Wednesday, 27 February 2019

टैगोर: राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद


टैगोर: राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद

प्रमुख आयाम
1.  राष्ट्रवाद और देशभक्ति का फ़र्क
2.  राष्ट्रीय आन्दोलन को लेकर टैगोर की दुविधा
3.  टैगोर का युगीन परिदृश्य
4.  राष्ट्रवाद और टैगोर
5.  राष्ट्रवाद का विध्वंसक रूप: फासीवाद
6.  समाज को राज्‍य से अधिक महत्व
7.  मानवता पर देशभक्ति को तरजीह
8.  राष्ट्रवाद और भारत
9.          स्विस-मॉडल भी अनुकरणीय नहीं
10.          आलोचना के प्रमुख आधार
11.         राष्ट्रीय आन्दोलन में टैगोर की भूमिका
12.         राष्ट्रीय आन्दोलन को सशर्त समर्थन

 राष्ट्रवाद और देशभक्ति का फ़र्क:
दरअसल राष्ट्रवाद एक सापेक्षिक राजनीतिक धारणा है जिसे साबित करने के लिए उनके साथ खड़े होने और उनकी विचारधारा को स्वीकार करने की ज़रुरत होती है जो खुद को राष्ट्रवाद के प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय हितों के संरक्षक के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में जर्मनी में हिटलर ने और इटली में मुसोलिनी ने खुद को, अपने दल को और अपने समर्थकों को राष्ट्रवादी घोषित करते हुए उन लोगों के खिलाफ मोर्चा खोला जो उनसे असहमत थे और उनकी नीतियों की आलोचना करते थे। इसीलिए राष्ट्रवाद की धारणा उसके विरोधियों के उत्पीड़न के साधन में तब्दील हो गयी और इन्होंने अपने विरोधियों को देशद्रोही घोषित किया। आज के परिदृश्य में भारत के राजनीतिक माहौल को भी देखा जा सकता है जहाँ पूरा विमर्श देशभक्ति एवं देशद्रोह के इर्द-गिर्द केन्द्रित है और इस विमर्श में भाजपा, उसका नेतृत्व एवं उसके समर्थक खुद को राष्ट्रवादी एवं देशभक्त के रूप में पेश करते हुए अपने विरोधियों एवं आलोचकों से राष्ट्रवादी एवं देशभक्त होने का प्रमाण माँग रहे हैं। इसी प्रकार वर्तमान परिदृश्य में पाकिस्तान के राष्ट्रवाद को देखें, तो यह भारत-विरोध के धरातल पर खड़ा है और भारत का राष्ट्रवाद पाकिस्तान एवं चीन के विरोध के धरातल पर।
लेकिन, देशभक्ति साबित करने के लिए न तो किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेनी पड़ती है और न ही प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना पड़ता है। यह राष्ट्रवाद की तरह सापेक्ष अवधारणा भी नहीं है। दरअसल देशभक्ति एक प्रकार से उस भूमि के प्रति आत्मीयता से भरे लगाव एवं कृतज्ञताबोध का परिणाम है जिसमें हमारा जन्म हुआ है, पालन-पोषण हुआ है, और जिसके साथ हमारा भविष्य सम्बद्ध है। यह स्वतःस्फूर्त भाव है जो हमारे भीतर छुपा हुआ है और जिसके प्रदर्शन की ज़रुरत नहीं पड़ती है। यह सकारात्मक अवधारणा है जिसका स्वरुप अधिक-से-अधिक रक्षात्मक होता है। यह न तो आक्रामक होती है और न ही इसका स्वरुप उत्पीड़क होता है। इसमें दूसरे देश पर हावी होने या उसे नीचा दिखने का भाव भी नहीं होता है। दोनों में सबसे महत्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रवाद इस देश के सभी नागरिकों को देशभक्त नहीं मानता है।    
राष्ट्रीय आन्दोलन को लेकर टैगोर की दुविधा:
राष्ट्रीय आन्दोलन को लेकर टैगोर की दुविधा और उनके रुख को देशभक्ति की रूमानियत पर आधारित उनके बांग्ला उपन्यास ‘घर-बाइरे’ के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। इस उपन्यास का नायक निखिल प्रगतिशील सामाजिक सुधारों का समर्थक है, पर जब मसला राष्ट्रवाद का आता है, तो उसका रुख थोड़ा नरम पड़ जाता है। इस मसले पर उसकी प्रेमिका बिमला अपने फैसले बदलने के लिए उस पर दबाव डालती है और यहाँ तक कि उसे छोड़ कर चली जाती है। लेकिन, प्रेमिका के दबाव के बावजूद निखिल अपने विचार नहीं बदलता और कहता है “मैं देश की सेवा करने के लिए हमेशा तैयार हूँ, लेकिन मेरी पूजा का हकदार सत्य है, जो मेरे लिए देश से भी ऊपर है। अपने देश को ईश्वर की तरह पूजने का मतलब है, उसे अभिशाप देना।” बिमला को भी राष्ट्रवादी भावनाओं और हिंसक गतिविधियों के बीच के सूक्ष्म सम्बन्ध-सूत्र का अहसास होता है और इसकी पृष्ठभूमि में मोहभंग टैगोर की तरह बिमला को भी राजनीति से उदासीन बना देता है। स्पष्ट है कि टैगोर ने इस उपन्यास के जरिये अति-राष्ट्रवाद के उन खतरों की ओर इशारा किया है जो बुनियादी मानवीय मूल्य एवं विश्व-बंधुत्व की भावना के प्रतिकूल है।
टैगोर का युगीन परिदृश्य:
टैगोर का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ जब भारत औपनिवेशिक पराधीनता का शिकार था। 20वीं सदी के पहले दशक के दौरान देश के भीतर एवं बाहर भारतीय राष्ट्रवाद ने भी क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उभार को देखा जिसका स्वरुप हिंसक था और जिसने कितने निर्दोषों की सिर्फ इसलिए बलि ली क्योंकि वे अँग्रेज थे। इस स्थिति ने टैगोर को भी विचलित किया। उन्होंने महसूस किया कि राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद की अवधारणा के मूल में घृणा है जो बुनियादी मानवीय मूल्यों के प्रतिकूल है।
उस समय का वैश्विक परिदृश्य तो और भी विचलित करने वाला था। उन्होंने देखा कि 17-20वीं सदी के दौरान वाणिज्यवाद एवं औद्योगिक क्रांति की पृष्ठभूमि में पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद ने किस प्रकार उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का रूप ले लिया और इसकी पृष्ठभूमि में इसने अफ्रीकी एवं एशियाई देशों को गुलामी की ओर धकेलते हुए मानव एवं मानवता के इतिहास को कलंकित किया। इतना ही नहीं, इसने 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय देशों को जिस राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा की ओर धकेला, उसकी परिणति प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में हुई। लेकिन, राष्ट्रवाद का यह ज्वार यहीं पर नहीं थमा। यह इसके बाद भी जारी रहा और 1920 के दशक एवं इसके बाद इसने जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासीवाद एवं जापान में सैन्यवाद के रूप में राजनीतिक सर्वसत्तावादी निरंकुशता को जन्म देते हुए हिटलर एवं मुसोलिनी के राजनीतिक उभार को संभव बनाया। अंततः इसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुई।
वैचारिक धरातल पर देखें, तो पश्चिमी राष्ट्रवाद की सीमाओं ने भी टैगोर को राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद के प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए उत्प्रेरित किया। ध्यातव्य है कि इटली के छोटे-छोटे नगर-राज्यों (City States) की पृष्ठभूमि में विकसित पश्चिमी राष्ट्रवाद की संकल्पना ‘एक भाषा, एक जाति एवं एक राष्ट्र’ की संकल्पना पर आधारित है। यह संकल्पना भारतीय परिस्थितियों के लिए बहुत उपयुक्त नहीं थी क्योंकि भारत एक बहुभाषा-भाषी देश था जहाँ विभिन्न धर्मों के अनुयायी रहते आये हैं और जहाँ पर्याप्त सांस्कृतिक वैविध्य है। ऐसी स्थिति में पश्चिमी राष्ट्रवाद की संकल्पना भारत के लिए बहुत प्रासंगिक नहीं रह जाती है। 
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें टैगोर की राष्ट्र-विषयक् धारणा ने आकार ग्रहण किया। 
राष्ट्रवाद और टैगोर:
राष्ट्रवाद की संकल्पना एक सांस्कृतिक संकल्पना है। इसके अनुसार समान भौगोलिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के उस समूह को राष्ट्र कहते हैं जो समान सांस्कृतिक विरासत धारण करते हैं और इसके कारण एक-दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करते हैं; जिन्हें लगता है कि वे एक ही नियति से बँधे हैं, जो एकसमान सामूहिक लक्ष्यों से प्रेरित होते हैं और उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। लेकिन, टैगोर ने राष्ट्रवाद को देशभक्ति से भिन्न माना।
टैगोर ने राष्ट्रवाद की संकल्पना को यूरोपीय देन मानते हुए इसे सांस्कृतिक की बजाय एक राजनीतिक-आर्थिक संकल्पना के रूप में देखा। सन् 1913 में नोबल पुरस्कार मिलने के बाद टैगोर को विश्व-भ्रमण का अवसर मिला और इसी क्रम में सन् 1917 में राष्ट्रवाद के बुखार में तड़प रहे जापान की यात्रा के दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना की थी जिसके कारण उन्हें जापान से बगैर भाषण दिए वापस आना पड़ा। इस यात्रा के दौरान जारी वक्तव्यों और भाषणों को सन् 2003 में संकलित करते हुए ‘नेशनलिज्म’ के नाम से प्रकाशित किया गया। सन् 1917 की जापान-यात्रा के दौरान ‘नेशनलिज्म इन इंडिया’ नामक निबंध में टैगोर ने राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की आलोचना करते हुए लिखा कि “राष्ट्रवाद का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठनात्मक आधार सिर्फ उत्पादन में वृद्धि तथा मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल प्राप्त करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि एवं राजनीतिक शक्ति में अभिवृद्धि करने में प्रयुक्त हुई हैं। शक्ति की वृद्धि की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा तथा भय का वातावरण उत्पन्न कर मानव जीवन को अस्थिर एवं असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे-सीधे जीवन के साथ खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाह्य संबंधों के साथ-साथ राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी परिस्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है। फलस्वरूप, समाज तथा व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप प्राप्त कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है।”
राष्ट्रवाद का विध्वंसक रूप: फासीवाद:
फासीवाद तथा साम्यवाद की तुलना करते हुए उन्‍होंने फासीवाद को साम्यवाद से कहीं अधिक खतरनाक माना और उसे ‘असह्य निरंकुशवाद’ की संज्ञा दी, क्‍योंकि उस व्‍यवस्‍था में हर चीज नियंत्रित होती है। उन्होंने फासीवादियों को राष्‍ट्रवाद के पागलपन का प्रतीक मानते हुए वे कहते हैं कि फासीवाद के प्रवर्तन से पहले राष्‍ट्रवाद आर्थिक विस्‍तारवाद तथा उपनिवेशवाद से जुड़ा हुआ था। पर, बाद में मशीनीकरण के साथ यांत्रिक सभ्यता के विकास ने राजनीतिक सर्वसत्तावाद के उदय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित की। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा वातावरण तैयार हुआ जिसमें बहुत हद तक न तो मानवीय मूल्यों के लिए जगह रह गयी और न ही मानवीय संवेदनाओं के लिए। इस संदर्भ में देखें, तो टैगोर बेनितो मुसोलिनी की इस बात से बहुत हद तक सहमत प्रतीत होते हैं कि “राष्‍ट्र राज्‍य का निर्माण नहीं करता, अपितु राज्‍य द्वारा राष्‍ट्र का निर्माण होता है।” उन्होंने देखा कि प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद किस प्रकार राष्ट्रवाद ने राज्‍य की शक्ति को बढ़ाया और तदनुरूप राज्य के द्वारा राष्‍ट्रवाद को काफी सराहा गया। इस बात की पुष्टि आज के परिप्रेक्ष्य से भी होती है। आज भी राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद शासन में मौजूद लोगों के हाथों को मजबूती प्रदान करने का साधन है और उनके द्वारा अक्सर इसका इस्तेमाल अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने के लिए किया जाता है।
समाज को राज्‍य से अधिक महत्व:
आधुनिक उदारवादी चिन्तक टैगोर व्यक्ति-स्वातंत्र्य के प्रबल हिमायती हैं और शायद इसलिए भी उन्होंने राष्ट्रवाद को व्यक्ति की स्वतंत्रता के रास्ते में बाधक मानते हुए उसकी आलोचना की है। वे समाज को मानवीय विकास के लिए आवश्यक बतलाते हुए उसे राष्ट्र की तुलना में   कहीं अधिक प्रमुखता देते हैं। उनका मानना है कि जहाँ राष्ट्र व्यक्ति की रचनात्मकता को बाधित करता है, वहीं समाज इसे प्रोत्साहित करता है।
मानवता पर देशभक्ति को तरजीह:
टैगोर राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति को मानवता एवं विश्वबंधुत्व की संकल्पना के प्रतिकूल मानते थे। उनका मानना था कि “देशभक्ति चहारदिवारी से बाहर के विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है। साथ ही, दूसरे देशों की जनता के दुख-दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है।” उन्होंने इसके लिए अपनी आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि “देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है।” टैगोर मानवता को राष्ट्रीयता से ऊपर रखते थे और उनका टैगोर का कहना था कि “जब तक मैं जिंदा हूँ, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूँगा।”
यही कारण है कि उन्होंने एशिया की आजादी की हिमायत तो की, पर आज़ादी उनकी प्राथमिकता में शीर्ष पर नहीं थी। उन्होंने नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के प्रश्न को कहीं अधिक महत्व दिया और राजनीतिक आज़ादी के प्रश्न को उन्होंने उसकी तुलना में कहीं कम महत्व दिया। उस समय चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को लेकर भी वे बहुत उत्साहित नहीं थे, क्योंकि उनका यह विश्वास था कि भारत राजनीतिक आजादी से शक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। उनका मानना था कि आर्थिक रूप से भारत भले ही पिछड़ा हो, पर उसे मानवीय मूल्यों की दृष्टि से पिछड़ा नहीं होना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र की धारणा को भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर खारिज करने की आवश्यकता पर बल दिया और भारत से यह अपेक्षा की कि वह पश्चिमी राष्‍ट्रवाद से दूर रहते हुए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में अपनी महती भूमिका का निर्वाह करे और पूर्व की तरह मानवीय एकता के आदर्शों को हासिल करने के लिए समस्त विश्व का मार्गदर्शन करे।
राष्ट्रवाद और भारत:
रवींद्रनाथ टैगोर राष्ट्रवाद के खिलाफ थे और उन्होंने राष्ट्रवाद को बहुत बड़ा खतरा मानते हुए कहा कि यह भारत की कई समस्याओं की जड़ है। उन्होंने भारत में राष्ट्रवाद की संभावनाओं को खारिज करते हुए इसे  राष्‍ट्र-रहित देश माना और यूरोप से भारतीय परिस्थितियों की भिन्नता की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत विभिन्‍न प्रजातियों का देश था और इसके सामने इन प्रजातियों में समन्‍वय बनाए रखने की चुनौती थी, जबकि यूरोपीय देशों के सामने प्रजातियों के समन्वय की ऐसी कोई चुनौती नहीं थी। इस भिन्नता के मद्देनज़र ही टैगोर ने राष्ट्रवाद को भारतीय परिस्थितियों के प्रतिकूल माना। उन्होंने यूरोपीय राष्ट्रों के लिए भविष्य के खतरों के रूप में इसकी पहचान करते हुए कहा कि इस भिन्नता के बावजूद यूरोपीय राष्ट्र राष्‍ट्रवाद रूपी मदिरा का सेवन कर अपनी आध्‍यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक एकता को खतरे में डाल रहे हैं और भविष्य में उन्हें भी प्रजातीय समन्वय की उन चुनौतियों का सामना करना होगा जिसका सामना सामाजिक एवं सांस्कृतिक वैविध्य के मद्देनज़र भारत को करना पड़ रहा था। उस स्थिति में उन्हें या तो अन्य प्रजातियों के लिए अपने दरवाज़े बंद करने होंगे, या फिर उन्हें कुचलते हुए अधीनस्थ प्रजाति का रूप देना होगा। इससे भिन्न भारतीय समाज में मौजूद आत्मसातीकरण की प्रक्रिया की ओर इशारा करते हुए टैगोर ने बंग-भंग आन्दोलन(1905) के समय लिखे गए निबंध ‘स्वदेशी समाज’ में यह कहा कि “आर्यों ने जब भारत पर आक्रमण किया, तब किस तरह यहाँ की स्थानीय जातियों ने उन्हें अपने भीतर समा लिया। बाद में फिर मुसलमान आएँ, उन्हें भी इसी तरह अपना लिया गया।”
टैगोर ने एक राष्ट्र के रूप में भारत में अन्तर्निहित संभावनाओं को खारिज करते हुए कहा कि “भारत की समस्या राजनीतिक नहीं, सामाजिक है। यहाँ राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है।” उन्होंने भारत की सामाजिक रूढ़ियों को राष्ट्रवाद के विकास में बाधक मानते हुए यह कहा  कि “भारत में पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें, तो वह कैसे प्रसारित होगा?” इस सन्दर्भ में अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि “भारत में कभी सही मायने में देशभक्ति की भावना नहीं रही। बचपन से ही मुझे सिखाया गया था कि देश का सम्मान करना ईश्वर की पूजा और मानवता का आदर करने से ज्यादा जरूरी है। मैंने अब उस सबक को छोड़ दिया है और मेरा मानना है कि मेरे देशवासी अपने भारत को सही मायने में तभी आगे ला पायेंगे, जब वे अपने शिक्षकों की उस शिक्षा का विरोध करेंगे कि देश मानवता के आदर्शों से ज्यादा बड़ा है।”
राष्ट्रवाद का स्विस-मॉडल भी अनुकरणीय नहीं:
भारतीय समाज की बहुधार्मिकता, बहुभाषीयता एवं बहुजातीयता को ध्यान में रखते हुए अक्सर राष्ट्रवाद के स्विस-मॉडल की प्रासंगिकता की बात की जाती है, लेकिन टैगोर ने इसे खारिज करते हुए कहा कि “स्विटजरलैंड तथा भारत में काफी फ़र्क एवं भिन्नताएँ हैं। वहाँ व्यक्तियों में जातीय भेदभाव नहीं है और वे आपसी मेल-जोल रखते हैं तथा आपस में विवाह करते हैं, क्योंकि वे अपने को एक ही रक्‍त के मानते हैं। लेकिन, भारत में जन्माधिकार समान नहीं है। जातीय विभिन्नता तथा पारस्परिक भेद-भाव के कारण भारत में उस प्रकार की राजनीतिक एकता की स्थापना करना कठिन दिखाई देता है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत आवश्यक है।” वर्ण एवं जाति की रूढ़ियों और इसके रोटी-बेटी के संबंध पर आधारित होने के कारण भारत में वैसी एकता मुश्किल है। इसी आलोक में टैगोर का मानना है कि समाज द्वारा बहिष्कृत होने के भय से भारतीय डरपोक एवं कायर हो गए हैं। ऐसी स्थिति में राजनीतिक स्वतंत्रता उस समाज के प्रभुत्वशाली समूह के पक्ष में साबित होगी और यह एक ऐसे निरंकुश राज्य की संभावनाओं को बल प्रदान करेगा जिसमें राजनीतिक मतभेद रखने वाले भिन्न मतों के लोगों का जीना दूभर हो जाएगा। टैगोर की इस आशंका को आज के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह शत-प्रतिशत सत्य साबित हो रही है। इसीलिए टैगोर का यह निष्कर्ष है कि न तो भारत में यूरोप जैसा राष्ट्रवाद है और न ही भारत में यूरोप जैसा राष्ट्रवाद कभी पनप सकता है।  
राष्‍ट्रवाद की आलोचना के प्रमुख आधार:
राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद के सन्दर्भ में टैगोर की धारणा भी अल्बर्ट आइंस्टाइन से मिलती-जुलती है। अल्बर्ट आइंस्टाइन के अनुसार, “राष्ट्रवाद एक बचकाना बीमारी है और यह मानव जाति का चेचक है।” टैगोर विश्व-बंधुत्व के प्रबल हिमायती थे और इसीलिए उन्होंने राष्ट्रवाद की बजाय अन्तर्राष्ट्रवाद की वकालत की। उन्होंने राष्ट्रवाद को इसके रास्ते में मौजूद महत्वपूर्ण अवरोध के रूप में देखा और इसे मानव एवं मानवता के लिए खतरा बतलाया। उन्होंने तीन आधारों पर राष्‍ट्रवाद की आलोचना की:
1.  राष्‍ट्र-राज्‍य की आक्रामक नीति,
2.  प्रतिस्पर्धी वाणिज्‍यवाद की अवधारणा, और
3.  प्रजातिवाद।
उन्होंने राष्ट्र के विचार को जनता के स्वार्थ का ऐसा संगठित रूप माना है, जिसमें मानवीयता और आत्मत्व लेशमात्र भी नहीं रह पाता है। उनकी दृष्टि में, न तो राष्ट्र की शक्ति में वृद्धि पर कोई नियंत्रण संभव है और न ही इसके विस्तार की कोई सीमा है। उसकी इस अनियांत्रित शक्ति में ही मानवता के विनाश के बीज उपस्थित हैं। इसीलिए यह निर्माण का मार्ग नहीं, बल्कि विनाश का मार्ग है जो विभिन्न मानव-समुदायों के बीच घृणा, वैमनस्य और टकराव को उत्पन्न करता है। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रवाद के खतरों की दिशा में संकेत करते हुए कहा कि “मानव की सहिष्णुता तथा उसमें स्थित नैतिकताजन्‍य परमार्थ की भावना राष्ट्र की स्वार्थपरायण नीति के चलते समाप्त हो जायेंगे।” उन्होंने शोषण के अमानवीय उपकरण के रूप में राष्‍ट्रवाद के इसी रूप की आलोचना की, जिसमें नृशंसता, रुग्णता तथा पृथकता दिखाई देती है। चूँकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य-शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है, इसीलिए युद्धोन्माद को बढ़ाता हुआ राष्ट्रवाद अपने समाज-विरोधी रूप में उपस्थित होता है। लेकिन, यह समाज का ही नहीं, व्यक्ति का भी विरोधी है। व्यक्ति-स्वातंत्र्य के समर्थक टैगोर को राष्ट्र के समक्ष व्यक्ति एवं उसकी स्वतंत्रता का समर्पण स्वीकार्य नहीं था। इसीलिए वे संकीर्ण राष्ट्रवाद का विरोध करते हुए इसे मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा मानते हैं।
राष्ट्रीय आन्दोलन में टैगोर की भूमिका:
टैगोर राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद की संकल्पना के मुखर विरोधी थे, इसीलिए राष्ट्रीय आन्दोलन से उनकी दूरी स्वाभाविक थी। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति वे उदासीन रहे। उन्होंने वैचारिक एवं सांस्कृतिक धरातल पर विमर्श को आगे बढ़ाते हुए     राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व को प्रभावित करते हुए उसके वैचारिक आधार को निर्मित करने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभायी। दिसंबर,1911 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया था और इसी अधिवेशन के दौरान उन्होंने पहली बार राष्ट्रगान गाया था। इससे पूर्व सन् 1905 में बंग-भंग आन्दोलन का विरोध करते हुए उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया और इसके विरोध में रक्षा-बंधन दिवस मनाते हुए विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया। उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन के दौरान सन् 1905 में ही ‘आमार सोनार बांग्ला’ लिखकर जन्मभूमि के प्रति अपने प्रेम का इज़हार किया और बांग्ला एकता का आह्वान किया। जब रौलट एक्ट के विरोध में आन्दोलन उठ खड़ा हुआ, तो उन्होंने अपने भाषणों और लेखों के माध्यम से ब्रिटिश शासन और उसकी दमनकारी नीतियों की घोर निंदा की। आगे चलकर उन्होंने जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड,1919 की प्रतिक्रिया में ‘नाईटहुड’ का सम्मान त्यागते हुए इस घटना के प्रति अपना विरोध-प्रदर्शन किया और ‘सर’ की उपाधि अंग्रेज़ी सरकार को लौटा दी। लेकिन, सन् 1920 में जब असहयोग आन्दोलन के दौरान स्वदेशी पर जोर देते हुए विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान किया गया, तो उन्होंने विदेशी वस्त्रों को जलाये जाने की घटना की खुलकर आलोचना करते हुए कहा कि यह ‘संसाधनों की निष्ठुर बर्बादी’ है। सन् 1930 में जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आह्वान किया गया, तो उन्होंने उसका समर्थन किया। 
राष्ट्रीय आन्दोलन को सशर्त समर्थन:
राष्ट्रीय आन्दोलन से उनकी दूरी निर्विवाद थी और इसके पीछे उनकी यह मान्यता थी कि:
1.    अति-राष्ट्रवाद और स्वदेशी का प्रबल आग्रह पश्चिम एवं विदेशी के पूरी तरह से नकार का आधार तैयार करेगा और ऐसी स्थिति में भारत खुद तक सीमित होकर रह जाएगा।
2.    यह चाह सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं से भरे भारत जैसे देश में ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम धर्म के प्रति भी असहिष्णुता का माहौल सृजित करेगा, जबकि इन्होंने अलग-अलग समय पर भारतीय समाज एवं संस्कृति पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी है जो इनके अस्तित्व से अभिन्न हो चुकी है।  
स्पष्ट है कि टैगोर आज़ाद भारत की कल्पना करते थे और इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया, लेकिन आज़ादी से जुड़े आंदोलनों को टैगोर का समर्थन बिना शर्त नहीं था। उन्होंने मानवतावाद को हमेशा देशभक्ति एवं राष्ट्रवाद से ऊपर रखा, इसीलिए उन्होंने सशस्त्र विद्रोह एवं क्रांति सहित किसी भी प्रकार के हिंसक आन्दोलन का खुलकर विरोध किया। यहाँ तक कि उन्होंने अतिरेक राष्ट्रवादी रुख की लगातार आलोचना की और राष्ट्रीय आन्दोलन के अतिरेकवादी राष्ट्रवाद के आग्रह ने उन्हें समकालीन राजनीति से दूर रहने के लिए विवश किया। लेकिन, सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए भी उन्होंने आजादी के आन्दोलन के वैचारिक आधार को तैयार करने और ज़रुरत पड़ने पर उसके एजेंडे के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जब अछूतों के मसले पर गाँधी और अम्बेडकर के बीच मतभेद उभरकर सामने आये और ऐसा लगा कि उपनिवेशवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चा खतरे में है, तो उन्होंने दोनों के बीच के मतभेद को कम करते हुए संकट के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दूसरे शब्दों में कहें, तो जब-जब राष्ट्रीय आंदोलन पर संकट के बदल मँडराये, बतौर अभिभावक उन्होंने उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उस संकट के समाधान में अपनी भूमिका का निर्वाह किया।

Wednesday, 13 February 2019

प्रेम (कविता)

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      प्रेम
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प्रेम
एक सुखद अहसास, पर
जिस तक पहुँचने के लिए
पीड़ा एवं वेदना की घाटियों से पड़ता है गुजरना;
फिर भी मुमकिन है
कि यात्रा अधूरी रह जाए,
जिसके अधूरेपन में ही है
उसकी पराकाष्ठा,
उसका उत्कर्ष।
प्रेम नहीं है परीक्षा;
प्रेम है
सम्पूर्ण आनत समर्पण,
सन्देह से परे।
प्रेम नहीं है
पाने का नाम,
प्रेम है
सब कुछ की तथता,
और सब कुछ की तथता का
सम्पूर्ण समर्पण,
उसे दे देने का नाम।
प्रेम है
वेदना की अनुभूति,
उस अनुभूति को भी बार-बार जीने की चाह,
और उन अनुभूतियों को बार-बार जीते हुए
सुख एवं संतुष्टि का अहसास।
प्रेम नहीं है शरीर की चाह,
प्रेम नहीं है उन्नत उरोजों का आकर्षण,
प्रेम नहीं है योनि की गहराइयों को मापने वाली कामजन्य वासना;
प्रेम है उरोजों की थाप,
जो हमें आश्वस्त करते हैं;
प्रेम है आँखों के रास्ते दिल में उतर जाना,
प्रेम है आश्रय की तलाश,
प्रेम है समा जाने की चाह,
प्रेम है अस्तित्व का विसर्जन,
प्रेम है खुद को खो कर
खुद को पाना,
प्रेम है असीम में विलीन होने की चाह,
प्रेम है अनन्त में लीन हो जाना।
प्रेम है निःशब्द हो जाना,
प्रेम है निर्वाह हो जाना,
प्रेम है भावों की ताल-तलैया में गोते लगाना,
प्रेम है भावों, अनुभूतियों और शब्दों में लीयमान हो जाना;
अगर ऐसा नहीं, तो
प्रेम अधूरा है।



Tuesday, 15 January 2019

अभिव्यक्ति की आजादी और राजद्रोह क़ानून:


अभिव्यक्ति की आजादी और राजद्रोह क़ानून

सन् 2016 में जेएनयू विवाद ने राजद्रोह से सम्बंधित भारतीय दंड संहिता(IPC),1860 की धारा 124A को बहस के विषय में तब्दील कर दिया। इसकी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न सहज ही उठा कि आज़ाद भारत में ऐसे कानूनों की क्या उपयोगिता रह गयी है, विशेषकर तब जब सत्तारूढ़ रहते हुए सभी राजनीतिक दलों ने इस क़ानून का इस्तेमाल अक्सर अपने विरोध में उठाने वाली आवाज़ को दबाने के लिए किया है? इतना ही नहीं, आज़ादी के सत्तर वर्षों बाद भी इस औपनिवेशिक विरासत को सहेज कर रखे जाने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है? इस प्रश्न पर विचार से पहले आवश्यकता राजद्रोह और देशद्रोह के फर्क को समझने की है?https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=6733583930155689758#editor/target=post;postID=1172652132591789908;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=4;src=postname
राजद्रोह और देशद्रोह का फर्क:
भारतीय दंड संहिता में ‘सेडिशन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘सेडिशन’ का अर्थ होता है राजद्रोह। इसे स्थापित व्यवस्था के प्रति विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ है सरकार के प्रति विद्रोह। इसे देशद्रोह के रूप में देखा जाना उचित नहीं है। लेकिन, हाल में ‘सेडिशन’ शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से देशद्रोह के लिए किया जा रहा है जो इस बात का संकेत देता है कि सरकार और देश एक दूसरे के पर्याय हैं। दरअसल यह उस भ्रामक सोच का परिणाम है जो सरकार और देश के फर्क को समझ पाने की स्थिति में नहीं है और इसीलिए दोनों को एक ही मान लेती है, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों एक नहीं हैं। सरकारें देशहित में काम कर भी सकती हैं और नहीं भी। अगर सरकारें देशहित में काम कर रही हैं, तो उसका विरोध देश के विरोध का रूप ले सकता है; लेकिन यदि किसी को लगता है कि सरकारें देशहित में काम नहीं कर रही हैं, तो उसका विरोध देशद्रोह नहीं, देशहित में होगा।
अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी भी देश की सरकार और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अंतर्गत सत्तारूढ़ दल खुद को देश से भी ऊपर मान लेते है और  राष्ट्रहित की रहनुमाई का दावा करते हुए अपने विरोध को राष्ट्र के विरोध से जोड़कर देखते हुए राष्ट्रहित के प्रतिकूल मानते हैं। इस प्रवृत्ति को भारत में भी सहज ही देखा जा सकता है। भारत में भी जो दल सत्ता में रहा है, उसे यह लगता रहा है कि उसका विरोध प्रकारांतर से  विकास एवं राष्ट्रहित का विरोध है, जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है। शायद यही कारण है कि राष्ट्रपिता गाँधी ने इस धारा के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था: “धारा 124A, जिसके अंतर्गत मुझ पर राजद्रोह का आरोप लगा है, राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए रचे गए आईपीसी के कानूनों का राजकुमार है।” यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रुरत है कि ब्रिटेन ने 2010 में ही इस कानून को समाप्त कर दिया है। यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मेरिका और कनाडा जैसे ब्रिटिश उपनिवेशों से भी ये कानून हटाये जा चुके हैं, पर औपनिवेशिक विरासत के रूप में इसे अबतक भारत में न केवल सहेजकर रखा गया है, वरन् इसका निरंतर इस्तेमाल अब भी जारी है, जबकि ऐसे कानून किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक हैं।
राजद्रोह क़ानून की पृष्ठभूमि:
‘सेडिशन’ अर्थात् राजद्रोह का यह प्रावधान मूल रूप से भारतीय दंड संहिता(IPC),1860 का हिस्सा नहीं था। 1870 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध बढ़ते असंतोष की पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद, राष्ट्रवादी आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के दमन के लिए इसे इसके अंतर्गत शामिल किया गया। भारतीय दंड संहिता(IPC) धारा 124A के प्रावधानों के तहत्:
1.  अगर कोई व्याक्ति मौखिक या लिखित रूप से शब्दों के जरिये या अन्य तरीके से प्रत्यक्षतः या परोक्षतः विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध घृणा, अवमानना या उत्तेजना पैदा करने की कोशिश करता है या असंतोष को भड़काने की कोशिश करता है, तो इसे राजद्रोह(Sedition) माना जाएगा।
2.  इस धारा के अनुसार राजद्रोह को संज्ञेय(cognizable), गैर-जमानती(non-bailable) और असंयोजनीय (non-compoundable) अपराध है।
3.  इसके लिए अधिकतम जुर्माने के साथ या जुर्माने के बिना न्यूनतम तीन साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।
स्पष्ट है कि इस क़ानून को औपनिवेशिक शासन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लाया गया था।  
संविधान सभा की बहस और राजद्रोह कानून:
संविधान के मूल प्रारूप में अनु. 19(2) में जिन आधारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बन्धन आरोपित करने का प्रावधान किया गया था, उनमें एक आधार ‘राजद्रोह भी था; लेकिन बाद में दिसम्बर,1948 में संविधान सभा की बहस के दौरान अनेक सदस्यों द्वारा  आपत्ति दर्ज करवाए जाने के बाद इस शब्द को बाहर कर दिया गया। कारण यह कि संविधान सभा के सदस्यों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान इस कानून के दुरूपयोग को देखा और झेला था। वे जानते थे कि इस कानून का दुरूपयोग सत्तारूढ़ दल के द्वारा अपने विरोध में उठने वाली आवाज़ को दबाने के लिए एवं अपने राजनीतिक विरोधियों को फँसाने के लिए किया जा सकता है, इसीलिए उनका निर्णय इसके विरुद्ध रहा।
आज़ाद भारत में इसका औचित्य:
अब यह प्रश्न सहज ही उठता है कि स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भारतीय दंड संहिता के इस प्रावधान को क्यों बने रहने दिया? क्यों नहीं इसे बदला गया? इसकी निरंतरता को निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1.  उस समय राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया अपने आरंभिक दौर में थी। आज़ादी के बाद देशी रियासतों को भारत में मिलाया तो जा चुका था, पर एकीकरण की इस प्रक्रिया को ठोस आधार अभी नहीं दिया जा सका था और आशंका इस बात की थी कि कहीं विघटनकारी शक्तियों के सिर उठाने के कारण राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता खतरे में न पड़ जाय। इसी आलोक में राज्य को विशेष शक्तियाँ प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की गयी ताकि ज़रुरत पड़ने पर ऐसी शक्तियों को कुचला जा सके।
2.  तत्कालीन नेतृत्व राष्ट्रीय आन्दोलन की जिस पृष्ठभूमि से आया था और जिन मूल्यों, नैतिकताओं, सिद्धांतों एवं आदर्शों से वह परिचालित था, वह यह मानकर चल रहा था कि यह कानून अप्रयुक्त बना रहेगा। उसमें उन्हें इस कानून के दुरूपयोग की आशंका नहीं थी। यह बात अलग है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने उनके इस अनुमान को गलत साबित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में इसके विरुद्ध याचिका:
कॉमन कॉज नामक एक गैरसरकारी संगठन की ओर से राजद्रोह कानून के दुरूपयोग के विरुद्ध दाखिल जनहित याचिका में कहा गया था कि:
a.  राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और आजकल सरकारें डर पैदा करने और असहमति को दबाने के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रनेताओं, लेखकों, अभिनेताओं, कवियों, कार्टूनिस्टों वगैरह को अपना निशाना बना रही हैं।
b.  याचिका ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो(NCRB) के हवाले से बताया था कि 2014 में राजद्रोह के छियालीस मामले दाखिल हुए, जिनमें अट्ठावन व्यक्तियों की गिरफ्तारी की गई, मगर सजा सिर्फ एक मामले में हुई।
दरअसल इस क़ानून का इसलिए भी विरोध किया जा रहा कि:
1.  भारतीय दंड संहिता,1860 में पहले से ही धारा 121, धारा 121A धारा 122 मौजूद है जो सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने या सरकार के विरुद्ध युद्ध में सहायता करने को दंडनीय अपराध घोषित करते हैं। इसीलिए अलग से इस क़ानून की ज़रुरत नहीं है। 
2.  यह क़ानून अनु. 19(1a) के द्वारा प्रदत्त मूलाधिकार वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के विरोध में है।
3.  सरकार के द्वारा जिस तरह धड़ल्ले से इस क़ानून का इस्तेमाल लोकतान्त्रिक विरोध की आवाज़ दबाने के लिए किया जा रहा है, वह  लोकतंत्र को ही खतरे में डाल देगा क्योंकि यह कानून सरकार की आलोचना और सरकार का विरोध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अहम् पहलू है और यह क़ानून सरकार के विरोध को देशद्रोह के रूप में देखता है। और, संभव है कि यह क़ानून न भी देखे, पर सरकार इसे देशद्रोह के रूप में ही देखती है और यह क़ानून सरकार को वह हथियार उपलब्ध करवाता है जिसकी बदौलत अपने विरोध में उठने वाली हर उस आवाज़ को दबाने की कोशिश करती है जो सरकार को परेशानियों में डाल सकती हैं।    
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
सितम्बर,2016 में जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस उदय यू. ललित की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस धारा को संवैधानिक घोषित करते हुए एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति सरकार की कड़ी आलोचना भी करता है, तो वह न मानहानि के दायरे में आता है और न ही राजद्रोह के। इस विषय में उसे राजद्रोह कानून की दोबारा व्याख्या करने की कोई जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि इस मसले पर उसके द्वारा केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य वाद,1962 में पहले ही निर्णय दिया जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि:
1.  कोई भी व्यक्ति जब तक किसी विधिसम्मत सरकार के खिलाफ लोगों को हिंसा के लिए नहीं भड़काता या इरादतन लोक-अव्यवस्था नहीं फैलाता, तब तक वह राजद्रोह का दोषी नहीं हो सकता।
2.  यह सिर्फ अवधारणा (Perception) के आधार पर नहीं होना चाहिए, वरन इसके ठोस साक्ष्य होने चाहिए।
3.  अदालत ने कहा कि जज हों या पुलिस महानिदेशक, संविधान पीठ के फैसले की अनदेखी नहीं कर सकते। पुलिस अधिकारी हों या दंडाधिकारी, वे संविधान पीठ के फैसले को मानने को बाध्य हैं।
फैसले का विश्लेषण:
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही स्थिति स्पष्ट कर दी हो, पर व्यवहार में सरकार और प्रशासन से लेकर निचली अदालतों तक ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय की उपेक्षा की है। इसीलिए इस निर्णय के बावजूद भी पिछले पाँच दशकों के दौरान राजद्रोह कानून का धड़ल्ले से मनमाने तरीके से दुरूपयोग होता रहा है।
पिछले कुछ दिनों से जिस तरह का माहौल देश में बना हुआ है, उसमें सर्वोच्च अदालत की ताजा टिप्पणी की प्रासंगिकता समझी जा सकती है। यह माना जाता है कि कोई राजनेता किसी के प्रति प्रतिशोध भाव रख भी सकता है और सत्ता में आने के बाद अपने विरोधियों के विरुद्ध किसी कानून को हथियार की तरह इस्तेमाल कर भी सकता है, लेकिन पुलिस और जज उससे निरपेक्ष रहेंगे। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह न्यायिक निर्णय मामला विशेष और उससे जुड़े हुए तथ्यों पर निर्भर करता है, इसीलिए आपराधिक मामलों में विभिन्न तथ्यों के आलोक में कोई एक आदेश पारित नहीं किया जा सका है। आपराधिक मामलों में सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। इसीलिए मामलों का पंजीकरण प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करना चाहिए, लेकिन इस सन्दर्भ में केदारनाथ सिंह वाद में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य वाद,1962:
बिहार के बेगुसराय जिले के केदार नाथ सिंह ने राजद्रोह से सम्बंधित धारा 124A को अभिव्यक्ति की आज़ादी के विरुद्ध मानते हुए इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।  इस मामले में पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने राजद्रोह कानून भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (ए) (राजद्रोह कानून) की संवैधानिक वैधता को यह कहते हुए स्वीकार किया था कि:
1.  इसका उद्देश्य विधि द्वारा स्थापित सरकार को पंगु होने से रोकना है क्योंकि राज्य की स्थिरता के लिए विधि द्वारा स्थापित सरकार की निरंतरता को सुनिश्चित करना आवश्यक है।
2.  लेकिन, अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल हिंसा या लोक व्यवस्था को भंग करने के लिए उत्प्रेरित करना ही राजद्रोह का आधार हो सकता है।
3.  इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे भाषणों या लेखन के बीच साफ़ अंतर किया जो लोगों को हिंसा के लिए उकसाते हैं या सार्वजानिक रूप से अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं तथा जो सरकार और उसकी नीतियों के प्रति विरोध प्रदर्शित करते हैं। किसी भी नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार के बारे में मनचाहे तरीके से आलोचना या टिप्पणी कर सकता है।

आगे चलकर बलवंत सिंह एवं अन्य बनाम् पंजाब राज्य वाद,1995 में सर्वोच्च अदालत ने खालिस्तान-समर्थक और भारत-विरोधी नारे लगाने के कारण देशद्रोह के आरोप से बरी करते हुए कहा कि इसमें देशद्रोह जैसा कुछ भी नहीं है। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि महज़ देश-विरोधी नारे मात्र लगाने से किसी पर राजद्रोह का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। राजद्रोह का आरोप तब तक नहीं लगेगा, जबतक यह प्रमाणित नहीं हो जाता है कि उसकी यह गतिविधि राज्य के विरूद्ध हिंसा की ओर न ले जाय। और हिंसा की यह बात सिर्फ़ परसेप्शन न हो, वरन् उसका ठोस आधार हो। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कहा है कि हिंसा की वकालत करना भी देशद्रोह नहीं है, लेकिन हिंसा के लिए भड़काना देशद्रोह है।