उन्हें विदेशी अधिनियम,1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम,1920 के तहत् भी छूट प्रदान करता है।

पार्ट 1: नागरिकता-संशोधन अधिनियम: विविध पहलू

संशोधन की दिशा में पहल:
दिसम्बर,2019 में केंद्र सरकार ने भारत की नागरिकता से सम्बंधित प्रावधानों को उदार बनाने की दिशा में पहल करते हुए नागरिकता-संशोधन अधिनियम,2019 को अंतिम रूप दिया। इसके पहले भी सन् 2016 में नागरिकता-संशोधन विधेयक को पारित करवाने की कोशिश की गयी थी, लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण सरकार उस समय हिम्मत नहीं जुटा पायी। लेकिन, मई,2019 में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब रहे सत्तारूढ़ दल का आत्मविश्वास बढ़ा है और अब वह उन एजेंडों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने में लगी है जिनका उल्लेख उसके घोषणा-पत्र में किया गया है। इसकी झलक पहले अनु. 370 के तहत् जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे की वापसी, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा-प्राप्त पूर्ण राज्य से केंद्र-शासित प्रदेश में तब्दील करने और अब नागरिकता संशोधन अधिनियम के रूप में दिखाई पड़ती है।
प्रमुख प्रावधान:
1.  देशीयकरण के जरिये भारतीय नागरिकता की प्राप्ति के प्रावधानों को उदार बनाना: यह अधिनियम अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उन छह अल्पसंख्यक समुदायों: हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई एवं पारसी धर्म के लोगों, जो वैध या अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर गए और वर्तमान में अवैध रूप से भारत में रह रहे है, को भारतीय नागरिकता प्रदान करने की दिशा में पहल करता है और इसके लिए नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों को उदार बनाता है।
2.   नयी कट-ऑफ तिथि का निर्धारण: सन् 2016 में प्रस्तुत एवं लोकसभा से पारित बिल में किसी कट-ऑफ तिथि का उल्लेख नहीं था; पर हाल में पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम,2019 की धारा 2 में इसका निर्धारण 31 अक्टूबर,2014 के रूप में किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि जो लोग दिसम्बर,2014 तक भारत आ चुके हैं, उन्हें भारत की नागरिकता प्रदान की जा सकती है, बशर्ते वे अन्य शर्तों को पूरा करते हों।
3.  पासपोर्ट अधिनियम,1920 में संशोधन करते हुए उसे उदार बनाना: प्रस्तावित अधिनियम के ज़रिये केंद्र सरकार ने पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम,1920 में संशोधन का प्रावधान करते हुए अफगानिस्तान, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश: इन तीनों देशों के अल्पसंख्यक आप्रवासियों को अधिनियम के प्रावधानों से छूट प्रदान की। ध्यातव्य है कि पासपोर्ट अधिनियम केंद्र सरकार को इस बात के लिए अधिकृत करता है कि वह भारत में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के सन्दर्भ में पासपोर्ट धारण करने से सम्बंधित नियम एवं कानून बना सके और उससे सम्बंधित शर्तों या उन शर्तों से छूट से सम्बद्ध प्रावधान कर सके। 
4.  विदेशी अधिनियम,1946 में संशोधन करते हुए इससे छूट प्रदान करना: इसके लिए केंद्र सरकार के द्वारा उन्हें विदेशी अधिनियम,1946 में संशोधन करते हुए इससे छूट प्रदान की गयी है। विदेशी अधिनियम सरकार को इस बात के लिए अधिकृत करता है कि वह भारत में गैर-नागरिकों के प्रवेश के नियमन एवं प्रतिषेध सन्दर्भ में नियम बना सके और उसके अनुरूप आदेश जारी कर सके। सरकार अगर चाहे, तो किसी विदेशी, व्यक्ति या समूह को इस अधिनियम के प्रावधानों से छूट भी प्रदान कर सकती है। इसी आलोक में सन् 2015 में पाकिस्तानी एवं बांग्लादेशी नागरिकों को और सन् 2016 में अफगानिस्तानी नागरिकों को इन प्रावधानों से छूटें दी गयीं, जिनकी वैधानिकता को अबतक कहीं भी और किसी भी रूप में चुनौती नहीं दी गयी। सरकार का यह तर्क है कि प्रस्तावित अधिनियम उपरोक्त दिशानिर्देशों के कारण उत्पन्न विसंगतियों को दुरूस्त करता है। साथ ही, उपरोक्त तीनों देशों के नागरिकों को दीर्घावधिक वीजा प्रदान करने के उद्देश्य से भी इसी प्रकार का वर्गीकरण किया गया है जिसे अबतक किसी भी रूप में चुनौती नहीं दी गयी है।      
5.  समय-सीमा का पुनर्निर्धारण: यह अधिनियम तीसरी अनुसूची में संशोधन करते हुए वैध एवं अवैध विदेशी आप्रवासियों के लिए देशीयकरण के द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की समय-सीमा को उदार बनता है। अब उन्हें भारत में पिछले 14 वर्षों में 11 वर्ष की बजाय 5 वर्ष की निवास की शर्त, या फिर भारत सरकार की सेवा में रहने की शर्त पूरी करनी होगी। सन् 2016 में प्रस्तावित बिल में इस समय-सीमा को घटाकर 6 वर्ष किया जाना था।
6.  भूतलक्षी प्रभाव से लागू: इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत् नागरिकता प्राप्त होने की स्थिति में सम्बंधित व्यक्ति भारत में प्रवेश की तिथि से ही भारत का नागरिक माना जाएगा, और अवैध आप्रवासन से सम्बंधित उसके विरुद्ध दर्ज सारे मामले वापस लिए जायेंगे एवं इससे सम्बंधित वैधानिक प्रक्रिया रोक दी जायेगी।
7.  अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहार रखना: संविधान की छठी अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा मिज़ोरम के आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिये विशेष उपबंध किये गए हैं। इसीलिए शिलॉन्ग को छोड़कर संपूर्ण मेघालय, मिज़ोरम, असम एवं त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है। दूसरे शब्दों में, इस अधिनियम के प्रावधान छठी अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित असम के आदिवासी-बहुल कर्बी आंगलोंग क्षेत्र, मेघालय के गारो हिल्स क्षेत्र, मिजोरम के चकमा जिला क्षेत्र एवं त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्र जिला के उन क्षेत्रों में नहीं लागू नहीं होंगे। 
8.  इनर-लाइन परमिट व्यवस्था का सन्दर्भ: यह अधिनियम उन क्षेत्रों में भी लागू नहीं होगा जहाँ बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत् इनर-लाइन परमिट व्यवस्था लागू है। इसके तहत् अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम एवं नागालैंड में भारतीयों की आवाजाही का नियमन किया जाता है। उपरोक्त दोनों प्रावधान सन् 2016 में प्रस्तावित विधेयक में शामिल नहीं थे, लेकिन इन्हें उत्तर-पूर्वी भारत के राज्यों की चिंताओं के मद्देनज़र नए विधेयक में ज़गह दी गयी। स्पष्ट है कि फिलहाल पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों में इनर-लाइन परमिट लागू नहीं होता है, इसीलिए इस व्यवस्था के तहत् संरक्षित राज्य: नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर तथा मिज़ोरम को इस अधिनियम के प्रावधानों से बाहर रखा गया है। ध्यातव्य है कि मणिपुर नवीनतम राज्य है जिसे इस अधिनियम के विधायन के क्रम में ही इनर-लाइन परमिट व्यवस्था के दायरे में लाने की घोषणा की गयी।
9.  कानून-उल्लंघन की स्थिति में ओसीआई कार्ड रद्द : नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार, केंद्र सरकार किसी भी ओवरसीज सिटीजन ऑफ़ इण्डिया(OCI)  कार्डधारक के पंजीकरण को निम्नलिखित आधार पर रद्द कर सकती है:
a.  यदि ओसीआई पंजीकरण में कोई धोखाधड़ी सामने आती है।
b.  यदि पंजीकरण के पाँच साल के भीतर ओसीआई कार्डधारक को दो साल या उससे अधिक समय के लिये कारावास की सज़ा सुनाई गई है।
c.  यदि ऐसा करना भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिये आवश्यक हो।
प्रस्तावित विधेयक में ओसीआई कार्डधारक के पंजीकरण को रद्द करने के लिये एक और आधार जोड़ने की बात की गई है, जिसके तहत् यदि ओसीआई कार्डधारक अधिनियम के प्रावधानों या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य कानून का उल्लंघन करता है, तो भी केंद्र के पास उस ओसीआई कार्डधारक के पंजीकरण को रद्द करने का अधिकार होगा। ध्यातव्य है कि भारत में दोहरी नागरिकता की सुविधा नहीं है जिसके कारण भारत आने में उन लोगों को परेशानी होती है जो किसी अन्य देश की नागरिकता ले चुके हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए ओसीआई कार्ड के जरिये बीच का रास्ता निकलने का प्रयास किया गया और भारत आने के लिए उन्हें वीजा आदि से सम्बंधित विशेष सुविधाएँ प्रदान की गयीं। इसके प्रावधान पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन(PIO) कार्ड, जिसे सन् 2015 में समाप्त कर दिया गया, के प्रावधानों की तुलना में कहीं अधिक उदार थे।
नागरिकता संशोधन विधेयक,2016 से भिन्नता:
नागरिकता-संशोधन अधिनियम,2019 के प्रावधान वही नहीं हैं, जो प्रस्तावित नागरिकता-संशोधन विधेयक,2016 के थे। अधिनियम के प्रावधान निम्न सन्दर्भों में सन् 2016 में प्रस्तावित विधेयक से भिन्न हैं:
a.  भूतलक्षी प्रभाव से लागू होने का प्रावधान, अर्थात् प्रवेश की तारीख से भारत का नागरिक माना जाना और अवैध प्रवास के संबंध में उनके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही बंद करने से सम्बंधित प्रावधान नए हैं। ये प्रावधान वर्ष 2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक में नहीं थे।
b.  छठी अनुसूची में शामिल अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों और इनर लाइन परमिट वाले क्षेत्र पर लागू नहीं: छठी अनुसूची में शामिल अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों और इनर लाइन परमिट वाले क्षेत्र को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखने के प्रावधान भी नए हैं जिनका सन् 2016 में प्रस्तावित विधेयक में उल्लेख नहीं था।
c.  पाँच वर्ष की समय-सीमा: वर्ष 2016 के विधेयक में अवैध प्रवासियों के लिये देशीयकरण के जरिये नागरिकता हेतु 11 वर्ष की समय-सीमा को घटाकर 6 वर्ष करने का प्रावधान किया गया था, जबकि इस अधिनियम में इसे 5 वर्ष कर दिया गया है।
पक्ष में तर्क:
इस अधिनियम के पक्ष में केंद्र सरकार का यह कहना है कि तीनों पड़ोसी इस्लामिक देशों के इन गैर-मुस्लिम आप्रवासियों को अपने-अपने देशों में ‘धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न’ का सामना करना पड़ा है और इस उत्पीड़न ने उन्हें अपना देश छोड़ने के लिए विवश किया है। लेकिन, भारत के विभिन्न हिस्सों में अवैध रूप से रह-रहे इन आप्रवासियों को काफी मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा है और ये उन नागरिक सुविधाओं एवं बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं जिनका इन्हें हकदार होना चाहिए। इस कानून के समर्थकों का तर्क है कि दिसम्बर,2014 तक की डेडलाइन को इस संदर्भ में एक आधार-रेखा मानकर सरकार ने यह तय किया कि इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत् भारतीय राज्य पाँच वर्षों से भारत में रह रहे इन तीन राज्यों के गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ मुसलमानों से अलग व्यवहार करेगा और उन्हें नागरिकता प्रदान करता हुआ उनके लिए इन अधिकारों एवं बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा। इस रूप में इस अधिनियम के प्रावधान देश की पश्चिमी सीमाओं से गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में आए धार्मिक उत्पीड़न के शिकार आप्रवासियों को राहत प्रदान करेंगे।
जहाँ तक अवैध मुस्लिम-प्रवासियों की नागरिकता का प्रश्न है, तो  पाकिस्तान, बांग्लादेश, और अफगानिस्तान, से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों को संशोधित नागरिकता कानून के अंतर्गत नागरिकता इसलिए नहीं दी गई कि मुसलमान इन तीनों ही राज्यों में बहुसंख्यक हैं और इस्लाम इन तीनों ही राज्यों का राज्य-धर्म है। ऐसे में इन तीनों राज्यों से मुसलमानों के भारत आने का कारण बेहतर अवसरों की तलाश है, न कि धार्मिक-उत्पीड़न। सरकार की दृष्टि में इन्हें नागरिकता न देना उचित ही है क्योंकि कोई भी राज्य अपने आर्थिक संसाधनों एवं रोजगार-अवसरों को विदेशियों के साथ बाँटने के लिए नागरिकता नहीं देता है।
सरकार का यह भी कहना है कि इस अधिनियम के जरिये किसी की नागरिकता छीनी नहीं जा रही है, वरन् उन ज़रूरतमंद आप्रवासियों को नागरिकता दी जा रही है जो अबतक इससे वंचित रहे हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अधिनयम का भारतीय मुसलमान नागरिकों से कोई संबंध नहीं है और ना ही यह अधिनियम उनके अधिकारों को किसी भी तरीके से कम करता है।   
केंद्र सरकार का यह मानना है कि पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बंधित लोगों के साथ-साथ भारतीय मूल के कई लोग भारतीय मूल से अपनी सम्बद्धता के समर्थन में साक्ष्य देने और नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत् नागरिकता पाने में असफल रहते हैं, इसलिये उन्हें देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के लिये आवेदन करना पड़ता है। देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत लंबी एवं जटिल है। इसके कारण उनके लिए अपने को भारतीय मूल का साबित कर पाना और इसके समर्थन में साक्ष्य दे पाना मुश्किल होता है। फलतः वे नागरिकता हासिल कर पाने में असमर्थ रहते हैं। स्पष्ट है कि सरकार मानवीय आधार पर इस विधायन के औचित्य को सिद्ध करना चाहती है।
केंद्र सरकार ने इस अधिनियम के पक्ष में जो तर्क दिए हैं, उसके अलावा इस अधिनियम के पक्ष में निम्न तर्क दिए जा रहे हैं:
1.  नेहरू-लियाकत समझौता के अनुरूप: केंद्र सरकार का यह भी तर्क है कि सन् 1950 में हुए नेहरू-लियाकत समझौता का पाकिस्तान द्वारा पालन नहीं किए जाने के बाद इस प्रकार के कानून को तभी लागू कर दिया जाना चाहिए था। सरकार का यह भी कहना है कि यह गाँधी के द्वारा किये गए वादों एवं उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप ही है।
2.  युक्तियुक्त वर्गीकरण की श्रेणी में: संशोधित नागरिकता कानून न तो अनु. 14 में उल्लिखित विधि के समक्ष समानता के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता है, क्योंकि अनु. 14 में तार्किक आधारों पर वर्गीय विभेद की अनुमति दी गयी है जिसे ‘युक्तियुक्त वर्गीकरण’ (Reasonable Classification) कहा गया है। संसद के पास यह शक्ति है कि वह दो वर्गों के बीच ऐसे किसी भी भेद को तार्किक आधार पर विधि में बदल सकें।
3.  अनु. 15 और अनु. 25 का उल्लंघन नहीं: जहाँ तक अनु, 15 का प्रश्न है, तो यह केवल नागरिकों के सन्दर्भ में लागू होता है, न कि विदेशियों के सन्दर्भ में भी। इनका यह भी कहना है कि यह कानून अनु. 25 के भी विरुद्ध नहीं है। इनका तर्क यह है कि जातिगत भेदभावों के संवैधानिक निषेध के बावजूद जिस प्रकार वर्णव्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में सामाजिक प्रताड़ना एवं अन्याय की शिकार जातियों के लिए जातिगत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, उसी प्रकार इन तीन देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए भी धार्मिक प्रताड़ना के आधार पर दी गयी रियायत उचित है। इनका कहना है कि चूँकि संविधान स्वयं असमान लोगों को समान नहीं मानता है और उनके साथ असमान व्यवहार की छूट देता है, इसलिए कानून के नजरिए से नागरिकता कानून संविधान के विरुद्ध नहीं है।
4.  अस्थायी उपबन्ध, न कि स्थायी: इस अधिनियम के पक्ष में तर्क देते हुए कहा जा रहा है कि यह कोई स्थाई कानून नहीं है, वरन् अस्थाई कानून है जो दिसंबर,2014 तक इन तीन इस्लामिक राज्यों से भारत आए हुए धार्मिक उत्पीड़न के शिकार गैर-मुसलमानों को नागरिकता ने के साथ निष्प्रभावी हो जाएगा।
5.  मुस्लिम आप्रवासियों के लिए वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध: यह अधिनियम दुनिया के किसी भी मुल्क के मुसलमान के लिए भारतीय नागरिकता पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाता है।  पहले की ही भाँति इन तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों के मुसलमानों के साथ-साथ अन्य देशों से आने वाले मुसलमानों एवं गैर-मुसलमानों को नागरिकता कानून,1955 के पुराने प्रावधानों के तहत् ही भारतीय नागरिकता मिल सकेगी। इस प्रकार इन तीन पड़ोसी देशों को छोड़कर बाकी देशों से आने वाले आप्रवासियों के संदर्भ में यह अधिनियम मुस्लिमों एवं गैर-मुस्लिमों के बीच न तो किसी प्रकार का भेदभाव करता है और न ही उन्हें कोई विशेषाधिकार प्रदान करता है।
सरकार नागरिकता-संशोधन अधिनियम के विरोध को पूरी तरह से राजनीतिक मानती है। उसका यह तर्क है कि एनआरसी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद असम में शुरू हुई प्रक्रिया का उस समय न तो अल्पसंख्यक समूहों के द्वारा विरोध किया गया था और न ही राजनीतिक दलों के द्वारा, लेकिन अब राजनीतिक कारणों से इस मसले को तूल दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, सरकार का यह भी कहना है कि जब सन् 2016-17 में नागरिकता अधिनियम से सम्बंधित नियमावली में संशोधन किया गया था, तब किसी ने इन संशोधनों का विरोध नहीं किया, लेकिन अब जब इन संशोधनों को नागरिकता अधिनियम में शामिल किया जा रहा है, तो इसे राजनीतिक मसला बनाकर इसका विरोध किया जा रहा है।  
भारत की रिफ्यूजी-नीति में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु:  
यद्यपि भारत ने रिफ्यूजी पर अंतर्राष्ट्रीय संविदा पर हस्ताक्षर नहीं किया है, पर सन् 1959 में भारतीय संसद में तिब्बती शरणार्थियों के सन्दर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने जो बाते कहीं, उससे तीन बातें सामने आती हैं:
a.  रिफ्यूजी के प्रति मानवीय नज़रिया अपनाया जाएगा और उसी के अनुरूप उनका स्वागत किया जाएगा।
b.  रिफ्यूजी-समस्या द्विपक्षीय समस्या है।
c.   सामान्य स्थिति की पुनर्बहाली के पश्चात् रिफ्यूजियों को वापस अपने मूल देश लौट जाना चाहिए। 
इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह बिल भारत की रिफ्यूजी-नीति में महत्वपूर्ण बदलावों की ओर इशारा करता हुआ रिफ्यूजी के अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है और उसके संरक्षण को सुनिश्चित करता है। लेकिन, बेहतर यह होता कि बिल में अल्पसंख्यकों के बजाय पीड़ित समूह की चर्चा होती, चाहे उनका सम्बन्ध अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े या बहुसंख्यक समुदाय से। जैसे अहमदिया को पाकिस्तान में मुसलमान ही नहीं माना जाता है और वे वहाँ विभेद के शिकार हैं। यही स्थिति म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की है। यह स्थिति भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के भी अनुरूप होती, जो धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण का आश्वासन देता है। 
अधिनियम के सकारात्मक पक्ष:
निश्चय ही इस पहल से उन लोगों को न केवल भारत की नागरिकता मिल सकेगी जो भारत के विभिन्न हिस्सों में अवैध घुसपैठियों वाली स्थिति में रह रहे हैं और उन बुनियादी मानवीय सुविधाओं की उपलब्धता भी संभव हो सकेगी जिनसे वे अबतक वंचित हैं। इससे नागरिक सुविधाओं तक ऐसे लोगों की पहुँच भी संभव हो सकेगी और उन्हें वे संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त हो सकेंगे जो अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशियो को नहींI यह इस अधिनियम का सकारात्मक पक्ष है। निश्चय ही इससे इनके जीने की परिस्थितियाँ भी बदलेंगी और उनमें सुधार होगा।
केंद्र सरकार की इस बात के लिए भी तारीफ करनी होगी कि उसने पूर्वोत्तर भारत के राज्यों एवं वहाँ के लोगों की चिंताओं के निराकरण के लिए मूल विधेयक में कुछ बदलाव किये और छठी अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों और स्वायत्त जिलों के साथ-साथ आवा-जाही हेतु इनर-लाइन परमिट की आवश्यकता वाले क्षेत्रों को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि बढ़ते घुसपैठ की पृष्ठभूमि में जनजातीय संस्कृति एवं पहचान पर उत्पन्न संकट की आशंकाओं को निरस्त किया जा सके। इतना ही नहीं, मणिपुर की चिंताओं के समाधान के लिए उसे इनर-लाइन परमिट व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया और इस प्रकार उसे भी इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया।

Wednesday, 29 January 2020

गाँधी और गाँधीवाद: वर्तमान सन्दर्भ में प्रासंगिकता

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गाँधी और गाँधीवाद: वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता ====================================
आज हम ऐस दौर में जी रहे हैं, जिसमें गाँधी को जानना और समझना किसी अपराध से कम नहीं है, मानने की तो बात ही छोड़ दें। यह अपने आप में यह बतलाने के लिए काफ़ी है कि आज हमें गाँधी की कितनी ज़रूरत है और कितनी ज़रूरत है उनको न केवल जानने और समझने की, वरन् उनको मानने की भी।
अब प्रश्न यह उठता है कि जिस गाँधीवाद के माध्यम से हम गाँधी तक पहुँच सकते हैं, वह गाँधीवाद क्या है? गाँधीवाद समय एवं परिस्थितियों के सापेक्ष विकसनशीलशील अवधारणा है, न कि स्थिर धारणा। इसके स्वरूप के निर्धारण में दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष से लेकर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के विभिन्न चरणों तक के दौरान प्राप्त अनुभवों की अहम् भूमिका रही। इसे गाँधी के अहिंसात्मक सत्याग्रह की संकल्पना के परिप्रेक्ष्य में देखा एवं समझा जा सकता है, जिसके मूल में गौतम बुद्ध का अहिंसावाद है। जहाँ फ़रवरी,1922 में चौरी-चौरा काण्ड के बाद गाँधी ने असहयोग आन्दोलन को वापस ले लिया, वहीं सन् 1931 में चटगाँव, शोलापुर एवं पेशावर की हिंसक घटनाओं के बावजूद उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को जारी रखा। आगे चलकर, सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान होनेवाली हिंसा की आलोचना करने की बजाय गाँधी ने उसे ‘ब्रिटिश दमन की प्रतिक्रिया में उपजी हुई हिंसा’ बतलाकर जस्टिफाई किया। इतना ही नहीं, गाँधी ने अहिंसा को लेकर व्यावहारिक नज़रिया अपनाते हुए कहा कि अगर अहिंसा कायरता का रूप लेने लगे, तो मैं हिंसक हो जाना पसन्द करूँगा। स्पष्ट है कि गाँधी ने अहिंसात्मक सत्याग्रह के जरिए शक्तिशाली ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के समक्ष ऐसी नैतिक दुविधा उत्पन्न की जिसकी उसके पास कोई काट नहीं थी और इसी कारण इसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को आज़ादी की तार्किक परिणति तक पहुँचाया।
दरअसल गाँधीवाद आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में भारतीय चिन्तन परम्परा की पुनर्व्याख्या है जिसकी ज़रूरत औपनिवेशिक शासन की पृष्ठभूमि में उसके द्वारा उत्पन्न चुनौतियों ने महसूस करवाई। इसके केन्द्र में सहिष्णुता एवं समन्वय का वह तत्व है जो वैष्णव धर्म एवं वैष्णव संस्कारों के प्राण-तत्व हैं। इसे ही तद्युगीन ज़रूरतों के आलोक में गौतम बुद्ध के यहाँ ‘मध्यमा प्रतिपदा’ और तुलसी के यहाँ ‘विरूद्धों के सामंजस्य’ के रूप में अभिव्यक्ति मिली है, और इसे ही गाँधी के यहाँ ‘सर्वधर्मसमभाव’ के रूप में अभिव्यक्ति मिली है। इसके बिना न तो विदेशी पराधीनता के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई को तार्किक परिणति तक पहुँचाया जा सकता था, और न ही विविधताओं से भरे भारतीय समाज एवं संस्कृति के ताने-बानों को ही सुरक्षित रखा जा सकता था। शायद यही कारण है कि अंग्रेज़ों ने मुस्लिम एवं हिन्दू सम्प्रदायवादियों के माध्यम से उनकी इस सोच को निरन्तर चुनौती दी। इसके परिणामस्वरूप गाँधी इन दोनों के निशाने पर रहे और यहाँ तक कि गाँधी और उनके नेतृत्व वाले काँग्रेस के ख़िलाफ़ इन दोनों ने एक दूसरे हाथ तक मिलाया। गाँधी जीवनपर्यन्त इन दोनों ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ते रहे, और अब जबकि वो हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी सोच इन ताक़तों के ख़िलाफ़ निरन्तर लड़ रही है और इनके प्रहारों का सामना कर रही है। आज भी यह सोच गाँधी और गाँधीवाद को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानती हुई उसे निरन्तर अप्रासंगिक बनाने की कोशिश में उनके चरित्र-हनन की कोशिश में लगी है। पहले इस सोच ने गाँधी की हत्या की, और अब यह सोच गाँधीवाद की हत्या पर उतारू है।
इस क्रम में यह भी जानने की आवश्यकता है कि गाँधी के लिए ‘सर्वधर्मसमभाव’ का मतलब मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं है। अगर ऐसा होता, तो राष्ट्रीय आन्दोलन के अन्तिम दिनों में गाँधी न तो मुस्लिम साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ नोआखाली की सड़कों पर उतरते और न ही सके विरूद्ध संघर्ष करते हुए हिन्दुओं को बचाने की कोशिश करते। इसीलिए अगर हम भारत और भारतीयता से प्यार करते हैं, तो हमारी यह नैतिक ज़िम्मेवारी बनती है कि हम गाँधी और गाँधीवाद के मूल्यों को महफ़ूज़  रखें, क्योंकि ये दोनों भारत एवं भारतीयता से अभिन्न हैं। यह भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत एवं गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए भी आवश्यक है, और भारत की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की अक्षुण्णता के लिए भी आवश्यक।
इससे इतर हटकर देखें, तो पारम्परिक धारणाओं के विपरीत गाँधीवाद भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना के लिए भी चुनौती बनकर आता है। उन्होंने एक ओर राष्ट्रीय आन्दोलन के अहिंसक स्वरूप की परिकल्पना के जरिए राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी के मार्ग को प्रशस्त किया, दूसरी ओर इन्द्रिय-संयम एवं नैतिक शुद्धि पर बल देते हुए उनके पुरूष सहकर्मियों को इस बात को लेकर आश्वस्त किया कि महिलाएँ घर के बाहर भी सुरक्षित हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने चरखे के माध्यम से भारतीय महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के मार्ग को प्रशस्त किया। शायद इसीलिए सुमित सरकार जैसे मार्क्सवादी भी नारी-मुक्ति में गाँधी के अप्रतिम योगदान को रेखांकित करते हैं।
अप्रासंगिक नहीं हैं गाँधी:
आज गाँधी की  कितनी प्रासंगिकता है, इसका अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कल तक जो लोग गाँधी का नाम तक लेना पसन्द नहीं करते थे, आज उन्हें उग्र दक्षिणपंथी हिन्दुत्व से लड़ने के लिए गाँधी की ज़रूरत शिद्दत से महसूस हो रही है। शाहीनबाग से लेकर सब्जीबाग तक, सब्जीबाग से लेकर नवाबगंज तक और नवाबगंज से लेकर शान्तिबाग तक जो लड़ाइयाँ लड़ी जा रही है, उनमें गाँधीवादी तकनीक एवं रणनीति का इस्तेमाल सरकार को दुविधा की स्थिति में डाल रहा है। यह दुविधा तब और भी बढ़ जाती है जब सरकार लड़ाई के मोर्चे पर महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में खड़ा पाती है। आरम्भ में  यह आन्दोलन स्वतःस्फूर्त रहा और जब इसे उकसाने की कोशिश की गयी, तो इसने हिंसक रूप भी लिया। पर, जल्द ही आन्दोलनकारियॉ की समझ में यह बात आ गयी कि यदि आन्दोलन को मज़बूती से जारी रखना है, तो उसके अहिंसक रूप को सुनिश्चित करना होगा; और आज आलम यह है कि #CAA_NPR_NRC विरोधी यह आन्दोलन पूरे भारत में फैल चुका है और यह सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए इन आन्दोलनों में इसको समर्थन एवं संस्थागत आधार प्रदान करने वाले वामपंथियों को भी गाँधी एवं गाँधीवाद की जय करते देखा जा सकता है। इस प्रकार आज पूरा भारत गाँधी एवं गाँधीवाद की जय से गुँजायमान हो उठा है।
स्पष्ट है कि अहिंसा, सर्वधर्मसमभाव एवं स्त्री-स्वत्व गाँधी और गाँधीवाद के ऐसे मूल तत्व हैं जो गाँधीवाद को जिलाए रखने में सहायक हैं और जिसके कारण गाँधीवाद की प्रासंगिकता निर्विवाद है।

Thursday, 9 January 2020

हाँ, मैं निष्पक्ष नहीं!



हाँ, मैं निष्पक्ष नहीं!
हाँ, तुम निष्पक्ष हो!
हाँ, तुम निष्पक्ष हो,
क्योंकि.....
क्योंकि.....
तुम राष्ट्र के साथ खड़े हो,
राष्ट्रवाद के साथ खड़े हो,
सरकार के साथ खड़े हो,
चाटुकार के साथ खड़े हो,
पत्तलकार के साथ खड़े हो!
शासन भी तुम्हारा है,
प्रशासन भी तुम्हारा है;
साहस भी तुम्हारा है,
दुस्साहस भी तुम्हारा है;
छल भी तुम्हारा है,
बल भी तुम्हारा है,
कल भी तुम्हारा है;
प्रेस भी तुम्हारा है,
संचार भी तुम्हारा है;
सभा भी तुम्हारी है,
प्रभा भी तुम्हारी है।
हाँ, इसीलिए तुम निष्पक्ष हो!
लेकिन,
मैं निष्पक्ष नहीं,
न हूँ, और
न ही होना चाहता।
मेरा एक पक्ष है,
मैं ही प्रतिपक्ष हूँ,
मैं ही विपक्ष हूँ!
मेरी एक दरकार है,
मेरी एक सोच है,
मेरा एक विचार है,
मेरी अपनी आस्था है,
मेरे अपने संस्कार हैं।
मैं ज़िन्दा हूँ,
क्योंकि मैं सोचता हूँ,
मैं विचारता हूँ।
सोचने में मुझे अपने होने का बोध होता है।
मेरी सोच ने,
मेरे अनुभव ने
मुझे इस निष्कर्ष पर पहुँचाया
कि कोई निष्पक्ष हो ही नहीं सकता,
(निष्पक्षता का भ्रम चाहे वह जितना पाल ले।)
और होने की ज़रूरत भी नहीं।
मेरी आत्मा जीवित है,
अपना ज़मीर अभी मैंने बेचा नहीं है,
इसीलिए मेरा एक पक्ष है, और
मैं पक्षधर हूँ।
इस दौर में पक्षधरता बहुत ज़रूरी है,
क्योंकि जब अधिकांश लोग
निष्पक्ष होने लगें, तो
पक्षधरता ज़रूरी हो जाती है;
इसीलिए पक्षधरता है मेरी
उनके प्रति जिनका तुम इस्तेमाल करते हो;
अब वो चाहे अल्पसंख्यक हों,
या बहुसंख्यक;
दलित हों,
या आदिवासी;
महिलाएँ हों,
या बच्चे।
मेरा तो एक पक्ष है,
शायद इसीलिए
मेरे लिए सेक्यूलर होना
सिकुलर होना नहीं,
और न ही है मुस्लिम-तुष्टिकरण का पर्याय;
मेरे लिए ‘हिन्दुइज्म’
हिन्दुत्व का पर्याय नहीं, और
न ही हिन्दू होने का मतलब
साम्प्रदायिक हो जाना है;
मेरा धर्म मुझे
प्रेम का संदेश देता है,
न कि घृणा का।;
मैं खुद को कबीर की परम्परा में पाता हूँ,
तुलसी हैं आदर्श मेरे,
गाँधी को भी जानने की कोशिश की है मैंने।
मेरे लिए ‘विकास’ का मतलब
अम्बानी-अडानी का विकास नहीं,
जिसकी क़ीमत दलितों और आदिवासियों को चुकानी पड़ती है;
मेरे लिए विकास का मतलब है
उन आँखों में आशा,
उन चेहरों पर मुस्कान,
जिसके आँसू पोंछने का सपना प्यारे बापू ने देखा था।
इसीलिए मैंने कहा
कि न तो मैं निष्पक्ष हो सकता हूँ, और
न ही निष्पक्षता का दम्भ भर सकता।
यही फ़र्क़ है मुझमें और तुममें:
तुम्हारे लिए राष्ट्र ही सब कुछ है, पर
मेरे लिए मानव सर्वोपरि है।
तुम राष्ट्र के लिए
इन्सान और इन्सानियत को दाँव पर लगा सकते हो, और
मैं इन्सान और इन्सानियत के लिए
राष्ट्र को दाँव पर लगा सकता हूँ।
तुम्हारे लिए
पश्चिम से राष्ट्र की आयातित संकल्पना मायने रखती है,
और मेरे लिए ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ के भारतीय आदर्श;
तुम्हारे लिए एकरंगा महत्वपूर्ण है,
पर मेरे लिए तिरंगा।
हाँ, मेरा एक पक्ष है,
मैं संविधान के पक्ष में खड़ा हूँ, और
संविधान
‘हम भारत के लोग’ के पक्ष में;
इसीलिए मैं भी
‘हम भारत के लोग’ के पक्ष में खड़ा हूँ।
मेरा पक्ष प्रेम का है,
घृणा का नहीं;
समन्वय का है,
टकराव का नहीं;
समर्पण का है,
अहम् का नहीं;
इसीलिए तो मैं निष्पक्ष नहीं।
हाँ, तुम निष्पक्ष हो सकते हो,
मैं नहीं;
तुम निष्पक्षता का दम्भ भर सकते हो,
मैं नहीं।
(अजीत अंजुम सर से प्रेरित)
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Thursday, 2 January 2020

काँग्रेस का पुनर्जीवन: क्यों और कैसे

भले ही यह बात कितनी भी नागवार लगे, पर काँग्रेस देश की आत्मा है। काँग्रेस को बचाने की चिन्ता महज़ एक राजनीतिक दल को बचाने की चिन्ता नहीं है, वरन् एक बिन्दु पर आकर यह देश को बचाने की चिन्ता में तब्दील हो जाती है। आज काँग्रेस को देश की ज़रूरत हो अथवा नहीं और काँग्रेसियों को काँग्रेस की ज़रूरत हो अथवा नहीं, पर देश को शिद्दत से काँग्रेस की ज़रूरत है। तमाम ऊहापोहों के बीच हमें  आश्वस्त होना चाहिए कि काँग्रेस बचेगी, क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद यह उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है जिसका सम्बंध भारत एवं भारतीयता से है। इस आश्वस्ति का कारण यह भी है कि आज काँग्रेस के भीतर केवल एक व्यक्ति ऐसा हैं जो इस बात की ज़रूरत को समझ भी रहा है, और इसके लिए कोशिश भी कर रहा है; और वह व्यक्ति है राहुल गाँधी। लेकिन, यह भी सच है कि इसके लिए काँग्रेस को चापलूसों के चँगुल से बाहर निकलते हुए पार्टी के भी आंतरिक लोकतंत्र की पुनर्बहाली सुनिश्चित करनी होगी, अपने मृतप्राय संगठनों को पुनर्जीवित करना होगा, एसी कमरों एवं एसी गाड़ी से बाहर निकलकर सड़कों पर उतरते हुए संघर्ष का जज़्बा दिखलाना होगा, एसपीजी सुरक्षा की वापसी की बजाय जनता से जुड़े मसलों पर सड़कों पर आन्दोलन शुरू करना होगा और संसद के भीतर बहिष्कार एवं बहिर्गमन की नकारात्मक राजनीति को तिलांजलि देते हुए मूल मसलों पर सरकार को घेरने की कोशिश करनी होगी, ताकि उसे एक्सपोज़ किया जा सके। लेकिन, इस क्रम में उसे अपनी भूलों को भी स्वीकार करना होगा। पूरे भरोसे के साथ यह कहा जा सकता है कि जिस दिन काँग्रेस सड़कों पर होगी, भाजपा एवं संघ की ईंट से ईंट बज जायेगी। लेकिन, इसके लिए सड़े पत्तों, जो काँग्रेस पर कुँडली मारे बैठे हैं और जिनके कारण काँग्रेस की यह दुर्गति हुई है, को झड़ना पड़ेगा और इसमें थोड़ा समय लगेगा। इस चर्चा के क्रम में काँग्रेस को वामपंथ एवं दक्षिणपंथ के साथ अपने सम्बंधों को पुनर्परिभाषित करना होगा जिसके लिए इनके साथ काँग्रेस के अबतक के सम्बंधों पर दृष्टिपात अपेक्षित है।
काँग्रेस और दक्षिणपंथ:
काँग्रेस के भीतर देखा जाय, तो दो धाराएँ गाँधीवादी दौर में प्रवाहमान रही हैं: एक धारा दक्षिणपंथियों की थी जिसे राजेंद्र प्रसाद, राजाजी और पटेल नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, और दूसरी धारा समाजवादियों की थी जिसे अशोक मेहता, जय प्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव आदि नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। दक्षिणपंथियों की धारा गाँधी एवं गाँधीवाद के कहीं ज्यादा करीब थी। नेहरु एवं बोस वाम-रुझान वाले नेता थे, लेकिन बोस अस्थिर चित्त वाले थे और अपनी प्रकृति में भावुक थे। नेहरु का रुझान पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की ओर कहीं अधिक था और इस मायने में वे गाँधी से कहीं अधिक दूर थे। गाँधी मूलतः धार्मिक व्यक्ति थे और उनका रुझान हिंदुत्व की ओर था, पर उनके हिंदुत्व का सर्वधर्मसमभाव से मेल था। उनके द्वारा ‘रामचरित मानस’ की पंक्तियों को उद्धृत करना, राम-राज्य के प्रतीकों का इस्तेमाल आदि इस और इशारा करता है कि वे विशुद्ध वैष्णव थे और वैष्णव धर्म एवं वैष्णव संस्कारों में उनकी गहरी आस्था थी। उनका सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद पर गहरा प्रभाव था। शायद यही कारण है कि गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस हिन्दू संप्रदायवादियों और हिन्दू महासभा के नेताओं से दूरियाँ बनाकर नहीं चल पाई, जबकि मुस्लिम संप्रदायवादियों से दूरी बनाते हुए उसे सहज ही देखा जा सकता है। यह नेहरु का दबाव था कि सन् 1937 में संयुक्त प्रान्त में सरकार-गठन के मसले पर काँग्रेस ने कठोर रुख अपनाया और मुस्लिम लीग के प्रति समझौतावादी रुख अपनाने से इन्कार किया। लेकिन, गाँधी के रहते नेहरु का धर्मनिरपेक्षतावादी आग्रह पृष्ठभूमि में ही बना रहा और सर्वधर्मसमभाव वाली धार्मिकता काँग्रेसी धर्मनिरपेक्षता के केंद्र में बनी रही।
यह राष्ट्रीय आन्दोलन का अंतिम दौर था जब 1940 के दशक के मध्य में भारतीय राजनीति के संप्रदायीकरण की तेज़ होती प्रक्रिया और मुस्लिम साम्प्रदायिकता के उग्र चरण में प्रवेश ने नेहरु की धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा में आने का अवसर प्रदान किया। लेकिन, यही वह दौर था जब  सीधी कार्यवाही दिवस एवं अंतरिम सरकार के अनुभव ने पटेल को दक्षिणपंथी हिंदुत्व की ओर धकेला और वे गाँधी के ‘सर्वधर्मसमभाव’ से दूर पड़ते दिखाई पड़े। लेकिन, गाँधी की हत्या ने पटेल एवं नेहरु, दोनों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाकर खड़ा कर दिया और वे दोनों संघ के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी हिंदुत्व के विरुद्ध उठ खड़े हुए, लेकिन धार्मिकता एवं ‘सर्वधर्मसमभाव’ वाली धर्मनिरपेक्षता और अधार्मिक प्रकृति वाली धर्मनिरपेक्षता का फर्क बना रहा। यह द्वंद्व संविधान-सभा द्वारा निर्मित संविधान में भी दिखायी पड़ता है और काँग्रेस की प्रांतीय सरकारों के व्यवहारों में भी, जिसके विरुद्ध नेहरु अपने पत्राचारों के माध्यम से चेतावनी देते हुए दिखाई पड़ते हैं। लेकिन, विशेषकर चीनी हमले के बाद नेहरु भी कमजोर पड़े, या फिर यह कह लें कि तद्युगीन परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए नेहरु ने संघ के प्रति नरम रुख अपनाया।
बाद में, राम मनोहर लोहिया के गैर-काँग्रेसवाद ने और जयप्रकाश के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन ने संघ और दक्षिणपंथी हिन्दुत्व को सामाजिक स्वीकार्यता दिलाने में अहम् एवं निर्णायक भूमिका निभायी। श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने इनसे लड़ने की कोशिश भी की और इस क्रम में प्रस्तावना में संशोधन करते हुए ‘पंथनिरपेक्षता’ शब्द को शामिल भी किया, जिसे कुछ लोग मुस्लिम तुष्टीकरण की कोशिश के रूप में भी देखते हैं, पर उस समय वे गलत पाले में थीं। लेकिन, हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने संघ और उसके मुखिया बाला साहब देवर को घुटनों के बल रेंगने के लिए विवश कर दिया था। इसी का परिणाम था कि जनसंघ और संघ के बड़े नेता माफ़ीनामा के बाद जेल से रिहा किए गये थे। लेकिन, राजीव की एक भूल काँग्रेस पर भारी पड़ी। 1980 के दशक के मध्य में शाहबानो निर्णय की पृष्ठभूमि में सर्वोच्च अदालत के आदेश को पलटने और राम-जन्मभूमि के ताले खुलवाने के राजीव सरकार के निर्णय ने ताबूत में आखिरी कील का काम किया। आज काँग्रेस उन्हीं कुकर्मों का परिणाम भुगत रही है।
काँग्रेस और वामपंथ:
काँग्रेस एक ऐसा आन्दोलन रहा है जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न धाराओं और उनके वैचारिक परिप्रेक्ष्य को अपने भीतर आत्मसात किया है। यह काँग्रेस की शक्ति भी रही है और सीमा भी। शक्ति इसलिए कि इसके कारण ही काँग्रेस वास्तविक अर्थों में समावेशी भारतीयता का प्रतिनिधित्व कर सकी और अखिल भारतीय संस्था बन सकी, और सीमा इसलिए कि इसी के कारण उन अर्थों में काँग्रेस की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं रही जिन अर्थों में यह वाम एवं दक्षिण में दिखायी पड़ती है। यही कारण है कि काँग्रेस के दायरे में वामपंथी भी समाते हुए दिखायी पड़ जाते हैं और दक्षिणपंथी भी; और काँग्रेस इन दोनों को अपने हिसाब से ढ़ालते हुए इन दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ती रही, इन दोनों की अतिवादिता से परहेज करते हुए। आज़ादी के बाद नेहरू ने इन दोनों को राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करना चाहा, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी, पर सफल रहे। समाजवाद की ओर वैचारिक रूझान के कारण और वैचारिक दुराग्रहों से दूर रहने के कारण नेहरू को अपेक्षाकृत उदार वामपंथ को अपने साथ इंगेज़ करने में सफलता मिली। इन उदार वामपंथी बुद्धिजीवियों ने काँग्रेस के वैचारिक आधार को निर्मित करने में अहम् भूमिका निभायी। काँग्रेस ने इन्हें सत्ता का संरक्षण प्रदान किया और बदले में इन्होंने काँग्रेस को वैचारिक-सांस्कृतिक मंच प्रदान किया। दोनों के बीच का यह रिश्ता प्रत्यक्ष से कहीं अधिक परोक्ष रहा, यद्यपि बीच-बीच में दोनों के ये रिश्ते सतह पर भी दिखते रहे। 1990 के दशक में  इस रिश्ते में दरार पड़ता दिखायी पड़ा, जब काँग्रेस ने समाजवादी चोले को उतारकर एलपीजी मॉडल को अपनाया, और वामपंथ ने काँग्रेस के विरूद्ध दक्षिणपंथ से हाथ मिलाने तक से परहेज़ नहीं किया।  इस दृष्टि से देखा जाए, तो दक्षिणपंथ के इस राजनीतिक उभार के लिए समाजवादी के साथ-साथ वामपंथी भी कहीं कम ज़िम्मेवार नहीं हैं। दक्षिणपंथ को इस बात का श्रेय देना होगा कि पिछले साढ़े तीन दशकों के दौरान उसने अपनी जड़ों को मज़बूती प्रदान करने के लिए वामपंथियों एवं समाजवादियों तक का बखूबी इस्तेमाल किया और इनके साथ-साथ काँग्रेस की कमज़ोरियों को भी अपने पक्ष में जमकर भुनाया। यही वह दौर है जब धर्मनिरपेक्ष की राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में तब्दील होती हुई दक्षिणपंथ के उभार का आधार तैयार करती है।
सन् 2004 में और इसके बाद यह स्थिति एक बार फिर से बदलती दिखायी पड़ती है जब काँग्रेस पूर्व की ग़लतियों से सबक़ लेती हुई एक बार फिर से समाजवादी एजेंडे के समायोजन की दिशा में पहल करती है। समायोजन की इस पहल की तार्किक परिणति सन् 2019 के लोकसभा-चुनाव के समय काँग्रेस के द्वारा जारी घोषणा-पत्र है जो पिछले तीन दशकों की भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिन्दु है जहाँ पर भारत के दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों की आर्थिक विचारधारा और उसके आर्थिक एजेंडे का फ़र्क़ स्पष्टत: सतह पर आ जाता है। इस पृष्ठभूमि में दक्षिणपंथ की विभाजनकारी मानसिकता और उसके फासीवादी तेवर ने काँग्रेस एवं वामपंथ को एक बार फिर से उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ भारत और भारतीयता को बचाने के लिए दोनों को एक दूसरे के पूरक की भूमिका निभानी होगी, अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगी। नियति भी तो इसी ओर इशारा कर रही है, अन्यथा जिस गाँधी एवं नेहरू की विरासत पर काँग्रेस और काँग्रेसी दावा करते हैं, उन पर होने वाले दक्षिणपंथी हमलों को लेकर वे मौन नहीं धारण करते और जिस गाँधी एवं नेहरू से वामपंथियों को परहेज है, उनकी रक्षा में उन वामपंथियों को आगे नहीं आना पड़ता।

Wednesday, 30 October 2019

भारतीय राजव्यवस्था: ट्रेंड-विश्लेषण और रणनीति (65th BPSC Mains)


भारतीय राजव्यवस्था
ट्रेंड-विश्लेषण और रणनीति (65th BPSC)

बीपीएससी के द्वारा आयोजित मुख्य परीक्षा में सामान्य अध्ययन के विभिन्न खण्डों से पूछे जाने वाले प्रश्नों में यदि किसी खंड ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है, तो वह है भारतीय राजव्यवस्था खंड। इस खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों और उनके रूझानों पर अगर गौर करें, तो वे सामान्यतः भारतीय संविधान एवं भारतीय राजव्यवस्था की व्यापक समझ के साथ-साथ एप्लीकेशन पर आधारित होते हैं। कई बार उत्कृष्टता की दृष्टि से इस खंड के प्रश्न संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों को भी चुनौती देते प्रतीत होते हैं। साथ ही, चूँकि इस खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति आरम्भ से ही गतिशील और एप्लीकेशन-आधारित रही है, इसीलिए इन्हें रेस्पोंड करना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा  है। इसके लिए निरंतर अपडेशन की ज़रूरत होती है। बिना अपडेशन के इसके साथ न्याय कर पाना मुश्किल है। स्पष्ट है कि भारतीय राजव्यवस्था के प्रश्नों के रुझान तीन चीजों की माँग करते हैं:
1.  अपडेशन
2.  एप्लीकेशन, और
3.  इन्टर-डिसिप्लिनरी एप्रोच
इस खंड की तैयारी करते वक़्त इन पहलुओं के साथ इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कई बार ऐसे प्रश्न बिहार के विशेष सन्दर्भ में पूछे जाते हैं, इसीलिए मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों की तैयारी की रणनीति भी इसी के परिप्रेक्ष्य में निर्धारित होनी चाहिए। स्पष्ट है कि भारतीय राजव्यवस्था खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर लिखते वक़्त आवश्यकता इस बात की है कि उत्तर को वर्तमान सन्दर्भों से जोड़कर लिखा जाए, चाहे प्रश्न पारंपरिक प्रकृति के हों या फिर समसामयिक प्रकृति के, और उत्तर को बिहार स्पेसिफिक भी बनाया जाए। ऐसी स्थिति में आपके उत्तर अन्य छात्रों के उत्तर से अलग भी होंगे और उनमें वैल्यू एडीशन की संभावना भी प्रबल होगी।      
64वीं बीपीएससी (मुख्य) परीक्षा
भारतीय राजव्यवस्था खंड से पूछे गए प्रश्न अपेक्षा के अनुरूप ही हैं, सिवा एक प्रश्न के; और वह है: ‘बहुत अधिक राजनीतिक दल भारत के लिए अभिशाप है। इस तथ्य को बिहार के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिये।’ यह बीपीएससी में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति के अनुरूप ही है क्योंकि इस खंड से पूछे जाने वाले प्रश्न समझ एवं एप्लीकेशन पर आधारित होते हैं और अद्यतन रुझानों पर आधारित भी। इसके अलावा चाहे न्यायिक सक्रियता पर पूछे जाने वाले प्रश्न हों, या प्रस्तावना एवं उनसे सम्बंधित संवैधानिक उपबंधों पर आधारित, या फिर राज्यपाल की भूमिका; ये सारे प्रश्न अपेक्षित थे।    
वर्तमान चुनौतियों के बीच आकार ग्रहण करते प्रश्न:
यहाँ पर इस बात को समझने की ज़रुरत है कि 64वीं बीपीएससी परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों का एक परिप्रेक्ष्य है और अगर उस परिप्रेक्ष्य तक पहुँचने की कोशिश की जाए, तो सहज ही प्रश्नों के निर्मित होने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है। उदाहरणतः उस प्रश्न को लिया जा सकता है जिसमें बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था को भारत एवं विशेष रूप से बिहार के परिप्रेक्ष्य में बाधक के रूप में देखा गया है, या राज्यों की राजनीति में राज्यपाल की भूमिका के उद्घाटन की बात की गयी है इन तमाम प्रश्नों को किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीय विमर्श के एजेंडे में प्रमुखता से जगह मिल रही है और इस रूप में इन प्रश्नों पर राजनीति की छाप देखी जा सकती है शायद यही कारण है कि ‘राज्यपाल के कठपुतली होने से समबन्धित प्रश्न ने अकारण राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है, जबकि ‘राष्ट्रपति रबड़ स्टाम्प के रूप में’ से सम्बंधित प्रश्न संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा पहले ही पूछा जा चुका है। इस प्रश्न में चर्चा इस बात पर हो रही है कि राज्यपाल को कठपुतली क्यों कहा गया, जबकि अगर चर्चा ही होनी है, तो चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि वर्तमान में बिहार के विशेष सन्दर्भ में इस प्रश्न के क्या मायने हैं? इसी प्रकार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के एजेंडे के कारण राजनीतिक दलों की बहुलता को नकारात्मक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जा रहा है, पर बहुलतावादी लोकतंत्र भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की मूल पहचान है और विविधता से भरे समाज की ज़रुरत भी, लेकिन इस पर कोई चर्चा होती नहीं दिखती   
प्रश्नों की माँग को पहचानना:
अब प्रश्नों की निर्माण-प्रक्रिया और उनके रुझानों के विश्लेषण के पश्चात् में 64वीं बीपीएससी मुख्य परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों और उनकी माँग का विश्लेषण अपेक्षित है। इसे निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:
1.  भारतीय संविधान अपनी प्रस्तावना में भारत को एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित करता है इस घोषणा को क्रियान्वित करने के लिए कौन-से संवैधानिक उपबंध दिए गए हैं?
विश्लेषण: भारतीय संविधान की प्रस्तावना से अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं। उसमें भी धर्मनिरपेक्षता बीपीएससी का प्रिय टॉपिक है। उदारीकरण ने प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द की मौजूदगी पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया, और बचा-खुचा काम सरकार के नज़रिए, जो बाजारवाद की ओर उन्मुख है एवं हिंदुत्व के प्रति आग्रहशील है, और हाल के विवादों ने कर दिया, इसलिए इन्हें अपेक्षित प्रश्नों की श्रेणी में रखा जाए। इस प्रश्न में भारतीय संविधान के उन उपबंधों की चर्चा करनी है जो प्रस्तावना के इन पहलुओं को व्यावहारिक रूप प्रदान करते हैं और उन्हें ज़मीनी धरातल पर उतारते हैं, अब चाहे उन प्रावधानों का सम्बंध मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों से जुड़ता हो, या फिर संविधान के अन्य उपबंधों से।  
2.  भारत में राज्य की राजनीति में राज्यपाल की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए विशेष रूप से बिहार के सन्दर्भ में क्या यह केवल एक कठपुतली है?
विश्लेषण: हाल में स्वविवेक के अधिकारों के दुरुपयोग के सन्दर्भ में राज्यपाल का पद चर्चा में आया और इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय भी दिए, इसलिए ऐसे प्रश्न अपेक्षित थे। इस प्रश्न में बिहार को बेवज़ह ही घसीटा गया। बिहार के सन्दर्भ में अधिक-से-अधिक दो बिन्दुओं को रेखांकित किया जा सकता है: महागठबंधन से अलग होने के बाद सरकार-गठन को लेकर उत्पन्न होने वाले विवाद में राज्यपाल की भूमिका, और बी. एड. कॉलेज विवाद की पृष्ठभूमि में बिहार के राज्यपाल का स्थानांतरण।
जहाँ तक इस प्रश्न को रेस्पोंड किये जाने का प्रश्न है, तो प्रश्न के पहले हिस्से में राज्यों, विशेष रूप से विपक्षी दल के द्वारा शासित राज्यों की राजनीति में राज्यपाल की भूमिका को रेखांकित किया जाना चाहिए और इस क्रम में यह दिखाया जाना चाहिए कि किस प्रकार राज्यपाल केंद्र के इशारों पर कार्यपालिका के प्रमुख के रूप में अपनी औपचारिक भूमिका से आगे बढ़कर सत्ता की राजनीति में संलिप्त होते चले जाते हैं, और वहाँ की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में लग जाते हैं, या फिर उसके लिए विभिन्न तरीकों से परेशानियाँ उत्पन्न करने की कोशिश में लग जाते इस क्रम में अरुणाचल प्रदेश में राज्य की भूमिका को लेकर उठाने वाले प्रश्नों के आलोक में पूँछी कमीशन की रिपोर्ट और अरुणाचल वाद में स्वविवेक के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
जहाँ तक राज्यपाल के ‘केंद्र के हाथों की कठपुतली’ होने का प्रश्न है, तो राज्यपाल की नियुक्ति एवं बर्खास्तगी-प्रक्रिया और पदावधि के दौरान संवैधानिक संरक्षण का अभाव उसे अपने पद पर बने रहने हेतु केंद्र पर निर्भर बना देता है और इसी पृष्ठभूमि में उसके स्वविवेकाधिकार के दुरूपयोग की संभावना जन्म लेती है। 
3.  भारतीय शासन में न्यायिक सक्रियता एक नवीन धारणा है विवेचना कीजिये तथा न्यायिक सक्रियता के पक्ष और विपक्ष में दिए गए मुख्य तर्कों को स्पष्ट कीजिए
विश्लेषण: बीपीएससी का फोकस हमेशा से ‘न्यायपालिका’ टॉपिक पर रहा है, और यहाँ से प्रश्न पूछने की फ्रीक्वेंसी कहीं अधिक रही है। मई,2014 के बाद से लेकर जस्टिस दीपक मिश्रा के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने तक न्यायपालिका के साथ कार्यपालिका एवं विधायिका के बीच टकराव की स्थिति लगातार   बनी रही। इस टकराव की पृष्ठभूमि में संविधान द्वारा निर्धारित दायरे के अतिक्रमण के आरोप न्यायपालिका पर लगातार लगते रहे और इसी क्रम में न्यायिक अतिक्रम पर भी चर्चा हुई। ऐसे में इस तरह के प्रश्नों का पूछा जाना लाजिमी है।
इस प्रश्न को रेस्पोंड करते हुए सबसे पहले न्यायिक सक्रियता की संकल्पना की आविर्भावकालीन परिस्थितियों की चर्चा करते हुए इसकी अहमियत को उद्घाटित किया जाना था। इस क्रम में न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रम के बीच विभेद किया जाना अपेक्षित है और इसी आलोक में उसके पक्ष-विपक्ष में जो भी संभव तर्क दिए जा सकते हैं, उन्हें लिखा जाना चाहिए था।    
4.  बहुत अधिक राजनीतिक दल भारत के लिए अभिशाप है। इस तथ्य को बिहार के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिये।
विश्लेषण: यह प्रश्न काफी चैलेंजिंग है, और पूर्वाग्रहपूर्ण भी। इस प्रश्न का सम्बन्ध एक ओर बिहार में हाशिये पर खड़े छोटे जातीय समूह के द्वारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए राजनीतिक दलों के गठन और इसके कारण राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता से जुड़ता है, दूसरी ओर ‘एक देश, एक चुनाव’ के एजेंडे के कारण राजनीतिक बहुलतावाद को नकारात्मक रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति से। इस प्रश्न का उत्तर इन दोनों सन्दर्भों को ध्यान में  रखते हुए दिया जाना अपेक्षित है।

दरअसल पिछले तीन दशकों के गठबंधन सरकार के अनुभवों के कारण उसे नकारात्मक रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति विकसित हुई है, और इसे इस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है कि विकास एवं राष्ट्रीय हितों के तकाजे के कारण भारत को गठबंधन सरकार से परहेज़ करना चाहिए। इस विमर्श को केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय दलों के द्वारा प्रोत्साहित किया गया और मीडिया के सहारे इसे आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने का प्रयास करते हुए छोटे एवं स्थानीय दलों के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की गयी। इस क्रम में इस बात को भुला दिया गया कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता से भरे भारत जैसे देश में राजनीतिक बहुलतावाद को नकारना इसकी राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को खतरे में डालने के समान है।  
इस तरह से देखें, तो भारतीय राजव्यवस्था खंड से पूछे गए चार में से तीन प्रश्न समसामयिक परिदृश्य से उठाये गए हैं। मतलब यह कि ऐसे खंड जो पारंपरिक प्रकृति वाले प्रतीत होते हैं, उनके साथ भी तबतक न्याय नहीं किया जा सकता है, जबतक हाल में घटी घटनाओं के आलोक में उसे देखने की कोशिश नहीं की गयी हो   

63वीं बीपीएससी (मुख्य) परीक्षा
जनवरी,2019 में 63वीं बीपीएससी मुख्य परीक्षा आयोजित की गयी थी। इस परीक्षा में सामान्य अध्ययन द्वितीय पत्र के भारतीय राजव्यवस्था खंड में पूछे गए प्रश्न प्रश्नों के बदलते हुए पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। 64वीं मुख्य परीक्षा की तरह एक बार फिर से 63वीं मुख्य परीक्षा  में पूछे जाने वाले प्रश्नों का विश्लेषण अपेक्षित है, ताकि छात्र इस बात को समझ सकें कि किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा रहे हैं, क्यों पूछे जा रहे हैं और इनमें क्या लिखना है:  
1.  स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संचालन में भारत के निर्वाचन आयोग की भूमिका की गंभीरता से जाँच करें। इस सम्बन्ध में चुनावी पहचान-पत्र किस उद्देश्य से कार्य करता है?
बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा मुख्य परीक्षा में भारतीय राजव्यवस्था खंड में जिन टॉपिकों को फोकस किया जाता है, उनमें चुनाव-आयोग और चुनाव-सुधार भी शामिल हैं। विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर लगातार चर्चा होती रही है और गहराते संस्थागत संकट के आयाम इससे भी जुड़ते चले गए। चुनावों की तिथि की घोषणा और ईवीएम-विवाद से लेकर चुनाव-प्रक्रिया के सञ्चालन और मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट के क्रियान्वयन तक चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विवाद उभरे। ऐसे स्थिति में इस प्रश्न का पूछा जाना सामायिक भी है एवं प्रासंगिक भी।
जहाँ तक उत्तर की माँग का प्रश्न है, तो इस प्रश्न के दो पहलू हैं: एक, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के संचालन में चुनाव आयोग की भूमिका; और दूसरे, मतदाता पहचान-पत्र का उद्देश्य। प्रश्न के पहले हिस्से में व्यावहारिक उदाहरणों के जरिये चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठाते प्रश्नों पर विचार करना है और इस क्रम में सांकेतिक रूप से इस बात की भी चर्चा करनी है कि आखिर चुनाव आयोग केंद्र सरकार के दबाव से मुक्त रहकर क्यों नहीं काम कर पा रहा है। छात्रों से इस प्रश्न पर गंभीर विश्लेषण की अपेक्षा की गयी है।      
2.   क्या आप सहमत हैं कि भारतीय राजनीति आज मुख्य रूप से वर्णनात्मक राजनीति की बजाय विकास राजनीति के आस-पास घूमती है? बिहार के सन्दर्भ में चर्चा कीजिए

यह प्रश्न भी सीधे-सीधे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से उठाये गए हैं। दरअसल पिछले ढ़ाई दशकों से यह बात की जा रही है कि भारतीय राजनीति में विकास मतदान-आचरण के महत्वपूर्ण निर्धारक-तत्व के रूप में उभरकर सामने आया है, और इस क्रम में धर्म एवं जाति जैसी पहचान-आधारित राजनीति को हाशिये पर धकेला है। वर्ण, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि पहचान पर आधारित राजनीति, जिसे वर्णनात्मक राजनीति के रूप में भी जाना जाता है, के मुख्य अवयव हैं। लोकसभा-चुनाव,2014 के दौरान नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने यह माहौल बनाने की कोशिश की कि पूरा-का-पूरा चुनाव भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दों पर लड़ा गया, पर उनके नेतृत्व में राजग सरकार के गठन के बाद भाजपा ने खुद को विकास की राजनीति के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करते हुए लगातार विपक्ष-शासित राज्यों में ऐसे माहौल को बनाये रखने का प्रयास किया। यही स्थिति बिहार की राजनीति के सन्दर्भ में नीतीश कुमार के द्वारा सृजित करने की कोशिश की गयी, जबकि वास्तविकता कुछ और है। इसी विरोधाभास की चर्चा इस प्रश्न के उत्तर में की जानी चाहिए और बिहार के विशेष सन्दर्भ में यह दिखाया जाना चाहिए कि किस प्रकार राजनीतिक विमर्श में विकास को जगह तो मिली है, पर वर्णनात्मक राजनीति अभी हाशिये पर नहीं पहुँची है। इसी प्रकार 56-59वीं मुख्य परीक्षा के दौरान बिहार के 2015 के विधानसभा चुनाव में जाति की भूमिका और वर्तमान समय में संघीय सरकार तथा बिहार राज्य के मध्य संबंधों का वर्णन भी समसामयिक परिदृश्य से उठाये गए थे
     
3.  हाल के दिनों में भारतीय पार्टी की राजनीति पर बढ़ते क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के प्रभाव क्या हैं?
इस प्रश्न में यह दिखाना है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उभार ने भारतीय दलगत राजनीति और उसके एजेंडे को किन रूपों में प्रभावित किया है। यह प्रभाव संघीय ढाँचे के अंतर्गत राजनीतिक समीकरणों को किन रूपों में प्रभावित कर रही है, इससे राष्ट्रीय राजनीति किस हद तक प्रभावित हुई है और इसने राज्यों की राजनीति को किन रूपों में प्रभावित किया है? यहाँ पर ‘हाल के दिनों’ की व्याख्या उत्तर के दायरे के निर्धारण में अहम् भूमिका निभायेगी। चूँकि लोकसभा-चुनाव,2009 से ही राष्ट्रीय दलों के फिर से उभार की प्रक्रिया तेज़ हुई है और उनके सापेक्ष क्षेत्रीय दलों की भूमिका पहले की तुलना में कहीं कम महत्वपूर्ण हुई है, इसीलिए ‘हाल के दिनों’ की व्याख्या पिछले तीन दशकों के परिप्रेक्ष्य में करते हुए इस बात को भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि हाल के वर्षों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका में कहीं अधिक तेजी से बदलाव आया है। इसने राष्ट्रीय्र राजनीतिक दलों के स्वरुप एवं संरचना को भी प्रभावित किया है।    

4.  संविधान और संवैधानिकता के बीच क्या अंतर है? भारत के सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अनुमोदित ‘मूल संरचना’ के सिद्धांत के विषय में गंभीरता से जाँच करें।
पिछले पाँच वर्षों के दौरान वर्तमान सरकार में विभिन्न संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों ने समय-समय पर प्रस्तावना में उल्लिखित ‘पंथनिरपेक्षता’ शब्द को हटाये जाने से सम्बंधित बयान जारी किए। इसी पृष्ठभूमि में संविधान की मूलभूत विशेषताओं, संविधान एवं संवैधानिकता पर चर्चा शुरू हुई और यह कहा गया कि चूँकि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में ‘पंथनिरपेक्षता’ को संविधान की मूलभूत विशेषताओं के रूप में रेखांकित किया गया है, इसीलिए ऐसा कोई भी संशोधन संविधान की मूल भावनाओं के प्रतिकूल होने के कारण असंवैधानिक होगा। 
यहाँ पर यह स्पष्ट करना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि हिन्दी में इस प्रश्न में अंग्रेजी के ‘कांस्टिट्यूशनलिज्म’ टर्म के लिए ‘संवैधानिकता’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जबकि इसका अनुवाद होता है ‘संविधानवाद’ और ‘संवैधानिकता’ के लिए अँग्रेजी में ‘कांस्टिट्यूशनलिटी’ शब्द का इस्तेमाल होता है। इसलिए इस प्रश्न में सबसे पहले संविधान, संवैधानिकता एवं संविधानवाद में अंतर को रेखांकित किया जाना अपेक्षित है, और फिर इसी के आलोक में मूल संरचना के विविध पहलुओं के प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए। इस क्रम में यह स्पष्ट किया जाना अपेक्षित है कि मूल संरचना का सिद्धांत किस प्रकार संविधानवाद को प्रभावित करता है और इस आलोक में इसका क्या औचित्य है।
5.  केंद्र-प्रायोजित योजनायें केंद्र एवं राज्यों के बीच हमेशा विवाद का मुद्दा रही हैं। प्रासंगिक उदाहरणों का हवाला देते हुए चर्चा करें।
इस प्रश्न को चौदहवें वित्त-आयोग की अनुशंसाओं के आलोक में देखे जाने की ज़रुरत है जिसने केंद्र-प्रायोजित योजनाओं को एक बार फिर से चर्चा में लाने का काम किया और फ्लेक्सी फण्ड की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए राज्यों की आपत्तियों के निराकरण की कोशिश की। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें इस प्रश्न का उत्तर लिखते हुए इन योजनाओं के सन्दर्भ में राज्य की आपत्तियों और उन आपत्तियों के औचित्य के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। इस क्रम में यह दिखाया जाना चाहिए कि किस प्रकार राज्यों को अपनी प्राथमिकताओं से समझौता करते हुए और उसकी उपेक्षा करते हुए केंद्र की प्राथमिकताओं के अनुरूप काम करना होता है जिससे उनका विकास प्रतिकूलतः प्रभावित होता है। इन बातों को केंद्र द्वारा प्रायोजित कुछ योजनाओं के सापेक्ष रखा जाना चाहिए, तब कहीं जाकर प्रश्न की माँग पूरी होगी।
इसी तरह का एक प्रश्न 53-55वीं मुख्य परीक्षा के दौरान पूछा गया था: भारतीय संघीय व्यवस्था और केंद्र-राज्य के प्रशासनिक सम्बन्ध का राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी परिषद (NCTC) के विशेष सन्दर्भ में वर्णन कीजियेअगर इन प्रश्नों के आलोक में देखें, तो 15वें वित्त आयोग के गठन ने हाल में संघीय पहलुओं को लेकर जिस विवाद को जन्म दिया है, उसने इस टॉपिक को महत्वपूर्ण बना दिया है। इसी प्रकार दिल्ली सरकार बनाम् संघीय सरकार के विवादों के आलोक में दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय भी महत्वपूर्ण है और हाल में सरकारों के गठन या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि में संघवाद जैसे टॉपिक को महत्वपूर्ण बना दिया है। इसीलिए इन टॉपिकों पर विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है।
(60-62)वीं बीपीएससी (मुख्य) परीक्षा
अप्रैल,2018 में (60-62)वीं बीपीएससी (मुख्य) परीक्षा सम्पन्न हुई (53-55)वीं बीपीएससी (मुख्य) परीक्षा से प्रश्नों की प्रकृति में बदलाव की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसे यहाँ पर तेज़ होते देखा जा सकता है रुझानों में यह बदलाव भारतीय राजव्यवस्था खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों में कहीं अधिक परिलक्षित होता है इसे इस परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के आलोक में सहज ही देखा जा सकता है:    
1.  राज्य की नीति के निर्देशक तत्व पवित्र घोषणा-मात्र नहीं हैं, बल्कि राज्य की नीति के मार्ग-दर्शन के लिए सुस्पष्ट निर्देश निर्देश हैं। व्याख्या कीजिये और बताइए कि वे व्यवहार में कहाँ तक लागू किये गए हैं?
बिहार लोक सेवा आयोग का रुझान हमेशा से अधिकारों से सम्बंधित मूलाधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों की ओर रहा है। इस दृष्टि से इन प्रश्नों को पारंपरिक प्रश्नों की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन इस प्रश्न का समसामयिक सन्दर्भ भी है। हाल के वर्षों में महिला सशक्तीकरण, शराबबंदी, समान कार्य के लिए समान वेतन, स्वच्छ विकास और गोहत्या निषेध जैसे नीति-निदेशक तत्वों से सम्बंधित मसले चर्चा में रहे हैं और ये नीति-निदेशक तत्वों की बढ़ती अहमियत की ओर इशारा करते हैं।  
इस प्रश्न के उत्तर में नीति-निदेशक तत्वों से सम्बंधित संविधान-निर्माताओं की चर्चा की जानी चाहिए। साथ ही, यह बतलाया जाना चाहिए कि किस प्रकार इसके सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट की बदलती हुई धारणा ने इसे आदर्शवादी सदिच्छा मात्र नहीं रहने दिया, वरन् इसके क्रियान्वयन के मार्ग को प्रशस्त किया और इसका परिणाम यह है कि पिछले चार दशकों के दौरान इसके कई पहलुओं का व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन हो रहा है। प्रश्न का दूसरा हिस्सा उन पहलुओं को रेखांकित किये जाने की अपेक्षा करता है जिनका क्रियान्वयन देश एवं बिहार राज्य के स्तर पर हो रहा है।
2.  हिंदुत्व की अवधारणा का परीक्षण कीजिये। क्या यह धर्मनिरपेक्षवाद का विरोधी है?
इस साल पूछे गए इस प्रश्न ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया है। यह प्रश्न भले ही पारंपरिक प्रकृति का लगता हो, पर यह समसामयिक परिदृश्य से कहीं अधिक प्रभावित है। सन् 2017 के आरम्भ में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था जो चुनाव-प्रक्रिया के दौरान राजनीति में जाति एवं धर्म के इस्तेमाल पर रोक से सम्बंधित जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 की धारा से सम्बद्ध है। इसने एक बार फिर से हिंदुत्व मामला,1995 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णय को प्रासंगिक बना दिया।
इसी आलोक में हिंदुत्व की अवधारणा और धर्मनिरपेक्षता के अंतर्संबंध पर आधारित यह प्रश्न तो व्यापक समझ की अपेक्षा रखते हैं। जहाँ हिंदुत्व की संकल्पना विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक संकल्पना है जिसका जनक हिंदुत्व-आधारित राष्ट्रवाद के जनक वी. डी. सावरकर को जाता है और जिसे आक्रामक तरीके से हेडगेवार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आगे बढ़ाया और इसके जरिये धर्मनिरपेक्षता की उस संकल्पना को चुनौती देने की कोशिश की जो संविधान की मूल भावनाओं के साथ नाभिनाल-बद्ध है। इस हिंदुत्व को सन् 1995 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा परिभाषित हिंदुत्व से असम्बद्ध कर देखे जाने की ज़रुरत है। स्पष्ट है कि इसका सम्बन्ध हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना से जाकर जुड़ता है और यह बहुसंख्यकों के वर्चस्व की वकालत करता है, इसीलिए यह धर्मनिरपेक्षता की मूल संकल्पना के प्रतिकूल है। इसी आलोक में इस प्रश्न के उत्तर लिखा जाना चाहिए। 
3.  भारतीय राजनीति के प्रमुख दबाव-समूहों की पहचान कीजिये और भारत की राजनीति में उनकी भूमिका का परीक्षण कीजिये।
इसी प्रकार दबाव-समूहों की भूमिका से सम्बंधित प्रश्न भले ही पारंपरिक लगते हों, पर जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों के दौरान दक्षिणपंथी हिंदुत्व की ओर रुझान रखने वाले संगठनों ने ऐसे मुद्दों को उठाने की कोशिश की और सामाजिक तनाव को बढ़ाते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेजी प्रदान की, उसकी पृष्ठभूमि में ये प्रश्न पारंपरिक नहीं रह जाते हैं। हाल में ट्रिपल तलाक, बहु-विवाह और समान नागरिक संहिता के साथ-साथ अनु. 35A, अनु. 370 बहाने सांप्रदायिक एजेंडे को थोपने की कोशिशों को इसके परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। इस आलोक में देखें, तो गोरक्षा के नाम पर मॉब-लिंचिंग, दलितों एवं मुसलमानों का इसका शिकार होना और इस पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्देश प्रश्न की दृष्टि से इस टॉपिक को महत्वपूर्ण बना देता है।
इतना ही नहीं, पिछले डेढ़ दशकों के दौरान जैसे-जैसे  सरकारों और शासन पर कॉर्पोरेट शिकंजा मजबूत हुआ है, वैसे-वैसे एक्टिविज्म बढ़ता चला गया है और इसकी पृष्ठभूमि में दलित, आदिवासी और किसान मुखर होते चले गए जिसने सरकारों पर दबाव बनाते हुए उन्हें अपनी नीतियों पर पुनर्विचार के लिए विवश किया है। इसीलिए इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस प्रश्न को रखकर देखे बगैर इसके साथ न्याय नहीं किया जा सकता है।
4.  बिहार की राजनीति में राज्यपाल की शक्तियों और वास्तविक स्थिति का वर्णन कीजिये।
यह प्रश्न पारंपरिक प्रकृति का है इस प्रश्न के दो आयाम हैं: एक, राज्यपाल की शक्तियाँ; और दूसरी, उसकी वास्तविक स्थिति इस प्रश्न का उत्तर लिखते वक़्त राज्यपाल की शक्तियों की चर्चा करनी है, और उसकी वास्तविक स्थिति का वर्णन करते वक़्त दो बातें दिखानी हैं: एक तो यह कि राज्यपाल को इन शक्तियों का प्रयोग मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद की सलाह पर करना होता है और इस संवैधानिक बाध्यता के कारण राज्य कार्यपालिका शक्ति के प्रधान के रूप में उसकी स्थिति औपचारिक बनकर रह जाती है, लेकिन राज्यपाल के स्वविवेक का अधिकार उसकी स्थिति को राष्ट्रपति की तुलना में कहीं अधिक अधिकार-सम्पन्न बनाता है; और दूसरा यह कि किस प्रकार राज्यपाल की नियुक्ति एवं बर्खास्तगी-प्रक्रिया उसे केंद्र पर निर्भर बनाती है और फिर उसे अपने अधिकारों का इस्तेमाल केंद्र के इशारों पर करना होता है इन तमाम आयामों को समेटने की स्थिति में ही उत्तर में समग्रता संभव हो पायेगी और बेहतर अंक मिल पायेंगे    
5.  मानवाधिकारों से आप क्या समझते हैं? संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा,1948 पर प्रकाश डालिए। बिहार सरकार द्वारा पिछले एक दशक में इन्हें बढ़ावा देने हेतु क्या प्रमुख प्रयास किये गए?
यद्यपि मानवाधिकार और इसे सुनिश्चित करने के लिए बिहार सरकार के द्वारा किये जा रहे प्रयासों से सम्बंधित यह प्रश्न करेंट सेक्शन में पूछा गया, तथापि इस प्रश्न का सम्बंध भारतीय राजव्यवस्था एवं संविधान खंड से जुड़ता है। यह इस खंड के बढ़ते दायरे और बीपीएससी के द्वारा नए आयामों की तलाश की ओर भी इशारा करता है। हो सकता है कि यह आपवादिक रुझान हो, पर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।
इस प्रश्न के पहले हिस्से में मानवाधिकारों को परिभाषित किये जाने की जरूरत है और ऐसा करते वक़्त यह दिखलाया जाना चाहिए कि किस प्रकार भारत का संविधान स्पष्ट शब्दों में मानवाधिकारों के उल्लेख से परहेज़ करता हुआ भी मौलिक अधिकारों एवं नीति-निदेशक तत्वों के अंतर्गत तमाम मानवाधिकारों को समाहित करता है। प्रश्न के दूसरे हिस्से में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा,1948 की चर्चा करनी है, और फिर प्रश्न के तीसरे हिस्से में मानवाधिकारों के प्रोत्साहन एवं संरक्षण के लिए बिहार सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों और इसकी प्रभाविता का उल्लेख करना है।   
भारतीय राजव्यवस्था खंड से अबतक पूछे गए प्रश्न
(56-59)th          
  BPSC
  (53-55)th          
   BPSC
  (48-52)th          
    BPSC
  47th BPSC       
    46th    
   BPSC       
1.भारतीय संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकारों का वर्णन कीजिये. किस प्रकार अनु. 21 की न्यायिक व्याख्याओं ने जीवन के अधिकार के विषय क्षेत्र का विस्तार किया है?
2.भारतीय चुनावी राजनीति में जाति की भूमिका का आकलन कीजिये. बिहार के 2015 के चुनाव को जाति की भूमिका ने किस सीमा तक प्रभावित किया?
3.भारतीय संघात्मक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के मध्य तनाव के क्षेत्रों का विश्लेषण कीजिये. वर्तमान समय में संघीय सरकार तथा बिहार राज्य के मध्य संबंधों का वर्णन कीजिये.
4.न्यायिक पुनरीक्षण से आपका क्या अभिप्राय है? भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित ‘मूल ढांचे’ के सिद्धांत का आलोचनात्मक वर्णन कीजिये.
5.एक सुनिश्चित एवं संगठित स्थानीय स्तर की शासन प्रणाली के अभाव में पंचायतें एवं समीतियाँ, मुख्यत: राजनीतिक संस्थाएं बनी रहती हैं और शासन प्रणाली की उपकरण नहीं बन पाती हैं. आलोचनात्मक समीक्षा कीजिये.
1.भारतीय संघीय व्यवस्था और केंद्र-राज्य के प्रशासनिक सम्बन्ध का राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी परिषद (NCTC) के विशेष सन्दर्भ में वर्णन कीजिये.
2.राज्यपाल की शक्ति और कार्यों तथा इनकी बिहार में भूमिका का वर्णन कीजिये.
3.भारत में निर्वाचन आयोग की शक्ति और कार्यप्रणाली एवं स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में इनकी भूमिका का परिक्षण कीजिये.
4.विभिन्न नीति निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन कीजिये. १९५० के बाद बिहार में इन्हें किस तरह से क्रियान्वित किया गया है?
5.1991 से बिहार के राजकीय शासन के राजकीय परिवर्तन की चर्चा करें.

1.जाति एवं वर्ग भारतीय राजनीति में महतवपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस उक्ति की व्याख्या बिहार के सन्दर्भ में करें.
2.बिहार के सन्दर्भ में ग्राम्य स्थानीय सरकार की कार्यों की 1994 से आज तक की व्याख्या करें.
3.मिली जुली राजनीति भारतीय सन्दर्भ का प्रमुख लक्ष्ण हो गया है. परंतु यह व्यवस्था अभी तक स्थायी सरकार देने में असफल रही है. अपनी राय दें.
4.भारतीय संघीय व्यवस्था में सामयिक दिगों (Recent Trends) की व्याख्या करें. क्या राज्यों को अधिक क्षमता (Autonomy) की आवश्यकता है?
5.किन्हीं दो पर टिप्पणी लिखे-
a.   मनरेगा
b.   सार्वभौम मानव अधिकार घोषणा
c.   भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या
1.“चुनाव लोकतंत्र की ह्रदय गति के समान है. यदि वे भुत जल्दी-जल्दी या बहुत अनियमित रूप से होते है तो लोकतंत्र का पतन हो सकता है.” भारतीय राजनीति के सन्दर्भ में मध्यावधि चुनावों पर अपने विचार अभिव्यक्त करें.
2.आरक्षण का मुद्दा राजनैतिक दलों के वोट-बैंक के दृढ़ीकरण के अतिरिक्त कुछ नही है. शोषित वर्ग को सामाजिक न्याय प्रदान करवाने के लिए आरक्षण के अतिरिक्त आप क्या उपाय सुझायेंगे?
3.टिप्पणी लिखे-
a.   पारदर्शी एवं जवाबदेह शासन के  साधन RTI अधिनियम-
b.   भारतीय जीवन व संस्कृति पर मीडिया (प्रसार माध्यम) का प्रभाव
c.   भारतीय राजनीति में जातीवाद- बिहार के विशेष सन्दर्भ में.
4.ग्राम्य स्तर पर राजनैतिक चेतना एवं नारी-सशक्तिकरण पर 73वें संविधान-संशोधन के प्रभावों का बिहार के विशेष सन्दर्भ में परिक्षण कीजिये.
1.भारतीय चुनाव आयोग के निर्देशन के अंतर्गत अबाध और निष्पक्ष चुनाव के संचालन में नौकरशाही की भूमिका की चर्चा करें.
2.73वें संवैधान-संशोधन अधिनियम के आधारभूत प्रावधानों का वर्णन करें.
3.चुनाव-प्रचार से आप क्या समझते है? बिहार के चुनाव प्रचार की महत्वपूर्ण पद्धतियों पर प्रकाश डालें.
4.भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका का विवेचन करें. बिहार में भाषाई संख्या लघुओं (Linguistic Minorities) के लिए प्रावधानों का वर्णन करें.
5.सामजिक-राजनितिक स्थिति के परिप्रेक्ष्य में बिहार में कारागृह प्रशासन पर अपना मत दीजिये

65वीं मुख्य परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण टॉपिक:

सबसे पहले भारतीय संविधान की प्रस्तावना को लिया जाय। यहाँ से सामान्य प्रकृति के ऐसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं:
1.  "भारतीय संविधान में प्रस्तावना के महत्व को रेखांकित करते हुए इसकी वैधानिक स्थिति को स्पष्ट करें।" 
लेकिन, हाल में प्रस्तावना जिस तरह से चर्चा में रही है, उसके मद्देनज़र इस प्रश्न के पूछे जाने की संभावना प्रबल है कि:
2.  " 'पंथनिरपेक्षता' और 'धर्मनिरपेक्षता' के फ़र्क़ को स्पष्ट करें। साथ ही, बयालीसवें संविधान-संशोधन के द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता और 'समाजवाद' शब्द को शामिल करने के औचित्य के प्रश्न पर विचार करते हुए बतलाइए कि क्यों नहीं इन्हें प्रस्तावना से हटा दिया जाए?"
यहाँ से भारतीय राज्य की समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को आधार बनाकर भी प्रश्न पूछे जाने की संभावना बनती है। प्रस्तावना से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय महत्वपूर्ण टॉपिक है जो पूरे बिहार विधानसभा-चुनाव के दौरान चर्चा में रहा था।
प्रस्तावना के बाद नागरिकता, मौलिक अधिकार, नीति निदेशक-तत्व तथा मौलिक कर्तव्य दूसरा महत्वपूर्ण टॉपिक है जहाँ से प्रश्न की संभावना बनती है। यहाँ से सामाजिक न्याय से जुड़े हुए पहलू से प्रश्न पूछे जाने की पूरी सम्भावना है। नागरिकता के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर(NRC), प्रस्तावित नागरिकता संशोधन विधेयक, आरक्षण और इससे सम्बद्ध पहलुओं, विशेषकर आरक्षण की समीक्षा, पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एवं इसमें संशोधन, बिहार में महिला-सशक्तीकरण में आरक्षण की भूमिका, अल्पसंख्यकों की स्थिति, बढ़ती हुई असहिष्णुता, सोशल मीडिया की भूमिका, मान-हानि, अभिव्यक्ति की आजादी, आधार-मसला एवं निजता के अधिकार के आलोक में आधार-कानून पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और इसका बिहार में क्रियान्वयन, सूचना का अधिकार अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन, बिहार के विशेष सन्दर्भ में सूचना का अधिकार की अप्रभाविता, कानून गोमांस-निषेध एवं गोरक्षा के नाम पर भीड़ के द्वारा हिंसा (Mob Lynching), धर्मांतरण एवं घर-वापसी, समान नागरिक संहिता(UCC), ट्रिपल तलाक और सुप्रीम कोर्ट, शराबबंदी, बिहार में नीति निदेशक-तत्वों के क्रियान्वयन की दिशा में पहल आदि टॉपिक हाल-फिलहाल चर्चा में रहे हैं जिन्हें विशेष रूप से तैयार करने की जरूरत है।
सरकार के विभिन्न अंगों में विधायिका से अध्यादेश, धन-विधेयक, संयुक्त विधेयक, विपक्षी दल की भूमिका, राज्यसभा का औचित्य और प्रासंगिकता, संसदीय गतिरोध, संसदीय सुधार, विशेष रूप से राज्यसभा-सुधार जैसे टॉपिक महत्वपूर्ण हैं। कार्यपालिका के अंतर्गत हालिया सम्पन्न राष्ट्रपति-चुनाव, प्रधानमंत्रीय शासन की संकल्पना एवं कैबिनेट-व्यवस्था तथा लाभ के पद से सम्बंधित विवाद से जोड़कर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। जहाँ तक न्यायपालिका का प्रश्न है, न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित विवाद, कालेजियम व्यवस्था, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग और इसको लेकर न्यायपालिका-विधायिका टकराव, मेमोरेंडा ऑफ़ प्रोसीड्योर(MOP), न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता, न्यायिक-सुधार, न्यायिक सक्रियता-न्यायिक अतिक्रम आदि से सम्बंधित टॉपिक महत्वपूर्ण हैं।
जहाँ तक संघ-राज्य सम्बन्ध  और संघवाद का प्रश्न है, तो यह खंड मुख्य परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार के द्वारा अनु. 356 के दुरूपयोग, दल-बदल क़ानून की विधानसभा स्पीकर के द्वारा मनमानी व्याख्या, विधानसभा स्पीकर एवं राज्यपाल के द्वारा संविधान-प्रदत्त शक्तियों का दुरूपयोग और इस सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने संघ-राज्य सम्बन्ध और संघवाद के प्रश्न को एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इन पहलुओं पर विचार के क्रम में इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आखिर वे कौन-सी चीजें हैं जो राज्यपाल एवं स्पीकर के पद को विवादास्पद बनाती हैं और इन्हें राजनीति एवं विवाद से परे रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए? निश्चय ही, इसका सम्बन्ध राज्यपाल की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं बर्खास्तगी की प्रक्रिया के साथ-साथ राज्यपाल के विवेकाधिकार से जाकर जुड़ता है। इसी प्रकार सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद के प्रश्न पर भारत के समक्ष मौजूद राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय चुनौतियों और हाल में लागू वस्तु एवं सेवा कर(GST) के आलोक में पुनर्विचार अपेक्षित है। साथ ही, इसे आयोजनोत्तर परिदृश्य (Post-Planning Period) में नीति-आयोग एवं चौदहवें-पन्द्रहवें वित्त-आयोग के आलोक में भी देखा जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, अगस्त,2019 में अनु. 370 में संशोधन करते हुए जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को न केवल समाप्त किया गया और अनु. 35A को प्रभावहीन बनाया गया, वरन् जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे को समाप्त करते हुए उसे जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के रूप में दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँटा गया। इस क्रम में संवैधानिक प्रक्रिया की पूरी तरह से अनदेखी की गयी। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि इस कदम की संवैधानिकता, संघीय ढाँचे से जुड़े पहलुओं और उसके भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध के सन्दर्भ में उसके निहितार्थों से जोड़कर देखते हुए कोई भी प्रश्न पूछे जाएँ।
इसके अलावा स्थानीय संस्थाएँ एवं राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक समावेशन में इसकी भूमिका के साथ-साथ न्यूनतम शैक्षिक एवं स्वच्छता मानदंड के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार के हालिया निर्देशों के आलोक में राजभाषा हिन्दी के सन्दर्भ में उत्पन्न विवाद और आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल करने को लेकर विवाद वाले पहलुओं को भी करना जरूरी है।  

जहाँ तक चुनावी-राजनीति, मतदान-आचरण और चुनाव-सुधार का प्रश्न है, तो पिछले ढ़ाई दशकों के दौरान बिहार में आनेवाले सामाजिक बदलावों में चुनावी राजनीती और इनमें आनेवाले परिवर्तनों की भूमिका, चुनावी आचार-संहिता, हालिया सम्पन्न बिहार विधानसभा-चुनाव के परिणामों का विश्लेषण; राजनीति का अपराधीकरण; भारतीय राजनीति के साथ-साथ बिहार की राजनीति में जाति एवं धर्म के साथ-साथ लिंग एवं भाषा, धनबल, सोशल मीडिया और तकनीक की भूमिका; पहचान-आधारित चुनावी-राजनीति एवं इस सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को सुनिश्चित करने में चुनाव आयोग एवं ब्यूरोक्रेसी की भूमिका, राजनीतिक दलों में आतंरिक लोकतंत्र का प्रश्न, वंशवादी राजनीति (Dynestic Politics), चुनावी-चंदे में पारदर्शिता, लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ, मुद्दों पर आधारित राजनीति बनाम् व्यक्ति-केन्द्रित राजनीति, हालिया लोकसभा एवं राज्य विधानसभा चुनावों में मतदान-आचरण के निर्धारक तत्व एवं इसके निहितार्थ, चुनाव-सुधार के सन्दर्भ में चुनाव आयोग के सुझाव(अद्यतन) आदि से संबंधित प्रश्न पूछे जाने की संभावना है। हाल में महागठबंधन के बिखराव ने गठबंधन राजनीति और जनादेश के उल्लंघन के प्रश्न को एक बार फिर से प्रासंगिक बना दिया है जिसे मुख्य परीक्षा के मद्देनज़र ध्यान में रखा जाना चाहिए।