Tuesday, 24 July 2018

बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या


बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या

बांग्लादेश और भारत की सीमा पिछले पाँच-छह दशकों के दौरान भारत की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती चली गई है दोनों देशों के बीच 4096 किलोमीटर लम्बी द्विपक्षीय सीमा में महज साढे छह किलोमीटर की सीमा अस्पष्ट और अनिर्दिष्ट है और इसको लेकर विवाद की स्थिति बनी हुयी है फिर भी, बांग्लादेश की ओर से अवैध घुसपैठियों का भारतीय सीमा में प्रवेश निरंतर जारी है तमाम कोशिशों के बावजूद इसे नियंत्रित कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है और आज यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में भारत में ढाई-तीन करोड़ अवैध बंगलादेशी घुसपैठिये मौजूद हैं
बढ़ते अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण:
मुम्बई हमले के आलोक में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकेत देते हुए यह प्रश्न उठाया था कि बांग्लादेश के लोगों को इतनी बड़ी संख्या में वीजा क्यों दी जा रही है उन्होंने इससे जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि निगरानी-व्यवस्था के लचर होने के कारण वीजा-समाप्ति के बाद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक अपने मूल देश वापस लौटने के बजाय यहीं पर रह जाते हैं सन् 2015 में गठित भूपेन हजारिका समिति ने ‘ज़मीन के प्रति भूख’ को अवैध आव्रज़न का प्राथमिक कारण बतलाया है  
इतना ही नहीं, इस्लामिक चरमपंथी संगठनों के द्वारा धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के कारण भी धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का गहराता अहसास उनके भारत, जो उन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित प्रतीत होता है, की ओर पलायन को उत्प्रेरित कर रहा है इसके अतिरिक्त, अक्सर अविकास, गरीबी और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे बांग्लादेशी नागरिकों को तेजी से विकसित हो रहा भारत आकर्षित करता है और  वे बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में भारतीय सीमा में अवैध रूप से प्रवेश कर जाते हैं फिर, स्थानीय बांग्लादेशी आबादी के साथ घुल-मिल जाते हैं और स्थानीय राजनीतिज्ञों एवं दलालों के सहयोग से उनके लिए भारत की नागरिकता एवं यहाँ पर मताधिकार के साथ-साथ सरकार के द्वारा भारतीय नागरिकों को उपलब्ध करवायी जा रही सारी सुविधाएँ हासिल कर पाना संभव हो पाता है ऐसा दो कारणों से संभव हो पाता है: एक तो यह कि भारत एवं बांग्लादेश की सीमा खुली है और इसकी अबतक पूरी तरह से बाड़बंदी नहीं हो पाई है, तथा दूसरे, सीमा सुरक्षा बल में व्याप्त भ्रष्टाचार और इसके कारण निगरानी की व्यवस्था के अप्रभावी होने के कारण भी इनका भारतीय सीमा में प्रवेश आसान हो जाता है ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार के अवैध घुसपैठ को सीमा सुरक्षा बल के जवानों के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है
अवैध घुसपैठ का असर:
1.  जनांकिकीय संरचना में बदलाव: बांग्लादेश की ओर से अवैध घुसपैठ के कारण इससे सटे पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा एवं असम जैसे भारतीय राज्यों में जनांकिकीय संरचना में बदलाव आ रहे हैं इस बदलाव को बांग्लाभाषी जनसंख्या और इसके सापेक्ष असमी-भाषी जनसंख्या और अन्य भाषा-भाषी जनसंख्या के आनुपातिक संतुलन में बदलाव के रूप में देखा जा सकता है साथ ही, चूँकि ऐसे अवैध प्रवासियों में मुसलमानों की संख्या अधिक है, इसीलिए हिन्दू-मुस्लिम जनसंख्या का आनुपातिक संतुलन भी बिगड़ रहा है जो स्थानीय स्तर पर तनाव को बढ़ाने में भी सहायक है   
2.  आर्थिक स्तरों पर बढाती मुश्किलें: इसके कारण उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है साथ ही, सरकार के द्वारा स्थानीय लोगों के लिए जो बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध करवायी जा रही है, उन पर भी दबाव बढ़ रहा है और उनकी उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है इतना ही नहीं, इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि पहले से ही रोजगार उपलब्धता सीमित है और समय के साथ इनमें भी कमी आ रही है, ऐसी स्थिति में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का बढ़ता हुआ दबाव स्थानीय स्तर पर रोजगार हेतु प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ा भी रहा है और उसकी उपलब्धता को और भी सीमित कर रहा है
3.  स्थानीय लोगों की विशिष्ट भाषायी-सांस्कृतिक पहचान खतरे में: इसने औपनिवेशिक विरासत के रूप में प्राप्त भाषा-समस्या को कहीं अधिक जटिल बनाया है इस घुसपैठ ने सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लाभाषियों एवं अन्य भाषियों के बीच के आनुपातिक संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है जिसके कारण स्थानीय लोगों की विशिष्ट भाषायी-सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में पड़ती चली जा रही है फलतः स्थानीय स्तर पर सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव तेजी से बढ़ा है इसका प्रमाण सन् 1979 में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध ऑल असम स्टूडेंट यूनियन(AASU) के नेतृत्व में शुरू हुआ आन्दोलन है जो लगातार छह वर्षों तक चला और जिसकी परिणति असम समझौता,1985 के रूप में हुई उल्फा का गठन भी अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध ही हुआ था और उन्होंने उन्हें निकाल-बाहर के लिए सशक्त अभियान भी चलाया, यह बात अलग है कि बाद में इसके चरित्र में बदलाव आया इसने गैर-असमी भारतीयों के विरोध को अपना एजेंडा बनाया और इसके लिए हिंसक अभियान भी चलाया आज भी गैर-असमी भारतीय इसके निशाने पर होते हैं    
4.     नागालैंड में बढ़ता असंतोष: अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध असम की तरह नागालैंड में भी माहौल बन रहा है नागाओं को इस बात का डर है कि अगर समय रहते उन्होंने पहल नहीं की, तो उन्हें अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बनकर रह जाना पड़ेगा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को खोने का खतरा भी उन्हें परेशान कर रहा है इनका आरोप है कि ये अवैध बंगलादेशी घुसपैठिये असम सरकार द्वारा जारी दस्तावेज लेकर उपस्थित होते हैं और दीमापुर में प्रशासन के सहयोग से घूस की बदौलत इनर लाइन परमिट हासिल करते हैं कई बार तो ये बिना इनर लाइन परमिट के ही घुमते दिखाई पड़ते इनका यह भी आरोप है कि हाल में दीमापुर में हिंसा, चोरी और बलात्कार की बढ़ी हुयी घटनाओं के लिए मुख्य रूप से ये ही जिम्मेवार हैं इस पृष्ठभूमि में नागा स्टूडेंट फेडरेशन और एनजीओ सर्वाइवल नागालैंड लोगों को संगठित कर रहा है और उसके इस प्रयास को पार्टी लाइन से इतर हटकर समर्थन मिल रहा है   
5.  कानून एवं व्यवस्था के लिए चुनौती: समस्या सिर्फ इतनी नहीं है जब इन घुसपैठियों के लिए जीविका के समुचित साधन उपलब्ध नहीं होते हैं, तो ये गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्तता के जरिये अपने आर्थिक हितों को संरक्षित करने की कोशिश करते हैं और इसकी पृष्ठभूमि में ये कानून एवं व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाते हैं और, सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि आज ये केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं हैं, वरन पूरे भारत में फ़ैल चुके हैं बांग्लाभाषियों से इनके सादृश्य के कारण इन्हें शेष आबादी से अलगाना अगर असंभव नहीं, तो अत्यंत मुश्किल अवश्य हो चुका है 
6.  आतंरिक सुरक्षा के समक्ष जटिल होती चुनौतियाँ: समस्या आतंरिक सुरक्षा के समक्ष जटिल होती चुनौतियों की भी है और इसमें इन अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों की भूमिका कहीं महत्वपूर्ण है पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों में आतंकी गतिविधियों में जो तेजी आयी है, उसके लिए पाकिस्तानी ख़ुफ़िया संस्था इन्टर सर्विसेज इंटेलिजेंस(ISI), जिसने बांग्लादेश को नया रूट बनाया है, और बांग्लादेश से परिचालित हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी(HUJI) को जिम्मेवार माना जा रहा है इन संगठनों के द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों, विशेषकर मुस्लिम घुसपैठियों का सॉफ्ट टारगेट के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है इन्हें उनकी अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक मजबूरियों और कट्टरपंथी रुझानों के करण विश्वास में लेना आसान होता है और जिनका इस्तेमाल इनके द्वारा भारत-विरोधी आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए किया जाता है भारतीयों के साथ पूरी तरह से घुले-मिले होने के करण इनकी मारक क्षमता बढ़ जाती है
7.  इसके अलावा, बांग्लादेश की सीमा से लगा यह इलाका देह-व्यापार, नकली नोटों के कारोबार, मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों की तस्करी के अड्डे के रूप में विकसित हो चुका है और इन तमाम गतिविधियों में अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों की संलिप्तता के संकेत मिले हैं यहाँ तक कि नोटबंदी के दौरान नए फर्जी नोटों की पहली खेप भी इसी सीमावर्ती क्षेत्र से मिली
बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी से सम्बद्ध समस्याएँ:
1.  मानवीय पहलू: बांग्लादेशी घुसपैठियों से मानवीय पहलू जुड़े हुए हैं क्योंकि न्यूनतम जीविका की तलाश इन्हें सीमा पर जाकर प्रवासी की ज़िंदगी जीने को विवश कराती है जब वहाँ पर भी इन्हें जीविका का न्यूनतम आधार भी उपलब्ध नहीं हो पाता है, तो वे आपराधिक एवं अनैतिक गतिविधियों (चोरी, डकैती, लूट-पाट, हत्या, देह-व्यापार आदि) में शामिल होने को विवश होते हैं इन्हें वापस भेजे जाने का मतलब उन्हें जीविका के अल्पतम साधन से वंचित करना होगा साथ ही, स्थिति के सामान्य हुए बिना उन्हें जबरन वापस भेजा जाना उनकी जान-माल को भी खतरे में दाल सकता है
2.  वैधानिक पहलू: इन घुसपैठियों की वापसी से जुड़ा वैधानिक पहलू भी है क्योंकि नागरिकता अधिनियम,1955 के मुताबिक भारत में जन्मे लोगों को जन्म के आधार पर भारतीय नागरिकता मिलती है ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि इन अवैध घुसपैठियों की भारत में जन्मी संतानों की वैधानिक स्थिति क्या होगी?    
3.  पहचान की समस्या: बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी तब तक संभव नहीं है जबतक इनकी पहचान नहीं की जाती है अब समस्या यह है कि पश्चिम बंगाल के लोगों और बांग्लादेशी लोगों को एक दूसरे से अलग पाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि इनके बीच परम्परागत, भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से इतनी समानताएँ हैं इसके कारण अक्सर निर्दोष बांग्लाभाषी नागरिकों को भी बांग्लादेशी घुसपैठिया समझ लिया जाता है जिसके कारण उसके साथ ज्यादती होने की सम्भावना बनी रहती है  
4.  बांग्लादेश के द्वारा इन्हें अपना नागरिक मानने से इन्कार: बांग्लादेश अक्सर इन अवैध घुसपैठियों को अपना नागरिक मानने से इन्कार करता है और जब वह इन्हें अपना नागरिक मानने के लिए ही तैयार नहीं है, तो इन्हें वापस लेने का प्रश्न कहाँ से उठता है देश से इनके निकल-बाहर के लिए कोई तयशुदा प्रणाली नहीं है सरकार का कहना है कि वह न्यायिक आदेश पर ही इन्हें स्वीकार करेगी इनकी संख्या, जो करीब-करीब दो-ढ़ाई करोड़ होने का अनुमान लगाया जा रहा है, को देखते हुए भी इनकी वापसी मुश्किल प्रतीत होती है क्योंकि किसी भी सरकार के लिए इतनी बड़ी संख्या में अपने लोगों को वापस लेना और उनके पुनर्वास के साथ-साथ उनके लिए बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करना बहुत ही मुश्किल है       
5.  बांग्लादेशी घुसपैठियों से सम्बंधित प्रश्न का राजनीतिकरण:  आज इस प्रश्न का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है और इसने परिदृश्य को कहीं अधिक जटिल बनाया है भारतीय जनता पार्टी आरम्भ से ही इन्हें भारत की आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा मान रही है, लेकिन उसकी आपत्ति केवल बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को लेकर है वोटेबैंक की राजनीति के कारण बांग्लादेश से अवैध रूप से घुसपैठ करने वाले हिन्दू घुसपैठियों के प्रति उसका रुख उदार है और वह उन्हें भारत की नागरिकता प्रदान करने को इच्छुक है प्रमाण है नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन, जो बांग्लादेश से आनेवाले गैर-मुस्लिमों, जिसमें बहुलांश में हिन्दू हैं, को नागरिकता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करता है और जिसपर विस्तार से चर्चा बाद में की जायेगी इसीलिए इस मसले पर उसके रुख को उसकी मुस्लिम-विरोधी मानसिकता से जोड़कर देखा जाता है उधर वोटबैंक की राजनीती के कारण काँग्रेस का रुख बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर आरम्भ से ही नरम है और उन्हें भारतीय नागरिकता से लेकर मताधिकार एवं राशन कार्ड दिलवाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के कारण काँग्रेस सहित तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इस समस्या की गंभीरता को नज़रंदाज़ करते हैं      
बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रति भारतीय जनता पार्टी की नीति:
बांग्लादेश से होनेवाली घुसपैठ को लेकर भाजपा संवेदनशील रही है आरम्भ से ही वह अवैध घुसपैठियों के प्रति सख्त नीति की हिमायती रही है इस मसले पर उसका रूख हिंदुत्व को लेकर उसके स्टैंड के हिसाब से भी फिट बैठता है 2014 में सोलहवीं लोकसभा चुनाव के दौरान उसने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ पर अंकुश लगाने और अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों को वापस बंगलादेशी भेजने का वादा किया था लेकिन, हाल में बंगलादेशी घुसपैठियों को लेकर उसके रूख में परिवर्तन दिखाई पड़ता है ऐसा लगता है कि उसे समस्या बंगलादेशी घुसपैठियों से उतनी नहीं है, जितनी बंगलादेशी मुसलमानों से, जो अवैध घुसपैठिये के रूप में भारत प्रवेश कर गए हैं, या फिर प्रवेश करना चाहते हैं वह बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं को तो शरणार्थी मानती है और उसके प्रति नरम रूख अपनाने के पक्ष में है, जबकि बंगलादेशी मुसलमानों को वह अवैध घुसपैठिया मानती है और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए उन्हें खतरा मानती है उसका यह भी मानना है कि नेशनल सिटीजन रजिस्टर (NCR) के लिए 1952 की मतदाता सूची को आधार बनाया जाना चाहिये, जबकि असम समझौता,1985 के अनुसार 1971 से पहले जो लोग भारत आ चुके थे और जिनका नाम मतदाता सूची में शामिल किया जा चुका था, उन्हें भारत का नागरिक माना गया है
बंगलादेशी घुसपैठियों के प्रति कांग्रेस की नीति:
बंगलादेशी घुसपैठियों को लेकर कांग्रेस का रूख नरम है अवैध घुसपैठ को लेकर वह भी चिंतित है, पर उसकी चिंता पर कहीं-न-कहीं वोट बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति तुष्टिकरण की नीति भारी पड़ रही है कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों के प्रति सहानुभूतिशील है उनकी ही मदद से इन अवैध घुसपैठियों ने अपना राशन कार्ड, और आधार कार्ड भी बनवा रखा है उनका नाम मतदाता सूची में भी दर्ज है और सरकारी सब्सिडी के लाभान्वितों की सूची में भी ये अवैध घुसपैठिये काँग्रेस के लिए मज़बूत वोट बैंक का भी काम करते हैं एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में असम की आबादी में मुसलमानों का अनुपात चौंतीस प्रतिशत के स्तर पर है जिनमें  महज दो प्रतिशत मुसलमान ही मूल रूप से असमी हैं मतलब यह कि असम की बत्तीस प्रतिशत आबादी या तो अवैध रूप से भारत में घुसपैठ करने वाले बंगलादेशी मुसलमानों की है, या फिर बांग्लाभाषी भारतीय मुसलमानों की, जिन्हें यहाँ लाकर बसाया गया है या फिर जो संभावनाओं की तलाश में पश्चिम बंगाल से यहाँ पर आकर बस गए हैं आज ये बंगलादेशी घुसपैठिये असम के तीस विधानसभा क्षेत्रों में अहम् और निर्णायक है
यहाँ पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिये कि काँग्रेस बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या का हल असम समझौते के प्रावधानों के मुताबिक चाहती है उसका मानना है कि 1971 के पहले भारत आ चुके बंगलादेशियों को भारत के नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या का हल असम समझौते के प्रावधानों के मुताबिक हो साथ ही, नेशनल सिटीजन रजिस्टर (NCR) के लिए 1971 की मतदाता सूची को आधार बनाया जाना चाहिये ध्यातव्य है कि काँग्रेस के शासन-काल में ही असम समझौते को अंतिम रूप दिया गया था इसके विपरीत भाजपा असम समझौते को दरकिनार कर इस समस्या का हल चाहती है, लेकिन इस मसले पर खुलने से भी बचाना चाहती है 
अवैध घुसपैठ को लेकर वैधानिक उपबंध:
कुछ समय पहले तक भारत में मौजूद विदेशी नागरिकों का विनियमन दो कानूनों के अंतर्गत किया जाता है: असम में प्रवर्तमान अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम [Illegal Migrants (Determiner Of Foreigners) Act,1983] और शेष देश में प्रवर्तमान विदेशी अधिनियम,1946 के अंतर्गत जहाँ 12 दिसम्बर,1983 से असम में लागू IMDT अधिनियम के प्रावधानों के तहत् किसी विदेशी के सन्दर्भ में शिकायत करने पर शिकायतकर्ता को ही यह साबित करना होगा कि आरोपी व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है, वरन वह विदेशी प्रवासी है इसके विपरीत अन्य राज्यों में लागू विदेशियों के लिए अधिनियम (Foreigner’s Act),1946 के मुताबिक आरोपित व्यक्ति को ही इस बात का प्रमाण देना होता है कि वह इस देश का नागरिक है इस एक्ट के तहत् अगर कोई बांग्लादेशी व्यक्ति अपना राशन कार्ड दिखाता, तो वैसे स्थिति में ट्रिब्यूनल के द्वारा उसके साथ नरमी बरती जाती और उसी के आलोक में उसे वापस भेजे जाने से सम्बंधित निर्णय लिया जाता दरअसल इस एक्ट के जरिये बांग्लादेशी घुसपैठियों को असमी चरमपंथियों से संरक्षण प्रदान किया गया  
सन् 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने IMDT एक्ट को बांग्लादेशी नागरिकों के पक्ष में और विभेदकारी बतलाते हुए कहा कि यह अधिनियम भारत के वास्तविक नागरिकों के बचाव एवं सुरक्षा प्रदान करने में विफल है क्योंकि इसका इस्तेमाल अक्सर उनके विरुद्ध किया जाता है साथ ही, यह देश की संप्रभुता को भी प्रतिकूलतः प्रभावित करता है इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान एवं उनकी वापसी के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मानते हुए असंवैधानिक करार दिया सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस निर्णय में यह स्पष्ट किया कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में रह्हने और भारतीयों की तरह शिक्षा, सुविधा, नागरिकता, मताधिकार, राशन कार्ड एवं नौकरी पाने का अधिकार नहीं है, इसीलिए इन्हें देश से निकाल-बाहर किया जाए साथ ही, उन लोगों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जाय, जो इन अवैध घुसपैठियों को नौकरी उपलब्ध करवा रहे हैं अपने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि अपने देश वापस भेजने के लिए ट्रांजिट कैम्पों में रखे गए अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को वे सारी सुविधाएँ देना अस्वीकार्य है जो भारतीय नागरिकों को उपलब्ध करवाए जा रहे हैं अपने इसी निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों देशों की सीमा पर बाड़बंदी का भी आदेश देते हुए कहा कि भारत से लगे बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसकी अविलम्ब व्यवस्था की जाय
असम समझौता,1985:
ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) और भारत सरकार के बीच सम्पन्न इस समझौते के अनुसार 25 मार्च,1971 को अवैध बंगलादेशियों की पहचान और निर्वासन के लिए कट-ऑफ तिथि निर्धारित की गई, लेकिन इसके रास्ते में कई अवरोध उत्पन्न किए गए। इस समझौते के अनुसार:
1.   25 मार्च,1971 के बाद भारत में प्रवेश करने वाले उन विदेशी नागरिकों को अवैध प्रवासी माना जायेगा जिनके पास पासपोर्ट, यात्रा-दस्तावेज या फिर अन्य विधिक प्राधिकार उपलब्ध नहीं है
2.  इस तिथि के पूर्व भारत में प्रवास करने वाले नागरिकों को इस एक्ट के अधीन अवैध घुसपैठिया नहीं माना जायेगा
3.  ऐसे मामले को बातचीत (negotiation) के जरिये सुलझाया जायेगा  
2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादास्पद अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा पहचान) अधिनियम,1983 को अवैध घोषित कर दिया गया। इसने पहचान और विशेष रूप से निर्वासन को और ज्यादा मुश्किल बनाया। बंगलादेश हमेशा घुसपैठ की बात से इन्कार करता रहा है।
बाड़बंदी और फ्लड लाइटिंग:
अवैध घुसपैठ पर अंकुश लगाने के लिए बंगलादेश की सीमा से लगे असम के सीमावर्ती इलाक़े में 176.314 किलोमीटर लंबी सीमा की ताड़बंदी का काम हो चुका है। केवल 0.06 किलोमीटर सीमा, जो ब्रिज तक एप्रोच रोड के रूप में है, की बाड़बंदी का काम मृदा-क्षरण के कारण अधूरा है। 3.57 किलोमीटर की विवादित सीमा की बाड़बंदी का काम केन्द्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। साथ ही, असम-बांग्लादेश के बीच लगभग 213 किलोमीटर लम्बी सीमा पर भी फ्लडलाइट लगाने का काम लगभग पूरा हो चुका है।  
हजारिका समिति रिपोर्ट,2015:
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अस में बंगलादेशी घुसपैठियों के अवैध आव्रजन के प्रश्न पर विचार के लिए उपमन्यु हजारिका के नेतृत्व में गठित एक सदस्यीय आयोग ने अक्टूबर,2015 में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि अगर बंगलादेशी घुसपैठियों का अवैध रूप से आना इसी तरह से जारी रहा, तो 2047 तक आते-आते असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक में तब्दील हो जायेंगेसमिति ने सरकार को इस मसले पर विचार के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का सुझाव दिया समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया है कि :
1.     भारत-बांग्लादेश सीमा पर नदी क्षेत्र में विशिष्ट पट्टी (stretch) की पहचान करते हुए एक ऐसे आदमी-रहित जोन (sterile zone) का सृज़न किया जाय
2.     रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि असम से लगे भारत-बांग्लादेश सीमा की निगरानी की जिम्मेवारी जिस सुरक्षा एजेंसी के पास है, वह ऐसे ज़ोन के सृज़न के प्रस्ताव से सहमत है, लेकिन इस सन्दर्भ में केंद्र और राज्य सरकार को सिद्धान्तः नीतिगत निर्णय लेने होंगे

3.   वहाँ पर ग्रामीणों को पहचान-पत्र का प्रावधान किया जाय ध्यातव्य है कि सन् 2003 में तत्कालीन गृह-मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने दो करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों को दुश्मन देश के एजेंट और भारत के लिए खतरा बतलाते हुए भारतीय नागरिकों के लिए पहचान-पत्र जारी करने की बात की     
4.   लेकिन, समस्या यह है कि जब किसी व्यक्ति का नाम़ मतदाता-सूची में शामिल किया जाता है, तो उपलब्ध करवाए गए दस्तावेज़ों की जाँच-पड़ताल नहीं की जाती है। आज असम में अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों को प्रवेश दिलाने और उन्हें नागरिकता, मताधिकार और राशन कार्ड-आधार कार्ड दिलाने का एक संस्थागत मैकेनिज़्म विकसित हो चुका है और ये सारा काम बड़े ही प्रोफ़ेशनल तरीक़े से होता है। ।
5.    रिपोर्ट में गुवाहाटी उच्च न्यायालय के हवाले से यह कहा गया कि फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के सामने आने की बात के बावजूद किसी के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई।
6.     रिपोर्ट में ज़मीन के प्रति भूख’ को अवैध आव्रज़न का प्राथमिक कारण बतलाते हुए आयोग ने भूमि के हस्तांतरण को उन लोगों तक सीमित करने का सुझाव दिया जो और जिनके वंशज 1951 से देश के नागरिक रहे हैं; चाहे यह हस्तांतरण खरीद-बिक्री, उपहार या किसी अन्य तरीके से हो रही हो, या फिर सरकार या किसी अन्य एजेंसी द्वारा आवंटन जरिये ऐसी रोक को जनजातीय क्षेत्रों से गैर-जनजातीय क्षेत्रों तक विस्तार दिया जाय ताकि अवैध बंगलादेशी प्रवासियों को ज़मीन हासिल करने से रोका जा सके
7.     अक्सर अवैध अप्रवासी अन्य जिलों के बाढ़ और कटाव प्रभावितों के नाम पर भ्रष्ट और अक्षम प्रशासन से सहायता के साथ ज़मीन हासिल करते हैं। उन्होंने फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनवा रखें हैं और इन फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों की बदौलत वे आरक्षित वन और चारागाह रिज़र्व सहित सरकारी ज़मीन हथियाने में सफल रहते हैं। ऐसी मदद और सहायता के लिए भी ऐसे ही कठोर मानकों का सहारा लिया जाना चाहिए, तभी स्थानीय मूल निवासियों के हितों को संरक्षित किया जा सकता है
8.     अवैध घुसपैठियों की बढती संख्या ने सरकारी संस्थाओं में रोजगार को लेकर मूल निवासियों के लिए अनुचित प्रतिस्पर्धा की स्थिति सृजित की हैसमस्या यह है कि इनके पिछले जीवन की विस्तृत जाँच-पड़ताल के बिना ही उन्हें नौकरियाँ दे दी जाती हैं
सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट के आलोक में केंद्र और राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया
भविष्य की रणनीति:
अब तक के अनुभवों के आलोक में यदि बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या से निपटने के लिए भविष्य की रणनीति के प्रश्न पर विचार किया जाय, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बिना समेकित रणनीति के इस पर अंकुश लगा पाना मुश्किल है इसके तहत्:
1.  अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या के राजनीतिकरण से परहेज किया जाए. यह बातें सभी राजनीतिक दलों पर लागू होती हैं
2.  पहली प्राथमिकता बांग्लादेश से होने वाले अवैध घुसपैठ पर अंकुश लगाने को दी जाए इसके लिए भारत-बांग्लादेश भूमि-सीमा समझौता, सीमा पर तारबंदी और फ्लड लाइटिंग के जरिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं आज आवश्यकता इस बात की है कि:
a.   सीमा पर निगरानी-तंत्र को मजबूत और प्रभावी बनाया जाए
b.  इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार की ज़रुरत है कि आखिर क्यों सीमा सुरक्षा बल की अवैध घुसपैठ के मामलों में संलिप्तता की बात सामने आती है और उनकी वास्तविक शिकायतों का समाधान करते हुए कैसे इसे दूर किया जा सकता है? इसके लिए सीमा सुरक्षा बल स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल की भी आवश्यकता है
c.  इस सन्दर्भ में हजारिका समिति के द्वारा स्थानीय ग्रामीणों को पहचान-पत्र देने  और मानव-रहित क्षेत्र के सृज़न की सलाह उपयोगी हो सकती है
d.  बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा देने की प्रक्रिया कठोर बनायी जाय साथ ही, उस वीजा पर जो लोग भी भारत आ रहे हैं, उनके लिए उपयुक्त एवं प्रभावी निगरानी तंत्र को विकसित किया जाए, ताकि उनकी समयबद्ध वापसी को सुनिश्चित किया जा सके और उन्हें अवैध रूप से भारत में रुकने से रोका जा सके
3.  भारत सरकार बांग्लादेश सरकार को इस बात के लिए तैयार करे कि वह भारत से लगे बंगलादेशी सीमावर्ती इलाकों में समयबद्ध तरीके से सामाजिक-आर्थिक विकास योजनायें और कार्यक्रम की शुरुआत करे इसके लिए भारत-बांग्लादेश सरकार को वित्तीय सहायता भी उपलब्ध करवाए अगर ऐसा किया जाता है, तो बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में ही आर्थिक अवसर उपलब्ध करवाए जा सकते हैं और भारत की ओर अवैध माइग्रेशन के आकर्षण को कम किया जा सकता है
4.  भारत सरकार चीन की तर्ज पर सीमावर्ती इलाके के बंगलादेशी नागरिकों को वर्क परमिट भी उपलब्ध करवाने पर विचार करे ऐसी स्थिति में अवैध घुसपैठ पर अंकुश लगाना भी संभव है और उनकी बेहतर निगरानी भी संभव है
5.  अब प्रश्न उठता है कि भारत में गैर-कानूनी रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने की रणनीति क्या हो और यह कहाँ तक व्यावहारिक है? इस संदर्भ में समस्या यह है कि:
a.   भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से ये मुख्यधारा में इतने घुल-मिल चुके हैं कि इनकी पहचान ही मुश्किल है
b.   अगर इन्हें पहचाना भी जाता है, तो इन्हें वापस भेजने का काम और भी मुश्किल है बांग्लादेश की सरकार यह स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है कि उसके यहाँ से घुसपैठ हो रही है
c.    घुसपैठियों की जबरन वापसी स्थानीय स्तर पर असंतोष को भी जन्म दे सकती है क्योंकि स्थानीय नागरिकों के साथ उनके रोटी-बेटी के संबंध स्थापित हो चुके हैं ऐसी स्थिति में जबरन वापसी की कोशिश का स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध भी संभव है
d.  इससे जुड़ा हुआ एक मानवीय पहलू भी है जिन पर विस्तार से चर्चा पहले ही की जा चुकी है
इसलिए व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो भारत आ चुके, भारत के विभिन्न हिस्सों में फैल चुके और भारत के विभिन्न भागों में बस चुके बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का प्रश्न बहुत व्यावहारिक नहीं लगता है अबतक के अनुभवों से भी यही लगता है कि यह कोशिश बहुत सफल हो पायेगी, इसमें संदेह है इसलिए हमें अन्य विकल्पों की पड़ताल करनी होगी करनी होगी
2.  ऐसी स्थिति में हमें भारत के विभिन्न हिस्सों में बस चुके बांग्लादेशी घुसपैठियों के विनियमन का कोई-न-कोई मैकेनिज्म विकसित करना होगा, ताकि उन्हें क़ानून एवं व्यवस्था के लिए खतरा बनाने से रोका जा सके   साथ ही, हमें इस बात को भी सुनिश्चित करना होगा कि भारत-विरोधी शक्तियाँ सॉफ्ट टारगेट के रूप में इनका इस्तेमाल न कर सकें इन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बनने से रोकना वर्तमान में भारत के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है इस चुनौती से निबटना भारत के लिए तभी संभव होगा, जब इन्हें पहचानते हुए अलग से पहचान-पत्र जारी किये जाएँ और इनकी सतत निगरानी सुनिश्चित की जाय  

Sunday, 22 July 2018

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित विवाद


नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित विवाद

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से आशय:
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) असम में रहने वाले ‘वैध’ भारतीय नागरिकों का एक रिकॉर्ड है, जिसका इस्तेमाल असम के नागरिकों की पहचान और उन्हें बाहरी लोगों से अलगाने के लिए किया जा रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में  नागरिकता अधिनियम,1955 और अन्य नियमों के प्रावधानों के अनुसार 1951 के बाद पहली बार अपडेट किया जा रहा है। इस रजिस्टर से यह अपेक्षा की गयी कि इस रजिस्टर के अपडेशन से 1971 की निर्धारित तिथि के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान संभव हो सकेगी। इसे किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति की पड़ताल के लिए संदर्भ-बिन्दु के रूप में इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
असमिया मूल के लोग हों, या फिर बांग्लाभाषी हिन्दू एवं मुसलमान, दोनों ही ‘नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर(NRC)’ के अपडेशन के निर्णय का स्वागत कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह लम्बे समय से चले आ रहे भाषा-विवाद को विराम देगा और उनकी नागरिकता को लेकर व्यक्त शंकाओं का भी समाधान होगा, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। जिस तरीके से NRC के द्वारा अपने काम को अंजाम दिया जा रहा है और इस क्रम में जो लापरवाही बरती जा रही है, वह चिंतित करती है। साथ ही, इस प्रक्रिया के राजनीतिकरण ने इसे विवादास्पद बना दिया है और आज यह बांग्लाभाषी अल्पसंख्यक मुसलमानों के उत्पीड़न के साधन में तब्दील होता दिखाई पद रहा है   
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) का अपडेशन:
असम भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ एनआरसी, जिसे पहली बार सन् 1951 में प्रकाशित किया गया था, की व्यवस्था है। उस वक्त असम में 80 लाख नागरिक थे। बाद में सन् 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन(AASU) ने असम में अवैध प्रवासियों की पहचान को लेकर आन्दोलन शुरू किया जिसकी परिणति 1985 के असम समझौते के रूप में हुई सन् 2005 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की सहमति से काँग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन राज्य सरकार ने एनआरसी को अपडेट करने की दिशा में पहल की आरम्भ में इस काम को बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन इस वक़्त यह सूची गहन छानबीन करके तैयार की जा रही है। इसके तहत् 24 मार्च,1971 से पहले बांग्लादेश से यहाँ आए लोगों को स्थानीय नागरिक माना जाएगा। इसी आलोक में हर ज़िले के डीसी ऑफिस को निर्देश दिए गए कि वह लोगों को वर्ष 1951 से लेकर 1971 तक की मतदाता-सूची मुहैया करवाए।
इस रजिस्टर के अपडेशन के संदर्भ में नीति, गाइडलाइन्स और फ़ंड केन्द्र के द्वारा उपलब्ध करवाया जा रहा है, जबकि अपडेशन की प्रक्रिया भारत के रजिस्ट्रार जनरल के निर्देशन में राज्य के द्वारा पूरी की जानी है। राज्य सरकार ने इसके लिए समय-बद्ध प्रक्रिया को अपनाया है। कुल 2500 से अधिक NRC सेवा केन्द्र स्थापित किए गए हैं, जिसका काम लोगों को नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेजों के साथ आमंत्रित करना और उनकी पहचान सुनिश्चित करना है। यहाँ पर कोई भी व्यक्ति 1952-1971 के दौरान अपने पूर्वजों के नाम मतदाता सूची में तलाश सकता है। अगर कोई व्यक्ति इस रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाना चाहता है, तो उसे निर्धारित चौदह दस्तावेज़ों में किसी एक दस्तावेज़ को प्रस्तुत करना होगा। कुल 1220 करोड़ रुपये के इस प्रॉजेक्ट में 50,000 कर्मचारी और स्वयं सेवी लगे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:
अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों और इनके कारण बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव के उत्पन्न होने से कानून एवं व्यवस्था के गहराते संकट और आतंरिक सुरक्षा के समक्ष मौजूद चुनौतियों की बढ़ती जटिलता के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न(NRC),1951 को अपडेट करने का निर्देश दिया, ताकि राज्य में अवैध तरीके से रहने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हुए समय-सीमा निर्धारित करने का निर्देश दिया। इस निर्देश के आलोक में सरकार ने NRC ड्राफ़्ट के प्रकाशन के लिए अक्टूबर,2015 और अंतिम रूप में NRC के प्रकाशन के लिए जनवरी,2016 की समय-सीमा निर्धारित की है, यद्यपि इसे निर्धारित समय-सीमा में नहीं पेश किया जा सका। इसी आलोक में दिसंबर,2013 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इस रजिस्टर के अपडेशन का काम शुरू हुआ। लेकिन, इसके ड्राफ्ट अंततः 2017-18 की मध्य रात्रि में ही जाकर जारी किये जा सके। इसका फाइनल ड्राफ्ट जुलाई,2018 के अंततक जारी किये जाने की उम्मीद है।  
अपडेशन के सन्दर्भ में वर्तमान स्थिति:
इसी आलोक में बांग्लादेश से सटे असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के मकसद से इसका पहला मसौदा दिसंबर,2017-जनवरी,2018 की मध्य रात्रि में प्रकाशित हुआ जून,2018 की निर्धारित समय-सीमा तक असम में 3.29 करोड़ लोगों के द्वारा अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) के समक्ष उपयुक्त दस्तावेज जमा किए गए, लेकिन नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) ने हाल ही में कानूनी वैध नागरिकों के रूप में केवल 1.9 करोड़ लोगों की एक सूची प्रकाशित की है, जिसका मतलब यह है कि असम के 1.39 करोड़ लोगों की वैध नागरिकता खतरे में हैं।
नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित आदेश:
इसी आलोक में मई,2017 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) के द्वारा जारी निर्देश के अनुसार जिनकी पहचान संदेहास्पद मतदाता के रूप में की गयी है, उनके लिए पुलिस अधीक्षक और फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल के समक्ष अपने भाइयों, बहनों एवं अन्य परिजनों से जुड़ी जानकारियाँ उपलब्ध करवानी होगी, अन्यथा इन जानकारियों के बिना उन्हें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) की सूची में शामिल नहीं किया जायेगा।
आगे चलकर मई,2018 में घोषित विदेशियों के परिजनों को भी संदिग्ध मतदाताओं की सूची में रखे जाने के निर्देश दिए गए। इस सन्दर्भ में नागरिक रजिस्टर के स्थानीय रजिस्ट्रार (LRCR) को यह निर्देश दिया गया कि वे अंतिम निर्णय हो जाने तक संदेहास्पद-मतदाताओं (Doubtful Voter) के समान ही उनकी भारतीय नागरिकता को भी लंबित स्थिति में बनाये रखें।
मई,2018 को पारित NRC राज्य समन्वयक के बेतुके आदेश के अनुसार, असम के विभिन्न जिलों के सभी डिप्टी कमिश्नरों को, हर तथाकथित “घोषित विदेशी” (Declared Foreigner) के भाई-बहनों और अन्य परिवार के सदस्यों का नाम भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से ‘पेंडिंग’ याने फ़िलहाल बाहर रखने को कहा गया है। इसलिए अब भले ही परिवार से एक व्यक्ति घोषित विदेशी (DF) है, परिवार के हर सदस्य का नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से फ़िलहाल बाहर रखा जाएगा। हालाँकि, इसके राज्य समन्वयक ने यह स्पष्ट किया कि घोषित विदेशियों के परिजनों के नाम तब तक ‘पेंडिंग’ नहीं रखे जाएँ जब तक बॉर्डर पुलिस की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि उनके बारे में फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल को सूचित किया गया है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के इस आदेश के कारण 2 लाख से अधिक भारतीयों के नाम नागरिकों के रजिस्टर से हटाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य ‘अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों’ की पहचान को सुनिश्चित करते हुए जिनका नाम इस रजिस्टर में नहीं है, उन्हें देश से बाहर निकालते हुए उनकी बांग्लादेश वापसी को सुनिश्चित करना है।
इस आदेश से सम्बद्ध समस्याएँ:
लेकिन, यह आदेश समस्याजनक है। अगर 25 मार्च,1971 के बाद वास्तव में अवैध रूप से भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने वाले व्यक्ति को ट्रिब्यूनल द्वारा “विदेशी” घोषित किया गया है और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के इस आदेश के तहत् उसके भाई-बहन को भी संदेहास्पद मतदाताओं की सूची में डाला जा सकता है, इस तथ्य के बावजूद कि वे निर्दिष्ट तारीख से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं। इसलिए मई,2018 का आदेश नागरिकता अधिनियम,1955 के प्रावधानों से टकराता है क्योंकि इस अधिनियम की धारा 3(1)(a) के अनुसार जनवरी,1950 के 26 वें दिन या उसके बाद और 1 जुलाई, 1987 से पहले भारत में पैदा हुआ हर व्यक्ति, जन्म से भारत का नागरिक होगा। साथ ही, इसकी धारा 6(a) के अनुसार, वे “विदेशी” नहीं हो सकते हैं।
एनआरसी से जुड़े समस्याजनक पहलू:
दरअसल एनआरसी सर्वेक्षण के जरिये ही असम में ग़ैरक़ानूनी तरीके से रह रहे बांग्लादेशी लोगों का सही आँकड़ा सामने आएगा, लेकिन, समस्या यह है कि राजनीतिक दबाव के कारण एनआरसी का सही तरीके से काम करना संभव नहीं हो पा रहा है। कोशिश यह है कि एनआरसी को विवाद के घेरे में लाया जाए, ताकि इसकी क्रियाप्रणाली पर सवालिया निशान लगे और राजनीतिक हितों को साधा जा सके। इसके अतिरिक्त इससे सम्बद्ध वैधानिक समस्याएँ भी हैं जिन्हें निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1.  नागरिकता साबित करने की जिम्मेवारी तत्संबंधित व्यक्ति पर: असम समेत पूरे भारत में फॉरनर्स एक्ट-1946 लागू है, फॉरनर्स एक्ट के सेक्शन 9 के अनुसार असम में अगर किसी भी नागरिक की नागरिकता पर शक़ है, तो उसे खुद साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है। यह राज्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।
2.  असम के सन्दर्भ में विशेष नागरिकता-प्रावधान: असम समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नागरिकता अधिनियम,1955 में संशोधन करते हुए धारा 6A जोड़ी गयी, जो सिर्फ असम के लिए है। इसके तहत पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से 24 मार्च, 1971 के बाद से गैर कानूनी तरीक़े से आए लोगों को वापस जाना होगा।
3.  फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन: असम में नागरिकता-संबंधी कोई भी विवाद उभरने की स्थिति में इसके समाधान के लिए ट्रिब्यूनल ऑर्डर,1964 के तहत् फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। इस वक़्त यहाँ 100 फॉरनर्स ट्रिब्यूनल हैं। इसके समक्ष चुनाव आयोग के द्वारा संदेहास्पद मतदाताओं से सम्बंधित मामले भेजे जाते हैं जिसके द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अभियान चलाया जा रहा है और इस क्रम में संदिग्ध मतदाताओं की पहचान की जा रही है।

मतदाता-सूची से नामों की डीलिस्टिंग:
स्पष्ट है कि एनआरसी इस समस्या का सम्बन्ध चुनाव आयोग के द्वारा मतदाता-सूची से मतदाताओं के नामों की डीलिस्टिंग के लिए चलाये जा रहे अभियान से भी जाकर जुड़ता है। 1997 में भारत के निर्वाचन आयोग ने संदिग्ध मतदाताओं की पहचान के लिए मतदाता-सूची की जाँच के लिए विशेष अभियान चलाया। इस अभियान के तहत् मतदाता-सूची में उन लोगों की पहचान की गयी, जिनके पास पर्याप्त नागरिकता दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें ‘संदिग्ध‘ मतदाता (D-Voter) के रूप में चिह्नित करते हुए उन्हें तबतक के लिए मतदान के अधिकार से वंचित किया गया, जबतक वे यह साबित न कर दें कि वे भारत के नागरिक हैं। स्पष्ट है कि चुनाव आयोग की सूची के अनुसार डी वोटर करार लोगों का मामला जब तक फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में हल नहीं होता है, तब तक उनका स्टेट्स होल्ड पर रखा जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसा साबित होने तक भारतीय नागरिक होने के नाते उसके तमाम अधिकार भी छीन लिए जाते हैं। इन संदिग्ध मतदाताओं से यह अपेक्षा की गयी कि वे मतदाता-सूची में से नाम कटने के बाद जिला पुलिस अधीक्षक (SP) के ऑफिस में निर्दिष्ट फॉर्म भरें और उसमें अपने बारे में विस्तृत विवरण दें।
चुनाव आयोग की एकतरफा एवं मनमानी कार्यवाही:
समस्या यहीं से शुरू हुई क्योंकि चुनाव आयोग की यह कार्यवाही एकतरफा और मनमानी रही, यद्यपि चुनाव आयोग ने आरंभिक जाँच का दावा किया। समस्या तब कहीं अधिक गंभीर रूप लेने लगी, जब चुनाव आयोग के इस निर्णय को लोगों को परोक्षतः राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से बाहर रखने का आधार बना लिया गया। इतना ही नहीं, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने मई,2017 के आदेश के आलोक में समुचित जाँच की आवश्यकता पर बल देते हुए उचित प्रक्रिया के पालन का निर्देश तो दिया है, पर वह संदिग्ध मतदाताओं की पहचान और इस सन्दर्भ में आरंभिक जाँच से सम्बंधित चुनाव आयोग के तर्क से सहमति प्रदर्शित की, इस तथ्य के बावजूद कि नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर(NRC) के द्वारा पूछताछ और समुचित जाँच की प्रक्रिया को अपनाये बिना संदिग्ध मतदाताओं और घोषित विदेशी(DF) के परिवार के सदस्यों को एकसमान समझा जा रहा है।
डीलिस्टिंग की प्रक्रिया का राजनीतिकरण:
समस्या सिर्फ चुनाव आयोग की एकतरफा एवं मनमानी कार्रवाई नहीं है, समस्या डीलिस्टिंग की इस प्रक्रिया के राजनीतिकरण की भी है। कहीं-न-कहीं इस समस्या का सम्बंध वोट-बैंक की राजनीति से जुड़ गया है। आरोप यह है कि अक्सर इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक दबाव में अंजाम दिया जाता है और इस क्रम में बांग्लाभाषी अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव होता है। इनका आरोप है कि पूरी राज्य-मशीनरी असमी अस्मिता के नाम पर बंगाला-भाषी हिन्दुओं और मुसलमानों के खिलाफ काम कर रही है। इसके लिए समुचित तरीके से जाँच करने के बजाय ‘बड़ी तादाद में मुस्लिम मतदाताओं को संदेहास्पद मतदाता के रूप में लक्षित करते हुए उनके नाम मतदाता-सूची से हटाने के लिए साज़िश रची जा रही है। जब मसला फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जाता है, तो ट्रिब्यूनल का कहना होता है कि यह पीड़ित की ज़िम्मेदारी है कि वह साबित करे कि वह दस्तावेज उसी का है। इस वक्त फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित हैं। ध्यातव्य है कि संदेहास्पद स्थिति फॉरेन ट्राइब्युनल के द्वारा प्रदान की जाती है। ऐसा देखा गया है कि कई बार लोगों के नाम सूची से कुछ मामूली विसंगतियों के कारण हटा दिए जाते हैं।
फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल का मनमाना तरीका:
1985 से अब तक विदेशियों के लिए गठित न्यायाधिकरण ने अवैध रूप से असम में प्रवेश करने वाले 38186 बंगलादेशी घुसपैठियों को विदेशी घोषित किया, पर इनमें से केवल 2448 बांग्लादेशियों को वापस बंगलादेश भेजा जा चुका है। शेष लोगों में कुछ मर चुके होंगे और अधिकांश लापता हैं। वर्तमान में इस न्यायाधिकरण के पास एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं और उम्मीद की जा रही है कि इनमें अच्छे-खासे लोगों को विदेशी घोषित किये जाने की संभावना है।
लेकिन, समस्या यह है कि फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल की क्रियाप्रणाली के सन्दर्भ में अबतक का अनुभव निराश करने वाला रहा है। इसमें निचले स्तर पर कर्मचारियों के द्वारा लापरवाही बरती गयी। फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल के द्वारा मनमाने तरीके से एकतरफा आदेश जारी किये गए हैं जिनमें से कई आदेश (लगभग 1/5) विभिन्न न्यायिक मंचों के द्वारा रद्द किये जा चुके हैं। सन् 1985 से अबतक लगभग एक लाख लोगों को विदेशी घोषित किया चुका है। इसलिए इसकी क्रियाप्रणाली के कारण कहीं-न-कहीं उन लोगों को भी परेशानी हो रही है जो बांग्लाभाषी भारतीय नागरिक तो हैं, पर विस्थापन के कारण या फिर अन्य कारणों से जिनके पास अपनी नागरिकता को पुष्ट करने के लिए वैध दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं।
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) निदेशालय का तर्क:
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) निदेशालय का तर्क है कि उसने इंटरनेट के ज़रिये जनता को वक़्त पर नोटिस भेजे हैं, लेकिन या तो ये नोटिस गरीब एवं निरक्षर जनता तक पहुँचे ही नहीं, या फिर समय पर नहीं पहुँचे, जिसके कारण वे समय पर अपेक्षित दस्तावेजों के साथ फॉरेन ट्रिब्यूनल्स तक नहीं पहुँच सके। इसी आधार पर एनआरसी ने अपनी आधी-अधूरी सूची तैयार की और फॉरनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दी। इसी आधी-अधूरी सूची के आलोक में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने उन लोगों के विरुद्ध एक्स पार्टी जजमेंट देते हुए उन्हें विदेशी करार दिया, जो न तो ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित हुए और जिन्होंने न ही नोटिस का जवाब दिया। इसका पता भी उन्हें तब चला, जब उन्हें या तो गिरफ्तार किया गया, या फिर वोट नहीं देने दिया गया।
निदेशालय के तर्क संतोषजनक नहीं:
सवाल यह उठता है कि इंटरनेट की सीमित पहुँच और अपेक्षाकृत निम्न साक्षरता के बावजूद डिजिटल माध्यम से नोटिस भेजा जाना कहाँ तक उचित है। इतना ही नहीं, यहाँ तक कि सरकारी नौकरी में रहे लोगों और पेंशनधारकों को सरकार द्वारा दिए गए वरिष्ठ नागरिक प्रमाण-पत्र और नागरिकता प्रमाण-पत्र तक को प्रमाणिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं स्वीकार जा रहा है और प्रभावितों को अदालत भी उपचार देने के लिए तैयार नहीं है।
व्यावहारिक समस्या: जागरूकता एवं जानकारी का अभाव:
इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि अशिक्षा एवं जागरूकता के अभाव के कारण उन्हें यह ही पता नहीं है कि यदि उनकी नागरिकता को लेकर कोई विवाद उठता है, तो वे इस विवाद के निराकरण के लिए कहाँ जाएँ और किन दस्तावेजों के सहारे इस विवाद का निराकरण संभव है? साथ ही, यदि इसमें गड़बड़ी है, तो यह गड़बड़ी कहाँ से ठीक होगी और इसके लिए क्या करना होगा? दैनिक मजदूरी पर आश्रित ये लोग इतने गरीब हैं कि स्थानीय पुलिस थाने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट तक जाने और वकीलों के खर्च उठाने में ये सक्षम नहीं हैं, फिर भी घर, परिवार और रोज़गार छोड़कर ये बांग्लाभाषी लोग इसी में लगे हैं कि इनका नाम एनआरसी में छूट न जाए।
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) को लेकर विभिन्न संगठनों का रुख:
इस रजिस्टर के निर्माण का जहाँ ऑल असम माइनरिटी स्टूडेंट यूनियन(AAMSU) के द्वारा विरोध किया जा रहा है, जबकि ऑल असम माइनरिटी स्टूडेंट यूनियन (AASU) का मानना है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी की जानी चाहिए। साथ ही, आसू की दृष्टि में NRC अपडेशन बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान का सबसे बेहतर तरीक़ा नहीं है। उपमन्यु हज़ारिका का मानना है कि NRC अपडेशन हज़ारों बंगलादेशी घुसपैठियों को वैधानिकता प्रदान करने का काम करेगा। उधर, काँग्रेस और ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट बंगलादेश से अवैध आव्रजन की समस्या उतनी गंभीर नहीं है जितनी भाजपा और आसू के द्वारा दावा किया जा रहा है।
केंद्र सरकार के द्वारा अनियमितता के दावों का खंडन:
असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) के प्रकाशन से पहले गृह मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि “30 जुलाई को प्रकाशित होने जा रहा एनआरसी सिर्फ एक मसौदा है और मसौदे के प्रकाशन के बाद दावों और आपत्तियों के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाया जाएगा और सभी दावों और आपत्तियों का उचित रूप से परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद ही अंतिम एनआरसी प्रकाशित किया जाएगा।” केंद्रीय गृह मंत्री कहा कि एनआरसी, जिसमें असम के नागरिकों की सूची है, को 15 अगस्त, 1985 को हस्ताक्षरित असम समझौते के अनुरूप प्रकाशित किया जा रहा है। उन्होंने इसमें अनियमितता की बात को ख़ारिज करते हुए कहा कि एनआरसी के प्रकाशन की पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी तरीके से कानून के मुताबिक चल रही है और इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरा पालन किया जा रहा है।” गृह-मंत्री का यह भी कहना है कि “नागरिकता नियम के अनुसार दावों और आपत्तियों के नतीजे से असंतुष्ट लोग विदेशी न्यायाधिकरण में अपील कर सकते हैं। इसलिए एनआरसी के प्रकाशन के बाद किसी को हिरासत केंद्र में रखने का सवाल ही नहीं है।”
निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि ऐसे नागरिकों, जिनकी नागरिकता खतरे में है, में बड़ी संख्या केवल उन मुसलमानों की ही नहीं है, जिन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे या तो रोहिंग्या हैं, या फिर बांग्लादेशी; वरन् इसकी ज़द में वे बांग्लाभाषी भारतीय नागरिक भी हैं, जिनके पास विस्थापन के कारण या फिर अन्य कारणों से अपनी नागरिकता को पुष्ट करने के लिए वैध दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। यह समस्या इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि सत्ता-प्रतिष्ठानों के द्वारा इस अपडेशन का इस्तेमाल केवल बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए ही नहीं हो रहा है, वरन् हर ऐसे मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ इसके इस्तेमाल की आशंका है जिनके पास उचित कागजात नहीं हैं। इसीलिए अतिरिक्त सावधानी बरते जाने की ज़रुरत है, अन्यथा आनेवाले समय में यह कहीं अधिक बड़ी समस्या को जन्म देगा।