Thursday, 25 June 2020

गुजराल-डॉक्ट्रिन,1996


गुजराल-डॉक्ट्रिन,1996
(पंचशील का विस्तारित रूप)
प्रमुख आयाम
1.  गुजराल डॉक्ट्रिन: पृष्ठभूमि
2.  नेहरुवादी विदेश-नीति: पुनर्परिभाषित
3.  पंचशील-पुनर्परिभाषित
4.  पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की जटिलता
5.  लोकल रणनीति, ग्लोबल सोच
6.  गुजराल-डॉक्ट्रिन: प्रमुख अवयव
7.  पंचशील से भिन्नता
8.  डॉक्ट्रिन की सीमाएँ
9.  विश्लेषण
गुजराल डॉक्ट्रिन: पृष्ठभूमि:
सन् 1990 में सोवियत संघ के विघटन और साम्यवादी ब्लॉक के बिखराव के साथ भारत के समक्ष यह चुनौती उत्पन्न हुई कि वह बदले हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ तालमेल स्थापित करने की कोशिश करे और इसके कारण जो नवीन चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उनसे निबटने की कोशिश करे। साथ ही, यह वह दौर था जिसमें भारत के प्रति पाकिस्तान की शत्रुता बढ़ती चली गयी और पाकिस्तान सहित भारत के निकटतम पड़ोसी देशों ने भारत के बढ़ते कद से आशंकित होकर उसकी बढ़ती शक्ति एवं उसके बढ़ते प्रभाव को प्रति-संतुलित करने के लिए चीन से नज़दीकियाँ बढ़ानी शुरू की। वैश्विक महाशक्ति बनने की आकांक्षा पाले चीन ने उसे रेस्पोंड करना शुरू किया और चीन के इस रिस्पांस ने भारत के लिए परेशानियाँ खड़ी करनी शुरू की। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत ने अपने राष्ट्रीय सामरिक एवं सुरक्षा-हितों को संरक्षित करने के लिए अपनी विदेश-नीति को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस की। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि अबतक:
1.  भारत की विदेश-नीति पश्चिम के बड़े देशों की ओर उन्मुख थी,
2.  उसका रुझान यथार्थ की बजाय आदर्शों की ओर कहीं अधिक था, और
3.  उसमें अबतक भारत के पड़ोसी देशों, विशेषकर छोटे पड़ोसी देशों और विस्तृत पड़ोस को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया था।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सन् 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारतीय विदेश-नीति को पुनर्परिभाषित करते हुए नेहरु-युग की विदेश-नीति से दूर ले जाने की कोशिश शुरू हुई, ताकि:
1.  इसे यथार्थ पर आधारित बनाया जा सके,
2.  बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ तालमेल स्थापित किया जा सके, और
3.  राष्ट्रीय हितों को बेहतर तरीके से संरक्षित किया जा सके।
नेहरुवादी विदेश-नीति: पुनर्परिभाषित
इस दिशा में कोशिश की गयी, लुक ईस्ट पालिसी के जरिये और गुजराल डॉक्ट्रिन के जरिये। सन् 1991 में पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने लुक ईस्ट पॉलिसी (Look East Policy) की घोषणा करते हुए भारत के दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसी देशों की अहमियत को स्वीकार किया और फिर, सन् 1996-97 के दौरान देवगौड़ा-सरकार में विदेश-मंत्री रहे इंद्र कुमार गुजराल ने गुजराल-डॉक्ट्रिन के जरिये भारत के दक्षिण एशियाई छोटे पड़ोसी देशों की अहमियत को स्वीकार करते हुए भारतीय विदेश-नीति को उनकी ओर कहीं ज्यादा अभिमुख किया। यह पर इस बात को भी ध्यान में रखे जाने की ज़रुरत है कि 1990 के दशक में आकर ही भारत ने विदेश-नीति के निर्धारण में घरेलू  चुनौतियों एवं प्राथमिकताओं को कहीं अधिक अहमियत दिए जाने की आवश्यकता महसूस की और इसकी पृष्ठभूमि में भारत की बाह्य एवं आतंरिक नीतियों के बीच कहीं अधिक समन्वय कायम हुआ। उदाहरण के रूप में, लुक ईस्ट पॉलिसी के निर्धारण में उत्तर-पूर्वी भारत की सुरक्षा एवं विकास-संबंधी चुनौतियों की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका रही।   
पंचशील-पुनर्परिभाषित:
तेजे से बदलते हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के बीच गुजराल ने यह ऑब्जर्व किया कि भारत के प्रति पाकिस्तान का शत्रुता-भाव निरंतर बढ़ता चला जा रहा है और इसके लम्बे समय तक बने रहने की संभावना है। समस्या यह है कि चीन भी तेजी से उसी दिशा में बढ़ रहा है और भविष्य में भारत के विरुद्ध इन दोनों की नजदीकियाँ भी तेजी से बढ़ने की संभावना है। ऐसी स्थिति में भारत को पाकिस्तान एवं चीन की सम्मिलित चुनौती का सामना करना होगा, लेकिन वह उस चुनौती का प्रभावी तरीके से सामना तबतक नहीं कर सकता है जबतक कि अन्य छोटे पड़ोसी देशों के साथ उसके सम्बन्ध बेहतर न हों और उनके बीच उसका गुडविल बेहतर न हो। इसी सोच ने में सन् 1996-97 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार में विदेश-मंत्री इंद्र कुमार गुजराल, जो इस सर्कार के ठीक बाद ग्यारह महीने के लिए देश के प्रधानमंत्री भी बने, ने भारत के छोटे दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के सन्दर्भ में ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ के रूप में पंचशील-सिद्धांत को पुनर्परिभाषित किया जिसने मई,2014 तक छोटे दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के सन्दर्भ में भारत की विदेश-नीति को आधार प्रदान किया और जो बदले हुए रूपों में निकटस्थ पड़ोस प्रथम की भारतीय नीति के रूप में आज भी प्रासंगिक बना हुआ है
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की जटिलता:
भारत के इन छोटे पड़ोसी देशों को उसके विशाल भौगोलिक आकार से, उसकी विशिष्ट आर्थिक पहचान से और उसके अंतर्राष्ट्रीय कद से खतरा महसूस होता है इसके अलावा, भारतीय उपमहाद्वीप की समान ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत की पृष्ठभूमि में ये अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय, जातीय, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खोने को लेकर आशंकित हैं। इस कारण अपनी भिन्न एवं विशिष्ट पहचान बनाए रखने के लिए इन्हें लगातार संघर्ष करना होता है
इसीलिए ये भारत को लेकर एक प्रकार के हीनताबोध एवं कुण्ठा के शिकार हैं इसकी पृष्ठभूमि में भारत की बड़े भाई वाली भूमिका और समय-समय पर हाथ मरोड़ने वाली नीति इनके मन में भारत को लेकर मौजूद आशंकाओं को गहराने का काम करती है और इसके परिणामस्वरूप ये संतुलन कायम करने की रणनीति के तहत् दूसरी बड़ी शक्तियों और विशेष रूप से चीन के साथ मेलजोल बढ़ाने लगते हैं, ताकि भारत पर दबाव निर्मित किया जा सके और उससे विशेष रियायतें हासिल की जा सकें। इसी आलोक में इनकी घरेलू राजनीति भी भारत-समर्थन एवं भारत-विरोध की तर्ज़ पर दो धाराओं में भी विभाजित होती दिखाई पड़ती है और इनके राजनीतिक नेतृत्व के द्वारा भारत-विरोध का इस्तेमाल उग्र-राष्ट्रवाद को उभारने के लिए किया जाता है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सामान्य कूटनीतिक दबाव भी इन्हें अपनी संप्रभुता का उल्लंघन प्रतीत होता है और वे उस पर आग बबूला हो जाते हैं सितंबर,1996 में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की इन जटिलताओं को समझते हुए तत्कालीन विदेश-मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने पहली बार एक स्थानीय नीति बनाई थी जिसका उद्देश्य था भारत की छवि को एक क्षेत्रीय अधिनायक से बदलकर एक उदार देश की छवि बनाना, जो पड़ोसियों से बिना कोई खास अपेक्षा रखे उन्हें साथ लेकर चलने की इच्छा रखता हो। स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य भारत के प्रति उसके छोटे पड़ोसी देशों में विश्वास की पुनर्बहाली को सुनिश्चित करना था और उनकी आशंकाओं का निवारण करना था
लोकल रणनीति, ग्लोबल सोच:
कोलम्बो में गुजराल डॉक्ट्रिन पर दिए गए स्पीच पर पंडित जवाहर लाल नेहरु के विज़न, जिसका गुजराल ने अपने स्पीच में बारम्बार उल्लेख किया है, का सीधा-सीधा असर दिखता है। उन्होंने नेहरु को उद्धृत करते हुए उस एशियाई अस्मिताबोध की ओर इशारा करते हुए कहा, “हमलोग एशिया हैं और एशिया के लोग दूसरों की तुलना में हमारे कहीं अधिक निकट हैं। भारत की अवस्थिति इस प्रकार की है कि वह पश्चिमी, दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्व एशिया की धुरी है।” इसी आलोक में गुजराल अपने इस विज़न के साथ उपस्थित होते हैं, “एशिया-पेसिफ़िक क्षेत्र के भीतर खाड़ी क्षेत्र और मध्य एशिया से निकटता दक्षिण एशिया में भारत की विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति हिन्द महासागरीय क्षेत्र में इसकी उपस्थिति को महत्वपूर्ण बना देती है” इसी आलोक में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत के लिए अन्तर्निहित संभावनाओं के दोहन के लिए गुजराल डॉक्ट्रिन के माध्यम से स्थानीय स्तर पर पहल की और इसके जरिये दक्षिण एशियाई क्षेत्र में ऐसे परिवेश के सृजन का सपना देखा जिसमें भारत उन संभावनाओं का दोहन करता हुआ अपना अंतर्राष्ट्रीय कद बढ़ा सकता है।   

गुजराल-डॉक्ट्रिन: प्रमुख अवयव:

जनवरी,1997 में तत्कालीन विदेश-मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने भंडारनायके सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज, कोलम्बो में ‘भारत की विदेश नीति के आयाम’ विषय पर बोलते हुए ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ की रूपरेखा प्रस्तुत की, जो आतंरिक मामलों में अहस्तक्षेप, अनाक्रमण, एक दूसरे की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के प्रति सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संकल्पना पर आधारित है उन्होंने इस डॉक्ट्रिन के पाँच मूल तत्वों को रेखांकित किया:
1.  भारत भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका जैसे छोटे पड़ोसी देशों से भारत प्रतिफल की आशा नहीं रखेगा, पर सद्भाव एवं विश्वास की पुनर्बहाली और उसे मजबूती प्रदान करने के लिए अपनी तरफ से जो भी संभव हो, करने को तत्पर रहेगा। कँवल सिब्बल के अनुसार, भूटान को इस सूची से बाहर रखा गया क्योंकि यह भावना द्विपक्षीय संबंधों में अंतर्निहित थी। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह पारंपरिक राजनयिक सोच से इतर विचार था। ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ इस मायने में पंचशील से भिन्न है 
2.  कोई दक्षिण एशियाई देश अपने भू-क्षेत्र का इस्तेमाल इस क्षेत्र के दूसरे देशों के हितों के खिलाफ नहीं होने देगा।
3.  इस क्षेत्र का कोई भी देश अपने पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा। भारत पर बड़े भाई वाली भूमिका निभाने के आरोप के मद्देनज़र यह प्रावधान महत्वपूर्ण था।
4.  सभी दक्षिण एशियाई देश एक दूसरे की क्षेत्रीय एकता, अखंडता और संप्रभुता के सम्मान करेंगे।
5.  सभी दक्षिण एशियाई देश शान्तिपूर्ण बातचीत के जरिये आपसी विवादों का द्विपक्षीय समाधान निकालेंगे।  
उन्होंने यह अपेक्षा ज़ाहिर की कि समय के साथ नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारत सहित इस महाद्वीप का समूचा पूर्वी-क्षेत्र परिवहन, ऊर्जा, जल-प्रबंधन आदि के क्षेत्र में सहयोग के जरिये विकास का उभार देखेगा उन्होंने ‘21वीं सदी: एशियाई सदी’ की और परोक्षतः इशारा करते हुए कहा, “यदि इस क्षेत्र के सभी सात देशों के द्वारा इसका क्रियान्वयन किया जाता है, तो इसकी परिणति दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय संबंधों की पुनर्संरचना के रूप में हो सकती है और यह एशियाई पुनरोद्भव के नेतृत्वकर्ता के रूप में इस क्षेत्र के उभर को संभव बनाएगा और, यह सब संभव होगा, द्विपक्षीय अंतःक्रिया और सार्क के रीजनल फ्रेमवर्क के जरिये।”    
गुजराल-डॉक्ट्रिन: पंचशील से भिन्नता
स्पष्ट है कि गुजराल-डॉक्ट्रिन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में पंचशील का ही विकसित एवं विस्तारित रूप है जिसे एकतरफा रियायतें पंचशील से अलगाती हैं। इसका उद्देश्य पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्ध सुधारना और पारस्परिक विश्वास की पुनर्बहाली को सुनिश्चित करना है। पंचशील से इसकी भिन्नता को निम्न सन्दर्भों में रेखांकित किया जा सकता है:
1.  प्रतिपादन की दृष्टि से: जहाँ पंचशील के सिद्धांत का प्रतिपादन भारत और चीन ने मिलकर किया था, वहीं गुजराल-डॉक्ट्रिन विशुद्ध रूप से भारतीय कूटनीति की उपज है
2.  उद्देश्य की दृष्टि से: पंचशील का लक्ष्य भारत एवं चीन की सुरक्षा चिंताओं का समाधान करते हुए उन्हें एक-दूसरे को लेकर आश्वस्त करना था, ताकि वे घरेलू चुनौतियों से निबटने और विकास-प्राथमिकताओं पर विशेष ध्यान दे सकें इसके विपरीत गुजराल-डॉक्ट्रिन का उद्देश्य भारत को लेकर उसके छोटे पड़ोसी देशों की आशंकाओं का निवारण करते हुए उनके साथ संबंधों में सुधार को सुनिश्चित करना था 
3.  अलग-अलग दायरा: पंचशील का सिद्धांत मूलतः द्विपक्षीय संबंधों को लक्षित करता है, यद्यपि क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इसके महत्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है इससे भिन्न गुजराल-डॉक्ट्रिन का प्रतिपादन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में किया गया था। इसके जरिये पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्याँमार को छोड़कर भारत के अन्य सभी छोटे दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों को शामिल किया गया था।
4.  एकतरफा रियायत की संकल्पना: गुजराल-डॉक्ट्रिन में पंचशील का मूल भाव तो मौजूद है, पर यह इन छोटे पड़ोसी देशों के साथ बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के एकतरफा रियायत (Unilateral Concession) की बात करता है जो पंचशील में नहीं था
5.  सुरक्षा चिंताओं का समाधान: गुजराल-डॉक्ट्रिन में एक-दूसरे की सुरक्षा चिन्ताओं का भी समाधान प्रस्तुत किया गया है इसमें कहा गया है कि भारत और उसके पड़ोसी देश एक-दूसरे के खिलाफ़ अपने भू-क्षेत्र या अपनी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। साथ ही, इसमें पड़ोसी देशों के साथ विवादों के द्विपक्षीय समाधान पर बल देते हुए कहा गया है कि दोनों पक्षों के द्वारा एक-दूसरे के साथ विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण बातचीत के जरिये किया जाएगा।   
डॉक्ट्रिन की सीमाएँ:
जहाँ तक गुजराल-डॉक्ट्रिन की सीमाओं का प्रश्न अहि, तो इसकी महत्वपूर्ण सीमा पाकिस्तान को लेकर इसके नज़रिए और दक्षिण एशियाई देशों के नेतृत्व में पाकिस्तान के बिना एशियाई पुनरोत्थान की परिकल्पना के सन्दर्भ में है पाकिस्तान को इसके दायरे से बहार रखा गया, जबकि दक्षिण एशिया में भारत-पकिस्तान द्विपक्षीय सम्बन्ध अहम् समस्या थी और इसमें सुधार को सुनिश्चित किये बिना दक्षिण एशियाई परिदृश्य में बदलाव आता और पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार संभव हो पाता, इसकी उम्मीद बेमानी थी। लेकिन, इस नज़रिए से देखें, तो पंडित जवाहर लाल नेहरु और उनके पंचशील की तुलना में गुजराल और गुजराल डॉक्ट्रिन की सोच यथार्थवाद के कहीं अधिक करीब थी। कारण यह कि 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद चरम पर होने के कारण यह उम्मीद बेमानी था कि वह गुजराल डॉक्ट्रिन के मूल तत्वों का सम्मान करेगा। कारगिल युद्ध,1999 सहित आगे के घटनाक्रमों से ये बातें पुष्ट हुईं।
इसकी दूसरी महत्वपूर्ण सीमा यह थी कि इसने भारत के छोटे पड़ोसी देशों के लिए भारत की ओर से जिस एकतरफा रियायत का आश्वासन इस अपेक्षा के साथ दिया कि इससे उनकी आशंकाओं का निवारण होगा और उनके बीच भारत का गुडविल विकसित होगा; लेकिन व्यवहार के धरातल पर ऐसा सम्भव नहीं हो पाया। इसके उलट, इसने भारत की बड़े भाई वाली छवि को सुदृढ़ करने का काम किया।
इसकी तीसरी महत्वपूर्ण सीमा यह थी कि इस डॉक्ट्रिन में इस समझ का अभाव दिखता है कि कूटनीतिक संबंधों में व्यावहारिक धरातल पर सदाशयता के लिए बहुत स्पेस नहीं होता है। इसकी तुलना में कूटनीतिक सम्बन्ध पारस्परिक हितों से कहीं अधिक निर्देशित होते हैं।
गुजराल-डॉक्ट्रिन: मूल्यांकन
स्पष्ट है कि गुजराल-डॉक्ट्रिन के पीछे उनकी यह सोच थी, “यदि किसी देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबदबा कायम करना है, तो सबसे पहले उसे अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते सही करने होंगे।” इसी सोच के अनुरूप उन्होंने गुजराल-डॉक्ट्रिन के जरिये भारत की विदेश-नीति को दिशा देने की कोशिश की और सन् 1996 में अमेरिकी दबावों के बावजूद उनके नेतृत्व में भारत ने सीटीबीटी पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया पूर्व विदेश-सचिव कँवल सिब्बल के अनुसार, “सन् 1996 में पड़ोसी देशों के परिप्रेक्ष्य में भारत ने जिस गुजराल-डॉक्ट्रिन की प्रस्तावना की, उसका उद्देश्य भारत की ‘क्षेत्रीय अधिनायक’ वाली छवि को परिवर्तित करते हुए एक उदार देश के रूप में उसकी छवि निर्मित करना था, जो बिना किसी अपेक्षा के अपने पड़ोसियों को साथ लेकर चलने की इच्छा रखता हो।‌‌‌” इस डॉक्ट्रिन की सफलता दो बातों पर निर्भर करती थी:
1.  भारत कितनी गंभीरता से इसे अपने आचरण में उतारने की कोशिश करता है क्योंकि यही कोशिश व्यावहारिक धरातल पर इस नीति की प्रभावशीलता को सुनिश्चित करती?
2.  व्यावहारिक धरातल पर इस नीति की प्रभावशीलता  इस बात पर भी निर्भर करती जिन पड़ोसी देशों के लिए इसे प्रस्तावित किया गया है, वे भारत पर भरोसा करते हुए कितनी अनुक्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं और वे स्वयं ही इन सिद्धांतों का कितना अनुपालन करते हैं?
स्वयं, गुजराल ने दिसंबर,1996 में भारत-बांग्लादेश गंगा-जल संधि गुजराल डॉक्ट्रिन की एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन, इस डॉक्ट्रिन की विडंबना यह रही कि आवश्यकता इस बात की है कि अगर गुजराल ज्यादा दिनों तक इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए मौजूद नहीं रहे क्योंके विदेश-मंत्री एवं प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल बहुत ही छोटा रहा। साथ ही, उनके बाद जो सरकारें आयीं, यह डॉक्ट्रिन उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा और इसका आधे-अधूरे मन से क्रियान्वयन हुआ जिसके कारण यह अपेक्षित परिणाम दे पाने में असमर्थ रहा। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि यह अप्रासंगिक था या आज इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। अगर वर्तमान सरकार निकटतम पड़ोस प्रथम की नीति को लेकर वाकई गंभीर है, तो इसे ‘गुजराल-डॉक्ट्रिन’ के द्विपक्षीय बातचीत, अहस्तक्षेप और क्षेत्रीय अखंडता जैसे तत्वों को अपनाते हुए उसे अंतर्राज्यीय सहयोग का आधार बनाना चाहिए, तभी शायद निकटस्थ पड़ोस प्रथम की नीति प्रासंगिक भी बनी रह पायेगी और अपने लक्ष्यों को भी प्राप्त कर सकेगी 

Tuesday, 23 June 2020

पड़ोसी देशों के प्रति भारतीय नीति: पंचशील


पड़ोसी देशों के प्रति भारतीय नीति: पंचशील
प्रमुख आयाम
1. पंचशील फिर से चर्चा में
2.  पंचशील की पृष्ठभूमि
3.  पंचशील से आशय
4.  पंचशील का आविर्भाव
5.  पश्चिमी कूटनीतिक वर्चस्व में एशियाई दखल
6.  पंचशील-विवाद: चीनी दावा और उसकी अहमियत
7.  पंचशील: नेहरु का रुख
8.  भारत और पंचशील
9.  पंचशील की भ्रूण-ह्त्या
10.  नेहरुवादी विदेश-नीति का पुनर्परिभाषित होना: 1990’s

पंचशील फिर से चर्चा में:
मई,2014 में भारत का प्रधानमंत्रित्व सँभालने के बाद नरेन्द्र मोदी ने क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में जो सक्रियता दिखलायी, उसने कइयों को हतप्रभ कर दिया। नेहरु के बाद शायद ही किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में इतने कम समय में अपने धमक महसूस करवाई हो। इस क्रम में उन्होंने ‘पड़ोस प्रथम’ की बात करते हुए नेपाल और भूटान को कहीं अधिक तवज्जो दिया। साथ ही, उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा चीन पर केन्द्रित करते हुए उसके साथ भारत के संबंधों में सुधार को प्राथमिकता दी। ऐसा लगा कि भारत-चीन द्विपक्षीय सम्बन्ध एक बार फिर से 1950 के दशक के पूर्वार्द्ध में ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ वाली मनोदशा में पहुँच चुका है। आर्थिक कूटनीति और इसके परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित होती भू-राजनीति के इस दौर में यह अस्वाभाविक नहीं था, अस्वाभाविक था उस सबक को भूलना जो सन् 1962 में चीन के हाथों मिला। इसलिए देर-सबेर इसकी सजा तो मिलनी ही थी और वो मिली भी, जून,2020 में पूर्वी लद्दाख स्थित गलवान घाटी में, जहाँ चीनी सैनिकों के हाथों भारत के बीस सैनिक अत्यन्त बर्बर तरीके से शहीद हुए। उसके बाद पूरे देश में एक ऐसा माहौल सृजित हुआ जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन को लेकर अत्यन्त उदार एवं नरम रुख अपनाने के लिए आलोचना-प्रत्यालोचना शुरू हुई। लेकिन, इसी की पृष्ठभूमि में बायकॉट चाइना ने चीन-विरोधी माहौल सृजित करते हुए उत्तेजना का जो वातावरण निर्मित किया, उसमें सीमा-विवाद के हल के लिए एक बार फिर से पंचशील की चर्चा शुरू हुई और इस चर्चा ने मृतप्राय पंचशील को एक बार फिर से पुनर्जीवित किया, यद्यपि बदले हुए रूपों में पंचशील पिछले सत्तर वर्षों के दौरान अपना कायांतरण करता रहा है, कभी गुजराल डॉक्ट्रिन के रूप में, तो कभी नेवरहुड फर्स्ट पॉलिसी के रूप में। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें ‘पंचशील’ के प्रश्न पर एक बार फिर से विचार और इसकी प्रासंगिकता का पुनर्निर्धारण अपेक्षित हो जाता है।         
पंचशील की पृष्ठभूमि:
सन् 1947 में आज़ाद होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में भारत ने अपने समक्ष मौजूद जटिल चुनौतियों को समझा और उन चुनौतियों से निबटने के लिए बाह्य मोर्चे पर उलझने से बचने की आवश्यकता महसूस की। उसने महसूस किया कि पड़ोसी देशों के साथ बेहतर एवं शांतिपूर्ण सम्बन्ध को सुनिश्चित किये बिना ऐसा संभव नहीं है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत ने उन चुनौतियों, जो करीब दो सौ वर्षों के औपनिवेशिक शोषण एवं उत्पीड़न शीत-युद्ध  से उपजी हुई थीं और जिनसे तत्काल निपटना किसी भी ऐसे देश के लिए अत्यन्त आवश्यक था जो अभी-अभी स्वतंत्र हुआ है, से निपटने के लिए घरेलू मोर्चे पर ध्यान केन्द्रित करने की रणनीति अपनायी। इसी रणनीति के तहत् गुटों में बँटी और शीत-युद्ध का दंश झेल रही दुनिया की चुनौतियों से भारत को बचाने के लिए गुट-निरपेक्षता की रणनीति अपनायी और पड़ोसी देशों के साथ उलझने से बचने के लिए एवं बेहतर सम्बन्ध को सुनिश्चित करने के लिए पंचशील के सिद्धांतों का अनुसरण किया। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत ने पंचशील एवं गुट-निरपेक्षता को अपनी विदेश-नीति का आधार बनाया।
पंचशील से आशय:
वामपंथी चिन्तक भगवान प्रसाद सिन्हा ने ‘पंचशील’ शब्द की व्युत्पत्ति की ओर इशारा करते हुए लिखा है, “दरअसल, पंचशील शब्द मूलतः बौद्ध साहित्य एवं दर्शन से जुड़ा शब्द है। चौथी-पाँचवी शताब्दी के बौद्ध दार्शनिक बुद्धघोष की पुस्तक ‘विशुद्धमाग्गो’ में ‘पंच-शील’ की विस्तृत चर्चा है जिसके अनुसरण की अपेक्षा बौद्ध-धर्म के अनुयायियों से की गयी।” 20वीं सदी में इंडोनेशिया के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के क्रम में डॉक्टर अहमद सुकर्णो ने बौद्ध-परंपरा से इस शब्द को उठाते हुए इन्हीं पाँच सिद्धांतों की बुनियाद पर डच अधिपतियों से आज़ादी की लड़ाई लड़ी, और जून,1945 में इन्हीं पाँच सिद्धांतों के आधार पर अपने राष्ट्र की बुनियाद खड़ा करने का उद्घोष किया। उस समय उसे वहाँ की भाषा में ‘पंत्ज-सील’ (Five Principles) की संज्ञा दी गयी और उसके अंतर्गत राष्ट्रवाद, मानवतावाद, स्वाधीनता, सामाजिक न्याय और ईश्वर-आस्था की स्वतंत्रता को स्थान दिया गया।
पंचशील का आविर्भाव:
बाद में, सन् 1950 के दशक के मध्य में भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने चीन के चाऊ एन लाई और म्याँमार के तत्कालीन प्रधानमंत्री यू नू के साथ मिलकर पंचशील की प्रस्तावना की बौद्ध-दर्शन के इतिहास और इंडोनेशिया के राष्ट्रीय परिदृश्य से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में इस शब्द को लाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय पंडित जवाहरलाल नेहरू को जाता है जब 29 अप्रैल,1954 को पीकिंग में भारत और चीनी तिब्बत क्षेत्र के बीच व्यापार एवं पारस्परिक मेल-जोल पर (नोटों के आदान-प्रदान के साथ) समझौता सम्पन्न हुआ। इस समझौते में द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अन्य देशों के साथ पारस्परिक संबंधों में भी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच आधारभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया और इन्हें ‘पंचशील’ का नाम दिया गया। पंचशील का स्वरुप इसी समझौते से उभर कर सामने आया जिसमें निम्न बातें की गईं:
1.  एक दूसरे की क्षेत्रीय एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के प्रति सम्मान का भाव;
2.  शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व: अर्थात् एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारते हुए शांति बनाये रखना
3.  अहस्तक्षेप की नीति: अर्थात् एक-दूसरे के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
4.  अनाक्रामकता: अर्थात् एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करना, और
5.  पारस्परिक लाभ के लिए समानता-पूर्ण सहयोग
और दोनों देशों से यह अपेक्षा की गयी कि वे पंचशील के इन सिद्धांतों का पालन करेंगे। आगे चलकर, पंचशील के इस सिद्धांत ने गुटनिरपेक्षता की नीति के रूप में तार्किक परिणति प्राप्त की और उसका मार्गदर्शक आधारभूत सिद्धांत बन गया। दूसरे शब्दों में कहें, तो गुटनिरपेक्षता की नीति वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पंचशील की नीति का ही विस्तारित रूप है और इस रूप में इसने शीतयुद्ध काल में उपनिवेश के चँगुल से मुक्त हुए तीसरी दुनिया के नव-स्वतंत्र देशों की संप्रभुता एवं अखंडता के लिए रक्षा-कवच का काम किया।
पश्चिम के कूटनीतिक वर्चस्व में एशियाई दखल:
भगवान प्रसाद सिन्हा ने ‘पंचशील’ की संकल्पना को पश्चिम के वर्चस्व वाले अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक परिवेश में एशियाई दखल के रूप में देखा है और इसे एशियाई अस्मिताबोध, जिसके भाव पंडित नेहरु से लेकर चाउ एन लाई और डॉ. सुकर्णों तक में मौजूद थे, से सम्बद्ध किया है। उन्हीं के शब्दों में कहें, तो “इस रूप में इस शब्द का ओरियंटल मूल पश्चिम के वर्चस्व वाली दुनिया में गौरवान्वित करनेवाले सांस्कृतिक अस्मिताबोध का एहसास कराता है। भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लिए यह शब्द विश्व सभ्यता को भारतीय संस्कृति का तोहफ़ा था। चीन के लिए यह शब्द बौद्ध- मूल का था जो चीन के इतिहास से अभिन्न रूप से उसी तरह जुड़ा था जैसे भारत की संस्कृति के साथ। इंडोनेशिया के लिए यह उसकी राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा था। पहली बार नेहरू ने इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में न केवल नए मुहावरे दिए, वरन् उसके दर्शन को परिभाषित भी किया।”
इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि सन् 1954 में इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री अली शास्त्रोमिद्ज्स्जो के दिल्ली-आगमन पर उनके सम्मान में दिये भोज के अवसर पर पंडित नेहरू ने पंचशील की चर्चा करते हुए कहा, “इंडोनेशिया के राष्ट्रीय अस्मिता का यह शब्द अब नये अवतार में अभी अस्तित्ववान हुआ है। ..... संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की यह ख़ास संदर्भ में पुनर्अभिव्यक्ति है।” इसी प्रकार अप्रैल,1955 में इंडोनेशिया में आयोजित अफ्रो-एशियाई देशों के बांडुंग सम्मेलन में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने ‘पंचशील-सिद्धांत’ के ‘एशियाईपन’ पर जोर देते हुए इसके सार्वभौमिक महत्व पर बल दिया था, और इसमें शामिल 23 अफ्रीकी-एशियाई देशों ने पंचशील के सिद्धांत की बुनियाद पर प्रत्येक देश को स्वयं एवं सामूहिक रूप से प्रतिरक्षा करने के अधिकार की मान्यता को अंगीकार किया था।
पंचशील-विवाद: चीनी दावा और उसके लिए इसकी अहमियत  
स्पष्ट है कि लोकप्रिय एवं स्वीकृत मान्यताएँ भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को ‘पंचशील’ के प्रतिपादक के रूप में देखती हैं, लेकिन चीन का यह दावा है कि पंचशील की प्रस्तावना चाऊ एन लाई के द्वारा की गयी थी और उन्हीं के आग्रह पर पंचशील को इस समझौते हिस्सा बनाया गया। ऐसा माना जाता है कि चीन की नज़र में पंचशील तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को सुनिश्चित करने का साधन था और उसने इसके माध्यम से भारत को यह संदेश देने की कोशिश की कि वह तिब्बत से दूर रहे और चीन की क्षेत्रीय अखंडता एवं संप्रभुता का सम्मान करे। आज भी चीन के लिए पंचशील का मतलब यह है कि भारत तिब्बत और तिब्बती शरणार्थियों के साथ अपने संबंधों को समाप्त करे। ध्यातव्य है कि ब्रिटिश-राज का उत्तराधिकारी होने के नाते भारत को तिब्बत में कई विशेषाधिकार प्राप्त थे जिसे चीन स्वीकारने एवं मान्यता देने के लिए तैयार नहीं था।
इस तरह, अगर देखें, तो पंचशील तिब्बत के मसले पर रणनीतिक दृष्टि से महत्व रखने के अलावा तीन तरीके से चीनी कूटनीतिक हितों को साधने में सहायक था और आज भी है, इस तथ्य के बावजूद कि व्यावहारिक रूप से अब इसकी बहुत अहमियत नहीं रह गयी है,:
1.  एक तो लोकतंत्र एवं मानवाधिकार से लेकर इन्टरनेट एवं गवर्नेंस के मुद्दे पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ चीन के वैचारिक संघर्ष में विरोध में जाने से भारत को रोकना,
2.  दूसरे, भारतीय उपमहाद्वीप में प्रभुत्व स्थापित करने की भारतीय आकांक्षाओं पर अंकुश लगाना, और
3.  तीसरे, इसके जरिये चीनी खतरे की आशंका को निर्मूल करते हुए एशियाई देशों के उस भय को दूर करने का प्रयास किया गया जो चीन के तेजी से उभार और उसकी बढ़ती हुई आक्रामकता के कारण उनमें प्रवेश कर गया था, ताकि एशिया में शांति एवं स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
इस रूप में अगर देखा जाए, तो चीन के लिए सामरिक दृष्टि से पंचशील की ज़रुरत आज उससे कहीं अधिक है, जितनी 1950 के दशक में थी; अब यह बात अलग है कि चीन ने अपने कूटनीतिक व्यवहार में पंचशील के आदर्शों का न तो तब अनुसरण किया था और न ही यह उन आदर्शों का अब ही अनुसरण करने के लिए तैयार है।
पंचशील: नेहरु का रुख
तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नेहरु और वी. पी. मेनन की बातचीत से इस बात का संकेत मिलता है कि आरम्भ में नेहरु पंचशील को लेकर बहुत गंभीर नहीं थे और उनके लिए इसकी अहमियत आदर्शवादी सदिच्छाओं के माफिक थी, पर समय के साथ इसके प्रति उनका और भारत का भी नज़रिया बदला। कहा यह जाता है कि जब कृष्णमेनन ने सन् 1954 के समझौते के उस अंश, जिसमें पंचशील का उल्लेख था, को लेकर अपनी ओर से आपत्ति दर्ज की, तो नेहरु ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था, “यह महज प्रस्तावना है, न कि कोई समझौता। अतः इसमें बहुत कुछ न तलाशा जाय। यह न तो भारतीय विदेश-नीति का हिस्सा है और न ही आधारभूत सिद्धांत।” लेकिन, यह भी सच है कि इसका स्वरुप उभर कर सामने आने के बाद भारत ने चीन के साथ-साथ अपने निकटस्थ पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के निर्धारण में पंचशील को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया। इसी का परिणाम था कि भारत ने उस दौर में ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया। साथ ही, आगे चलकर जब गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत का आविर्भाव हुआ, तो उसने इसे उसमें भी तवज्जो दिया।  
भारत और पंचशील:
अब पंचशील के मसले पर चीन का दावा चाहे कुछ भी क्यों न हो, पर पंचशील को नेहरु-युग की भारतीय विदेश-नीति की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जाता है और इसका श्रेय नेहरु को दिया जाता है। शायद इसका कारण यह है कि
1.  चीन ने इसको लेकर कभी गम्भीरता प्रदर्शित नहीं की,  
2.  भारत ने अपनी विदेश-नीति को और विशेष रूप से पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को पंचशील पर आधारित बनाया, और  
3.  अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज़ पर नेहरु का कद और उनकी विश्वसनीयता उनके चीनी समकक्षों पर भारी पड़ती थी।
ऐसा माना जाता है कि गुटनिरपेक्षता की नीति भी पंचशील का ही विस्तारित रूप है जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता मिली और स्वीकृति भी। आगे चलकर इसे ही 1990 के दशक के मध्य में देवगौड़ा-सरकार के द्वारा ‘गुजराल-डॉक्ट्रिन’ (Gujral Doctrine) के रूप में और सन् 2014 में मोदी-सरकार के द्वारा इसे ही ‘प्रथम पड़ोस की नीति’ (Neighbourhood First Policy) के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया।
पंचशील की भ्रूण-ह्त्या:
कूटनीति में सदाशयता के लिए जगह नहीं होती है। इसकी जगह नीतियाँ राष्ट्रीय हितों से निर्देशित होती हैं। इसकी पुष्टि सन् 1954 की संधि से भी होती है जिसके जरिये भारत ने तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को स्वीकारा और चीन में तिब्बत के विलय को औपचारिक मान्यता दी। भारत तिब्बत के सन्दर्भ में कई विशेषाधिकारों को छोड़ने पर भी राजी हुआ और व्यापारियों एवं तीर्थयात्रियों के लिए सीमा तक आसान पहुँच सुनिश्चित की। स्पष्ट है कि इस संधि के जरिये हिमालयी-क्षेत्र में वाणिज्यिक एवं सांस्कृतिक संपर्क को मान्यता प्रदान किया गया।
फिर भी, चीन की इतनी शर्तों को स्वीकार इतनी सारी न तो चीन की शिकायतें दूर नहीं हुईं और न ही चीन ने अपनी विदेश-नीति के निर्धारण में पंचशील को कभी गंभीरता से ही लिया। इससे पहले कि पंचशील व्यावहारिक रूप ले पाता और कूटनीतिक व्यवहार के धरातल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाता, यह जन्मदाताओं के लिए बोझ बन गया और उन्होंने उसे उतार फेंकने में ही अपनी भलाई समझी। 1960 के दशक के आरम्भ में भारत और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु चीन और चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से गुहार लगते रहे और पंचशील की दुहाई देकर सीमा-विवाद के समाधान की अपील करते रहे, पर उनकी एक नहीं सुनी गयी। परिणाम यह हुआ कि भारत-चीन युद्ध,1962 ने पंचशील का मृत्यु घोषणा-पत्र लिख दिया, यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भारत ने इसे अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाये रखा।
भले ही सन् (1954-1991) के दौरान भारत ने पंचशील की नीति को अपने विदेश-नीति का आधार बनाया हो, पर इस दौरान दो ऐसे मौके आये जब इसने इसके प्रतिकूल आचरण किया:
a.  सन् 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के मसले पर इसने बांग्लादेश-मुक्ति संग्राम में विद्रोहियों के पक्ष में हस्तक्षेप किया जिसकी परिणति बंगलादेश के उदय के रूप में हुई, और
b.  सन् 1987 में भारतीय शांति-सैनिकों को श्रीलंका भेजा जाना एवं तमिल विदोहियों के खिलाफ उनकी कार्रवाई, जिसकी परिणति लिट्टे से शत्रुता और भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या के रूप में हुई
चीन ने भी इसका इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए किया और अपनी सुविधा के हिसाब से पंचशील को अपनाया, या फिर ठण्डे बस्ते में डाल दिया। अबतक उसने पंचशील का सहारा लेते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के अंतर्गत आने वाले दक्षिण एशियाई देशों में उस राजनीतिक नेतृत्व को समर्थन दिया है जो भारतीय दबाव के विरुद्ध खड़ा होना चाहते हैं। शायद इसीलिए भारत भी तिब्बत के जरिये चीन पर अपने दबाव को बनाये रखना चाहता है। इसीलिए अक्सर चीन भारत पर तिब्बत के मामले में हस्तक्षेप का आरोप लगाता रहा है और भारत ने भी चीन पर पूर्वोत्तर भारत में उपद्रवियों एवं नक्सलियों के समर्थन का आरोप लगाटा रहा है। इसे हाल के सन्दर्भों में भी देखा जा सकता है: मसला चाहे मालदीव में भूतपूर्व राष्ट्रपति मो. नशीद के विरुद्ध अब्दुल्ला यामीन के खुलकर समर्थन का हो, या फिर भूटान में लोटे शिरींगे के नेतृत्व वाले समाजवादी रुझान रखने वाले मध्यमार्गी राजनीतिक दल के समर्थन का; मसला चाहे नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (एमाले) एवं के. पी. ओली के समर्थन का हो, या फिर श्रीलंका में रनिल विक्रमसिंघे के विरुद्ध महिन्दा राजपक्षे के समर्थन का। पाकिस्तान की तो बात ही छोड़ दी जाए। म्याँमार और बंगलादेश भी इसके अपवाद नहीं हैं।    
नेहरुवादी विदेश-नीति का पुनर्परिभाषित होना
सन् 1990 में सोवियत संघ के विघटन और साम्यवादी ब्लॉक के बिखराव के साथ भारत के समक्ष यह चुनौती उत्पन्न हुई कि वह बदले हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ तालमेल स्थापित करने की कोशिश करे और इसके कारण जो नवीन चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उनसे निबटने की कोशिश करे। इसके लिए आवश्यकता थी भारतीय विदेश-नीति को पुनर्परिभाषित करने की। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि अबतक:
1.  भारत की विदेश-नीति पश्चिम के बड़े देशों की ओर उन्मुख थी,
2.  उसका रुझान यथार्थ की बजाय आदर्शों की ओर कहीं अधिक था, और
3.  उसमें अबतक इसके छोटे पड़ोसी देशों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया था।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सन् 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारतीय विदेश-नीति को पुनर्परिभाषित करते हुए नेहरु-युग की विदेश-नीति से दूर ले जाने की कोशिश शुरू हुई, ताकि:
1.  इसे यथार्थ पर आधारित बनाया जा सके,
2.  बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ तालमेल स्थापित किया जा सके, और
3.  राष्ट्रीय हितों को बेहतर तरीके से संरक्षित किया जा सके।
इसी आलोक में पहले नरसिंहा राव की सरकार ने लुक ईस्ट पॉलिसी (Look East Policy) की घोषणा करते हुए भारत के दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसी देशों की अहमियत को स्वीकार किया और फिर, सन् 1996-97 के दौरान देवगौड़ा-सरकार में विदेश-मंत्री रहे इंद्र कुमार गुजराल ने गुजराल-डॉक्ट्रिन के जरिये भारत के दक्षिण एशियाई छोटे पड़ोसी देशों की अहमियत को स्वीकार करते हुए भारतीय विदेश-नीति को उनकी और कहीं ज्यादा अभिमुख किया।