Sunday, 24 April 2022

बढ़ता ऑयल इन्फ्लेशन: सरकार है जिम्मेवार

 

बढ़ता ऑयल इन्फ्लेशन

पेट्रोलियम उत्पादों के उपभोग हेतु भारत की आयात पर निर्भरता निरंतर बढती जा रही है। सन् 1998-99 में भारत अपने कुल उपभोग का 69 प्रतिशत आयात के ज़रिये पूरा करता है, जबकि 2020-21 में यह आँकड़ा लगभग 95 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच चुका है। देश के अधिकांश राज्यों में पेट्रोल की कीमतें शतक लगा चुकी हैं, जबकि डीजल की कीमतें कई जगहों पर शतक लगा चुकी हैं और कई जगहों पर शतक लगाने के करीब हैं। देश की वितीय राजधानी मुंबई में अगर पेट्रोल 120 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक के स्तर पर पहुँच चुका है, तो डीजल करीब 105 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर। देश की राजधानी दिल्ली में अगर पेट्रोल 105 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक के स्तर पर पहुँच चुका है, तो डीजल करीब 96.7 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर।

बिहार में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतें:

बिहार की राजधानी पटना में अगर पेट्रोल 116 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक के स्तर पर पहुँच चुका है, तो डीजल करीब 101 रुपये प्रति लीटर से अधिक के स्तर पर। अक्टूबर, 2021 की स्थिति के अनुसार, बिहार में पेट्रोल पर 26 प्रतिशत बिक्री कर या 16.65 रुपये प्रति लीटर (दोनों में से जो अधिक है), लगाया जाता है और इसके अतिरिक्त उस पर 30 प्रतिशत सरचार्ज भी लगाया जाता है। बिहार सरकार डीजल पर 19 प्रतिशत बिक्री कर या 12.33 रुपये प्रति लीटर (दोनों में से जो अधिक है), लगाया जाता है और इसके अतिरिक्त उस पर 30 प्रतिशत सरचार्ज भी लगाया जाता है।

ऑयल इन्फ्लेशन और मुद्रास्फीतिक दबाव:

जहाँ तक मुद्रास्फीतिक दबाव का प्रश्न है, तो पेट्रोल एवं डीजल की बढ़ती कीमतें ऊर्जा-लागत के साथ-साथ परिवहन-लागत को बढ़ाने का काम करती हैं और इसका असर पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसे निम्न चार्ट के सहारे भी देखा जा सकता है:

थोक मूल्य सूचकांक में भारांश

क्रम

मद

भारांश

1.  

डीजल

3.10%

2.  

पेट्रोल

1.60%

3.  

एलपीजी

0.64%

 

सरकार का दावा:

वित्त-मन्त्री निर्मला सीतारमण का यह कहना है कि यूपीए सरकार द्वारा ऑयल बांड्स जारी किये जाने के कारण सरकार को उस पर ब्याज और मूलधन का भुगतान करने की जिम्मेवारी है, इसीलिए टैक्स में कटौती के ज़रिये पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों को नियंत्रित करने का विकल्प सरकार नहीं अपना सकती है इस सन्दर्भ में निर्मला सीतारमण ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को उद्धृत किया जिन्होंने सन् 2008 में राष्ट्र के नाम सन्देश में कहा था, मैं राष्ट्र को याद दिलाना चाहूँगा कि ऑयल बांड्स जारी करना और इसके ज़रिये तेल-विपणन कम्पनियों पर घाटों को आरोपित करना तेल की ऊँची कीमतों के कारण उत्पन्न होने वाली समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इसके ज़रिये हम अपने बोझ को अपने बच्चों पर ट्रान्सफर कर रहे हैं और उन्हें भविष्य में इसका पुनर्भुगतान करना होगा।” वित्त-मन्त्री ने ऑयल इन्फ्लेशन को नियंत्रित करने की जिम्मेवारी राज्य सरकारों पर थोपते हुए कहा कि अगर राज्य सरकारें उपभोक्ताओं पर से इसके बोझ को कम करना चाहें, तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। इस तरह उन्होंने तेल की बढ़ती कीमतों की जिम्मेवारी लेने से इनकार किया। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि एक ओर यूक्रेन-संकट और इसके परिणामस्वरूप  अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की आपूर्ति के अवरुद्ध होने के कारण हाल के दिनों में तेल की कीमतों के उछाल आयी है, तो दूसरी ओर पेट्रोल एवं डीजल की कीमत-निर्धारण व्यवस्था के विनियन्त्रित होने के कारण वह इसमें हस्तक्षेप कर पाने में असमर्थ है।    

यूपीए-सरकार द्वारा जारी बांड्स की जिम्मेवारी की वास्तविकता:

दरअसल, मई,2014 में जब एनडीए सत्ता में आयी थी, उस समय 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बांड्स उसे विरासत में मिले जिस पर उसे सन् 2026 तक ब्याज और बांड के परिपक्व होने पर बांड-राशि का भुगतान करना था सन् 2021 तक एनडीए सरकार ने कुल 13,500 करोड़ रुपये के बांड्स का भुगतान किया है, और इसके अलावा वित्त-वर्ष (2021-22) तक सरकार को 80,186 करोड़ ब्याज-भुगतान भी करना पड़ रहा है इस तरह सन् (2014-22) के दौरान अबतक सरकार ने ब्याज और मूलधन सहित कुल 93,686 करोड़ रुपये का भुगतान किया है आने वाले समय में सन् 2026 तक सरकार को 1,20,923.17 करोड़ के ऑइल बांड्स का भुगतान करना है इसके अतिरिक्त, केन्द्र सरकार को ऑयल बांड्स पर ब्याज का भी भुगतान करना है इसके कारण केन्द्र सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ सृजित हो रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, यह इस विमर्श का महज एक पक्ष है, एकमात्र पक्ष नहीं।

इस पूरे विमर्श के क्रम में ‘गोदान’ उपन्यास के ड्यूटी वाले प्रसंग में प्रेमचन्द द्वारा की गयी टिप्पणी को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा, “यदि ड्यूटी बढ़ाए पाँच रुपये का नुक्सान रहा, तो मजदूरी में कटौती से दस रुपये का फायदा।” कुछ ऐसी ही स्थिति यहाँ पर भी देखने को मिलती है क्योंकि ऑयल बांड्स के कारण जो वित्तीय बोझ सृजित हो रहा है, वह उस तेल-राजस्व का महज एक छोटा-सा हिस्सा है जो इस वित्तीय बोझ के नाम पर केन्द्रीय उत्पाद कर में वृद्धि के कारण प्राप्त हो रहा है। इसे आँकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की ज़रुरत है। 

पेट्रोल एवं डीजल पर केन्द्रीय कर में निरंतर वृद्धि:

मई,2014 से अबतक एनडीए सरकार ने तेल पर लेवीज (Auto Fuel Levies) में 12 बार वृद्धि की है जिसमें सर्वाधिक तीव्र वृद्धि मार्च-मई,2020 में हुई मई,2020 में केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर केन्द्रीय उत्पाद कर 19.98 रुपये/लीटर से बढ़ाकर 32.98 रुपये/लीटर और डीजल पर 15.83 रुपये/लीटर से बढ़ाकर 31.83 रुपये/लीटर कर दिया। ध्यातव्य है कि वित्त-वर्ष 2015 में पेट्रोल एवं डीजल पर केन्द्रीय कर क्रमशः 9.48 रुपये/लीटर और 3.56 रुपये/लीटर था अगस्त,2021 में केंद्र एवं राज्य के द्वारा आरोपित कर पेट्रोल की खुदरा कीमतों का 55.4 प्रतिशत और डीजल की खुदरा कीमतों का 50 प्रतिशत है केवल केन्द्र के द्वारा आरोपित कर पेट्रोल की खुदरा कीमतों का 32.3 प्रतिशत और डीजल की खुदरा कीमतों का 35.4 प्रतिशत है

पेट्रोल एवं डीजल पर बढ़ता केन्द्रीय कर एवं उपकर

वर्ष

पेट्रोल पर केन्द्रीय कर

डीजल पर केन्द्रीय कर

वित्त-वर्ष 2015

9.48 रुपये/लीटर

3.56 रुपये/लीटर

मई,2020

32.98 रुपये/लीटर

31.83 रुपये/लीटर

खुदरा कीमतों में केन्द्रीय कर का शेयर

32.3 प्रतिशत

35.4 प्रतिशत

 

वित्त-वर्ष (2019-20) में केन्द्र सरकार को पेट्रोल एवं डीजल पर केन्द्रीय उत्पाद शुल्क से कुल 1.78 लाख करोड़ रुपये के तेल-राजस्व की प्राप्ति हुई, जबकि वित्त-वर्ष (2020-21) में 3.35 लाख करोड़ रुपये के तेल-राजस्व की प्राप्ति। मतलब यह कि कोविड-संकट और इसकी पृष्ठभूमि में आरोपित लॉकडाउन के कारण जिस वित्त-वर्ष के दौरान आर्थिक विकास दर नकारात्मक रही, उसी वित्त-वर्ष में केन्द्र को प्राप्त तेल-राजस्व में 88 प्रतिशत की वृद्धि हुई। और, वह सब संभव हुआ पेट्रोल एवं डीजल पर आरोपित करों की दरों में वृद्धि के कारण, और वह भी ऐसे समय में जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड ऑयल की कीमतें न्यूनतम स्तर पर थीं।

वित्त (राज्य) मन्त्री अनुराग ठाकुर के लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, जहाँ वित्त-वर्ष (2014-15) में पेट्रोल से 29,279 करोड़ रुपये और डीजल से 42,881 करोड़ रुपये केन्द्रीय उत्पाद कर प्राप्त हुए, वहीं वित्त-वर्ष (2020-21) में अप्रैल,2020 से जनवरी,2021 के दौरान पेट्रोल से 89,575 करोड़ रुपये और डीजल से 2,04,906 करोड़ रुपये केन्द्रीय उत्पाद कर प्राप्त हुए। जहाँ केन्द्र सरकार की कमाई में उत्पाद-शुल्क का हिस्सा वित्त-वर्ष (2013-14) में 4.3 प्रतिशत के स्तर पर था, वहीं वित्त-वर्ष (2016-17) में 13.3 प्रतिशत और वित्त-वर्ष (2020-21) में 12.2 प्रतिशत के स्तर पर

तेल-राजस्व की मात्रा:

सन् (2014-22) के दौरान केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने करीब 43 लाख करोड़ से अधिक राजस्व प्राप्त किया, और इस दौरान ऑइल बांड्स से सम्बद्ध देयता कुल प्राप्त राजस्व के महज 2.2 प्रतिशत के स्तर पर रहीवित्त-वर्ष (2014-15) और वित्त-वर्ष (2020-21) के बीच पिछले सात वर्षों के दौरान अकेले केन्द्र सरकार ने पेट्रोल एवं डीजल पर करों में बढ़ोत्तरी के ज़रिये करीब 22.34 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त किया हैअकेले सड़क अवसंरचना उपकर(RIC) के मद में केन्द्र सरकार को जहाँ वित्त-वर्ष (2019-20) के दौरान महज 67,371 करोड़ रुपए प्राप्त हुए, वहीं वित्त-वर्ष (2020-21) के दौरान 1,23,596 करोड़ रुपए और वित्त-वर्ष (2021-22): 2,03,235 करोड़ रुपए। मतलब यह कि महज तीन वर्षों के दौरान इस मद में प्राप्त तेल-राजस्व तीन गुना हो गया। केवल वित्त-वर्ष (2020-21) में 4,53,812 करोड़ की राशि पेट्रोल एवं डीजल पर वसूले गए करों से प्राप्त हुई सन् (2014-15) में सरकार ने कुल तेल-राजस्व का महज 7 प्रतिशत भुगतान ऑयल बांड्स पर किया, और जैसे-जैसे समय बीतता गया, बढ़ते तेल-राजस्व के साथ यह अनुपात कम होता गया मतलब यह कि सरकार के द्वारा ऑइल बांड्स मद में किया गया भुगतान इस क्षेत्र से हासिल राजस्व की तुलना में कुछ भी नहीं है वह राशि इतनी बड़ी नहीं है कि इस तरह के तर्कों का कोई औचित्य बनता हो

पेट्रोल एवं डीजल की कीमत-निर्धारण प्रक्रिया: ट्रेड पैरिटी प्राइसेज की डायनामिक प्राइसिंग व्यवस्था:

सन् 2010 के पहले तक पेट्रोल और सन् 2014 के पहले तक डीजल की कीमतों का निर्धारण सरकार के द्वारा किया जाता था और इसकी समीक्षा पाक्षिक आधार पर की जाती थी। लेकिन, सन् 2002 में एविएशन टरबाइन फ्यूल(ATF) की कीमतों को विनियंत्रित किया गया, तो सन् 2010 में पेट्रोल की कीमतों को और सन् 2014 में डीजल की कीमतों को। इसी के साथ पेट्रोल एवं डीजल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से जुड़ गयीं और उनकी कीमतों का निर्धारण बाज़ार-कारकों के आधार पर होने लगा। इस प्रकार सन् 2010 से पेट्रोल और सन् 2014 से डीजल के दाम सरकारी नियंत्रण से छूटकर सरकारी तेल-कम्पनियों के द्वारा तय होने लगे हैं।

पेट्रोल की प्राइस-संरचना (दिल्ली)

सन्दर्भ

मई,2014

(कुल कीमत में शेयर)

मई,2021

(कुल कीमत में शेयर)

क्रूड ऑयल

109.5 डॉलर/बैरल

68.5 डॉलर/बैरल

पेट्रोल-कीमत

71.4 रुपये/लीटर

92.6 रुपये/लीटर

बेस प्राइस

47.1 रुपये/लीटर

(66 प्रतिशत)

34.2 रुपये/लीटर

(37 प्रतिशत)

केन्द्रीय उत्पाद कर

10.4 रुपये/लीटर

(14 प्रतिशत)

32.9 रुपये/लीटर

(36 प्रतिशत)

डीलर-कमीशन

2 रुपये/लीटर

(3 प्रतिशत)

3.78 रुपये/लीटर

(4 प्रतिशत)

राज्य-कर

11.9 रुपये/लीटर

17 प्रतिशत

21.4 रुपये/लीटर

(23 प्रतिशत)

 

केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल पर आरोपित कर (जुलाई2021)

क्रम

कर/उपकर

केन्द्र द्वारा आरोपित कर की दर

1

बेसिक एक्साइज ड्यूटी(BED)

1.40 रुपये/लीटर

2.

स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी(SAED)

11 रुपये/लीटर

 

3.

रोड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस(RIC)

18 रुपये/लीटर

4.

एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस(AIDC)

2.5 रुपये/लीटर

 

वर्तमान में भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों का निर्धारण क्रूड ऑयल, रिफाइनिंग एवं विपणन-लागत को ध्यान में रखते हुए नहीं की जाती है, वरन् इसके लिए ट्रेड पैरिटी प्राइसेज (Trade Parity Prices) को आधार बनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भारत 80 प्रतिशत पेट्रोल एवं डीजल का आयात करता है और 20 प्रतिशत पेट्रोल एवं डीजल का निर्यात करता है। इसी आलोक में यहाँ पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों का निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसकी कीमतों के आलोक में किया जाता है, न कि क्रूड ऑयल की कीमतों को ध्यान में रखकर। सामान्यतः अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसकी कीमतें भी क्रूड ऑयल की कीमतों में बदलाव के आलोक में प्रभावित होती हैं, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है क्योंकि माँग एवं आपूर्ति के आयाम भिन्न हो सकते हैं। साथ ही, ट्रेड पैरिटी प्राइसेज को पहले डॉलर से रुपये में बदला जाता है और फिर तेल कम्पनियों की अन्य लागत (जिसमें रिफाइनिंग एवं परिवहन-लागत भी शामिल है), उनके प्रॉफिट मार्जिन, डीलर-कमीशन और करों को समेकित करते हुए तेल की कीमत निर्धारित की जाती है। मतलब यह कि अगर क्रूड ऑयल की कीमतें स्थिर भी हों, तब भी रुपये के विनिमय-दर में उतार-चढ़ाव, कर की दरों में परिवर्तन और डीलर के कमीशन में बदलाव पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में बदलाव का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसके अलावा, जून,2017 के मध्य से इसकी कीमत के निर्धारण के लिए ‘डेली प्राइसिंग मैकेनिज्म’ को अपनाया गया है और इसके लिए रॉलिंग बेसिस पर पेट्रोल एवं डीजल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के पिछले 15 दिनों के औसत मूल्यों को आधार बनाया जाता है। इसीलिए भारत में इसकी कीमतों पर टाइम लैग का भी असर होता है। 

कीमत-निर्धारण की अस्पष्ट एवं अपारदर्शी प्रक्रिया:

सरकार द्वारा यह दावा किया जाता है कि भारत ने डायनामिक प्राइसिंग की व्यवस्था को अपनाया है, इसके तहत् ऑयल मार्केटिंग कम्पनियाँ अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों की घोषणा प्रतिदिन करती हैं और सरकार का मूल्य-निर्धारण की प्रक्रिया में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं है या फिर इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन, अबतक के अनुभव यह बतलाते हैं कि आज भी टैक्स की दरों में बदलावों के अलावा पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों के निर्धारण की प्रक्रिया में सरकार का हस्तक्षेप बना हुआ है, अन्यथा अक्सर चुनावों के समय पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में बदलाव थम कैसे जाता है? अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद समय-समय पर कीमतों में उतार-चढ़ाव का थमना भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों के निर्धारण की प्रक्रिया को अस्पष्ट एवं अपारदर्शी बनाता है, और इसीलिए ट्रेड पैरिटी प्राइसिंग मैकेनिज्म की अक्सर आलोचना की जाती है। यह भिन्न लागत और भिन्न दक्षता के बावजूद तेल-विपणन से सम्बद्ध तीन सार्वजनिक उपक्रमों: इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम द्वारा करीब एक ही कीमतों की वसूली कार्टेलाइजेशन की ओर इशारा करता है। ध्यातव्य है कि इन तीनों कम्पनियों के पास करीब 58,000 पेट्रोल पम्प हैं, अर्थात तेल-वितरण में इनकी हिस्सेदारी 95 प्रतिशत से ज्यादा है।

जहाँ तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों के विनियंत्रण की वास्तविकता का प्रश्न है, तो अबतक का अनुभव यह बतलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में कमी का लाभ भले ही भारतीय तेल-उपभोक्ताओं को नहीं मिला हो, पर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में वृद्धि का वित्तीय बोझ हमेशा वहन करना पड़ा है सन् 2021-22 में पेट्रोल की कीमतें 39 बार बढ़ाई गयी हैं, जबकि इसमें कमी केवल 1 बार हुई है, जबकि डीजल की कीमतें 36 बार बढ़ाई गयी हैं, जबकि इसमें कमी केवल 2 बार हुई है सन् 2020-21 में पेट्रोल की कीमतें 76 बार बढ़ाई गयी हैं, जबकि इसमें कमी केवल 10 बार हुई है, जबकि डीजल की कीमतें 73 बार बढ़ाई गयी हैं, जबकि इसमें कमी केवल 24 बार हुई है

 

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड ऑयल vs भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत

सन्दर्भ

जुलाई,2008

अक्टूबर,2021

क्रूड ऑयल

132 डॉलर प्रति बैरल

82 डॉलर प्रति बैरल

पेट्रोल

50 रुपये प्रति लीटर

110 रुपये प्रति लीटर

डीजल

34 रुपये प्रति लीटर

---- रुपये प्रति लीटर

राज्यों से करों में कटौती की अपेक्षा का औचित्य:

केन्द्र सरकार का यह कहना कि राज्य अगर चाहें, तो वे पेट्रोल एवं डीजल पर बिक्री करों/वैट में कटौती के ज़रिए आमलोगों को ऑयल इन्फ्लेशन से राहत दे सकते हैं, उचित नहीं प्रतीत होता है। कारण यह कि:

1.  संसाधनों का वितरण केन्द्र के पक्ष में: पहले से ही संसाधनों का वितरण केन्द्र के पक्ष में है, जबकि अधिकांश उत्तरदायित्व राज्यों के जिम्मे है   

2.  कुल कर-राजस्व में उपकर एवं अधिभार का बढ़ता योगदान और इसमें राज्यों का शेयर नहीं: पिछले आठ वर्षों के दौरान केन्द्र सरकार ने विभाजनीय करों में वृद्धि के बजाए उपकरों और अधिभारों में वृद्धि का विकल्प चुना है जिसमें राज्यों का कोई शेयर नहीं है इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि वित्त-वर्ष 2020-21 में केन्द्र के कुल कर-राजस्व में उपकर एवं अधिभार का योगदान 2011-12 के 10.4 प्रतिशत से बढ़कर 19.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच चुका है। इसीलिए लगातार यह माँग की जा रही है कि उपकार एवं अधिभार को भी विभाजनीय करों की श्रेणी में लाया जाए।   

3.  कर-राजस्व के वितरण के सन्दर्भ में राज्यों की स्थिति: यद्यपि 14वें वित्त-आयोग की अनुशंसा के कारण केन्द्रीय कर-राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गयी, लेकिन इस वृद्धि को अन्य प्रकार के सशर्त अन्तरण में आने वाली कमी ने प्रति-संतुलित किया। इस कारण यह वृद्धि मामूली ही रही, उतनी नहीं है जितनी आँकड़ों में दिखा रही है। राज्यों को मुख्या रूप से फायदा यह हुआ कि अब वे केन्द्र से प्राप्त संसाधनों को अपनी प्राथमिकता के अनुसार खर्च कर सकते हैं।

4.  केन्द्रीय तेल-राजस्व में वृद्धि से मुख्य रूप से केन्द्र लाभान्वित: सन् (2020-21) में केन्द्र सरकार को क्रूड ऑइल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट से प्राप्त राजस्व 45.6 प्रतिशत की उछाल के साथ 4.18 लाख करोड़ के स्तर पर पहुँच गया और पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद करों से प्राप्त राजस्व 74 प्रतिशत की उछाल के साथ 3.45 लाख करोड़ के स्तर पर। वित्त-वर्ष (2016-17) और वित्त-वर्ष (2019-20) के बीच पेट्रोलियम उत्पादों पर प्राप्त राजस्व में केन्द्र सरकार की हिस्सेदारी 2.73 लाख करोड़ से बढ़कर 2.87 लाख करोड़ हो गया, जबकि वित्त-वर्ष (2019-20) और वित्त-वर्ष (2020-21) के बीच राज्यों की हिस्सेदारी 2.20 लाख करोड़ से 1.6 प्रतिशत घटकर 2.17 लाख करोड़ रह गयी वित्त-वर्ष 2015 में केंद्र सरकार डीजल से प्राप्त 41 प्रतिशत केन्द्रीय राजस्व राज्यों के साथ शेयर करती थी, जबकि वर्तमान में केवल 5.7 प्रतिशत राजस्व शेयर करती है इसका मतलब यह है कि कर की पुनर्रचना से मुख्य रूप से केन्द्र लाभान्वित हुआ है

5.  जीएसटी-क्षतिपूर्ति विवाद: इतना ही नहीं, कोविड-संकट और लॉकडाउन की पृष्ठभूमि में जीएसटी संग्रह में आने वाली गिरावट का हवाला देते हुए केन्द्र ने राजस्व-हानि की स्थिति में भरपाई के अपने वादे को पूरा करने में आना-कानी की, और अन्ततः राज्यों को केन्द्र की शर्तों पर राजस्व-क्षतिपूर्ति की भरपाई के लिए सहमत होना पड़ा। इसने भी राज्यों पर दबाव बढ़ाया, वह भी उस समय जब पब्लिक हेल्थ के मद में राज्यों पर अतिरिक्त खर्च का दबाव था।  

ऐसी स्थिति में राज्यों से यह अपेक्षा करना कि वे कर में कटौती के ज़रिये लोगों को ऑयल इन्फ्लेशन से राहत प्रदान करें, उनके साथ ज्यादती है और इसीलिए उचित नहीं है

यल बांड्स जारी करने की परिपाटी:

जहाँ तक ऑयल बांड्स के सन्दर्भ में यूपीए की जिम्मेवारी का प्रश्न है, तो आरम्भ में केन्द्र सरकार तेल-विपणन कम्पनियों(OMC) को कम कीमत पर पेट्रोल एवं डीजल की बिक्री से होने वाले घाटे की भरपाई नकद राशि प्रदान कर करती थी, लेकिन सन् 2002 में अटल-सरकार द्वारा पहली बार कैश की जगह 9,000 करोड़ रूपये के ऑयल बांड्स जारी किया गया और ऑइल बांड्स जारी कर घाटे की भरपाई करने की परिपाटी शुरू की गयी यह बांड मनमोहन सिंह की सरकार के समय परिपक्व हुआ और उनकी सरकार ने ब्याज के साथ-साथ मूलधन का भी भुगतान किया ध्यातव्य है कि उस समय तेल-विपणन कम्पनियों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से क्रूड ऑयल अपेक्षाकृत अधिक कीमत पर खरीदी पड़ती थी और सरकार द्वारा निर्धारित खुदरा कीमत पर ग्राहकों को उपलब्ध करवानी होती थी जिसके कारण उन्हें घाटा होता था। इस घाटे की भरपाई सरकार द्वारा सब्सिडी देकर की जाती थी जो सरकार के राजकोष पर दबाव को बढ़ाने वाला साबित होता था। इस तरह आम जनता को तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव से मुक्त रखा जाता था।

आगे चलकर, एक ओर सन् 2008-09 के वित्तीय संकट के कारण यूपीए सरकार पर राजकोषीय दबाव बढ़ने लगा, दूसरी ओर मध्य-पूर्व संकट के कारण क्रूड ऑइल की कीमतों में तीव्र वृद्धि ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड ऑयल की कीमतें 142 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर जा पहुँची, तो सरकार के लिए तेल कम्पनियों को नकदी में भुगतान करना मुश्किल होता चला गया क्योंकि सरकार को आर्थिक मन्दी की चुनौती से निबटने के लिए अतिरिक्त संसाधन भी उपलब्ध करवाने थे और राजकोषीय अनुशासन के मद्देनज़र राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को भी नियंत्रित रखना था

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें मनमोहन-सरकार ने (2005-06) और (2009-10) के बीच 1.4 लाख करोड़ के ऑयल बांड्स जारी किये। इसने सरकार पर लायबिलिटी बढ़ाई और पिछले दो दशकों से यूपीए एवं एनडीए, दोनों ही सरकारों के द्वारा ऑयल बांड्स का भुगतान करना पड़ रहा है। यूपीए द्वारा (2009-10) से (2013-14) तक 53,163 करोड़ रुपये का भुगतान ऑयल बांड्स पर ब्याज के रूप में किया गया सार्वजानिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए पुनर्पूंजीकरण बांड्स:

वर्तमान एनडीए सरकार ने भी सार्वजानिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए पुनर्पूंजीकरण बांड्स जारी कर 3.1 लाख करोड़ की राशि जुटाई है जो (2028-35) के दौरान परिपक्व होगा और जिस पर ब्याज एवं मूलधन का भुगतान 2035 तक किया जाना है ध्यातव्य है कि अक्टूबर,2017 में तत्कालीन वित्त-मंत्री अरुण जेटली ने इसे अपवाद स्वरूप वन-टाइम मानक (one-time measure) के रूप में अपनाते हुए 1.35 लाख करोड़ के पुनर्पूंजीकरण बांड्स जारी किया था, लेकिन बाद में यह राजकोषीय घाटे से बचने के नियमित अभ्यास में तब्दील हो गया कारण यह कि इसके कारण सरकार पर तत्काल ब्याज-भुगतान की जिम्मेवारी आती है और राजकोषीय घाटे के आकलन में केवल यही दबाव परिलक्षित होता है

यहाँ तक कि अधिकांश सरकारें फिस्कल डेफिसिट की भरपायी तो बाज़ार में बांड्स जारी करके ही करती हैं, जिसका मतलब है उधारी लेकर अपनी ज़रूरतों को पूरा करना इसका भी तो वही मतलब है जो मतलब आयल बांड्स जारी करने का है और यह भी तो आने वाली सरकारों पर वित्तीय बोझ को बढ़ाता है   

विश्लेषण:

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि न तो वित्त-मंत्री का यह कहना उचित प्रतीत होता है कि बढ़ती हुई कीमतों के लिए यूपीए सरकार जिम्मेवार है और न ही तेल की बढ़ती कीमतों को कम करने की जिम्मेवारी राज्यों के ऊपर थोपना ही उचित प्रतीत होता है। बेहतर यह होता कि वित्त-मन्त्री करों में कटौती के ज़रिये कुछ समय के लिए तेल की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने की कोशिश करतीं, और इस मसले पर जनता के साथ-साथ विपक्ष को भी विश्वास में लेते हुए एक सीमा से ज्यादा कटौती में असमर्थता प्रदर्शित करतीं। दरअसल नोटबन्दी, जीएसटी और कोविड-संकट एवं लॉकडाउन से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किलों में है, और इसका केन्द्र के कर-राजस्वों पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जबकि खर्च का दबाव अब भी बना हुआ है। सरकार की राजकोषीय स्थिति बिगड़ी हुई है, और बेरोजगारी की चुनौती से निबटने और माँग को सृजित करने आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अधिक खर्च करे। यह स्थिति निकट भविष्य में बदलती हुई नहीं दिख रही है, इसलिए सरकार राजस्व के मोर्चे पर राहत देने के लिए तैयार नहीं है। सरकार इसके प्रतिकूल राजनीतिक परिणामों से भी बचना चाहती है, इसलिए पेट्रोल एवं डीजल की बढ़ती कीमतों की जिम्मेवारी को लेना के बजाय इसका ठीकरा पूर्ववर्ती यूपीए सरकार और विशेष रूप से विरोधी दलों के द्वारा शासित राज्य सरकारों पर फोड़ना चाहती है। साथ ही, पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों के मेनुपुलेशन की स्थिति को भी बनाए रखना चाहती है, ताकि ज़रुरत पड़ने पर अपने राजनीतिक हितों को साधा जा सके।  

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Tuesday, 12 April 2022

विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता (हालिया सन्दर्भ)


 विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता 

(हालिया सन्दर्भ)

 

हालिया बिहार विधान-परिषद चुनाव-परिणाम के रुझान:

अप्रैल,2022 में बिहार विधान-परिषद के स्थानीय संस्था कोटे की 23 सीटों के लिए चुनाव सम्पन्न हुआ जिसमें स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना। चुनाव-परिणाम एक ओर सत्तारूढ़ दल के वर्चस्व की ओर इशारा करते हैं, दूसरी ओर धनबल के वर्चस्व के साथ-साथ जाति-विशेष के वर्चस्व की ओर। इससे सामाजिक न्याय की राजनीति के अप्रासंगिक होने का संकेत मिलता है, तो नए समीकरण के निर्मित होने का संकेत भी। इस चुनाव में महागठबंधन ने जाति और संप्रदाय विशेष के दायरे में सिमटी अपनी राजनीति को विस्तार देने की कोशिश करते हुए यह संदेश देने का प्रयास किया कि सामाजिक न्याय की राजनीति का मतलब जातिगत विद्वेष की राजनीति नहीं होना चाहिए, वरन् यह समावेशी राजनीति और समावेशी लोकतंत्र के निर्माण में सहायक होनी चाहिए। यद्यपि उसकी इस राजनीति की भी सीमा रही जहाँ मुसलमानों, दलितों और अति-पिछड़ों के लिए स्पेस सृजित नहीं हो पाया, तथापि इन सीमाओं के बावजूद उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों का दायरा अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक रहा। अब यह संयोग है, या फिर प्रयोग, यह तो आने वाला समय बतलायेगा। इसके विपरीत, भाजपा के जीते नौ उम्मीदवारों में चार वैश्य, तीन राजपूत, एक ब्राह्मण और एक भूमिहार हैं। मतलब वहाँ पूरी तरह से सवर्णों और वैश्यों का वर्चस्व है। जदयू की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वहाँ भी पाँच में से चार विधान-पार्षद या तो राजपूत हैं या फिर वैश्य, जबकि एक यादव हैं। यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भारतीय समाज में जाति और वर्ग भले एक दूसरे के पर्याय न हों, पर इनमें गहरा रिश्ता है।

विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता:

हालिया सम्पन्न चुनाव ने एक बार फिर से विधान-परिषद के औचित्य एवं प्रासंगिकता के प्रश्न को जन्म दिया है और इस पर नए सिरे से बहस की शुरुआत हुई है। कारण यह कि:

1.  चुनाव में धन-बल की अहम् एवं निर्णायक भूमिका: हाल में सम्पन्न विधान-परिषद चुनाव में उन लोगों को पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने के साथ-साथ जीत हासिल करने का अवसर प्राप्त हुआ जिन्होंने चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाया। यह इस ओर इशारा करता है कि विधान-परिषद चुनावों में धनबल की भूमिका विधानसभा और लोकसभा चुनावों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, और अगर विधान-परिषद के चुनाव में धन-बल की भूमिका ही अहम् एवं निर्णायक है, तो फिर इसकी ज़रुरत क्या है?

2.  सामाजिक न्याय की समावेशी राजनीति के लिए झटका: हाल में बिहार विधान-परिषद के 24 स्थानों के लिए सम्पन्न चुनाव में 6 स्थानों पर राजपूत, 6 स्थानों पर भूमिहार, 6 स्थानों पर वैश्य, 5 स्थानों पर यादव और एक स्थान पर ब्राह्मण निर्वाचित हुए। मतलब यह कि अति-पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक विधान-परिषद चुनाव के इस परिदृश्य में हाशिये पर हैं, जबकि विधान-परिषद से यह अपेक्षा की गयी है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के कारण इसमें उन सामाजिक समूहों को सहज ही प्रतिनिधित्व मिल सकेगा जिन्हें ‘फर्स्ट पास्ट, द पोस्ट’ की व्यवस्था के कारण विधानसभा में समुचित एवं पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। इसलिए विधान-परिषद् का चुनाव-परिणाम सामाजिक न्याय की समावेशी राजनीति के लिए भी ज़बरदस्त झटका है।

इस प्रवृत्ति को बिहार विधान-परिषद के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है अगर बिहार विधान-परिषद के सदस्यों की सामजिक संरचना पर गौर करें, तो 75 सदस्यीय बिहार विधान-परिषद में 35 स्थानों पर सवर्ण (16 राजपूत, 9 भूमिहार, 8 ब्राह्मण, 2 कायस्थ) काबिज़ हैं जो बिहार की कुल आबादी में इस समूह की भागीदारी के सापेक्ष इनके अति-प्रतिनिधित्व को दर्शाता है। इसके अलावा, 10 स्थानों पर यादव, 5 स्थानों पर कोइरी-कुर्मी और करीब 9 स्थानों पर वैश्य समुदाय के लोग काबिज़ हैं। इस प्रकार विधान-परिषद की करीब तीन-चौथाई सीटों पर सवर्ण और मध्यवर्ती जातियों के ऐसे लोग काबिज़ हैं जो समाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि से कहीं अधिक प्रभावशाली हैं।

कुछ ऐसी ही स्थिति राज्यसभा की भी दिखती है। राज्यसभा में बिहार के लिए 16 सदस्यों का कोटा निर्धारित किया गया है जिनमें 4 भूमिहार, 3 राजपूत, 2 ब्राह्मण, 2 बनिया और 2 यादव हैं। इनमें जनता दल यूनाइटेड के महेन्द्र प्रसाद सिंह की सीट हाल ही में उनकी मौत के कारण खाली हुई है, जबकि इसी दल के शरद यादव की सदस्यता का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

3.  विधान-परिषद का डम्पिंग यार्ड में तब्दील हो जाना: दरअसल राज्यसभा और विधान-परिषद को भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के डम्पिंग यार्ड में तब्दील कर दिया गया है जहाँ ऐसे नेताओं को एडजस्ट किया जाता है जो या तो चुनाव में हार चुके हैं या फिर चुनावी राजनीति में अप्रासंगिक हैं, पर जिन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है। यह उच्च सदन के रूप में राज्यसभा एवं विधान परिषद् की मर्यादा एवं गरिमा के प्रतिकूल है।

4.  राज्यसभा और विधानसभा की तुलना में शक्तिहीन: चूँकि एक संवैधानिक संस्था के रूप में विधान-परिषद राज्यसभा और विधानसभा की तुलना में शक्तिहीन है, इसीलिए इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है।

5.  विधानसभा पर अंकुश लगा पाने में असमर्थ: विधान परिषद से यह अपेक्षा की गयी है कि अगर विधानसभा जल्दबाजी में बिना सोचे-विचारे कोई विधेयक पारित करती है, तो वह उस पर अंकुश लगाये; लेकिन विधान परिषद ऐसा कर पाने में भी असमर्थ है कारण यह कि इसकी शक्तियाँ राज्यसभा की तुलना में भी कम हैं जिसके कारण यह महज कुछ दिनों के लिए उसे विलंबित कर सकती है

6.  सम्बद्ध हित-समूहों की तुलना में दलीय हितों का प्रतिनिधित्व: सदन के भीतर राज्यसभा की तरह ही विधान-परिषद के सदस्यों का व्यवहार भी इन संस्थाओं की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ये सम्बद्ध हित-समूहों का प्रतिनिधित्व करने और इसके अनुरूप आचरण करने के बजाय दलीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। इनका विधानमंडलीय आचरण भी इनके दलीय हितों और संकीर्ण राजनीतिक हितों के अनुरूप होता है।

7.  एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में अपने दायित्वों के निर्वाह में असफल: राज्यसभा की तरह ही विधान परिषद की परिकल्पना एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में की गयी है और इसी के मद्देनज़र विभिन्न क्षेत्रों से सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान रखा गया है, लेकिन ये सदस्य इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतरते। सामान्यतः न तो इनकी रूचि विधायी कार्यों एवं विधायी प्रक्रिया में होती है और न ही ये अपने अनुभवों से उसमें कुछ नया जोड़ पाने की स्थिति में होते हैं। यहाँ तक कि राज्यसभा की तरह इसके सदस्य भी राज्य के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप व्यवहार करने के बजाय पार्टी-लाइन के आधार पर काम करते हैं

8.  सार्वजानिक वित्त पर बोझ: आज विधान-परिषद को राज्यों के सार्वजानिक वित्त पर बोझ को बढ़ने वाला मान लिया गया है।

उपरोक्त बिन्दुओं के आलोक में विचार करें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि विधान-परिषद अनुपयोगी और अनावश्यक है, इसीलिए इसे समाप्त किया जाना चाहिए।

औचित्य एवं प्रासंगिकता बरकरार:

ऊपर जिन पहलुओं को रेखांकित करते हुए विधान-परिषद को अप्रासंगिक घोषित किया गया है, उनमें बहुत हद तक सच्चाई है। लेकिन, वे विधान-परिषद के एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं और उस पक्ष का सम्बंध कहीं-न-कहीं संसदीय राजनीति में आने वाली गिरावट से भी जाकर जुड़ता है जिसके लिए विधान-परिषद से कहीं अधिक आज का समय और आज की राजनीति जिम्मेवार है। आवश्यकता इस बात की है कि निष्कर्ष तक पहुँचाने में जल्दबाजी करने के बजाय इसके अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जाए। और, यह गम्भीर विचार-विमर्श इसकी प्रासंगिकता की ओर इशारा करता है जिसे निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:

1.  राज्यसभा की तुलना में विधान-परिषद् का वैशिष्ट्य: सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि राज्यसभा के सापेक्ष विधान-परिषद के वैशिष्ट्य को समझा जाए, जो विधान-परिषद के औचित्य एवं प्रासंगिकता की ओर भी इशारा करता है। अगर राज्यसभा के सापेक्ष विधान-परिषद की संरचना का विश्लेषण करें, तो इसमें राज्यसभा की तुलना में कहीं अधिक विविधता है। विधान-परिषद में साहित्य, कला, विज्ञान और समाज-सेवा ही नहीं, सहकारिता क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों को भी मनोनीत किया जाता है। इसके अलावा, इसमें एक निश्चित मात्रा में शिक्षक-समुदाय और स्नातकों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। साथ ही, स्थानीय संस्था के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है जो त्रिस्तरीय संघीय ढाँचे की मूल भावनाओं के अनुरूप ही है। यद्यपि राज्यसभा के विपरीत इसकी परिकल्पना प्रत्यक्षतः स्थानीय संस्थाओं की प्रतिनिधि संस्था के रूप में नहीं की गयी है, तथापि यह सीमित संदर्भों में ही सही, स्थानीय संस्थाओं की आवाज़ को प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। अब यह बात अलग है कि इसके सदस्यों के आचरण इसे पुष्ट नहीं करते, पर यह समस्या तो राज्यसभा के साथ भी है जिसके सदस्य राज्यों के हितों के बजाय राजनीतिक दलों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  

2.  विशेषज्ञ संस्था के रूप में विधान-परिषद की अहमियत: संसदीय व्यवस्था में संसद और विधान-मंडल के सदस्यों से यह अपेक्षा की गयी है कि व्यापक सामाजिक हित में वह विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मसले पर पूर्वाग्रहों से मुक्त रहते हुए तटस्थ एवं निष्पक्ष विश्लेषण करते हुए किसी निर्णय तक पहुँचे। लेकिन, कई बार ऐसा संभव नहीं होता है क्योंकि विधान-सभा के सदस्यों पर कई बार लोकप्रिय जनाकांक्षाओं का दबाव होता है, तो कई बार तात्कालिकता का दबाव। कई बार दलीय राजनीति से बँधे होने के कारण निम्न सदन के सदस्य अपने दायित्वों के निर्वाह में असफल रहते हैं। यही कारण है कि कई बार उनके निर्णय दीर्घकालिक सामाजिक हितों पर संकीर्ण राजनीतिक हितों को तरजीह देते हैं, जबकि व्यापक सामाजिक-राजनीतिक हितों के मद्देनज़र इस स्थिति से बचे जाने की ज़रुरत होती है। ऐसे समय में उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा और विधान-परिषद की जिम्मेवारी बढ़ जाती है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि पुनर्विचार, समीक्षा एवं सुधार के ज़रिये वह विमर्श के दायरे को विस्तार दे और बहुमत के विचारों को उचित एवं सही मार्गदर्शन प्रदान करे। यही कारण है कि दुनिया के जिन हिस्सों में द्वितीय सदन की अवधारणा को स्वीकारा गया है, उनका यह मानना है कि द्वितीय सदन विधायन की प्रक्रिया में विचार-विमर्श को गहनता प्रदान करता है। एक पर्यवेक्षक की भूमिका में यह अपने विस्तृत विवेचन के ज़रिये असहमति एवं मतभेद प्रदर्शित करता हुआ अपने संशोधनों और परामर्श उपलब्ध करवाता है जिसके आलोक में विधानसभा को अपने रुख पर पुनर्विचार का अवसर मिलता है। साथ ही, इस दौरान विधायन की प्रक्रिया में विलम्ब के कारण जो अतिरिक्त समय मिलता है, उसका इस्तेमाल सदन के बाहर भी उस मसले पर गंभीर चिन्तन और मंथन के लिए होता है जिसके कारण उससे सम्बंधित कई अनछुए पहलू भी सामने आते हैं और उनके आलोक में विमर्श संभव हो पाता है। अगर विधान-मण्डल द्विसदनीय नहीं होता और विधान-परिषद का अस्तित्व नहीं होता, तो यह सब संभव नहीं हो पाता। स्पष्ट है कि एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में इसकी अहमियत आज भी बनी हुई है, वह इस दायित्व के निर्वहन में समर्थ है, और इसी कारण उपयोगी एवं आवश्यक भी। 

3.  सामूहिक निर्णयन की लोकतान्त्रिक संकल्पना को मजबूती प्रदान करना: कहा जाता है कि लोकतंत्र में सरकार तो बहुमत से बनती है, पर लोकतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह आम सहमति के आधार पर काम करे। यह लोकतंत्र के सफल प्रकार्यण की अनिवार्य शर्त है, अन्यथा लोकतन्त्र बहुसंख्यकवाद के उपकरण में तब्दील होकर रह जाएगा। यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक कि विधायन की प्रक्रिया में सरकार द्वारा विरोधी दलों को न साधा जाए। इसके लिए आम सहमति बनानी होती है जिससे सामूहिक निर्णयन की संभावनाओं को बल मिलता है। यह लोकतन्त्र की मूल भावनाओं एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों के अनुरूप ही है, और इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है।

4.  विधानसभा के भंग होने पर कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण को सुनिश्चित करना: द्वितीय सदन चाहे जितना ही शक्तिहीन हो, पर निम्न सदन के भंग होने की स्थिति में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण को सुनिश्चित करते हुए उसके मनमानेपन पर अंकुश लगाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ ही, विधान-परिषद विधानसभाओं पर काम के बोझ को कम करने में भी सहायक है।  

5.  विधान-परिषद को पुनर्जीवित करना इसका प्रमाण: इतना ही नहीं, अगर विधान-परिषद की उपयोगिता और अहमियत नहीं होती, तो उन राज्यों के द्वारा द्विसदनीय विधान-मण्डल और विधान-परिषद को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहल नहीं की जाती जिन्होंने कभी इसकी समाप्ति की दिशा में पहल की थी। आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु के उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।  

निष्कर्ष:

स्पष्ट है कि वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में विधान-परिषद आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है। आवश्यकता है इसे और अधिक सुदृढ़ बनाये जाने की, और इसके लिए सही मंशा से हरसंभव प्रयास की। इसका मतलब यह नहीं है कि विधान-परिषद् की जिन कारणों से आलोचना की जाती है और उनकी उपयोगिता, महत्व एवं प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े किये जाते हैं, वे मायने नहीं रखते, या फिर वे अनावश्यक और निरर्थक हैं। लेकिन, ऊपर जिन समस्याओं की बात की गयी है और जिनके आधार पर विधान-परिषद को अप्रासंगिक ठहराया गया है, वे समस्याएँ तो विधानसभा और लोकसभा के सन्दर्भ में भी उभरकर सामने आ रही हैं, तो क्या लोकसभा और विधानसभा को भी भंग कर दिया जाए? आवश्यकता सुधारों की है, न कि संस्थाओं को भंग करने की, क्योंकि अधिकांश समस्याएँ तात्कालिक प्रकृति की होती है, जबकि संस्थाओं को बनने में दशकों का समय लग जाता है। ऐसी स्थिति में दशकों के दौरान विकसित संस्थाओं की कीमत पर समस्या के समाधान की तलाश उचित नहीं है, बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है। बेहतर विधायिका के निर्माण के लिए आवश्यकता है बेहतर समाज के निर्माण की, ताकि बेहतर लोगों की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके।

रही बात सामाजिक न्याय के प्रश्न की अनदेखी की, तो इसे हमें राजनीति के भरोसे छोड़ना होगा और उसके प्रति आलोचनात्मक नजरिया अपनाते हुए उस पर इतना दबाव निर्मित करना होगा ताकि वह सामाजिक न्याय के एजेंडे के प्रति संवेदनशील हो और उच्च सदन में भी प्रतिनिधित्व के क्रम में इस बात का ध्यान रखे। लेकिन, सिर्फ राजनीतिक दलों से ऐसी अपेक्षा ज्यादती होगी। हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था बड़े राजनीतिक दलों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पक्ष में है। फण्डों का प्रवाह भी इन्हीं के पक्ष में है जिसके कारण स्थानीय एवं क्षेत्रीय दलों को फण्डिंग के स्तर पर कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निरन्तर संघर्ष करना होता है। हाल के वर्षों में यह समस्या कम होने के बजाय और अधिक गहन हुई है। राजनीतिक भ्रष्टाचार से लेकर लोकसभा-विधानसभा चुनाव के दौरान टिकटों की खरीद-बिक्री और राज्यसभा-विधान परिषद में सीटों की खरीद-बिक्री के मूल में इस समस्या की मौजूदगी से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जब तक इस समस्या के समाधान हेतु चुनावी सुधारों की प्रभावी कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की जाती है और उन्हें ज़मीनी धरातल पर क्रियान्वित नहीं किया जाता है, तब तक इस समस्या का समाधान संभव हो पायेगा और भारतीय राजनीति एवं भारतीय लोकतंत्र समावेशी हो पायेगा, इसमें संदेह है।