Sunday, 22 July 2018

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित विवाद


नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित विवाद

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से आशय:
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) असम में रहने वाले ‘वैध’ भारतीय नागरिकों का एक रिकॉर्ड है, जिसका इस्तेमाल असम के नागरिकों की पहचान और उन्हें बाहरी लोगों से अलगाने के लिए किया जा रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में  नागरिकता अधिनियम,1955 और अन्य नियमों के प्रावधानों के अनुसार 1951 के बाद पहली बार अपडेट किया जा रहा है। इस रजिस्टर से यह अपेक्षा की गयी कि इस रजिस्टर के अपडेशन से 1971 की निर्धारित तिथि के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान संभव हो सकेगी। इसे किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति की पड़ताल के लिए संदर्भ-बिन्दु के रूप में इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
असमिया मूल के लोग हों, या फिर बांग्लाभाषी हिन्दू एवं मुसलमान, दोनों ही ‘नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर(NRC)’ के अपडेशन के निर्णय का स्वागत कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह लम्बे समय से चले आ रहे भाषा-विवाद को विराम देगा और उनकी नागरिकता को लेकर व्यक्त शंकाओं का भी समाधान होगा, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। जिस तरीके से NRC के द्वारा अपने काम को अंजाम दिया जा रहा है और इस क्रम में जो लापरवाही बरती जा रही है, वह चिंतित करती है। साथ ही, इस प्रक्रिया के राजनीतिकरण ने इसे विवादास्पद बना दिया है और आज यह बांग्लाभाषी अल्पसंख्यक मुसलमानों के उत्पीड़न के साधन में तब्दील होता दिखाई पद रहा है   
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) का अपडेशन:
असम भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ एनआरसी, जिसे पहली बार सन् 1951 में प्रकाशित किया गया था, की व्यवस्था है। उस वक्त असम में 80 लाख नागरिक थे। बाद में सन् 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन(AASU) ने असम में अवैध प्रवासियों की पहचान को लेकर आन्दोलन शुरू किया जिसकी परिणति 1985 के असम समझौते के रूप में हुई सन् 2005 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की सहमति से काँग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन राज्य सरकार ने एनआरसी को अपडेट करने की दिशा में पहल की आरम्भ में इस काम को बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन इस वक़्त यह सूची गहन छानबीन करके तैयार की जा रही है। इसके तहत् 24 मार्च,1971 से पहले बांग्लादेश से यहाँ आए लोगों को स्थानीय नागरिक माना जाएगा। इसी आलोक में हर ज़िले के डीसी ऑफिस को निर्देश दिए गए कि वह लोगों को वर्ष 1951 से लेकर 1971 तक की मतदाता-सूची मुहैया करवाए।
इस रजिस्टर के अपडेशन के संदर्भ में नीति, गाइडलाइन्स और फ़ंड केन्द्र के द्वारा उपलब्ध करवाया जा रहा है, जबकि अपडेशन की प्रक्रिया भारत के रजिस्ट्रार जनरल के निर्देशन में राज्य के द्वारा पूरी की जानी है। राज्य सरकार ने इसके लिए समय-बद्ध प्रक्रिया को अपनाया है। कुल 2500 से अधिक NRC सेवा केन्द्र स्थापित किए गए हैं, जिसका काम लोगों को नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेजों के साथ आमंत्रित करना और उनकी पहचान सुनिश्चित करना है। यहाँ पर कोई भी व्यक्ति 1952-1971 के दौरान अपने पूर्वजों के नाम मतदाता सूची में तलाश सकता है। अगर कोई व्यक्ति इस रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाना चाहता है, तो उसे निर्धारित चौदह दस्तावेज़ों में किसी एक दस्तावेज़ को प्रस्तुत करना होगा। कुल 1220 करोड़ रुपये के इस प्रॉजेक्ट में 50,000 कर्मचारी और स्वयं सेवी लगे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:
अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों और इनके कारण बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव के उत्पन्न होने से कानून एवं व्यवस्था के गहराते संकट और आतंरिक सुरक्षा के समक्ष मौजूद चुनौतियों की बढ़ती जटिलता के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न(NRC),1951 को अपडेट करने का निर्देश दिया, ताकि राज्य में अवैध तरीके से रहने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हुए समय-सीमा निर्धारित करने का निर्देश दिया। इस निर्देश के आलोक में सरकार ने NRC ड्राफ़्ट के प्रकाशन के लिए अक्टूबर,2015 और अंतिम रूप में NRC के प्रकाशन के लिए जनवरी,2016 की समय-सीमा निर्धारित की है, यद्यपि इसे निर्धारित समय-सीमा में नहीं पेश किया जा सका। इसी आलोक में दिसंबर,2013 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इस रजिस्टर के अपडेशन का काम शुरू हुआ। लेकिन, इसके ड्राफ्ट अंततः 2017-18 की मध्य रात्रि में ही जाकर जारी किये जा सके। इसका फाइनल ड्राफ्ट जुलाई,2018 के अंततक जारी किये जाने की उम्मीद है।  
अपडेशन के सन्दर्भ में वर्तमान स्थिति:
इसी आलोक में बांग्लादेश से सटे असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के मकसद से इसका पहला मसौदा दिसंबर,2017-जनवरी,2018 की मध्य रात्रि में प्रकाशित हुआ जून,2018 की निर्धारित समय-सीमा तक असम में 3.29 करोड़ लोगों के द्वारा अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) के समक्ष उपयुक्त दस्तावेज जमा किए गए, लेकिन नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) ने हाल ही में कानूनी वैध नागरिकों के रूप में केवल 1.9 करोड़ लोगों की एक सूची प्रकाशित की है, जिसका मतलब यह है कि असम के 1.39 करोड़ लोगों की वैध नागरिकता खतरे में हैं।
नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) से सम्बंधित आदेश:
इसी आलोक में मई,2017 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) के द्वारा जारी निर्देश के अनुसार जिनकी पहचान संदेहास्पद मतदाता के रूप में की गयी है, उनके लिए पुलिस अधीक्षक और फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल के समक्ष अपने भाइयों, बहनों एवं अन्य परिजनों से जुड़ी जानकारियाँ उपलब्ध करवानी होगी, अन्यथा इन जानकारियों के बिना उन्हें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) की सूची में शामिल नहीं किया जायेगा।
आगे चलकर मई,2018 में घोषित विदेशियों के परिजनों को भी संदिग्ध मतदाताओं की सूची में रखे जाने के निर्देश दिए गए। इस सन्दर्भ में नागरिक रजिस्टर के स्थानीय रजिस्ट्रार (LRCR) को यह निर्देश दिया गया कि वे अंतिम निर्णय हो जाने तक संदेहास्पद-मतदाताओं (Doubtful Voter) के समान ही उनकी भारतीय नागरिकता को भी लंबित स्थिति में बनाये रखें।
मई,2018 को पारित NRC राज्य समन्वयक के बेतुके आदेश के अनुसार, असम के विभिन्न जिलों के सभी डिप्टी कमिश्नरों को, हर तथाकथित “घोषित विदेशी” (Declared Foreigner) के भाई-बहनों और अन्य परिवार के सदस्यों का नाम भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से ‘पेंडिंग’ याने फ़िलहाल बाहर रखने को कहा गया है। इसलिए अब भले ही परिवार से एक व्यक्ति घोषित विदेशी (DF) है, परिवार के हर सदस्य का नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से फ़िलहाल बाहर रखा जाएगा। हालाँकि, इसके राज्य समन्वयक ने यह स्पष्ट किया कि घोषित विदेशियों के परिजनों के नाम तब तक ‘पेंडिंग’ नहीं रखे जाएँ जब तक बॉर्डर पुलिस की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि उनके बारे में फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल को सूचित किया गया है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के इस आदेश के कारण 2 लाख से अधिक भारतीयों के नाम नागरिकों के रजिस्टर से हटाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य ‘अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों’ की पहचान को सुनिश्चित करते हुए जिनका नाम इस रजिस्टर में नहीं है, उन्हें देश से बाहर निकालते हुए उनकी बांग्लादेश वापसी को सुनिश्चित करना है।
इस आदेश से सम्बद्ध समस्याएँ:
लेकिन, यह आदेश समस्याजनक है। अगर 25 मार्च,1971 के बाद वास्तव में अवैध रूप से भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने वाले व्यक्ति को ट्रिब्यूनल द्वारा “विदेशी” घोषित किया गया है और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के इस आदेश के तहत् उसके भाई-बहन को भी संदेहास्पद मतदाताओं की सूची में डाला जा सकता है, इस तथ्य के बावजूद कि वे निर्दिष्ट तारीख से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं। इसलिए मई,2018 का आदेश नागरिकता अधिनियम,1955 के प्रावधानों से टकराता है क्योंकि इस अधिनियम की धारा 3(1)(a) के अनुसार जनवरी,1950 के 26 वें दिन या उसके बाद और 1 जुलाई, 1987 से पहले भारत में पैदा हुआ हर व्यक्ति, जन्म से भारत का नागरिक होगा। साथ ही, इसकी धारा 6(a) के अनुसार, वे “विदेशी” नहीं हो सकते हैं।
एनआरसी से जुड़े समस्याजनक पहलू:
दरअसल एनआरसी सर्वेक्षण के जरिये ही असम में ग़ैरक़ानूनी तरीके से रह रहे बांग्लादेशी लोगों का सही आँकड़ा सामने आएगा, लेकिन, समस्या यह है कि राजनीतिक दबाव के कारण एनआरसी का सही तरीके से काम करना संभव नहीं हो पा रहा है। कोशिश यह है कि एनआरसी को विवाद के घेरे में लाया जाए, ताकि इसकी क्रियाप्रणाली पर सवालिया निशान लगे और राजनीतिक हितों को साधा जा सके। इसके अतिरिक्त इससे सम्बद्ध वैधानिक समस्याएँ भी हैं जिन्हें निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1.  नागरिकता साबित करने की जिम्मेवारी तत्संबंधित व्यक्ति पर: असम समेत पूरे भारत में फॉरनर्स एक्ट-1946 लागू है, फॉरनर्स एक्ट के सेक्शन 9 के अनुसार असम में अगर किसी भी नागरिक की नागरिकता पर शक़ है, तो उसे खुद साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है। यह राज्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।
2.  असम के सन्दर्भ में विशेष नागरिकता-प्रावधान: असम समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नागरिकता अधिनियम,1955 में संशोधन करते हुए धारा 6A जोड़ी गयी, जो सिर्फ असम के लिए है। इसके तहत पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से 24 मार्च, 1971 के बाद से गैर कानूनी तरीक़े से आए लोगों को वापस जाना होगा।
3.  फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन: असम में नागरिकता-संबंधी कोई भी विवाद उभरने की स्थिति में इसके समाधान के लिए ट्रिब्यूनल ऑर्डर,1964 के तहत् फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। इस वक़्त यहाँ 100 फॉरनर्स ट्रिब्यूनल हैं। इसके समक्ष चुनाव आयोग के द्वारा संदेहास्पद मतदाताओं से सम्बंधित मामले भेजे जाते हैं जिसके द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अभियान चलाया जा रहा है और इस क्रम में संदिग्ध मतदाताओं की पहचान की जा रही है।

मतदाता-सूची से नामों की डीलिस्टिंग:
स्पष्ट है कि एनआरसी इस समस्या का सम्बन्ध चुनाव आयोग के द्वारा मतदाता-सूची से मतदाताओं के नामों की डीलिस्टिंग के लिए चलाये जा रहे अभियान से भी जाकर जुड़ता है। 1997 में भारत के निर्वाचन आयोग ने संदिग्ध मतदाताओं की पहचान के लिए मतदाता-सूची की जाँच के लिए विशेष अभियान चलाया। इस अभियान के तहत् मतदाता-सूची में उन लोगों की पहचान की गयी, जिनके पास पर्याप्त नागरिकता दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें ‘संदिग्ध‘ मतदाता (D-Voter) के रूप में चिह्नित करते हुए उन्हें तबतक के लिए मतदान के अधिकार से वंचित किया गया, जबतक वे यह साबित न कर दें कि वे भारत के नागरिक हैं। स्पष्ट है कि चुनाव आयोग की सूची के अनुसार डी वोटर करार लोगों का मामला जब तक फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में हल नहीं होता है, तब तक उनका स्टेट्स होल्ड पर रखा जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसा साबित होने तक भारतीय नागरिक होने के नाते उसके तमाम अधिकार भी छीन लिए जाते हैं। इन संदिग्ध मतदाताओं से यह अपेक्षा की गयी कि वे मतदाता-सूची में से नाम कटने के बाद जिला पुलिस अधीक्षक (SP) के ऑफिस में निर्दिष्ट फॉर्म भरें और उसमें अपने बारे में विस्तृत विवरण दें।
चुनाव आयोग की एकतरफा एवं मनमानी कार्यवाही:
समस्या यहीं से शुरू हुई क्योंकि चुनाव आयोग की यह कार्यवाही एकतरफा और मनमानी रही, यद्यपि चुनाव आयोग ने आरंभिक जाँच का दावा किया। समस्या तब कहीं अधिक गंभीर रूप लेने लगी, जब चुनाव आयोग के इस निर्णय को लोगों को परोक्षतः राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) से बाहर रखने का आधार बना लिया गया। इतना ही नहीं, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने मई,2017 के आदेश के आलोक में समुचित जाँच की आवश्यकता पर बल देते हुए उचित प्रक्रिया के पालन का निर्देश तो दिया है, पर वह संदिग्ध मतदाताओं की पहचान और इस सन्दर्भ में आरंभिक जाँच से सम्बंधित चुनाव आयोग के तर्क से सहमति प्रदर्शित की, इस तथ्य के बावजूद कि नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर(NRC) के द्वारा पूछताछ और समुचित जाँच की प्रक्रिया को अपनाये बिना संदिग्ध मतदाताओं और घोषित विदेशी(DF) के परिवार के सदस्यों को एकसमान समझा जा रहा है।
डीलिस्टिंग की प्रक्रिया का राजनीतिकरण:
समस्या सिर्फ चुनाव आयोग की एकतरफा एवं मनमानी कार्रवाई नहीं है, समस्या डीलिस्टिंग की इस प्रक्रिया के राजनीतिकरण की भी है। कहीं-न-कहीं इस समस्या का सम्बंध वोट-बैंक की राजनीति से जुड़ गया है। आरोप यह है कि अक्सर इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक दबाव में अंजाम दिया जाता है और इस क्रम में बांग्लाभाषी अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव होता है। इनका आरोप है कि पूरी राज्य-मशीनरी असमी अस्मिता के नाम पर बंगाला-भाषी हिन्दुओं और मुसलमानों के खिलाफ काम कर रही है। इसके लिए समुचित तरीके से जाँच करने के बजाय ‘बड़ी तादाद में मुस्लिम मतदाताओं को संदेहास्पद मतदाता के रूप में लक्षित करते हुए उनके नाम मतदाता-सूची से हटाने के लिए साज़िश रची जा रही है। जब मसला फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जाता है, तो ट्रिब्यूनल का कहना होता है कि यह पीड़ित की ज़िम्मेदारी है कि वह साबित करे कि वह दस्तावेज उसी का है। इस वक्त फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित हैं। ध्यातव्य है कि संदेहास्पद स्थिति फॉरेन ट्राइब्युनल के द्वारा प्रदान की जाती है। ऐसा देखा गया है कि कई बार लोगों के नाम सूची से कुछ मामूली विसंगतियों के कारण हटा दिए जाते हैं।
फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल का मनमाना तरीका:
1985 से अब तक विदेशियों के लिए गठित न्यायाधिकरण ने अवैध रूप से असम में प्रवेश करने वाले 38186 बंगलादेशी घुसपैठियों को विदेशी घोषित किया, पर इनमें से केवल 2448 बांग्लादेशियों को वापस बंगलादेश भेजा जा चुका है। शेष लोगों में कुछ मर चुके होंगे और अधिकांश लापता हैं। वर्तमान में इस न्यायाधिकरण के पास एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं और उम्मीद की जा रही है कि इनमें अच्छे-खासे लोगों को विदेशी घोषित किये जाने की संभावना है।
लेकिन, समस्या यह है कि फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल की क्रियाप्रणाली के सन्दर्भ में अबतक का अनुभव निराश करने वाला रहा है। इसमें निचले स्तर पर कर्मचारियों के द्वारा लापरवाही बरती गयी। फ़ॉरेनर्स ट्राइब्युनल के द्वारा मनमाने तरीके से एकतरफा आदेश जारी किये गए हैं जिनमें से कई आदेश (लगभग 1/5) विभिन्न न्यायिक मंचों के द्वारा रद्द किये जा चुके हैं। सन् 1985 से अबतक लगभग एक लाख लोगों को विदेशी घोषित किया चुका है। इसलिए इसकी क्रियाप्रणाली के कारण कहीं-न-कहीं उन लोगों को भी परेशानी हो रही है जो बांग्लाभाषी भारतीय नागरिक तो हैं, पर विस्थापन के कारण या फिर अन्य कारणों से जिनके पास अपनी नागरिकता को पुष्ट करने के लिए वैध दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं।
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) निदेशालय का तर्क:
राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) निदेशालय का तर्क है कि उसने इंटरनेट के ज़रिये जनता को वक़्त पर नोटिस भेजे हैं, लेकिन या तो ये नोटिस गरीब एवं निरक्षर जनता तक पहुँचे ही नहीं, या फिर समय पर नहीं पहुँचे, जिसके कारण वे समय पर अपेक्षित दस्तावेजों के साथ फॉरेन ट्रिब्यूनल्स तक नहीं पहुँच सके। इसी आधार पर एनआरसी ने अपनी आधी-अधूरी सूची तैयार की और फॉरनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दी। इसी आधी-अधूरी सूची के आलोक में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने उन लोगों के विरुद्ध एक्स पार्टी जजमेंट देते हुए उन्हें विदेशी करार दिया, जो न तो ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित हुए और जिन्होंने न ही नोटिस का जवाब दिया। इसका पता भी उन्हें तब चला, जब उन्हें या तो गिरफ्तार किया गया, या फिर वोट नहीं देने दिया गया।
निदेशालय के तर्क संतोषजनक नहीं:
सवाल यह उठता है कि इंटरनेट की सीमित पहुँच और अपेक्षाकृत निम्न साक्षरता के बावजूद डिजिटल माध्यम से नोटिस भेजा जाना कहाँ तक उचित है। इतना ही नहीं, यहाँ तक कि सरकारी नौकरी में रहे लोगों और पेंशनधारकों को सरकार द्वारा दिए गए वरिष्ठ नागरिक प्रमाण-पत्र और नागरिकता प्रमाण-पत्र तक को प्रमाणिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं स्वीकार जा रहा है और प्रभावितों को अदालत भी उपचार देने के लिए तैयार नहीं है।
व्यावहारिक समस्या: जागरूकता एवं जानकारी का अभाव:
इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि अशिक्षा एवं जागरूकता के अभाव के कारण उन्हें यह ही पता नहीं है कि यदि उनकी नागरिकता को लेकर कोई विवाद उठता है, तो वे इस विवाद के निराकरण के लिए कहाँ जाएँ और किन दस्तावेजों के सहारे इस विवाद का निराकरण संभव है? साथ ही, यदि इसमें गड़बड़ी है, तो यह गड़बड़ी कहाँ से ठीक होगी और इसके लिए क्या करना होगा? दैनिक मजदूरी पर आश्रित ये लोग इतने गरीब हैं कि स्थानीय पुलिस थाने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट तक जाने और वकीलों के खर्च उठाने में ये सक्षम नहीं हैं, फिर भी घर, परिवार और रोज़गार छोड़कर ये बांग्लाभाषी लोग इसी में लगे हैं कि इनका नाम एनआरसी में छूट न जाए।
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) को लेकर विभिन्न संगठनों का रुख:
इस रजिस्टर के निर्माण का जहाँ ऑल असम माइनरिटी स्टूडेंट यूनियन(AAMSU) के द्वारा विरोध किया जा रहा है, जबकि ऑल असम माइनरिटी स्टूडेंट यूनियन (AASU) का मानना है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी की जानी चाहिए। साथ ही, आसू की दृष्टि में NRC अपडेशन बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान का सबसे बेहतर तरीक़ा नहीं है। उपमन्यु हज़ारिका का मानना है कि NRC अपडेशन हज़ारों बंगलादेशी घुसपैठियों को वैधानिकता प्रदान करने का काम करेगा। उधर, काँग्रेस और ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट बंगलादेश से अवैध आव्रजन की समस्या उतनी गंभीर नहीं है जितनी भाजपा और आसू के द्वारा दावा किया जा रहा है।
केंद्र सरकार के द्वारा अनियमितता के दावों का खंडन:
असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) के प्रकाशन से पहले गृह मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि “30 जुलाई को प्रकाशित होने जा रहा एनआरसी सिर्फ एक मसौदा है और मसौदे के प्रकाशन के बाद दावों और आपत्तियों के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाया जाएगा और सभी दावों और आपत्तियों का उचित रूप से परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद ही अंतिम एनआरसी प्रकाशित किया जाएगा।” केंद्रीय गृह मंत्री कहा कि एनआरसी, जिसमें असम के नागरिकों की सूची है, को 15 अगस्त, 1985 को हस्ताक्षरित असम समझौते के अनुरूप प्रकाशित किया जा रहा है। उन्होंने इसमें अनियमितता की बात को ख़ारिज करते हुए कहा कि एनआरसी के प्रकाशन की पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी तरीके से कानून के मुताबिक चल रही है और इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरा पालन किया जा रहा है।” गृह-मंत्री का यह भी कहना है कि “नागरिकता नियम के अनुसार दावों और आपत्तियों के नतीजे से असंतुष्ट लोग विदेशी न्यायाधिकरण में अपील कर सकते हैं। इसलिए एनआरसी के प्रकाशन के बाद किसी को हिरासत केंद्र में रखने का सवाल ही नहीं है।”
निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि ऐसे नागरिकों, जिनकी नागरिकता खतरे में है, में बड़ी संख्या केवल उन मुसलमानों की ही नहीं है, जिन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे या तो रोहिंग्या हैं, या फिर बांग्लादेशी; वरन् इसकी ज़द में वे बांग्लाभाषी भारतीय नागरिक भी हैं, जिनके पास विस्थापन के कारण या फिर अन्य कारणों से अपनी नागरिकता को पुष्ट करने के लिए वैध दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। यह समस्या इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि सत्ता-प्रतिष्ठानों के द्वारा इस अपडेशन का इस्तेमाल केवल बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए ही नहीं हो रहा है, वरन् हर ऐसे मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ इसके इस्तेमाल की आशंका है जिनके पास उचित कागजात नहीं हैं। इसीलिए अतिरिक्त सावधानी बरते जाने की ज़रुरत है, अन्यथा आनेवाले समय में यह कहीं अधिक बड़ी समस्या को जन्म देगा। 

Sunday, 3 June 2018

न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति से सम्बंधित विवाद: हाल का सन्दर्भ


सड़कों पर खुशहालदेश के बदहाल किसान
बिहार के विशेष सन्दर्भ में न्यूनतम समार्थन मूल्य विवाद !
हर साल की तरह इस साल भी जब मई,2018 में बिहार जाना हुआ, तो वहाँ के किसानों की की स्थिति को देखने, समझने और महसूसने का मौक़ा मिला। इसी दौरान खेती और किसानी से जुड़े होने के अभिशाप को भी झेलने का मौका मिला। मार्च,2013 में पिताजी के नहीं रहने के बाद अपने बँटाईदरों को राहत देते हुए मैंने यह निर्णय लिया कि अब मालगुजारी की वसूली नकद रूप में ही करूँगा और इसके निर्धारण के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को आधार बनाऊँगा। यह व्यवस्था सन् 2016 तक ठीक-ठाक चली, पर पिछले साल से इसमें समस्या आने लगी क्योंकि पिछले दो वर्षों से गेहूँ की बाज़ार-कीमत उसके न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चली गयी। सन् 2017 में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य 1625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ही मालगुजारी वसूली; पर इस बार जहाँ न्यूनतम समर्थन मूल्य 1725 रुपये प्रति क्विंटल था, वहीं बाज़ार-कीमत (1400-1450) रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर। अपने बँटाईदारों की परेशानियों को समझते हुए मैंने मालगुजारी के निर्धारण की पुरानी नीति में संशोधन करते हुए पिछले वर्ष की तरह ही              1625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ही मालगुजारी वसूली। फिर भी, मुझे यह लगता रहा कि मुझे उन्हें और छूटें देनी चाहिए थी। उसी समय मैंने यह निर्णय लिया कि फुर्सत मिलते ही बँटाईदारों की इन परेशानियों को अपने उन फेसबुक मित्रों के साथ साझा करूँगा, पर व्यस्तता के कारण कल के पहले तक ऐसा संभव नहीं हो सका। संयोगवश कल फेसबुक ने तीन साल पहले की एक पोस्ट की याद दिलाई जिसका विषय इससे मिलता-जुलता था। मैनें अपने वर्तमान अनुभव के साथ इस पोस्ट को शेयर करने का निर्णय ऐसे समय में लिया जब किसानों के द्वारा दस दिनों के गाँव-बंद का अभियान चलाया जा रहा था। इस पृष्ठभूमि में मेरे इस पोस्ट और इसमें किसानों की इस स्थिति के लिए वर्तमान राज्य सरकार और केंद्र सरकार की जिम्मेवारी के निर्धारण ने राजनीतिक रूप ले लिया, जिससे बचा जा सकता था, पर ऐसा नहीं हो सका। शायद इसलिए कि मैं अराजनीतिक नहीं हूँ, और होना भी नहीं चाहता। इस बात को स्वीकार करने में मुझे हिचक नहीं है। और, शायद हम इस दौर में जी रहे हैं जिसमें हममें से कोई अराजनीतिक नहीं हो सकता, दावा चाहे जितना किया जाय। खैर, मैं वापस लौटना चाहूँगा मूल मसले पर।
किसानों की मूल समस्या:
अब अगर किसानों की मूल समस्या पर विचार किया जाय, तो यह कहा जा सकता है कि पिछले साढ़े तीन दशकों के दौरान खाद्यान्न फसलों की उत्पादन-लागत में जितनी तेजी से वृद्धि हुई, उतनी तेजी से उनकी विपणन-कीमतों में नहीं, जिसके परिणामस्वरूप किसानों का प्रॉफिट-मार्जिन कम होता चला गया। फिर भी, 21वीं सदी का पहला दशक कई मायनों में किसानों के लिए महत्वपूर्ण रहा:  
1.  इस दौरान वैश्विक स्तर पर फ़ूड-इन्फ्लेशन की स्थिति बनी रही और खाद्यान्न उत्पादों की कीमतों में इस उछाल का लाभ कुछ हद तक भारतीय किसानों को भी मिला, यद्यपि इसका बड़ा हिस्सा बिचौलियों के खाते गया
2.  जब सन् 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी, तो कुछ तो वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न उत्पादों की कीमतों में उछाल के कारण और कुछ आर्थिक उदारीकरण-वैश्वीकरण की अबतक की नीतियों की सीमाओं के अहसास के कारण किसानों की ओर थोड़ा-सा अतिरिक्त रुझान प्रदर्शित किया। इसके परिणामस्वरूप (2004-2014) के दौरान गेहूँ और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 630 रुपये प्रति क्विंटल और 550 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़कर क्रमशः 1400 रुपये प्रति क्विंटल और 1360 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। मतलब यह कि इस दौरान गेहूँ और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में करीब-करीब (130-140)% की वृद्धि हुई। पर, किसानों को इससे कुछ बेहतर कीमतें मिलीं क्योंकि बाज़ार कीमतें इससे ज्यादा थीं।
3.  इसके अतिरिक्त जन राज्यों में धनी एवं समृद्ध किसानों की मज़बूत लोब्बेय है, वहाँ उसके दबाव में राज्य सरकारों के द्वारा बोनस भी दिए जाते रहे हैं।
लेकिन, ये यूपीए शासन के अंतिम वर्षों तक आते-आते कुछ तो खान-पान की आदतों में परिवर्तन और कुछ बेहतर उत्पादन के कारण माँग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ा। इसके परिणामस्वरूप खाद्यान्न उत्पादों की कीमतों में तीव्र गिरावट का रुझान दिखाई पड़ा और एनडीए शासन में 2015-16 तक आते-आते न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी इसका असर दिखने लगा। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि सन् 2014 में बाज़ार में गेहूँ की खरीद 1500 रूपए प्रति क्विंटल की दर पर की जा रही थी, सन् 2015 में यह गिरकर तेरह-साढ़े तेरह सौ रूपए प्रति क्विंटल रह गयी। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि बाज़ार-कीमतों के सन्दर्भ में न्यूनतम समर्थन मूल्य का मनोवैज्ञानिक दबाव प्रतिसंतुलित होता चला गया। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एनडीए शासन के पिछले चार वर्षों के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य में लगभग 23% की वृद्धि हुई है। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों के दौरान, विशेषकर भारतीय खाद्य निगम की पुनर्संरचना पर गठित शांता कुमार पैनल की रिपोर्ट आने के बाद बोनस-विरोधी माहौल बना है। इस संदर्भ में केन्द्र सरकार के निर्देश और उसकी ख़रीद-नीति बोनस की संभावनाओं को निरस्त करती है। इतना ही नहीं, इस दौरान कृषि-क्षेत्र पर जलवायु-परिवर्तन का असर भी गहराता चला गया, जिसने कृषि की अनिश्चितता और इससे सम्बद्ध जोखिम को बढ़ाने का काम किया। उधर मनरेगा के कारण श्रम-लागत बढ़ता चला गया और इसके परिणामस्वरूप कृषि-लागत भी।         
कृषि-क्षेत्र का विरोधाभास: उत्पादक-हित बनाम् उपभोक्ता-हित
इसे किसी भी अर्थव्यवस्था का विरोधाभास ही कहेंगे कि जहाँ विनिर्माण-क्षेत्र के उत्पादकों को अपने उत्पादन की कीमत निर्धारित करने की छूट है, वहीं किसानों को नहीं। इसका कारण कुछ तो किसानों का बिखराव है और कुछ राजनीतिक, क्योंकि कोई भी सरकार मज़बूत वोटबैंक होने के कारण मध्य वर्ग के हितों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील होती है। उसकी यही संवेदनशीलता उसे खाद्यान्न उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने हेतु पहल के लिए उत्प्रेरित करती है। इसका महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि मध्य वर्ग राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक जागरूक और सक्रिय होता है। ऐसी स्थिति में उसकी नाराज़गी किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक दृष्टि से परेशानियाँ खड़ी कर सकती है। यही कारण है कि कोई भी सरकार कृषि-उत्पादों के सन्दर्भ में उत्पादक के बजाय उपभोक्ता हितों के संरक्षण को प्राथमिकता देती है। ये बातें वर्तमान एनडीए सरकार पर भी लागू होती है। स्पष्ट है कि किसानों की बढ़ती लागत और घटती क़ीमतों के विरोधाभास से मध्य वर्ग भी बेखबर है और सरकार भी। सरकार की मुख्य चिंता वोट की है और यह मध्य वर्ग प्रमुख वोट बैंक है। वोट बैंक तो किसानों का भी है, पर अशिक्षित होने के कारण उन्हें जाति और धर्म के नाम पर आसानी से बहलाया-फुसलाया जा सकता है।
शहर-केन्द्रित विकास-रणनीति की ज़रुरत:
अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो 2008-09 के आस-पास विश्व बैंक के उपाध्यक्ष का चेन्नई आगमन हुआ था जिस दौरान उन्होंने इस बात को लेकर नाराज़गी जताई थी कि भारत सरकार अबतक विश्व बैंक के साथ की गयी उस प्रतिबद्धता को पूरा करने को लेकर गंभीर नहीं है जिसके तहत् अगले एक दशक के दौरान शहरी क्षेत्रो के लिए 400 मिलियन श्रमिक उपलब्ध करवाए जाने थे। उस समय विश्व बैंक के उपाध्यक्ष की उस फटकार के बाद तत्कालीन वित्त-मंत्री पी. चिदंबरम ने उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की कि भारत इस सन्दर्भ में अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करेगा। जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार अबनी और उसने योजना आयोग की जगह पर नीति आयोग का गठन करते हुए अरविन्द पनगारिया को इसका उपाध्यक्ष नियुक्त किया, तो उनका बिजनेस स्टैण्डर्ड में एक आर्टिकल छपा जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में शहरी श्रमिकों की बढ़ती माँगों के मद्देनज़र कृषि क्षेत्र पर दबाव कम करने और इसमें संलग्न जनसंख्या को शहरी क्षेत्र की ओर उन्मुख करने की सरकार की रणनीति का खुलासा किया था। और, ऐसा तबतक संभव नहीं होगा जबतक किसानों और खेतिहर मजदूरों की स्थिति बिगड़ती न चली जाए। सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की, इसी दिशा में बढ़ रही है। फर्क बस यह है कि यूपीए के समय इसकी गति थोड़ी धीमी थी, और एनडीए के समय यह गति तेज हो चुकी है।        
सरकार की जिम्मेवारी:
अब प्रश्न यह उठता है कि अगर किसानों तक MSP का लाभ नहीं पहुँच रहा है, तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं? इस सन्दर्भ में देखें, तो अबतक न्यूनतम समर्थन मूल्य से सम्बंधित मैकेनिज्म का समुचित विकास नहीं हो सका है। एक तो न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति की प्रभाविता गेहूँ एवं धान जैसे कुछ खाद्यान्न उत्पादों तक सीमित है, दूसरे इसका भी लाभ हरित क्रांति से प्रभावित और कृषि की दृष्टि से विकसित कुछ राज्यों तक सीमित है और वह भी वहाँ के धनी एवं समृद्ध किसानों तक सीमित। इसका कारण यह है कि भारत के अधिकांश हिस्सों में अबतक उस खरीद-तंत्र और इसके लिए उपयुक्त संरचना का विकास नहीं हो सका है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य को समर्थन प्रदान करते हुए प्रभावी बना सके और इसे ज़मीनी धरातल पर उतारते हुए छोटे एवं सीमान्त किसानों तक इसके लाभों को सुनिश्चित कर सके। दुर्भाग्य यह कि तमाम दावों के बावजूद वर्तमान सरकार के कार्यकाल में स्थिति जस-की-तस बनी हुई है। सन्दर्भ चाहे कृषि-विपणन की दिशा में की गयी पहलों का हो, या फिर पूर्वी भारत के राज्यों में कृषि-विपणन ढाँचे और कृषि-अवसंरचना के विकास का। जबतक इस दिशा में प्रभावी पहल नहीं की जाती और उस पहल के प्रभाव को ज़मीनी धरातल पर नहीं उतारा जाता, तबतक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य दिवास्वप्न बना रहेगा। इस सन्दर्भ में न केवल पिछली सरकारों, वरन् वर्तमान सरकारों की भी जिम्मेवारी बनती है।
केंद्र सरकार बनाम् राज्य सरकार:
कृषि राज्य-सूची का विषय है। यही कारण है कि इस सन्दर्भ में प्राथमिक जिम्मेवारी राज्य सरकारों की बनती है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। अगर बिहार के विशेष सन्दर्भ में बात करें (क्योंकि इस पोस्ट को बिहार के बेगुसराय जिले के विशेष सन्दर्भ में लिखा गया था), तो वहाँ 2005 से अबतक प्रत्यक्षतः या परोक्षतः नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार रही है जिसमें अधिकांश समय तक भाजपा प्रमुख भागीदार रही है। विशेष रूप से जुलाई,2017 में महागठबंधन से अलग होने के बाद जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में दोबारा एनडीए गठबंधन की सरकार बनी, तो उस सरकार में नीतीश कुमार और जनता दल (यूनाइटेड) की वास्तविक स्थिति से हममें से हर कोई परिचित है। ऐसी स्थिति में, जब केंद्र एवं राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार है और केन्द्रीय कृषि मंत्री भी बिहार से हैं, अगर मई,2018 के मध्य तक MSP के आधार पर किसानों से गेहूँ की ख़रीद से सम्बंधित निर्णय नहीं लिया जा सका है, तो इसके लिए राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को जिम्मेवार नहीं माना जाय, तो किसे जिम्मेवार माना जाय? अगर केंद्र सरकार ने सन् 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का आश्वासन दे रखा है और इसके मद्देनज़र पूर्वी भारत के राज्यों में खरीद-तंत्र एवं खरीद-अवसंरचना विकसित करने की घोषणा कर रखी है, तो क्या उसकी जिम्मेवारी नहीं बनती है कि वह ज़मीनी धरातल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करे? क्या यह सच नहीं है कि किसानों की आय दिन-प्रतिदिन कम हो रही है?
हाँ, यह भी सच है कि यह स्थिति बिहार तक सीमित नहीं है बिहार, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश: इन सभी राज्यों में कमोबेश स्थिति एकसमान है, थोड़े बहुत अंतर के साथ। इसीलिए मुद्दा किसानों को हाशिए पर पहुँचाने का है, और इसके लिए हर सरकार ज़िम्मेवार है। इस परिदृश्य में निश्चित तौर पर हमेशा वह सरकार निशाने पर कहीं ज्यादा होगी जो सत्ता में है क्योंकि पहल करने की जिम्मेवारी उसकी है और वही फल करने की स्थिति में है।

इसीलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर खरीद न होने और इस कारन बिहार के किसानों की दुर्दशा के लिए जितना नीतीश सरकार जिम्मेवार है, उतना ही केंद्र सरकार भी, क्योंकि जब केंद्र सरकार अपने सहयोगी दलों के शासन वाले राज्यों में ही केन्द्रीय नीतियों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों का क्रियान्वयन न करवा पाने की स्थिति में है, तो उन राज्यों में उससे क्या अपेक्षा की जा सकती है जिनमें विरोधी दलों के शासन वाली सरकारें हैं। इसीलिए न तो केंद्र एवं राज्य में सत्तारूढ़ दल भाजपा इस ज़िम्मेदारी से बच सकती है और न ही नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार। अगर केन्द्र एवं राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होने के बावजूद समन्वय स्थापित नहीं हो पा रहा है, तो यह केन्द्र एवं राज्य, दोनों ही स्तरों पर विद्यमान सरकारों की विफलता है।
पार्ट 2
न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति से सम्बंधित विवाद


वृद्धि की पृष्ठभूमि:
केंद्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा ने सोलहवीं लोकसभा चुनाव के दौरान जारी पार्टी घोषणा-पत्र में न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) को आर्थिक लागत के डेढ़ गुने स्तर पर ले जाने का वादा किया था। लेकिन, अबतक सरकार इससे बच रही थी और इस सन्दर्भ में उसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कोर्ट को सूचित भी किया था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कृषि-उत्पादों की उत्पादन-लागत के दोगुने के स्तर पर रखना व्यावहारिक रूप में संभव नहीं है और इस सन्दर्भ में सरकार कोई पहल नहीं करने जा रही है। लेकिन, ज़मीनी धरातल पर विभिन्न आर्थिक मोर्चों पर डिलीवर कर पाने में सरकार के असफल रहने और गहराते कृषि संकट की पृष्ठभूमि में किसानों की बढ़ती हुई बदहाली के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत के डेढ़ गुने स्तर पर ले जाने के लिए सरकार पर दबाव निरंतर बढ़ता चला जा रहा था। इस दबाव ने सरकार को चुनावी वर्ष में पेश बजट में इस घोषणा के लिए विवश किया।
किसानों की स्थिति पर NSSO का अध्ययन,दिसम्बर,2014:
वर्ष 1965 से चल रही देश की न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति के तहत सरकार कुछ कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती हैन्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के जरिये कीमतों का नियमन करते हुए सरकार ने यह कोशिश कभी नहीं की कि किसानों को खुले बाज़ार और मंडी में भी उचित कीमतें मिलें  दिसंबर,2014 में नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की 70वें दौर के सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया कि:
1.  केवल 32.2 प्रतिशत किसानों को धान के समर्थन मूल्य के बारे में और 39.2 प्रतिशत को ही गेहूँ के समर्थन मूल्य के बारे में कोई जानकारी थीउड़द के बारे में तो 5.7 प्रतिशत को ही जानकारी थी
2.  अध्ययन से यह भी पता चला कि जुलाई 2012 से जून 2013 के बीच गेहूँ बेचने वाले किसानों में से केवल 6.8 प्रतिशत ने ही सीधे सहकारी संस्था या सरकारी खरीद संस्था को गेहूँ बेचा, जबकि 50 प्रतिशत कृषकों ने स्थानीय व्यापारी को और 35 प्रतिशत ने मंडी में सरकारी खरीद संस्था या सहकारी संस्था के हाथों धान बेचने वाले कृषकों का प्रतिशत महज 6.4 प्रतिशत था
3.  अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य तो तय होता है, पर उसे मानता कोई नहीं इसके सन्दर्भ में सरकारी या सहकारी खरीद तंत्र अत्यंत कमजोर है
स्पष्ट है कि भारत सरकार 23 जिंसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है, किंतु खरीद-मैकेनिज्म की प्रभावित बहुत हद तक गेहूँ और चावल तक सीमित है और वह भी गेहूँ एवं चावल-उत्पादक 5-6 राज्यों तक 
बजट,2018-19 और न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP):
सरकार ने बजट,2018-19 में कहा कि दशकों से केंद्र सरकार की कृषि नीति एवं कार्यक्रम उत्पादन-केन्द्रित रहा है, लेकिन वर्तमान सरकार ने इसमें मूलभूत बदलाव लाते हुए इसे उत्पादन-केन्द्रित के बजाय आय-केन्द्रित बनाया और किसानों के लिए अधिक आय सृजित करने पर बल दियासरकार ने सन् 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है इसके लिए किसानों की आय में वृद्धि के सन्दर्भ में एक समग्रतावादी नज़रिए को अपनाने पर भी बल दिया गया। इसके तहत्:
a.   किसानों को उसी ज़मीन पर कम लागत पर अधिक उत्पादन करने में सक्षम बनाया जाएगा,
b.   उनके उत्पादों के लिए उचित एवं लाभकारी कीमत सुनिश्चित की जायेगी।
c.   साथ ही, इसके लिए किसानों और भूमिहीन परिवारों के लिए ऑन-फार्म और नन-फार्म उत्पादक एवं लाभकारी रोजगार सृजित करने का भी संकेत दिया गया है
सरकार ने किसानों को तुरंत राहत देने के लिए कर्ज माफी की बजाय दूसरे तरीकों से तत्काल और स्थाई फायदा पहुँचाने के लिए कदम उठाया है। वित्त मंत्री ने किसानों को उनके फसलों की उचित एवं लाभकारी कीमत सुनिश्चित करने के लिए इस बजट में किसानों को लागत से डेढ़ गुना ज़्यादा दाम देने की बात सैद्धांतिक रूप से स्वीकार ली है उनके अनुसार रबी की अधिकांश घोषित फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से कम-से-कम डेढ़ गुना तय किया जा चुका है बजट,2018-19 में इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि:
a.  अब बची हुई अधिघोषित खरीफ फसलों के सन्दर्भ में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को उसकी उत्पादन-लागत का डेढ़ गुना करने की बजटीय घोषणा की गयी
b.  इसके अतिरिक्त किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए सरकार वैकल्पिक मॉडलों पर भी विचार कर रही है इसके लिए नीति आयोग केंद्र एवं राज्य सरकारों की सलाह से एक मैकेनिज्म विकसित करेगा जिसके तहत् न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार कीमत के बीच के अंतर की भरपाई सरकार के द्वारा की जायेगी   
c.   आलू-प्याज़ और टमामटर के किसानों को नुकसान से बचाने के लिए 500 करोड़ ‘ऑपरेशन ग्रीन्स’ नाम की योजना बनाई गई है जो इन फसलों के किसानों को व्यावसायिक प्रबंधन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी
लागत के डेढ़ गुने न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) के दावे का औचित्य:
कृषि-मंत्रालय के तहत् कृषि लागत एवं मूल्य आयोग(CACP) हर साल फसलों की लागत और न्यूतनम समर्थन मूल्य का डाटा उपलब्ध करवाता है इसी के द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) की अनुशंसा की जाती है इसकी वेबसाइट पर गेंहूँ की उत्पादन-लागत तय करने के दो पैमाने मिले: उत्पादन-लागत (Production Cost) और आर्थिक-लागत(Economic Cost) उत्पादन-लागत के अंतर्गत खाद, बीज और मज़दूरी को शामिल किया जाता है; जबकि आर्थिक लागत के अंतर्गत  इसके अतिरिक्त कोल्ड-स्टोरेज खर्च, वितरण-खर्च, मंडी-शुल्क, टैक्स, सूद,  कमीशन, प्रबंधन-शुल्क आदि भी शामिल होते हैं एम. एस. स्वामिनाथन आयोग ने आर्थिक लागत के अंतर्गत ज़मीन के भाड़े को भी शामिल किये जाने की अनुशंसा की थी। इसी आलोक में स्वामीनाथन आयोग ने C-2 लागत को MSP का आधार बनाया जाय और किसानों के लिए C-2 लागत से अधिक कीमत सुनिश्चित की जाय
कृषि-मंत्रालय के तहत् आने वाले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग(CACP) की वेबसाइट पर 2018-19 के लिए एक क्विंटल गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) 1735 रुपये निर्धारित किया गया है इसके द्वारा गेहूँ की उत्पादन-लागत 1256 रुपये होने का अनुमान लगाया गया है और आर्थिक लागत 2345 रुपये होने का दोनों भाव के अनुसार 1735 रुपया कहीं से भी लागत का डेढ़ गुना नहीं होता है अगर MSP उत्पादन-लागत का डेढ़ गुना होता, तो इसे 1884 रुपया होना चाहिए था और अगर MSP आर्थिक-लागत का डेढ़ गुना होता, तो इसका भाव 3517 रुपये होना चाहिए था न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) के आधार पर खाद्यान्नों की ख़रीद करनेवाली महत्वपूर्ण एजेंसी फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया(FCI) ने भी 2017-18 के लिए एक क्विंटल गेहूँ की लागत का हिसाब 2408 रुपये लगाया है। इसके वेबसाइट पर 2014-15 में एक क्विंटल गेहूँ की लागत 2015 रुपये, 2015-16 में 2127 और 2017-18 में 2408 रुपये का उल्लेख है। इसीलिए कभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य ज़्यादा नहीं मिला लेकिन, वास्तविकता ऐसी नहीं है

एमएसपी-व्यवस्था को प्रभावी बनाने के सुझाव:
अगर सरकार वाकई कृषि-संकट और किसानों को लेकर गंभीर है, तो उसे:
1.  न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना-विधि में परिवर्तन करते हुए कृषि-उत्पादों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना होगा। यह तभी संभव है जब स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप C-2 लागत पर आधारित बनाया जाय। कृषि-लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण के क्रम में A-2 लागत की भी चर्चा करता है और C-2 लागत की भी। A-2 लागत के अंतर्गत किसान द्वारा नकद में भुगतान किए जाने वाले खर्चों को शामिल किया जाता है। इसके अंतर्गत बीज, उर्वरक, खाद, रसायन, मजदूर, बैल, मशीन और सिंचाई खर्च और फसल की देखरेख पर आने वाली लागत शामिल है। इससे भिन्न C-2 लागत में A-2 लागत के अलावा पारिवारिक श्रम, निवेशित पूँजी पर ब्याज और भूमि का लगान भी शामिल है। वर्तमान में न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण के लिए A-2 लागत को आधार बनाया जाता है और इस क्रम में भूमि-किराया, उत्पादन, प्रबंधन और रखरखाव में किसान के पारिवारिक श्रम और उद्यमिता कौशल की अनदेखी की जाती है, जबकि कायदे से इसे इसके अंतर्गत शामिल किया जाना चाहिए। अगर फसलों की लागत का अनुमान लगते हुए और कृषि-उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करते हुए इस बात को ध्यान में रखा जाता है, तो इससे कृषि को लाभकारी पेशे में तब्दील करना संभव हो सकेगा और इससे कृषि एवं कृषकों का कल्याण संभव हो सकेगा। इसी प्रकार इस बात को भी ध्यान में रखे जाने की ज़रुरत है कि जिस ज़मीन पर किसान खेती करता है, उसके लिए सामान्यतः वह रेंट अर्थात् किराया नहीं देता है (अपवाद: बँटाईदार); लेकिन यदि वह उस भूमि का इस्तेमाल खुद न कर औरों को इसका इस्तेमाल करने देता है, तो बदले में उसे किराया प्राप्त होता है।    
2.  न्यूनतम समर्थन मूल्य-व्यवस्था का विस्तार सभी फसलों के लिए सुनिश्चित किया जाए। सभी फसलों में एमएसपी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित प्रयास और लागत को वहन करने की जरूरत होगी।
3.  इसके लिए प्रभावी खरीद-नीति के समर्थन को भी सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है।
4.  न्यूनतम समर्थन मूल्य-व्यवस्था की सीमाओं और विश्व व्यापार संगठन के फ्रंट पर कृषि-सब्सिडी के विरोध के मद्देनज़र आवश्यकता इस बात की है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसान को मिली कीमत में अंतर की भरपाई के लिए नकद भुगतान की पूरक व्यवस्था को लागू किया जाय।
समर्थन मूल्य(MSP) में वृद्धि राहत है, समस्या का समाधान नहीं:
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य-व्यवस्था उन समस्याओं का समाधान है जिनका सामना भारतीय किसानों को करना पर रहा है? इस प्रश्न पर विचार के पूर्व न्यूनतम समर्थन मूल्य-व्यवस्था की निम्न सीमाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए::
1.  यद्यपि न्यूनतम समर्थन मूल्य-नीति की घोषणा 23 फसलों के सन्दर्भ में की जाती है, लेकिन यह व्यवस्था मुख्य रूप से गेहूँ, धान और कपास जैसे दो-तीन फसलों के लिए ही प्रभावी रूप से काम कर पा रही है
2.  यह व्यवस्था गेहूँ, धान और कपास-उत्पादक शीर्ष राज्यों तक ही प्रभावी है
3.  गेहूँ, धान और कपास की फसलों को छोड़ बाकी फसलों की सरकारी खरीद के लिए उपयुक्त तंत्र मौजूद नहीं है अन्य फसलों और अन्य राज्यों के सन्दर्भ में इसे खरीद-व्यवस्था का समर्थन प्राप्त नहीं है
4.  यही कारण है कि इसका लाभ सिर्फ (6-7)% किसानों तक ही सीमित है, न कि इसका लाभ सभी किसानों को प्राप्त हो रहा है
5.  यह इस बात का संकेत है कि अगर एमएसपी-व्यवस्था सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही है, तो फिर इस व्यवस्था का क्या फायदा?:
इन तमाम सीमाओं के बावजूद यह स्वीकारना होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति बाज़ार की कीमतों पर कुछ हद तक मनोवैज्ञानिक दबाव उत्पन्न करती हुए उसे एक सीमा से नीचे जाने से रोकती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों के दौरान बेह्तर उत्पादन, खान-पान की आदतों में परिवर्तन और इसके परिणामस्वरूप माँग-आपूर्ति के संतुलन के आपूर्ति के पक्ष में रहने के कारण वैश्विक स्तर पर कीमतों में गिरावट के रुझानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य-नीति की मनोवैज्ञानिक दबाव उत्पन्न करने वाली भूमिका को भी कुछ हद तक प्रति-संतुलित कर दिया है। इतना ही नहीं, बाज़ारवादी शक्तियों और मुद्रास्फीतिक कारकों के साथ-साथ राजनीतिक दबावों के कारण पिछले कुछ वर्षों के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का रुझान भी थमता दिखायी पड़ता है। इसके विपरीत कृषि की इनपुट लागत और मनरेगा के कारण श्रम-लागत लगातार बढ़ती चली गयी। शायद यही कारण है कि 40% किसान विकल्प मिलने पर किसानी छोड़ने के लिए तैयार हैं और यहाँ तक कि उन्हें आत्महत्या का विकल्प तक चुनना पर रहा है। इसलिए बाजार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए किसानों द्वारा उचित एवं लाभकारी मूल्य के आश्वासन की माँग पूरी तरह वाजिब है।
अगर किसानों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाता है, तो इसके कई फायदे हैं। यदि फसल-उत्पादन के स्तर पर ही उसके मूल्य में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है तो इससे किसान की आमदनी में 1.6 प्रतिशत का इजाफा होता है। इसके अलावा कृषि-उत्पादों के वास्तविक मूल्य में तेजी आने से उत्पादकता और वृद्धि पर भी असरदार प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक ओर किसानों को उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करता है, दूसरी ओर आय एवं बचत में वृद्धि की संभावना को जन्म देता हुआ उन्हें निवेश में सक्षम भी बनाता है। लेकिन, यह तात्कालिक राहत है, स्थाई समाधान नहीं।  
स्थाई समाधान के लिए मूल्य से इतर कारकों पर भी ध्यान दिया जाना अपेक्षित है। भूमि-सुधार, जोतों के छोटे आकार की चुनौती से निबटना, कृषि-सुधार, आसान शर्तों पर समुचित एवं पर्याप्त मात्रा में ऋण की उपलब्धता, तकनीक, सिंचाई-सुविधाओं के जरिये मानसून पर निर्भरता को कम करते हुए कृषि की अनिश्चितता को कम किया जाना, कृषि-अवसंरचना का विकास, कृषि-विपणन, विपणन-अवसंरचना का विकास, प्रभावी पश्च-फसल प्रबंधन और फसलों की बर्बादी को रोकना जैसे कारक ऐसे ही पहलू हैं जो किसानों की आमदनी में वृद्धि के सन्दर्भ में शायद उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं जितने समर्थन-मूल्य। हाँ, यह ज़रूर है कि ये तात्कालिक राहत देने में समर्थ नहीं हैं। इन सन्दर्भों में परिणाम पाने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है और इसके लिए बड़े स्तर पर निवेश की ज़रुरत है।    
कृषि-विपणन: कृषि-उत्पादों की सीधी खरीद-बिक्री की सुविधा
2018-19 के बजट में इस बात की सूचना भी दी गयी कि 2017-18 की बजटीय घोषणा के अनुरूप 585 कृषि उत्पाद बाज़ार समितियों(APMC’s) में अबतक 470 मंडियों को ई-नेम प्लेटफार्म के साथ सम्बद्ध किया जा चुका है और शेष मंडियों को मार्च,2018 तक सम्बद्ध कर लिया जाएगा। लेकिन, समस्या यह है कि लगभग 86% भारतीय किसान लघु एवं सीमान्त किसानों की श्रेणी में आते हैं जिनकी कृषि मंडियों और थोक बाज़ारों तक सीधी पहुँच नहीं है।
इसी आलोक में बजट,2018-19 में 22,000 ग्रामीण हाटों को कृषि-मंडियों के रूप में विकसित करते हुए इन्हें ई-नेम(E-National Agricultural Market) से सम्बद्ध करने की घोषणा की गयी ताकि कृषि-उत्पादों की सीधी खरीद-बिक्री की सुविधा उपलब्ध करवाई जा सके। साथ ही, यह भी कहा गया कि इसके लिए मनरेगा सहित अन्य सरकारी स्कीमों के अंतर्गत उपलब्ध करवाए जानेवाले संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए भौतिक अवसंरचना के विकास को सुनिश्चित किया जाएगा इन बाज़ारों में कृषि-विपणन अवसंरचना के विकास के लिए 2000 करोड़ रुपये से निर्मित कृषि बाज़ार अवसंरचना कोष की स्थापना की भी घोषणा इस साल के बजट में की गयी