Tuesday, 12 April 2022

विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता (हालिया सन्दर्भ)


 विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता 

(हालिया सन्दर्भ)

 

हालिया बिहार विधान-परिषद चुनाव-परिणाम के रुझान:

अप्रैल,2022 में बिहार विधान-परिषद के स्थानीय संस्था कोटे की 23 सीटों के लिए चुनाव सम्पन्न हुआ जिसमें स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना। चुनाव-परिणाम एक ओर सत्तारूढ़ दल के वर्चस्व की ओर इशारा करते हैं, दूसरी ओर धनबल के वर्चस्व के साथ-साथ जाति-विशेष के वर्चस्व की ओर। इससे सामाजिक न्याय की राजनीति के अप्रासंगिक होने का संकेत मिलता है, तो नए समीकरण के निर्मित होने का संकेत भी। इस चुनाव में महागठबंधन ने जाति और संप्रदाय विशेष के दायरे में सिमटी अपनी राजनीति को विस्तार देने की कोशिश करते हुए यह संदेश देने का प्रयास किया कि सामाजिक न्याय की राजनीति का मतलब जातिगत विद्वेष की राजनीति नहीं होना चाहिए, वरन् यह समावेशी राजनीति और समावेशी लोकतंत्र के निर्माण में सहायक होनी चाहिए। यद्यपि उसकी इस राजनीति की भी सीमा रही जहाँ मुसलमानों, दलितों और अति-पिछड़ों के लिए स्पेस सृजित नहीं हो पाया, तथापि इन सीमाओं के बावजूद उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों का दायरा अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक रहा। अब यह संयोग है, या फिर प्रयोग, यह तो आने वाला समय बतलायेगा। इसके विपरीत, भाजपा के जीते नौ उम्मीदवारों में चार वैश्य, तीन राजपूत, एक ब्राह्मण और एक भूमिहार हैं। मतलब वहाँ पूरी तरह से सवर्णों और वैश्यों का वर्चस्व है। जदयू की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वहाँ भी पाँच में से चार विधान-पार्षद या तो राजपूत हैं या फिर वैश्य, जबकि एक यादव हैं। यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भारतीय समाज में जाति और वर्ग भले एक दूसरे के पर्याय न हों, पर इनमें गहरा रिश्ता है।

विधान-परिषद: औचित्य और प्रासंगिकता:

हालिया सम्पन्न चुनाव ने एक बार फिर से विधान-परिषद के औचित्य एवं प्रासंगिकता के प्रश्न को जन्म दिया है और इस पर नए सिरे से बहस की शुरुआत हुई है। कारण यह कि:

1.  चुनाव में धन-बल की अहम् एवं निर्णायक भूमिका: हाल में सम्पन्न विधान-परिषद चुनाव में उन लोगों को पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने के साथ-साथ जीत हासिल करने का अवसर प्राप्त हुआ जिन्होंने चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाया। यह इस ओर इशारा करता है कि विधान-परिषद चुनावों में धनबल की भूमिका विधानसभा और लोकसभा चुनावों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, और अगर विधान-परिषद के चुनाव में धन-बल की भूमिका ही अहम् एवं निर्णायक है, तो फिर इसकी ज़रुरत क्या है?

2.  सामाजिक न्याय की समावेशी राजनीति के लिए झटका: हाल में बिहार विधान-परिषद के 24 स्थानों के लिए सम्पन्न चुनाव में 6 स्थानों पर राजपूत, 6 स्थानों पर भूमिहार, 6 स्थानों पर वैश्य, 5 स्थानों पर यादव और एक स्थान पर ब्राह्मण निर्वाचित हुए। मतलब यह कि अति-पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक विधान-परिषद चुनाव के इस परिदृश्य में हाशिये पर हैं, जबकि विधान-परिषद से यह अपेक्षा की गयी है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के कारण इसमें उन सामाजिक समूहों को सहज ही प्रतिनिधित्व मिल सकेगा जिन्हें ‘फर्स्ट पास्ट, द पोस्ट’ की व्यवस्था के कारण विधानसभा में समुचित एवं पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। इसलिए विधान-परिषद् का चुनाव-परिणाम सामाजिक न्याय की समावेशी राजनीति के लिए भी ज़बरदस्त झटका है।

इस प्रवृत्ति को बिहार विधान-परिषद के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है अगर बिहार विधान-परिषद के सदस्यों की सामजिक संरचना पर गौर करें, तो 75 सदस्यीय बिहार विधान-परिषद में 35 स्थानों पर सवर्ण (16 राजपूत, 9 भूमिहार, 8 ब्राह्मण, 2 कायस्थ) काबिज़ हैं जो बिहार की कुल आबादी में इस समूह की भागीदारी के सापेक्ष इनके अति-प्रतिनिधित्व को दर्शाता है। इसके अलावा, 10 स्थानों पर यादव, 5 स्थानों पर कोइरी-कुर्मी और करीब 9 स्थानों पर वैश्य समुदाय के लोग काबिज़ हैं। इस प्रकार विधान-परिषद की करीब तीन-चौथाई सीटों पर सवर्ण और मध्यवर्ती जातियों के ऐसे लोग काबिज़ हैं जो समाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि से कहीं अधिक प्रभावशाली हैं।

कुछ ऐसी ही स्थिति राज्यसभा की भी दिखती है। राज्यसभा में बिहार के लिए 16 सदस्यों का कोटा निर्धारित किया गया है जिनमें 4 भूमिहार, 3 राजपूत, 2 ब्राह्मण, 2 बनिया और 2 यादव हैं। इनमें जनता दल यूनाइटेड के महेन्द्र प्रसाद सिंह की सीट हाल ही में उनकी मौत के कारण खाली हुई है, जबकि इसी दल के शरद यादव की सदस्यता का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

3.  विधान-परिषद का डम्पिंग यार्ड में तब्दील हो जाना: दरअसल राज्यसभा और विधान-परिषद को भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के डम्पिंग यार्ड में तब्दील कर दिया गया है जहाँ ऐसे नेताओं को एडजस्ट किया जाता है जो या तो चुनाव में हार चुके हैं या फिर चुनावी राजनीति में अप्रासंगिक हैं, पर जिन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है। यह उच्च सदन के रूप में राज्यसभा एवं विधान परिषद् की मर्यादा एवं गरिमा के प्रतिकूल है।

4.  राज्यसभा और विधानसभा की तुलना में शक्तिहीन: चूँकि एक संवैधानिक संस्था के रूप में विधान-परिषद राज्यसभा और विधानसभा की तुलना में शक्तिहीन है, इसीलिए इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है।

5.  विधानसभा पर अंकुश लगा पाने में असमर्थ: विधान परिषद से यह अपेक्षा की गयी है कि अगर विधानसभा जल्दबाजी में बिना सोचे-विचारे कोई विधेयक पारित करती है, तो वह उस पर अंकुश लगाये; लेकिन विधान परिषद ऐसा कर पाने में भी असमर्थ है कारण यह कि इसकी शक्तियाँ राज्यसभा की तुलना में भी कम हैं जिसके कारण यह महज कुछ दिनों के लिए उसे विलंबित कर सकती है

6.  सम्बद्ध हित-समूहों की तुलना में दलीय हितों का प्रतिनिधित्व: सदन के भीतर राज्यसभा की तरह ही विधान-परिषद के सदस्यों का व्यवहार भी इन संस्थाओं की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ये सम्बद्ध हित-समूहों का प्रतिनिधित्व करने और इसके अनुरूप आचरण करने के बजाय दलीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। इनका विधानमंडलीय आचरण भी इनके दलीय हितों और संकीर्ण राजनीतिक हितों के अनुरूप होता है।

7.  एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में अपने दायित्वों के निर्वाह में असफल: राज्यसभा की तरह ही विधान परिषद की परिकल्पना एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में की गयी है और इसी के मद्देनज़र विभिन्न क्षेत्रों से सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान रखा गया है, लेकिन ये सदस्य इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतरते। सामान्यतः न तो इनकी रूचि विधायी कार्यों एवं विधायी प्रक्रिया में होती है और न ही ये अपने अनुभवों से उसमें कुछ नया जोड़ पाने की स्थिति में होते हैं। यहाँ तक कि राज्यसभा की तरह इसके सदस्य भी राज्य के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप व्यवहार करने के बजाय पार्टी-लाइन के आधार पर काम करते हैं

8.  सार्वजानिक वित्त पर बोझ: आज विधान-परिषद को राज्यों के सार्वजानिक वित्त पर बोझ को बढ़ने वाला मान लिया गया है।

उपरोक्त बिन्दुओं के आलोक में विचार करें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि विधान-परिषद अनुपयोगी और अनावश्यक है, इसीलिए इसे समाप्त किया जाना चाहिए।

औचित्य एवं प्रासंगिकता बरकरार:

ऊपर जिन पहलुओं को रेखांकित करते हुए विधान-परिषद को अप्रासंगिक घोषित किया गया है, उनमें बहुत हद तक सच्चाई है। लेकिन, वे विधान-परिषद के एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं और उस पक्ष का सम्बंध कहीं-न-कहीं संसदीय राजनीति में आने वाली गिरावट से भी जाकर जुड़ता है जिसके लिए विधान-परिषद से कहीं अधिक आज का समय और आज की राजनीति जिम्मेवार है। आवश्यकता इस बात की है कि निष्कर्ष तक पहुँचाने में जल्दबाजी करने के बजाय इसके अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जाए। और, यह गम्भीर विचार-विमर्श इसकी प्रासंगिकता की ओर इशारा करता है जिसे निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:

1.  राज्यसभा की तुलना में विधान-परिषद् का वैशिष्ट्य: सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि राज्यसभा के सापेक्ष विधान-परिषद के वैशिष्ट्य को समझा जाए, जो विधान-परिषद के औचित्य एवं प्रासंगिकता की ओर भी इशारा करता है। अगर राज्यसभा के सापेक्ष विधान-परिषद की संरचना का विश्लेषण करें, तो इसमें राज्यसभा की तुलना में कहीं अधिक विविधता है। विधान-परिषद में साहित्य, कला, विज्ञान और समाज-सेवा ही नहीं, सहकारिता क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों को भी मनोनीत किया जाता है। इसके अलावा, इसमें एक निश्चित मात्रा में शिक्षक-समुदाय और स्नातकों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। साथ ही, स्थानीय संस्था के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है जो त्रिस्तरीय संघीय ढाँचे की मूल भावनाओं के अनुरूप ही है। यद्यपि राज्यसभा के विपरीत इसकी परिकल्पना प्रत्यक्षतः स्थानीय संस्थाओं की प्रतिनिधि संस्था के रूप में नहीं की गयी है, तथापि यह सीमित संदर्भों में ही सही, स्थानीय संस्थाओं की आवाज़ को प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। अब यह बात अलग है कि इसके सदस्यों के आचरण इसे पुष्ट नहीं करते, पर यह समस्या तो राज्यसभा के साथ भी है जिसके सदस्य राज्यों के हितों के बजाय राजनीतिक दलों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  

2.  विशेषज्ञ संस्था के रूप में विधान-परिषद की अहमियत: संसदीय व्यवस्था में संसद और विधान-मंडल के सदस्यों से यह अपेक्षा की गयी है कि व्यापक सामाजिक हित में वह विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मसले पर पूर्वाग्रहों से मुक्त रहते हुए तटस्थ एवं निष्पक्ष विश्लेषण करते हुए किसी निर्णय तक पहुँचे। लेकिन, कई बार ऐसा संभव नहीं होता है क्योंकि विधान-सभा के सदस्यों पर कई बार लोकप्रिय जनाकांक्षाओं का दबाव होता है, तो कई बार तात्कालिकता का दबाव। कई बार दलीय राजनीति से बँधे होने के कारण निम्न सदन के सदस्य अपने दायित्वों के निर्वाह में असफल रहते हैं। यही कारण है कि कई बार उनके निर्णय दीर्घकालिक सामाजिक हितों पर संकीर्ण राजनीतिक हितों को तरजीह देते हैं, जबकि व्यापक सामाजिक-राजनीतिक हितों के मद्देनज़र इस स्थिति से बचे जाने की ज़रुरत होती है। ऐसे समय में उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा और विधान-परिषद की जिम्मेवारी बढ़ जाती है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि पुनर्विचार, समीक्षा एवं सुधार के ज़रिये वह विमर्श के दायरे को विस्तार दे और बहुमत के विचारों को उचित एवं सही मार्गदर्शन प्रदान करे। यही कारण है कि दुनिया के जिन हिस्सों में द्वितीय सदन की अवधारणा को स्वीकारा गया है, उनका यह मानना है कि द्वितीय सदन विधायन की प्रक्रिया में विचार-विमर्श को गहनता प्रदान करता है। एक पर्यवेक्षक की भूमिका में यह अपने विस्तृत विवेचन के ज़रिये असहमति एवं मतभेद प्रदर्शित करता हुआ अपने संशोधनों और परामर्श उपलब्ध करवाता है जिसके आलोक में विधानसभा को अपने रुख पर पुनर्विचार का अवसर मिलता है। साथ ही, इस दौरान विधायन की प्रक्रिया में विलम्ब के कारण जो अतिरिक्त समय मिलता है, उसका इस्तेमाल सदन के बाहर भी उस मसले पर गंभीर चिन्तन और मंथन के लिए होता है जिसके कारण उससे सम्बंधित कई अनछुए पहलू भी सामने आते हैं और उनके आलोक में विमर्श संभव हो पाता है। अगर विधान-मण्डल द्विसदनीय नहीं होता और विधान-परिषद का अस्तित्व नहीं होता, तो यह सब संभव नहीं हो पाता। स्पष्ट है कि एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में इसकी अहमियत आज भी बनी हुई है, वह इस दायित्व के निर्वहन में समर्थ है, और इसी कारण उपयोगी एवं आवश्यक भी। 

3.  सामूहिक निर्णयन की लोकतान्त्रिक संकल्पना को मजबूती प्रदान करना: कहा जाता है कि लोकतंत्र में सरकार तो बहुमत से बनती है, पर लोकतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह आम सहमति के आधार पर काम करे। यह लोकतंत्र के सफल प्रकार्यण की अनिवार्य शर्त है, अन्यथा लोकतन्त्र बहुसंख्यकवाद के उपकरण में तब्दील होकर रह जाएगा। यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक कि विधायन की प्रक्रिया में सरकार द्वारा विरोधी दलों को न साधा जाए। इसके लिए आम सहमति बनानी होती है जिससे सामूहिक निर्णयन की संभावनाओं को बल मिलता है। यह लोकतन्त्र की मूल भावनाओं एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों के अनुरूप ही है, और इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है।

4.  विधानसभा के भंग होने पर कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण को सुनिश्चित करना: द्वितीय सदन चाहे जितना ही शक्तिहीन हो, पर निम्न सदन के भंग होने की स्थिति में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण को सुनिश्चित करते हुए उसके मनमानेपन पर अंकुश लगाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ ही, विधान-परिषद विधानसभाओं पर काम के बोझ को कम करने में भी सहायक है।  

5.  विधान-परिषद को पुनर्जीवित करना इसका प्रमाण: इतना ही नहीं, अगर विधान-परिषद की उपयोगिता और अहमियत नहीं होती, तो उन राज्यों के द्वारा द्विसदनीय विधान-मण्डल और विधान-परिषद को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहल नहीं की जाती जिन्होंने कभी इसकी समाप्ति की दिशा में पहल की थी। आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु के उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।  

निष्कर्ष:

स्पष्ट है कि वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में विधान-परिषद आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है। आवश्यकता है इसे और अधिक सुदृढ़ बनाये जाने की, और इसके लिए सही मंशा से हरसंभव प्रयास की। इसका मतलब यह नहीं है कि विधान-परिषद् की जिन कारणों से आलोचना की जाती है और उनकी उपयोगिता, महत्व एवं प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े किये जाते हैं, वे मायने नहीं रखते, या फिर वे अनावश्यक और निरर्थक हैं। लेकिन, ऊपर जिन समस्याओं की बात की गयी है और जिनके आधार पर विधान-परिषद को अप्रासंगिक ठहराया गया है, वे समस्याएँ तो विधानसभा और लोकसभा के सन्दर्भ में भी उभरकर सामने आ रही हैं, तो क्या लोकसभा और विधानसभा को भी भंग कर दिया जाए? आवश्यकता सुधारों की है, न कि संस्थाओं को भंग करने की, क्योंकि अधिकांश समस्याएँ तात्कालिक प्रकृति की होती है, जबकि संस्थाओं को बनने में दशकों का समय लग जाता है। ऐसी स्थिति में दशकों के दौरान विकसित संस्थाओं की कीमत पर समस्या के समाधान की तलाश उचित नहीं है, बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है। बेहतर विधायिका के निर्माण के लिए आवश्यकता है बेहतर समाज के निर्माण की, ताकि बेहतर लोगों की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके।

रही बात सामाजिक न्याय के प्रश्न की अनदेखी की, तो इसे हमें राजनीति के भरोसे छोड़ना होगा और उसके प्रति आलोचनात्मक नजरिया अपनाते हुए उस पर इतना दबाव निर्मित करना होगा ताकि वह सामाजिक न्याय के एजेंडे के प्रति संवेदनशील हो और उच्च सदन में भी प्रतिनिधित्व के क्रम में इस बात का ध्यान रखे। लेकिन, सिर्फ राजनीतिक दलों से ऐसी अपेक्षा ज्यादती होगी। हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था बड़े राजनीतिक दलों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पक्ष में है। फण्डों का प्रवाह भी इन्हीं के पक्ष में है जिसके कारण स्थानीय एवं क्षेत्रीय दलों को फण्डिंग के स्तर पर कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निरन्तर संघर्ष करना होता है। हाल के वर्षों में यह समस्या कम होने के बजाय और अधिक गहन हुई है। राजनीतिक भ्रष्टाचार से लेकर लोकसभा-विधानसभा चुनाव के दौरान टिकटों की खरीद-बिक्री और राज्यसभा-विधान परिषद में सीटों की खरीद-बिक्री के मूल में इस समस्या की मौजूदगी से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जब तक इस समस्या के समाधान हेतु चुनावी सुधारों की प्रभावी कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की जाती है और उन्हें ज़मीनी धरातल पर क्रियान्वित नहीं किया जाता है, तब तक इस समस्या का समाधान संभव हो पायेगा और भारतीय राजनीति एवं भारतीय लोकतंत्र समावेशी हो पायेगा, इसमें संदेह है।  


Wednesday, 30 March 2022

स्थानीय निकायों का सशक्तिकरण एवं सुदृढ़ीकरण: अद्यतन प्रगति, चुनौतियाँ और समाधान

 

स्थानीय संस्थाएँ और स्थानीय निकाय चुनाव: अद्यतन रुझान

चुनौतियाँ एवं सम्भावनाएँ और सिविल सोसाइटी की भूमिका:

हाल में बिहार पंचायत-चुनाव सफलतापूर्वक और प्रभावी तरीक़े से सम्पन्न हुआ है, और निकट भविष्य में शहरी निकायों के चुनाव अपेक्षित हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यकता इस बात की है कि पंचायत-चुनाव के अनुभवों से सीख लेते हुए शहरी निकायों के चुनाव को और भी अधिक प्रभावशाली तरीक़े से सम्पन्न करवाया जाए। इसी आलोक में विगत रविवार: 27 मार्च को पटना स्थित ए. एन. सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म से सम्बद्ध बिहार इलेक्शन वाच (BEW) और एक्शन फ़ॉर अकाउंटेबुल गवर्नेंस (AAG) के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय शहरी निकाय का सशक्तिकरण एवं सुदृढ़ीकरण: मुद्दे एवं चुनौतियाँ विषय पर एकदिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी तीन सत्रों में चली और तीनों सत्रों के स्थाने निकायों से सम्बंधित भिन्न-भिन्न विषय निर्धारित किए गये। पहले सत्र में स्थानीय निकाय चुनावों के हालिया अनुभवों के आलोक में शहरी निकाय चुनाव के प्रश्न पर विचार करना था, दूसरे सत्र में स्थानीय शहरी निकाय चुनावों में सिविल सोसाइटी की भूमिका पर विचार किया गया और तीसरे सत्र में शहरी निकायों के समक्ष मौजूद चुनौतियों के प्रश्न पर विचार किया गया।

इस संगोष्ठी का उद्घाटन बिहार राज्य निर्वाचन आयुक्त श्री दीपक प्रसाद और अन्य विशिष्ट अतिथियों द्वारा किया गया। इस संगोष्ठी के पहले सत्र में बिहार इलेक्शन वाच के राज्य-प्रमुख और एक्शन फ़ॉर अकाउंटेबुल गवर्नेंस (AAG) के संस्थापक-सदस्य राजीव कुमार ने अपने स्वागत-भाषण में विषय-प्रवेश के साथ-साथ इस आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शहरी स्वशासी संस्थाओं का सशक्तिकरण एवं सुदृढ़ीकरण के रास्ते में मौजूद अवरोधों को पहचानने और उसे दूर करने की आवश्यकता है, ताकि ये संस्थाएँ महज़ संवैधानिक ख़ानापूर्ति बनकर न रह जाएँ। संगोष्ठी के पहले सत्र के अध्यक्ष कुमार सर्वेश ने हाल में सम्पन्न बिहार पंचायत चुनाव,2021-22 के अनुभवों की शहरी निकाय चुनाव के संदर्भ में प्रासंगिकताविषय पर परिचर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और समाजवादी चिन्तक डॉ. रमा मनोहर लोहिया के राजनीतिक-प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण का जो सपना देखा, उसे ज़मीनी धरातल पर उतारने के लिए आज भी गम्भीर पहल अपेक्षित है। इस दिशा में हालिया सम्पन्न पंचायत-चुनाव के अनुभवों से सीखने और उन्हें संयोजित करने की ज़रूरत है।

कई मायनों में ऐतिहासिक रहा पंचायत-चुनाव: राज्य चुनाव-आयुक्त दीपक प्रसाद:

स्थानीय स्वशासन के प्रश्न पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विचार करते हुए राज्य चुनाव आयुक्त दीपक प्रसाद ने उन चुनौतियों और उपलब्धियों को रेखांकित किया को राज्य चुनाव आयोग के समक्ष मौजूद थे। उन्होंने राज्य निर्वाचन आयोग की उन पहलों का विस्तार से उल्लेख किया जिन्होंने चुनाव-प्रक्रिया को स्पष्ट, पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाते हुए उसकी स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता ही सुनिश्चित नहीं की, वरन् उसे हरसंभव भय-मुक्त एवं दबाव-मुक्त भी बनाया। उनके अनुसार, इस रूप में बिहार पंचायत-चुनाव,2021-22 ने पूरे देश के समक्ष ईवीएम, बायोमेट्रिक पहचान और मानवीय हस्तक्षेप की संभावनाओं को कम करने के लिए डिजिटाइज़्ड चुनाव-प्रक्रिया के ज़रिए स्पष्ट, पारदर्शी और जवाबदेह चुनाव-मॉडल प्रस्तुत किया है। ध्यातव्य है कि बिहार में पहली बार पंचायत-चुनाव में प्रमुख पदों पर निर्वाचन के लिए ईवीएम का इस्तेमाल किया गया और बोगस वोटिंग को रोकने के लिए मतदाताओं की बायोमीट्रिक पहचान को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। साथ ही, काउंटिंग की पूरी प्रक्रिया को भी डिजिटाइज़्ड किया गया। ध्यातव्य है कि हालिया सम्पन्न पंचायत चुनाव में ईवीएम-विवाद के मद्देनज़र राज्य चुनाव आयोग ने स्ट्राँग रूम में ईवीएम के लिए डिजिटल लॉक की व्यवस्था शुरू की जिसके लिंक सभी उम्मीदवारों को भी उपलब्ध करवाए गए। डिजिटल लॉक के कारण ईवीएम के साथ किसी भी प्रकार के छेड़छाड़ संभव नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता है, इससे सम्बंधित सूचना उन सभी लोगों तक पहुँच जाती है जिनके पास डिजिटल लॉक के लिंक उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं, आयोग ने कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखते हुए हिंसा एवं दबाव-मुक्त चुनाव को सुनिश्चित करने के लिए ग्राम-पंचायतों को विभिन्न सेक्टरों में बाँटते हुए सेक्टर-आधारित एप्रोच को अपनाया। उन्होंने यह भी बतलाया कि इस बार बूथों पर धाँधलियों और मतगणना के दौरान धाँधलियों की शिकायतों में भी तीव्र गिरावट का रुझान देखने को मिलता है। इस रूप में पंचायत-चुनाव,2021-22 निश्चय ही राज्य चुनाव-आयोग की उपलब्धि है। यही कारण है कि इस बार चुनाव-प्रक्रिया के सम्पन्न होने के बाद से 25 मार्च तक महज़ 117 चुनावी याचिकाएँ दायर की गयीं, जबकि पिछली बार ऐसी याचिकाओं की संख्या 8,000 से ज़्यादा अधिक थी। आयोग की इन पहलों से प्रभावित होकर कई राज्यों ने बिहार पंचायत-चुनाव के प्रायोगिक अनुभवों से सीख लेने के लिए अपने प्रतिनिधियों को बिहार भेजा, ताकि वे इससे लाभान्वित हो सकें।

पंचायत-चुनाव के नवीनतम रुझान:

राज्य चुनाव-आयुक्त ने इस चुनाव के नवीनतम रुझानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस बार पंचायतों में खेल, कला, साहित्य, प्रोफेशनल दुनिया आदि से सम्बद्ध विविध पृष्ठभूमि से लगभग 85 प्रतिशत तक नए लोग जन-प्रतिनिधि के रूप में चुनकर आये हैं। इतना ही नहीं, इस बार 35 वर्ष से कम उम्र के लगभग 35 प्रतिशत से अधिक युवा त्रिस्तरीय पंचायती राज-व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर जन-प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित हुए, जो स्थानीय निकायों की ओर युवाओं के बढ़ते आकर्षण और इसमें उनकी बढ़ती भागीदारी की ओर इशारा करता है।
उन्होंने चुनाव-प्रक्रिया से लेकर मतदान-प्रक्रिया तक महिलाओं की सहभागिता को इस चुनाव की उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया। ध्यातव्य है कि पहली बार इस चुनाव में पहली बार आयोग ने मतदान से लेकर काउंटिंग तक की प्रक्रिया में महिलाओं पर भरोसा प्रदर्शित करते हुए उनकी बढ़-चढ़ कर भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया। साथ ही, स्थानीय संस्थाओं के स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक समावेशन की प्रक्रिया में तेज़ी की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस चुनाव में पंचायत के विभिन्न स्तरों पर निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों में महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में बढ़ी है। उन्होंने इसे
महिलाओं के समावेशन और सशक्तिकरण से सम्बद्ध करके देखा, तथा इसका श्रेय हिंसा एवं धाँधली-मुक्त चुनाव को दिया जिसके लिए निश्चय ही राज्य चुनाव-आयोग के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, इस बार के चुनाव में अनाऱक्षित पद पर आरक्षित समूह के निर्वाचित लोगों की संख्या में भी वृद्धि का रूझान देखने को मिलता है जो हाशिए पर के समूह के समावेशन एवं सशक्तिकरण की ओर इशारा करता है।

प्रभावी प्रशिक्षण के ज़रिये क्षमता-निर्माण समावेशन एवं सशक्तिकरण की प्राथमिक शर्त:

लेकिन, आयोग के इस दावे से कई सोशल-पोलिटिकल एक्टिविस्ट असहमत दिखे। पटना हाईकोर्ट से सम्बद्ध एडवोकेट मधु श्रीवास्तव ने महिला-सशक्तिकरण एवं महिलाओं के समावेशन पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि इसके लिए अपनी पीठ थपथपाने के बजाए हमें इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि क्या वाक़ई महिलाएँ निर्वाचित जन-प्रतिनिधि के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाह कर पा रही हैं, या फिर उनके अधिकारों का (दुरू)उपयोग उनके पुरूष सहकर्मियों के द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए उन्होंने निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि स्थानीय स्वशासन की संकल्पना तब तक ज़मीनी धरातल पर प्रभावी नहीं होगी, जब तक ऐसी टीम का विकास नहीं हो जाता, जिसके पास गवर्नेंस की समझ हो, जो इससे सम्बंधित दायित्वों के निर्वहन में सक्षम हो और जो इन दायित्वों के निर्वाह के लिए सर्वथा प्रस्तुत भी हो।

धनबल की भूमिका पर अंकुश लगा पाने में आयोग विफल:

वरिष्ठ पत्रकार मणिकान्त ठाकुर ने राज्य चुनाव-आयुक्त का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि चूँकि इन चुनावों में भी धनबल की अहम् भूमिका रही है और जातिगत समीकरणों ने चुनाव-परिणामों को प्रभावित किया है, इसलिए आवश्यकता चुनाव-सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए धनबल की बढ़ती भूमिका पर अंकुश लगाने की है। पटना हाईकोर्ट से सम्बद्ध एडवोकेट मधु श्रीवास्तव ने निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की जवाबदेही के निर्धारण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि धन-बल की भूमिका पर प्रभावी अंकुश लगा पाना तब तक संभव नहीं है जब तक कि सांसदों एवं विधायकों/ विधान-पार्षदों की तरह स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के लिए भी सम्मानजनक वेतन एवं भत्ते निर्धारित नहीं किए जाते।  

जीरो बज़ट चुनाव पर जोर:

पटना साइंस कॉलेज के प्रोफ़ेसर डॉ. अखिलेश कुमार ने पॉलिटिकल कॉलेजियमकी व्यवस्था को तोड़े जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि स्थानीय संस्थाओं से लेकर विधानसभा एवं लोकसभा तक की राजनीतिक पर कुछेक घरानों के वर्चस्व को देखा जा सकता है जिसने राजनीति में आमलोगों के प्रवेश को अत्यन्त मुश्किल बना दिया है। अन्य वक्ताओं की तरह उन्होंने भी चुनाव-सुधारों की प्रक्रिया पर बल देते हुए ज़ीरो बजट चुनावसे सम्बंधित अपने अनुभवों एवं विचारों को साझा किया और इसके ज़रिये चुनावों में धनबल की भूमिका पर अंकुश लगाने की बात की। इस बहस को आगे बढ़ाते हुए सोशल-पॉलिटिकल एक्टिविस्ट देव कुमार सिंह ने अपने निजी अनुभवों के हवाले से कहा कि यदि नेतृत्व जनता के प्रति समर्पित हो, तो फिर चुनाव उम्मीदवार नहीं, जनता लड़ती है और ऐसी स्थिति में संसाधनों की अहमियत खुद-ब-खुद कम हो जाती है। मतलब यह कि अगर जन-प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हों और जनता सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि से जागरूक हो, तो धनबल की भूमिका पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सकता है।

नए जनप्रतिनिधियों का सच और धनबल:

सोशल एक्टिविस्ट और मेंटर कुमार सर्वेश ने नयी लोगों की बढ़ती भागीदारी के सामान्यीकरण के बजाए इस मसले पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता प्रदर्शित करते हुए कहा कि कहीं ये लोग पिछले डेढ़ दशकों के दौरान स्थानीय संस्थाओं के मद में वित्त-आयोग द्वारा फण्ड-आवंटन में तीव्र वृद्धि (13वें वित्त-आयोग के द्वारा करीब 80,000 करोड़ से बढ़कर 15वें वित्त-आयोग द्वारा करीब 4.35 लाख करोड़) की पृष्ठभूमि में त्वरित लाभ की कामना में तो नहीं आये हैं। अगर ऐसा है, तो यह चिन्ता का विषय है क्योंकि यह स्थानीय स्तर की राजनीति में नए स्टेकहोल्डर्स के आविर्भाव के ज़रिए भ्रष्टाचार के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को और अधिक तेज करेगा। इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार की समस्या और अधिक गहन होगी। उनके अनुसार, बाहुबल की भूमिका पर अंकुश लगाने के चुनाव आयोग के दावों के बावजूद वास्तविकता यह है कि जब तक धनबल की भूमिका पर प्रभावी तरीक़े से अंकुश नहीं लगाया जाता है, तब तक बाहुबल की भूमिका पर अंकुश लगाने का दावा महज़ छलावा है। लोकसभा से लेकर विधानसभा और स्थानीय संस्थाओं तक में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जन-प्रतिनिधियों की बढ़ती भागीदारी इसी बात की ओर इशारा करते हैं। ध्यातव्य है कि भारत के मुख्य चुनाव-आयुक्त(CEC) ने भी एकाधिक अवसरों पर चुनाव में धनबल की भूमिका पर अंकुश लगाने में चुनाव आयोग की असफलता को स्वीकार किया है। लेकिन, यह इसका एक पक्ष है, एकमात्र पक्ष नहीं। यह भी सच है कि इस चुनाव में कई ऐसे प्रतिनिधि चुनकर आये हैं जिनके लिए पैसा कमाने के कई विकल्प मौजूद थे, पर उन विकल्पों को ठुकराते हुए उन्होंने सेवा-भाव और बदलाव की आकांक्षा से प्रेरित होकर स्थानीय निकायों में अपनी भागीदारी को प्राथमिकता दी। इसके अलावा, मतदाताओं ने उन पुराने जन-प्रतिनिधियों को हराने का काम किया जिन्होंने स्थानीय स्तर की राजनीति में पॉलिटिकल कॉलेजियम निर्मित करते हुए शौचालय-निर्माण से लेकर प्रधानमंत्री आवास तक से सम्बंधित योजनाओं तक में कमीशनखोरी को प्राथमिकता दी और विभिन्न परियोजनाओं में अपने समर्थकों को भागीदार बनाने के बजाय उसके लाभ को खुद तक और अपने निकटतम शागिर्दों तक सीमित रखा। इस रूप में यह बदलाव पर बल देता हुआ निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की जवाबदेही को सुनिश्चित करने में सहायक होगा। दोनों ही रूपों में इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी।   

सिविल सोसाइटी की भूमिका:

इस संगोष्ठी के दूसरे सत्र की अध्यक्षता बिहार टाइम्सके सम्पादक अजय कुमार के द्वारा किया गया। उन्होंने इस सत्र के विषय आगामी शहरी निकाय चुनाव में सिविल सोसाइटी की भूमिकाके सन्दर्भ में अपनी आरम्भिक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा कि किसी भी समाज के विकास की दिशा एवं दशा को प्रभावित करने में उस समाज के प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका अहम् होती है। विशेष रूप से स्थानीय स्तर के चुनावों में सिविल सोसाइटी ज़मीनी धरातल से जुड़ाव और ज़मीनी धरातल पर अपनी विश्वसनीय मौजूदगी के सहारे बड़ा फ़र्क़ पैदा करने की स्थिति में है। इसके मद्देनज़र कई वक्ताओं ने सिविल सोसाइटी से यह अपेक्षा की कि वह आगे बढ़कर अपनी ज़िम्मेवारी को स्वीकार करे, ताकि शहरी निकायों के चुनाव जाति-धर्म जैसे भावात्मक मुद्दों के बजाए शहरी शासन और शहरी प्रबंधन से सम्बद्ध वास्तविक मुद्दों के आधार पर लड़े जा सकें। साथ ही, चुनावों और मतदाताओं पर धनबल की गिरफ़्त को कमजोर किया जा सके। लेकिन, यह तभी सम्भव है जब सिविल सोसाइटी और इससे जुड़े लोग व्यक्तिगत स्तर पर और सांगठनिक स्तर पर इसके लिए सतत अभियान चलते हुए मतदाताओं को जागरूक करने की कोशिश करें।

जागरूक समाज का निर्माण है इसका समाधान:

श्रोताओं की ओर से हस्तक्षेप करते हुए साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट रवीन्द्र राय जी ने स्कैंडिनेवियन देशों का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार स्थानीय संस्था में सुधारों और इसके सशक्तिकरण को लेकर वाक़ई गम्भीर है, तो उसे आर्थिक असमानता समाप्त करने की दिशा में प्रभावी पहल करनी चाहिए और लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक पाँच किलो मुफ्त अनाज, साड़ी, मुफ्त भोजन, दारू  या फिर चन्द नकदी के सहारे वोटों की खरीद-बिक्री चलती रहेगी। इस पर अंकुश लगा पाना सम्भव नहीं होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आवश्यकता समतामूलक समाज के निर्माण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के ज़रिये सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि से जागरूक समाज के निर्माण की है जिसमें व्यक्ति इन बुराइयों की कीमत को समझ सके और इनसे दूर रह सके। यह स्थिति चुनावी राजनीति की अधिकांश बुराइयों को दूर करने में सहायक है, अब वे बुराइयाँ चाहे धनबल-बहुबल की हों, या फिर जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय जैसी पहचान पर आधारित राजनीति की। इतना ही नहीं, ऐसी स्थिति में निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों को भी जनता एवं समाज के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता है। साथ ही, एक जागरूक समाज स्थानीय स्वशासन के सपनों को ज़मीनी धरातल पर उतारने में भी सहायक साबित होगा।

शहरी निकाय चुनावों की पंचायत चुनावों से भिन्नता:

सोशल एक्टिविस्ट और तलाशके संस्थापक डॉ. विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा ने कहा कि जैसा समाज होगा, वैसी ही राजनीति होगी और वैसे ही जन-प्रतिनिधि मिलेंगे। इसलिए अगर राजनीति बदलनी है, तो समाज एवं उसकी सोच बदलनी होगी। उन्होंने शहरी और ग्रामीण निकायों हेतु चुनावों में फ़र्क़ की ओर इशारा करते हुए कहा कि जहाँ गाँव में भाई-भतीजावाद और जातिवाद जैसे कारक कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं, वहीं शहरी निकाय के चुनाव में इसकी संभावना अपेक्षाकृत कम होती है। लेकिन, उनकी इस मान्यता की सीमा यह है कि उनकी बातें बड़े शहरी निकायों के संदर्भ में कहीं अधिक प्रभावी हैं, न कि नगर-पंचायत और नगर-परिषद जैसे छोटे शहरी निकायों के सन्दर्भ में। लेकिन, यह सच है कि ग्रामीण मतदाताओं की तुलना में शहरी मतदाता कहीं अधिक प्रबुद्ध एवं जागरूक होते हैं। इसीलिए अगर सिविल सोसाइटी चाहे और सक्रियता प्रदर्शित करे, तो शहरी निकाय के चुनावों में उनकी भूमिका कहीं अधिक प्रभावी हो सकती है। लेकिन, यहाँ पर समस्या यह भी है कि ग्रामीण मतदाताओं और शहरी स्लम इलाकों के मतदाताओं की तुलना में ऐसे मतदाता मतदान-प्रक्रिया के प्रति उदासीन होते हैं।

नौकरशाही की गिरफ्त में स्थानीय स्वशासन:

एनजीओ निदानके कार्यकारी निदेशक अरविन्द कुमार ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए अप्रभावी शहरी प्रबन्धन और अप्रभावी शहरी गवर्नेंस जैसी कमियों को रेखांकित किया। उन्होंने शहरी गवर्नेंस की ख़ामियों की ओर इशारा करते हुए महापौर और नगर आयुक्त के बीच टकराव की ओर ध्यान आकृष्ट किया। उनका कहना था कि शहरी गवर्नेंस पर नौकरशाही हावी है और वास्तविक अर्थों में जनभागीदारी के तत्व कमजोर हैं। इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि शहरी स्वशासन से सम्बंधित विधानों में परिवर्तन करते हुए शहरी गवर्नेंस में समुचित एवं पर्याप्त जन-भागीदारी को भी सुनिश्चित किया जाए और संसाधनों के हस्तांतरण के ज़रिए शहरी संस्थाओं के सशक्तिकरण को भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने नीति-निर्माण से सम्बंधित प्रभावी ढ़ाँचे के अभाव की ओर इशारा करते हुए कहा कि (73-74)वें संविधान संशोधन की अपेक्षाओं अनुरूप नौकरशाही के माइंडसेट में बदलाव लाए बग़ैर नीति-निर्माण के ढ़ाँचे का विकास मुश्किल है। और, जब तक ऐसा नहीं हो जाता, तब तक राजनीतिक एवं प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण का सपना साकार हो पायेगा, इसमें सन्देह है।

शहरी निकायों के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ:

इस संगोष्ठी के अंतिम सत्र की अध्यक्षता करते हुए एडवोकेट बी. के. सिन्हा ने बिहार में शहरी स्थानीय निकायों के समक्ष मौजूद चुनौतियाँविषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि एक ओर स्थानीय निकायों से हमारी अपेक्षा विकेन्द्रीकृत आयोजन की है, दूसरी ओर पटना जैसे शहर में पिछले पचास वर्षों से कोई टाउन प्लानर नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ़ पटना की है, अन्य शहरों की भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि सरकार स्वयं ही शहरी नियोजन को लेकर गम्भीर नहीं है, और अगर ऐसा है, तो फिर इतना बड़ा ढ़ाँचा खड़ा करने का क्या औचित्य है। इस बहस को आगे बढ़ाते हुए सोशल-पॉलिटिकल एक्टिविस्ट देव कुमार सिंह ने स्थानीय संस्थाओं के एजेंडे थोपने की प्रवृत्ति पर चिन्ता प्रदर्शित करते हुए कहा कि निर्वाचित जन-प्रतिनिधि केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा थोपे गए एजेंडे को मानने लिए विवश होते हैं जिसके कारण राजनीतिक-प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण का सपना सपना ही रह जाता है, कभी मूर्त रूप नहीं ले पाता है। आज आलम यह है कि पूरे शहरी गवर्नेंस पर नगर आयुक्त हावी हैं और स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से योजनाओं के चयन तक की अनुमति नहीं है।

पटना नगर निगम की वार्ड-पार्षद पिंकी देवी ने लक्षित विकेन्द्रीकृत आयोजन से नो प्लानिंगतक की यात्रा अपनी चिन्ता प्रदर्शित करते हुए कहा कि स्थानीय संस्थाओं को केन्द्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के क्रियान्वित करने वाली एजेंसी में तब्दील भर कर दिया गया है। फलत: ऐसी परिस्थितियाँ सृजित की गईं जिसमें इस पर नौकरशाही हावी होती चली गयी। इस आलोक में कुमार सर्वेश ने हालिया बदलावों की विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक ओर (73-74)वें संविधान-संशोधन के ज़रिये राजनीतिक-प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ विकेन्द्रीकृत आयोजन का आधार तैयार करने का प्रयास किया और सन् 2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग का गठन करते हुए बॉटम अप एप्रोच के ज़रिये उसे समर्थन देने की कोशिश की गयी, दूसरी ओर बारहवीं पंचवर्षीय योजना(2012-17) के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के मॉडल को ही ड्राप कर दिया गया। जब आयोजन की संकल्पना ही नहीं है, तो फिर जिला योजना समिति(DPC) और ग्रामीण एवं शहरी स्वशासी संस्थाओं द्वारा योजना-निर्माण का औचित्य एवं प्रासंगिकता क्या रह जाती है? आज भी जिला योजना समितियाँ मृतप्राय स्थिति में हैं, फलतः स्थानीय निकाय क्रियान्वयन एजेंसियों में तब्दील होकर रह गए हैं।

हालिया संशोधन का शहरी संस्थाओं की स्वायत्ता पर प्रतिकूल असर:

पटना नगर निगम के जन-प्रतिनिधि आशीष कुमार ने शहरी स्थानीय निकाय से सम्बंधित नियमावली में हालिया संशोधन की विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक ओर मेयर और डिप्टी मेयर के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था अपनायी जा रही है, दूसरी ओर नगरपालिका नियमावली में संशोधन करते हुए धारा 36-38 और धारा 41 को समाप्त करते हुए शहरी स्वशासी निकायों की शक्तियों को कम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने शहरी निकायों में सुधार के नाम पर सरकार के द्वारा इसकी शक्तियों में कटौती की तीखे शब्दों में निंदा की। उन्होंने महापौर और महापौर के कैबिनेट के सशक्तिकरण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केरल भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ के मेयर को नगर आयुक्त का चरित्र रिपोर्ट (CR) लिखने का अधिकार है। इसी आलोक में उन्होंने माँग की कि नगरपालिका नियमावली के अनुरूप नगर आयुक्त की नियुक्ति में स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों की राय को अहमियत दी जाए और अगर वे नगर-आयुक्त के निष्पादन से संतुष्ट नहीं हैं, तो उन्हें उनकी सेवा-वापसी का भी अधिकार हो।

सोशल एक्टिविस्ट योगेश रौशन ने यह बतलाया कि यह शहरी निकाय का चुनाव सिविल सोसाइटी का हस्तक्षेप एवं इसकी पृष्ठभूमि में उच्च न्यायलय का आदेश के है जिसके कारण बिहार में शहरी निकाय अस्तित्व में आए और उनका थोड़ा-बहुत सशक्तिकरण भी संभव हो सका, अन्यथा क्या हालात होते, इसके बारे में अनुमान लगा पाना भी मुश्किल है। उन्होंने सन् 2009 में पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस आदेश का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया कि सड़कों के निर्माण के क्रम में सड़कों के लेवल को मेंटेन किया जाए ताकि बने हुए घरों का लेवल सड़कों से नीचे नहीं चला जाए। लेकिन, चिन्ता की बात यह है कि आम लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है और इसके कारण उन्हें परेशानियाँ झेलनी पड़ रही हैं।

स्थानीय संस्थाओं की विसंगतियों के लिए आम जनता जिम्मेवार नहीं:

सबरी के प्रबंध निदेशक संजीव कुमार ने अपने सम्बोधन में सरकार और प्रशासन पर यह आरोप लगाया कि इनके द्वारा प्रभावी स्थानीय स्वशासन के सन्दर्भ में अपनी विफलता छुपाने के लिए नागरिक को जिम्मेवार ठहराने हेतु संस्थागत तरीक़े से अभियान चल रही है, ताकि लोगों को यह लगने लगे कि इस स्थिति के लिए सरकार एवं प्रशासन नहीं, आम जनता ज़िम्मेवार है। उन्होंने महाराष्ट्र के हिबड़े बाज़ार मॉडल का उल्लेख करते हुए कहा कि आज आवश्यकता स्थानीय स्वशासन के इस मॉडल को पूरे देश में अपनाने की है, तभी स्थानीय संस्थाएँ उन लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेंगी जिनके लिए इनका गठन किया गया है।

समाधान की दिशा:

संगोष्ठी के अन्त में सम्पादक अजय कुमार ने उभरने वाले निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि प्रभावी स्थानीय स्वशासन के ज़रिए राजनीतिक-प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण के स्वप्न को साकार करना है, तो सिविल सोसाइटी और निर्वाचित स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को आपस में मिलकर शक्तियों के हस्तांतरण के ज़रिए स्थानीय संस्थाओं के सशक्तिकरण हेतु सरकार पर दबाव निर्मित करना होगा ताकि सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। लेकिन, यह तब तक संभव नहीं है जब तक सिविल सोसाइटी और स्थानीय जन-प्रतिनिधियों के बीच संवाद हेतु प्लेटफ़ॉर्म विकसित न हो और स्थानीय जन-प्रतिनिधि अपनी जवाबदेही के ज़रिए सिविल सोसाइटी में अपने प्रति भरोसा उत्पन्न न करें। इसके अलावा, इस संगोष्ठी में शामिल सारे वक्ताओं के बीच इस बात पर सहमति थी कि अगर स्थानीय स्वशासन के समक्ष मौजूद चुनौतियों से प्रभावी तरीक़े से निबटना है, तो सिविल सोसाइटी को आगे आकर अपनी ज़िम्मेवारी स्वीकार करनी होगी, ताकि आम मतदाताओं में राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता क़ायम की जा सके, स्थानीय निकायों के चुनावों में धनबल एवं बाहुबल, जाति एवं धर्म जैसी विसंगतियों को दूर किया जा सके और निर्वाचित स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा अपनी नागरिक ज़िम्मेवारी को स्वीकार करते हुए सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक के प्लेटफ़ार्मों का प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल किया जाए। अन्त में उन्होंने राज्य सरकार से
यह अपील की कि वह स्थानीय संस्थाओं की प्रभावशीलता और सशक्तिकरण के प्रति संवेदनशील हो, तथा प्रशासन अपने माइंड सेट में बदलाव के ज़रिए इसके प्रति अनुक्रियाशील (Responsive) हो।