Wednesday, 5 December 2018

सीवीसी-नियुक्ति विवाद-प्रकरण

सीवीसी-नियुक्ति विवाद-प्रकरण
प्रमुख आयाम 
1. सीवीसी-नियुक्ति विवाद-प्रकरण 
2. हाल के सन्दर्भ 
3. पी. जे. थॉमस मामला,2010-11
4.  नियुक्ति-प्रक्रिया
5. नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती 
6. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
7.  विशिष्ट रूप से सीवीसी के सन्दर्भ में दिशानिर्देश
8. नियुक्ति-प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने हेतु सुझाव
9. विश्लेषण
सीवीसी-नियुक्ति विवाद-प्रकरण

सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों के बावजूद नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। जून,2015 में प्रशांत भूषण के गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर के. वी. चौधरी और सतर्कता आयुक्त के पद पर टी. एम. भसीन की नियुक्ति की वैधानिकता को चुनौती देते हुए राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया और उनके दागी व्यक्तित्व एवं नियुक्ति-प्रक्रिया की अपारदर्शिता का हवाला देते हुए इसे अवैधानिक घोषित करने की माँग की सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक पक्षपात वाले पहलू पर गौर करने से इन्कार करते हुए कहा कि वह इस प्रश्न पर गौर करेगा कि मुख्य सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्त व्यक्ति बेदाग छवि वाले मानदंड को पूरा करता है, या नहीं सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की इस आपत्ति को खारिज किया कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश बहुत सीमित है। उसका कहना था कि मसला मुख्य सतर्कता आयुक्त एवं सतर्कता आयुक्त से सम्बद्ध है और इनके विरुद्ध कुछ ऐसी सामग्रियाँ उपलब्ध हैं जिन्हें गंभीरतापूर्वक देखे जाने की ज़रुरत है। जुलाई,2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों नियुक्तियों को अपनी ओर से क्लीयरेंस देते हुए याचिका खारिज कर दी। इससे पूर्व पी. जे. थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर उनकी नियुक्ति की वैधानिकता को खारिज करते हुए नियुक्ति-प्रक्रिया के सन्दर्भ में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये थे जिसके बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि इस विवाद का पटाक्षेप हो जाएगा।

पी. जे. थॉमस मामला,2010-11:


सितम्बर,2010 में केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त(CVC) के पद पर पी. जे. थॉमस की नियुक्ति की गयी, लेकिन इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। इससे पूर्व जिस कमिटी ने पी. जे. थॉमस की इस पद पर नियुक्ति की अनुशंसा की थी, उस पैनल में विपक्ष की नेता के तौर पर लोकसभा में विपक्षी दल की नेता सुषमा स्वराज भी शामिल थीं और उन्होंने उनके दागी चरित्र की ओर पैनल का ध्यान आकृष्ट करते हुए इस पद के लिए उनके नाम की अनुशंसा का खुलकर विरोध किया था। लेकिन, पैनल ने उनकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए उनके नाम की अनुशंसा की।
नियुक्ति-प्रक्रिया:
केन्द्रीय सतर्कता आयोग(CVC) अधिनियम के प्रावधानों के तहत् केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त(CVC) के पद पर नियुक्ति हेतु विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गयी है। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक लोकपाल की तर्ज़ पर केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त एवं सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति के लिए सार्वजानिक विज्ञापन जारी किये जाएँ। इसी सार्वजानिक विज्ञापन के साथ नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू होती है और प्रधानमंत्री, गृह-मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को समाहित करने वाली तीन सदस्यीय समिति, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, इस पद पर नियुक्ति हेतु नामों की अनुशंसा करते हैं और इसी आलोक में केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति की जाती है।
आरम्भ में इस पद पर केवल भारतीय प्रशासनिक सेवा से सम्बद्ध अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, पर मार्च,2011 में पी. जे. थॉमस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों ने न केवल इस पद को अन्य लोकसेवकों सहित सबों के लिए खोल दिया गया, वरन् सर्च पैनल के गठन और सर्च पैनल के साथ-साथ कॉलेजियम के प्रकार्यण-संबंधी दिशा-निर्देशों के जरिये नियुक्ति-प्रक्रिया को स्पष्ट एवं पारदर्शी भी बनाया गया और इसकी वैधानिकता के परीक्षण के विकल्प को भी खुला रखा गया।
नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती:
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए प्रशांत भूषण ने इस नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी कि:
1.  थॉमस का नाम केरल के पामोलीन तेल आयात घोटाले(2002) की चार्जशीट में आ चुका है और इस मामले में तो बाकायदा उन पर मुक़दमा चल रहा था, इसलिए उनकी सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी संदेह के घेरे में है।
2.  थॉमस कुछ समय पहले तक दूरसंचार मंत्रालय में टेलिकॉम सचिव रहे थे और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में शामिल होने के आरोप भी उन पर लगे हैं। ऐसी स्थिति में इस बात को लेकर संदेह है कि वे इस मामले में होनेवाले सीवीसी के रूप में इस मामले में चलने वाले जाँच की प्रक्रिया की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित कर पायेंगे और उसकी निगरानी के दायित्व का निर्वाह कर पायेंगे। इसीलिए उनकी नियुक्ति हितों के टकराव के प्रश्न को भी जन्म देती है।
3.  विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने थॉमस के नाम पर आपत्ति जताते हुए इस नियुक्ति के लिए अपनी सहमति देने से इन्कार किया, फिर भी उनकी आपत्ति एवं विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने थॉमस को सीवीसी नियुक्त किया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
मार्च,2011 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराया जिससे केंद्र सरकार को झटका लगासुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिस उच्चस्तरीय समिति ने पीजे थॉमस की नियुक्ति की सिफ़ारिश की थी, उसका क़ानून के मुताबिक कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि इस नियुक्ति के समय इस समिति और किसी सरकारी संस्था ने मुख्य सतर्कता आयुक्त की संस्था की ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा के मसले पर ध्यान नहीं दिया
इसी आलोक में सर्वोच्च अदालत ने यह सामान्य दिशा-निर्देश दिया कि:
1.  प्रक्रिया की विधि सम्यकता अपेक्षित: नियुक्ति-प्रक्रिया के दौरान विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का अनुपालन ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उसका विधि सम्यक् होना भी अपेक्षित है
2.  संस्थागत सत्यनिष्ठा (Institutional Integrity) कहीं अधिक महत्वपूर्ण: सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नियुक्ति-प्रक्रिया के दौरान जिस व्यक्ति के नाम की अनुशंसा की जा रही है, उसकी व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा (Individual Integrity) तो महत्वपूर्ण है ही, पर इसके साथ संस्थागत सत्यनिष्ठा (Institutional Integrity) को भी आम लोगों के हित में अपेक्षित महत्व मिलना चाहिए यह आवश्यक नहीं है कि इसके निर्धारण के लिए साक्ष्य मौजूद ही हों
विशिष्ट रूप से केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के सन्दर्भ में दिशानिर्देश:
पी. जे. थॉमस के मामले में जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य दिशा-निर्देश जारी किये जो सीवीसी की नियुक्ति के साथ उन सभी कार्यकारी पदों पर नियुक्ति के सन्दर्भ लागू होते हैं जिनके लिए कॉलेजियम व्यवस्था को अपनाया है, वहीं सीवीसी के पद पर नियुक्ति के सन्दर्भ में कुछ विशिष्ट दिशा-निर्देश भी जारी किये गए हैं इन विशिष्ट दिशा-निर्देशों को निम्न सन्दर्भों में देखा जा सकता है:  
1.  नियुक्ति हेतु सर्च पैनल का गठन: कॉलेजियम के द्वारा जिन नामों पर विचार किया जाना है, उसकी शॉर्ट लिस्टिंग के लिए सर्च पैनल का गठन किया जाए
2.  शॉर्ट लिस्टेड नामों के औचित्य को साबित करना: सर्च पैनल के द्वारा जिन नामों की शॉर्ट लिस्टिंग की गयी है, उसके औचित्य को साबित करना होगा और इससे सम्बद्ध प्रासंगिक एवं अप्रासंगिक सभी प्रकार के दस्तावेज़ कॉलेजियम को उपलब्ध करवाने होंगे 
3.  नियुक्ति हेतु विशिष्ट अर्हता का निर्धारण: वर्तमान में मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति हेतु किसी भी प्रकार की विशिष्ट अर्हता का निर्धारण नहीं किया गया है, पर यदि इसके लिए किसी भी प्रकार की विशिष्ट अर्हता का निर्धारण किया जाता है, इसके लिए युक्तियुक्त कारण बतलाये जाएँ
4.  नियुक्ति-प्रक्रिया को नौकरशाहों तक सीमित न रखना: यदि इसके लिए किसी भी प्रकार की विशिष्ट अर्हता की ज़रुरत नहीं है और इसके लिए स्पष्ट कारण नहीं हैं, तो भविष्य में मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति के दायरे को केवल भारतीय प्रशासनिक सेवा(IAS) के अधिकारियों तक सीमित न रखा जाय इसके दायरे का विस्तार करते हुए इसे अन्य सेवाओं से सम्बद्ध ईमानदार एवं निष्ठावान व्यक्तियों के लिए भी खोला जाना चाहिए। इसी आधार पर यह कहा जा रहा है कि इस पद के लिए किसी के द्वारा भी आवेदन किया जा सकता है, इसके लिए आवेदनकरता का लोकसेवक होना जरूरी नहीं है। 
5.  कॉलेजियम के सदस्यों को वीटो का अधिकार नहीं: अपने इस निर्णय में सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट किया कि विपक्ष के नेता सहित कॉलेजियम के किसी भी सदस्य को 'वीटो' का अधिकार तो नहीं दिया जा सकता है
6.  असहमति का कारण और असहमत सदस्य की आपत्तियों का निराकरण अपेक्षित: यदि वे किसी सदस्य के नाम पर असहमत हैं या किसी नाम पर उन्हें आपत्ति है, तो उसे उसके पर्याप्त कारण बतलाने चाहिए। यदि कॉलेजियम का बहुमत उस असहमति से सहमत नहीं है, तो उसे उन आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपने निर्णय का औचित्य साबित करना होगा स्पष्ट है कि कॉलेजियम के बहुमत को असहमत सदस्य की आपत्तियों को दरकिनार करने की बजाय ध्यान में रखना होगा और यदि आपत्तियों के बावजूद नियुक्ति होती है, तो बहुमत को इसका निराकरण करना होगा
7.  नियुक्ति-प्रक्रिया को स्पष्ट एवं पारदर्शी बनाना: स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के जरिये नियुक्त-प्रक्रिया को स्पष्ट एवं पारदर्शी बनाने की कोशिश की गयी है और यह सुनिश्चित किया गया है कि चयन-समिति उचित एवं पारदर्शी तरीके से शॉर्ट लिस्टेड नामों पर विचार करे
8.  चयन की वैधानिकता का परीक्षण संभव: अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय के द्वारा चयन की वैधानिकता का परीक्षण किया जा सकता है अगर इन निर्देशों का अनुपालन नहीं होता है, तो नियुक्ति को रद्द करने की संभावनायें खुली रहेंगी 
नियुक्ति-प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने हेतु सुझाव:
जिन पदों पर नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम व्यवस्था को स्वीकार किया गया है, उनके अबतक के अनुभवों के आलोक में कॉलेजियम एवं नियुक्ति-प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाये जाने के सन्दर्भ में निम्न सुझाव दिए जा सकते हैं:
1.  कॉलेजियम का आधार व्यापक हो,
2.  यह सुनिश्चित किया जाय कि इसमें सरकार का बहुमत न हो,
3.  अनुभव को अपेक्षित महत्व दिया जाए एवं इसे इस पद पर नियुक्ति हेतु अत्यावश्यक शर्त के रूप में देखा जाए, और
4.  सिर्फ उन्हीं नामों पर विचार किया जाए जिनके लिए सीवीसी एवं वीसी के रूप में न्यूनतम तीन साल का कार्यकाल मिले 
विश्लेषण:
दरअसल भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में केन्द्रीय सतर्कता आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण एवं निर्णायक है क्योंकि यह न केवल भ्रष्टाचार से सम्बंधित तमाम शिकायतों को स्वतः संज्ञान लेने में समर्थ है, वरन् भ्रष्टाचार प्रतिषेध अधिनियम(PCA),1985 के तहत् दर्ज मामलों में सीबीआई की निगरानी की जिम्मेवारी भी इसके ऊपर है। इसीलिए सीबीआई की क्रियाप्रणाली की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग(CVC) की कमान किसके हाथों में रहती है। यही कारण है कि हर सरकार इस पद पर अपने मनपसंद व्यक्ति को बैठना चाहती है, भले ही इससे आयोग की विश्वसनीयता से ही क्यों न समझौता करना पड़े। इसी आलोक में देखें, तो अक्टूबर,2018 में सीबीआई के आतंरिक विवाद में जिस तरह मुख्य सतर्कता आयुक्त का पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार रहा है, जिस तरह उन्होंने सीबीआई निदेशक की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए विशेष निदेशक के रूप में राकेश अस्थाना की नियुक्ति से सम्बंधित फाइल को क्लीयरेंस दिया, इस विवाद को समय रहते सुलझाने की दिशा में पहल करने की बजाय तूल लेने दिया और जिस तरह सीबीआई निदेशक के खिलाफ आरोप लगाते हुए उन्हें छुट्टी प भेजे जाने के फाइल को मंजूरी दी, उसने एक बार फिर से सरकार के लिए मुख्य सतर्कता आयुक्त की राजनीतिक उपयोगिता सिद्ध करते हुए उनकी नियुक्ति को लेकर उठने वाले प्रश्न को प्रासंगिक बना दिया है। 

संस्थागत संकट से जूझता भारत


संस्थागत संकट

 प्रमुख आयाम 

  1.  संस्थागत संकट से आशय
  2.  रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता और साख खतरे में
  3.  चुनाव आयोग की विश्वसनीयता भी खतरे में
  4.  सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता और निष्पक्षता भी खतरे में
  5.  केन्द्रीय सतर्कता आयोग से संबंधित विवाद
  6.  केन्द्रीय सूचना आयोग से सम्बंधित विवाद
  7.  गहराता सीबीआई विवाद
  8.  लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संस्थाओं का महत्व



संस्थागत संकट से आशय:
पिछले कुछ वर्ष उन संस्थाओं के लिए भारी रहे हैं जो एक राष्ट्र के रूप में भारत को मज़बूती प्रदान करते हैं और जिन पर भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद टिकी हुई है। सरकार अपने तरीक़े से इनकी संरचना और क्रिया-प्रणाली को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है ताकि इन्हें अपनी ज़रूरतों और हितों के अनुरूप दिशानिर्देशित किया जा सके। इसीलिए आज वे संस्थाएँ संकट में हैं और उनकी स्वायत्तता ख़तरे में है, जिन्हें बनाने में दशकों लगे। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और रिज़र्व बैंक से लेकर लोकपाल, केन्द्रीय सतर्कता आयोग(CVC), चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय(ED) और सीबीआई तक इस स्थिति को देखा जा सकता है। यहाँ तक कि केंद्र सरकार के द्वारा अपने राजनीतिक हितों को साधने और अपने राजनीतिक विरोधियों से निपटने के लिए जिस तरीके से ख़ुफ़िया ब्यूरो(IB), सीबीआई(CBI), प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी स्वतंत्र जाँच एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है, उसने इस संकट को और अधिक गहराने का काम किया है। ऐसा नहीं कि इन संस्थाओं के साथ ऐसा पहली बार हो रहा है, या फिर इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ, पर हाल में यह प्रवृत्ति अपने चरम पर है। इतना ही नहीं, इन संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं जिसने इनकी साख एवं विश्वसनीयता को रसताल में पहुँचा दिया है।
रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता और साख खतरे में:
रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच टकराव भी नया नहीं है। समय-समय पर विभिन्न सरकारों ने अपने तरीके से रिज़र्व बैंक को प्रभावित करने की कोशिश भी की है और प्रभावित किया भी है, पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह टकराव दायरे को लाँघता दिखाई पर रहा है और अब इस टकराव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था चरमराती दिखाई पड़ रही है। रघुराम राजन के आरबीआई गवर्नर रहते हुए सरकार और आरबीआई के बीच टकराव तेज हुआ, फिर नोटबंदी के समय जिस तरीके से रिज़र्व बैंक को दरकिनार किया गया एवं इससे उत्पन्न चुनौतियों से निबटने के क्रम में वित्त मंत्रालय की अति-सक्रियता ने आरबीआई को जिस तरह हाशिये पर धकेला, जिस तरीके से आरबीआई ने गहराते एनपीए संकट के लिए जिम्मेवार तत्वों से निपटने की कोशिश की और अब अबतक अप्रयुक्त आरबीआई अधिनियम की धारा सात के प्रावधानों के तहत् जिस तरीके से सरकार रिज़र्व बैंक को दिशानिर्देशित करने की कोशिश करते हुए उसके रिज़र्व फण्ड को हासिल करने की कोशिश कर रही है, उससे ऐसा लगता है कि एक वित्तीय नियामक संस्था के रूप में आरबीआई पंगु होकर अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप रिज़र्व बैंक एवं सरकार के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है और कई बार रिज़र्व बैंक के गवर्नर एवं वित्त मंत्रालय आमने-सामने दिखाई पड़ते हैं।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता भी खतरे में:
चुनाव आयोग की क्रिया-प्रणाली और इसकी स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता को लेकर पहले भी प्रश्न उठाते रहे हैं, लेकिन हाल में चुनाव आयोग ने जिस तरीके से ईवीएम विवाद को हैंडल किया; जिस तरीके से चुनाव की तिथि का निर्धारण किया गया, इसकी घोषणा की गयी एवं इससे सम्बंधित सूचनाएँ लीक हुई; चुनावों के दौरान संवेदनशील मसलों से जिस तरीके से निपटा गया और सत्तारूढ़ दलों के द्वारा चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन एवं चुनाव-प्रचार में खुलकर धर्म-जाति आधारित विद्वेष के इजहार को लेकर आयोग की जो मूकदर्शक भूमिका सामने आयी, उसने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचाया और इसके कारण उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगे। इसने एक बार फिर से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एवं बर्खास्तगी-प्रक्रिया अविलम्ब सुधार की आवश्यकता का अहसास करवाया।
सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता और निष्पक्षता भी खतरे में:
विभिन्न मसलों पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच टकराव तो लम्बे समय से चल रहा है, लेकिन जनवरी,2018 में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ यह टकराव लक्ष्मण-रेखा को लाँघता दीख पड़ा और यह स्पष्ट हो गया कि न्यायपालिका की संस्थागत स्वायत्तता के साथ-साथ इसकी स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो चुका है। आरम्भ में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर विवाद शुरू हुआ और फिर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(NJAC) की संवैधानिकता को लेकर लम्बा न्यायिक विवाद चला। किसी तरह इस विवाद पर विराम लगा, तो सरकार ने मेमोरेंडा ऑफ़ प्रोसिड्योर(MOP) के जरिये एक बार फिर से न्यायाधीशों की नियुक्ति-प्रक्रिया में अपनी निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने की कोशिश की। यही कारण है कि अबतक मेमोरेंडा ऑफ़ प्रोसिड्योर(MOP) को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। अब भी न्यायाधीशों की नियुक्ति को प्रभावित करने की कोशिश में सरकार के द्वारा कॉलेजियम के द्वारा अनुशंसित नामों में विभिन्न तरीक़ों से अड़ंगा लगाये जाने की प्रक्रिया जारी है। इस पृष्ठभूमि में सितम्बर,2017 में हितों के टकराव को लेकर प्रश्न उठे और इस मसले पर वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण और मुख्य न्यायाधीश के बीच होनेवाली बहस ने एक बार फिर से न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता के प्रश्न को उठाया। लेकिन, जनवरी,2018 में न्यायपालिका का आंतरिक संकट गहराता हुआ दिखा जब चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिये सार्वजनिक रूप से देश की जनता को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट की क्रिया-प्रणाली के प्रति अपने असंतोष का इजहार किया और देश के लोकतंत्र को ख़तरे में बतलाया। उन्होंने मास्टर ऑफ़ रोस्टर को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करवाते हुए विभिन्न पीठों के बीच केसों के आवंटन को लेकर मुख्य न्यायाधीश पर पक्षपात और मनमानी का आरोप लगाया। संवैधानिक बेंच द्वारा मुख्य न्यायाधीश को मास्टर ऑफ़ रोस्टर के रूप में देखने की प्रक्रिया भी विवादों से परे नहीं रही। इस क्रम में यह बात उभरकर सामने आयी कि सुप्रीम कोर्ट में आंतरिक संवाद की प्रक्रिया का बाधित हो चुकी है और सर्कार अपने तरीके से न्यायपालिका को निर्देशित करने की कोशिश कर रही है। भले ही समय के प्रवाह में ये सारी बातें पीछे छूटती दिख रही हों, पर इन सब कारणों से सुप्रीम कोर्ट की साख को बट्टा लगा, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। शायद इन्हें दुरुस्त करने में दशकों लग जाएँ।
केन्द्रीय सतर्कता आयोग से संबंधित विवाद:
केन्द्रीय सतर्कता आयोग विवाद के घेरे में तब आया जब जून,2015 में प्रशांत भूषण के गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर के. वी. चौधरी और सतर्कता आयुक्त के पद पर टी. एम. भसीन की नियुक्ति की वैधानिकता को चुनौती देते हुए राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया और उनके दागी व्यक्तित्व एवं नियुक्ति-प्रक्रिया की अपारदर्शिता का हवाला देते हुए इसे अवैधानिक घोषित करने की माँग की। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को खारिज कर दिया, तथापि इस प्रकरण ने पी. वी. थॉमस नियुक्ति प्रकरण और इससे उपजे हुए विवाद की याद दिला दी। प्रेमे कोर्ट के निर्णय के साथ भले ही यह मसला निपट गया लगता हो, पर हालिया सीबीआई विवाद में केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के. वी. चौधरी की संलिप्तता और विवादास्पद भूमिका ने एक बार फिर से केन्द्रीय सतर्कता आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रश्न के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। ध्यातव्य है कि सन् 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने संस्थागत निष्ठा (Institutional Integrity) को सर्वोपरि महत्व देते हुए सीवीसी के पद पर पी. सी. थामस की नियुक्ति को ख़ारिज किया था, फिर भी सरकारें इससे सबक लेने को तैयार नहीं दिखाती हैं।
केन्द्रीय सूचना आयोग से सम्बंधित विवाद:
सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को लेकर कितनी गंभीर है और इससे सम्बंधित संस्थाओं को मज़बूती प्रदान करने की कितनी गंभीर कोशिश कर रही है, इसका अंदाज़ा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि मई,2014 से शासन संभाले लगभग साढ़े चार साल होने को हैं, पर अभीतक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट के तमाम दबावों के बावजूद किसी-न-किसी बहाने सरकार अबतक इसको टालती रही है। यह कोई अपवाद नहीं है, वरन् यह ट्रेंड है। इतना ही नहीं, हाल में उन संस्थानों और उन कानूनों पर हमले लगातार बढ़े हैं जिन पर पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी है भ्रष्टाचार और अनियमितता उजागर करने के कारण आरटीआई कार्यकर्ताओं और ह्विसिल ब्लोअरों पर लगातार हमले हो रहे हैं, फिर भी न तो ह्विसिल ब्लोअर सुरक्षा अधिनियम को लागू किया गया और न ही लोकपाल की नियुक्ति की गई यहाँ तक कि इस सरकार के कार्यकाल के दौरान 24 नवम्बर को मुख्य सूचना आयुक्त आर. के. माथुर के सेवानिवृत्त होने के बाद केन्द्रीय सूचना आयोग तीसरी बार बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम कर रहा है कोर्ट के हस्तक्षेप के बिना मई,2014 से अबतक के अपने कार्यकाल के दौरान इस सरकार ने एक भी सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं की है और हालत यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि सन् 2016 से अबतक केंद्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोगों में रिक्तियों के बावजूद एक भी सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं की है और दिसम्बर,2018 के पहले सप्ताह के उत्तरार्द्ध से ग्यारह सदस्यीय केंद्रीय सूचना आयोग महज़ तीन सूचना आयुक्तों के भरोसे चल रहा है। मतलब यह कि केन्द्रीय सूचना आयोग में रिक्तियों की संख्या आठ तक पहुँच चुकी है और सरकार इसका जवाब देने के लिए तैयार नहीं है, शायद इसलिए कि पिछले साढ़े चार वर्षों के दौरान केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने निर्देशों के जरिये केंद्र सरकार को लगातार मुश्किलों में डाला है और इसके कारण उसकी किरकिरी हुई है। यह स्थिति तब है जब नवम्बर,2012 में नमित शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह निर्देश दिया था कि रिक्तियाँ सृजित होने के कम-से-कम तीन महीने पहले सूचना आयुक्तों की नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए
इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने अब केन्द्रीय सूचना आयोग की स्वायत्तता को भी अपने तरीके से सीमित करने की दिशा में पहल की, ताकि उस पर दबाव बनाया जा सके और उसके निर्णयों को प्रभावित किया जा सके। इसके लिए उसने मानसून-सत्र,2018 में सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 में संशोधन करते हुए सूचना आयुक्तों के वेतन-भत्ते एवं पदावधि की शक्ति अपने हाथों में लेने कीई दिशा में पहल की, जिसने नए सिरे से विवाद को जन्म दिया। यद्यपि व्यापक विरोध के मद्देनज़र सरकार को इसमें संशोधन का अपना इरादा बदलना पड़ा, तथापि इससे उसके मकसद का संकेत तो मिल ही जाता है।
ऐसा नहीं कि सूचना आयोग के सन्दर्भ में यह स्थिति केन्द्रीय सूचना
आयोग तक सीमित है। दरअसल किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, सूचनाओं और सूचना आयोग के प्रति उसका रवैया लगभग मिलता-जुलता है। जहाँ आंध्र प्रदेश का राज्य सूचना आयोग अब भी एक अदद सूचना आयुक्त की प्रतीक्षा कर रहा है, वहीं गुजरात, महाराष्ट्र और नागालैंड जैसे राज्यों में राज्य सूचना आयोग को अब भी मुख्य सूचना-आयुक्त की प्रतीक्षा है और उन्हें उनके बिना ही काम चलाना पड़ रहा है। एक ओर सूचना आयोग के पास आवेदनों की भरमार है जिनके समयबद्ध निपटारे की अपेक्षा उनसे है, दूसरी ओर केरल, तेलंगाना एवं पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में राज्य सूचना आयोग क्रमशः 1, 2 और 3 सूचना-आयुक्तों के भरोसे चल रहे हैं। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक सहित अन्य राज्यों में भी स्थिति बेहतर नहीं है और वहाँ पर सूचना आयोग को भारी मात्रा में रिक्तियों की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। सूचना-आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने की वजह से सूचना आयोगों में लंबित अपीलों और शिकायतों की संख्या बढ़ती जा रही है
दिसम्बर,2018 में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलू ने राष्ट्रपति का ध्यान केंद्र सरकार की ओर से उत्पन्न उन चुनौतियों की ओर आकृष्ट किया है जिसका सामना केन्द्रीय सूचना आयोग को करना पड़ रहा है उन्होंने उस उभरते ट्रेंड की ओर इशारा किया जिसके तहत् सरकारी संस्थान सूचना के अधिकार कानून के तहत् सूचना माँग रहे नागरिकों और इसके मद्देनज़र सूचनाओं को उपलब्ध करवाने से सम्बंधित निर्देश जारी करने वाले केन्द्रीय सूचना आयोग(CIC) के खिलाफ रिट याचिकाएँ दायर कर रहे हैं और इसके जरिये उन्हें डराने-धमकाने के साथ-साथ उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं केन्द्रीय सूचना आयोग के खिलाफ ऐसी ही लगभग 1,700 रिट याचिकाएँ दायर की गई है, जिनमें से ज्यादातर, सरकार और आरबीआई आदि जैसे उसके संस्थानों द्वारा दायर की गई हैं इन याचिकाओं के जरिये भारत संघ या इससे सम्बद्ध संस्थान केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेशों को यह कहते हुए चुनौती देता है कि एक सरकारी कर्मचारी की शैक्षणिक योग्यता, उनकी निजी जानकारी और उसका खुलासा करना उनकी गोपनीयता का अनुचित अतिक्रमण है; इसीलिए आयोग का यह निर्देश अवैधानिक है और इसे रद्द किया जाय सूचना आयोग ने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों के नामों का खुलासा करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करने को लेकर रिजर्व बैंक को आदेश दिया था जिसके विरुद्ध रिज़र्व बैंक ने न्यायलय की शरण ली और बाद में न्यायालय ने सूचना आयोग के उस आदेश को बरक़रार रखा उन्होंने सार्वजनिक भागीदारी के खिलाफ रणनीतिक मुकदमें’ (SLAAP) की वैश्विक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि ऐसे मुकदमें का मकसद जीतना नहीं, बल्कि किसी संगठन या एक व्यक्ति के खिलाफ बोलने वाले लोगों एवं संस्थाओं को प्रताड़ित और भयभीत करना है ताकि उसे ऐसा करने से रोका जा सके
गहराता सीबीआई विवाद:
दरअसल सीबीआई विवाद का दायरा सिर्फ सीबीआई तक सीमित नहीं है। इसकी ज़द में सीबीआई के अलावा आईबी(IB) और रॉ(RAW) तक आ चुके हैं। वास्तव में यह भारत में जो संस्थागत संकट आकार ग्रहण कर रहा हा, उसका प्रतिनिधित्व करता है। इन संस्थाओं की समस्या संरचनात्मक है और यह इसे अराजनीतिक संस्था नहीं रहने देती है। सीबीआई के सन्दर्भ में समस्या यह है कि यह प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रहकर कम करती है और यह इसे बहुसंस्थाओं की निगरानी में रखा गया है। उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में सीबीआई को केन्द्रीय सतर्कत्ता आयोग(CVC) की निगरानी में रहकर काम करना होता है और लोकपाल से सम्बंधित मामलों में इसकी निगरानी लोकपाल के द्वारा की जाती है, जबकि इसका प्रशासनिक नियंत्रण कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग(DOPT) के जिम्मे होता है जो प्रधानमंत्री के अधीन है। बहु-संस्थाओं (Multiplicities of Institution) की निगरानी वाली यह स्थिति सीबीआई की क्रिया-प्रणाली को कहीं अधिक मुश्किल बनाती है। इसीलिए यह कहा जा रहा है कि अगर स्वतंत्र जाँच एजेंसी के रूप में सीबीआई की साख एवं विश्वसनीयता को बनाये रखना है, तो पृथक सीबीआई अधिनियम समय की माँग है, अन्यथा आनेवाले समय में यह एक और जाँच एजेंसी बनकर रह जायेगी। 
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संस्थाओं का महत्व:
यह सच है कि देश संस्थाओं से बड़ा है और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जवाबदेही चुनी हुई संस्थाओं की कहीं ज्यादा होती है, पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि लोकतंत्र का संचालन संस्थाओं के माध्यम से होता है और इसीलिए इसकी मज़बूती बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि ये संस्थायें कितनी प्रभावी तरीके से कम कर रही हैं। दूसरी बात यह कि लोकतंत्र का मतलब यह नहीं है कि निर्वाचित संस्थाओं को मनमानी करने के लिए छोड़ दिया जाय। इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भारत में संविधान की सर्वोच्चता है और संविधान नियंत्रण एवं संतुलन की अवधारणा पर आधारित है। इसीलिए निर्वाचित संस्थाओं को भी एक ओर संविधान के द्वारा निर्धारित दायरे में रहकर काम करना होता है, दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की सतत निगरानी में रहकर, जिस पर संविधान के संरक्षण की जिम्मेवारी है और जो इस नाते संविधान के अनुपालन को सुनिश्चित करता है। सुप्रीम कोर्ट की तरह ही चुनाव आयोग दूसरी महत्वपूर्ण संस्था है जिस पर लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता और इसका प्रभावी प्रकार्यण निर्भर करता है। इस पर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी होती है जिसके बिना लोकतंत्र का टिके रह पाना मुश्किल होता है। कुछ ऐसी ही स्थिति सीबीआई, सीवीसी, आईबी और प्रवर्तन निदेशालय जैसी जाँच एजेंसियों तथा रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया जैसे वित्तीय नियामकों की भी है जिन्हें विभिन्न वैधानिक उपबंधों के जरिये अस्तित्व में लाया गया है। अगर ये संस्थाएँ कमजोर होंगी, तो लोकतंत्र का मजबूती से बचे रह पाना और इसका प्रभावी तरीके से काम कर पाना मुश्किल होगा। इसीलिए चुनी हुई सरकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उन संस्थाओं को मज़बूती प्रदान करें जिन पर लोकतंत्र की मज़बूती और उसकी सफलता निर्भर करती है।