Saturday, 9 April 2016

samvaidhanik sankat bhag 5

             ======================================
            भाग 8: राष्ट्रपति की भूमिका: अनु• 356 के सन्दर्भ में
           ======================================
संविधान-सभा की बहस के दौरान डॉ• भीमराव अंबेडकर ने राष्ट्रपति से यह सुनिश्चित करने की अपेक्षा की थी कि अनु• 356 का प्रयोग अंतिम विकल्प के रूप में किया जाय। चौवालीसवें संविधान-संशोधन के ज़रिए जोड़ा गया अनु• 74(1 परंतुक ) राष्ट्रपति को इस बात के लिए अधिकृत करता है कि वे मंत्रिपरिषद द्वारा भेजें गए किसी प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैंलेकिन पुनर्विचार के पश्चात् दुबारा भेजें गए मंत्रिपरिषद के प्रस्ताव को अनुमति देने के लिए बाध्य हैं। दूसरी बात यह कि बोम्मई वाद,1994 में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अनु• 356 राष्ट्रपति को निरपेक्ष (Absolute) शक्तियाँ नहीं प्रदान करता है। यह उन्हें सशर्त शक्तियाँ प्रदान करता है। इन्हीं प्रावधानों का उपयोग करते हुए 1997 में तत्कालीन राष्ट्रपति के• आर• नारायणन ने गुजराल सरकार द्वारा बिहार में राष्ट्रपति शासन से संबंधित भेजे गए प्रस्ताव को पुनर्विचार हेतु कैबिनेट के पास वापस भेजा था। इसने मीडिया द्वारा अनु• 356 के दुरूपयोग से संबंधित आलोचना-प्रत्यालोचना की पृष्ठभूमि में गुजराल सरकार पर नैतिक दबाव उत्पन्न किया। परिणामत: गुजराल सरकार को इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल देना पड़ा। एक बार फिर से ऐसी ही स्थिति 1998 में भी उत्पन्न हुई जब उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन से संबंधित वाजपेयी सरकार के प्रस्ताव को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर• नारायणन ने ही पुनर्विचार हेतु वापस भेजा। 
अब प्रश्न यह उठता है कि अरूणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति-शासन से संबंधित प्रस्ताव के संदर्भ में वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस विकल्प को क्यों नहीं आज़मायाशायद इसकी व्याख्या निम्न संदर्भों में की जा सकती है:

1.  दोनों संकटों को राजनीतिक संकट से संवैधानिक संकट में रूपांतरित होते हुए देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति के पास उपलब्ध विकल्प सीमित हो जाते हैं।

2.  राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के साथ किसी भी टकराव से बचना चाहते हैंया फिर किसी भी विवाद में उलझने  से परहेज़ कर रहे हैं।

यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक प्रतीत होता है कि राष्ट्रपति रबड़ स्टाम्प की तरह नहीं हैं। जब श्री मती इंदिरा गाँधी की सरकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति वी• वी• गिरि को लोकसभा-भंग करने की सलाह दीतो राष्ट्रपति ने उनसे पूछा कि क्या कैबिनेट ने इस प्रस्ताव पर विचार किया हैजब लोकसभा भंग किए जाने की अधिसूचना जारी की गईतो उसमें " मंत्रिपरिषद की सलाह पर पर्याप्त सोच-विचार के पश्चात" का उल्लेख किया गया। इसी प्रकार डाक विधेयक,1986 पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह और 1991 में चंद्रशेखर सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों से अफरा-तफ़री में पारित कराए गए सांसदों के वेतन-भत्ते में वृद्धि से संबंधित विधेयक पर तत्कालीन राष्ट्रपति आर• वेंकटरमन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। न तो उन्होंने इसे स्वीकारा और न ही उन्होंने इसे ठुकराया। मतलब यह कि संविधान में राष्ट्रपति द्वारा प्रो-एक्टिव स्टेप्स लिए जाने की संभावना विद्यमान है जो ज़रूरत पड़ने पर संविधान के संरक्षण में राष्ट्रपति में समर्थ बनाता है, या फिर यह कह लें कि कम-से-कम इतना नैतिक दबाव उत्पन्न करने में समर्थ है जो मंत्रिपरिषद को जल्दबाज़ी और हड़बड़ी में निर्णय लेने से रोक सके। हाँयह जरूर है कि संविधान के इन प्रावधानों का धड़ल्ले से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह मंत्रिपरिषद के साथ उसके टकराव को जन्म देगा.
        ===========================================
         भाग 9: न्यायपालिका की भूमिका: अनु• 356 के सन्दर्भ में
        ===========================================
यदि केन्द्र-राज्य सम्बंध को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता हैतो यह अनु• 131 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट की मूल अधिकारिता के अंतर्गत आता है। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट अनु• 137 के प्रावधानों के अंतर्गत रहते हुए संसद के द्वारा बनाए गए किसी क़ानून और अनु• 145 के प्रावधानों के रहते जारी आदेशों की समीक्षा कर सकता है। अप्रैल,1989 में जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस• आर• बोम्मई की सरकार को बहुमत साबित करने का मौक़ा दिए बग़ैर बर्खास्त कर दिया गयातो उन्होंने इसे न्यायालय में चुनौती दी। एस• आर• बोम्मई बनाम् भारत संघ वाद,1994 में सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यीय संवैधानिक बैंच का निर्णय अनु• 356 और केन्द्र-राज्य संबंध की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिन्दु है। इससे पूर्व राजस्थान राज्य बनाम् भारत संघ मामला, 1977 में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि राष्ट्रपति का समाधान दुर्भावनापूर्ण हो या असम्बद्ध आधारों पर निर्भर होतो वह न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे में आएगा। 1994 के बोम्मई वाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अनु• 356 के अंतर्गत कार्यपालिका को दी गई शक्तियाँ पूर्ण तथा निरपेक्ष नहीं हैंवरन् सशर्त्त हैं। अनु• 356(3) संसद द्वारा अनुमोदन की उन शर्तों का उल्लेख करता है जिसकी अपेक्षा संविधान कार्यपालिका से करता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:
1.  अनु• 356 का प्रयोग केवल संवैधानिक मशीनरी की विफलता की स्थिति में किया जाना चाहिएन कि प्रशासनिक मशीनरी की विफलता की स्थिति में। यह क़ानून एवं व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को दुरुस्त करने का उपकरण नहीं हो सकता है।
2.  अनु• 356 के प्रयोग के पहले राज्य सरकार को चेतावनी दी जानी चाहिए और उसका जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया जाना चाहिए।
3.  जब तक संसद राष्ट्रपति शासन से संबंधित उद्घोषणा को अनुमति नहीं दे देती हैतब तक विधानसभा को निलंबित रखा जाय। प्रस्ताव के संसद द्वारा अनुमोदन के बाद ही उसे भंग किया जाय।
4.  किसी भी निर्वाचित सरकार को बहुमत का समर्थन प्राप्त है अथवा नहींइसका परीक्षण राजभवन के सामने विधायकों की पैरेड और राज्यपाल के सामने विधायकों की गिनती के ज़रिए न हो। बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर हो। बहुमत-परीक्षण का अन्य कोई भी विकल्प अस्वीकार्य है। ऐसी ही अनुशंसा सरकारिया आयोग ने भी की थी।
5.  संघीय कैबिनेट ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दीन्यायपालिका इसकी समीक्षा नहीं कर सकती है। अनु• 74(2) इस सलाह को न्यायपालिका के दायरे से बाहर रखता है।लेकिनरिपोर्ट में जिन तथ्यों के आलोक में संवैधानिक मशीनरी की विफलता की बात करते हुए राष्ट्रपति-शासन की अनुशंसा की गई है और जिन तथ्यों पर राष्ट्रपति का समाधान आधारित हैउन तथ्यों की न्यायपालिका के द्वारा समीक्षा की जा सकती है।
6.  इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन के क्रम में निम्न प्रश्नों पर विचार किया जाएगा:
·         क्या राष्ट्रपति-शासन की उद्घोषणा के  पीछे कोई तथ्य मौजूद है?
·         क्या वह तथ्य प्रासंगिक है?
·         कहीं शक्ति का दुरूपयोग तो नहीं  किया गया है?
7.  अगर अनु• 356 का अनुचित इस्तेमाल हुआ है और राष्ट्रपति-शासन की उद्घोषणा ग़लत तथ्यों पर आधारित हैतो न्यायालय के द्वारा उस उद्घोषणा को रद्द किया जा सकता है।
8.  अनु• 356(3) राष्ट्रपति की शक्तियों को मर्यादित करता है। एक तो राष्ट्रपति का समाधान राज्यपाल की रिपोर्ट या फिर अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचना पर आधारित होदूसरा इस उद्घोषणा का संसद द्वारा अनुमोदन अपेक्षित है। प्रासंगिक सामग्री की उपलब्धता ही राष्ट्रपति-शासन का आधार हो सकती है। इसीलिए राष्ट्रपति को ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए जिसे पलटा न जा सके।
9.  सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अगर उद्घोषणा असंवैधानिक हैतो न्यायालय बर्खास्त सरकार की पुनर्बहाली का निर्देश दे सकता है।अगर ज़रूरत पड़ीतो न्यायालय उद्घोषणा की वैधानिकता के परीक्षण के संदर्भ में अंतिम निर्णय आने तक नए सिरे से विधानसभा चुनाव पर रोक का अंतरिम आदेश भी जारी कर सकता है।
10. इसी सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस, 1992 के बाद केन्द्र सरकार द्वारा चार भाजपा शासित राज्य सरकारों की बर्खास्तगी को उचित ठहराते हुए कहा कि धर्मनिरपेक्षता मूल ढाँचे का हिस्सा है जिसे संरक्षित कर पाने में भाजपा सरकारें असफल रही। मतलब यह कि अगर कोई राज्य सरकार संविधान के मूल ढांचे के संरक्षण में असमर्थ है, तो इसे संवैधानिक मशीनरी की विफलता माना जा सकता है और इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.
11. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनु• 356 का प्रयोग अपवादस्वरूप ही किया जाना चाहिए अन्यथा यह केंद्र और राज्य के बीच की संवैधानिक संरचना को ध्वस्त कर देगा।
स्पष्ट है कि बोम्मई वाद में सुप्रीम कोर्ट ने जो गाईडलाइंस जारी किएउसने अनु• 356 के दुरूपयोग पर प्रभावी तरीक़े से अंकुश लगाते हुए केंद्र-राज्य संबंध के बीच संतुलन की पुनर्बहाली को सुनिश्चित किया। इसे एक महत्वपूर्ण प्रस्थानबिन्दु माना जाना चाहिए।

झारखण्ड मामला,2005 :
******************* 
झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी ने सरकारिया आयोग के सुझावों की अनदेखी करते हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में बहुमत के क़रीब सबसे बड़े गठबंधन के उभरकर आनेवाले एनडीए गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की बजाय यूपीए गठबंधनजिसमें राजद बाद में शामिल हुआको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। राज्यपाल के इस निर्णय के विरूद्ध एनडीए ने न्यायपालिका की शरण ली और न्यायपालिका ने राज्यपाल की गतिविधियों को संविधान के साथ धोखाधड़ी क़रार देते हुए विधानसभा के पटल पर बहुमत परीक्षण हेतु अंतरिमकिन्तु विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। साथ हीराज्यपाल को विधानसभा हेतु एंग्लो-इंडियन सदस्य के मनोनयन से तबतक के लिए रोका जबतक बहुमत-परीक्षण के पश्चात् वैधानिक सरकार के गठन की पुष्टि नहीं हो गई . इसने  अनुच्छेद 333 की नयी व्याख्या की और वह यह कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में नवगठित राज्य सरकारों को एंग्लो इंडियन सदस्य के मनोनयन से तब तक परहेज करना चाहिये जबतक वह सरकार विश्वास मत नहीं हासिल कर लेती है.इससे अनावश्यक विवाद में उलझने से बचा जा सकेगा .

दिल्ली राष्ट्रपति-शासन वाद,2014:
************************** 
राष्ट्रपति शासन के प्रश्न पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि " लोकतंत्र में हमेशा के लिए राष्ट्रपति शासन की अनुमति नहीं दी जा सकती है। लेफ़्टिनेंट गवर्नर को पहले ही सरकार के गठन की दिशा में पहल करनी चाहिए थी। इसमें पाँच महीने का लम्बा समय नहीं लेना चाहिए था।" दिल्ली मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि संसद की अनुमति मिलने के बाद भी विधानसभा को तबतक निलंबित रखा जा सकता है जबतक सरकार गठन की सम्भावना शेष है, लेकिन इस दिशा में अविलम्ब पहल की जानी चाहिये. लेकिन सरकार गठन के नाम पर अनिश्चित काल के लिए राष्ट्रपति-शासन की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
बिहार विधानसभा-भंग वाद,2006:
***************************
मई,2005 में जब बिहार की त्रिशंकु विधानसभा में बहुमत हासिल करने और सरकार बनाने के क़रीब पहुँच रहे एनडीए गठबंधन को सरकार बनाने से रोकने के लिए बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की आशंका जताते हुए राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा कीतो एनडीए की ओर से बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने से संबंधित केन्द्र सरकार के इस निर्णय को चुनौती दी गई। रामेश्वर प्रसाद एवं अन्य बनाम् भारत संघ वाद,2006 (बिहार विधानसभा भंग करने से संबंधित मामला के रूप में लोकप्रिय) में सुप्रीम कोर्ट के पाँच सदस्यीय संवैधानिक बैंच ने जो निर्णय दियाउसे बोम्मई वाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाईडलाइंस के बतौर पूरक देखा जा सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहाउसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1.  सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कार्यपालिका के प्रति सख़्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति-शासन की उद्घोषणा के लिए राज्यपाल के साथ-साथ संघीय मंत्रिपरिषद को भी ज़िम्मेवार माना।
2.  सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बिहार के गवर्नर ने केंद्र सरकार को ग़लत सूचना देकर भ्रमित किया। गवर्नर ने जल्दबाज़ी में दुर्भावनाओं के साथ बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा की।
3.  गवर्नर निरंकुश राजनीतिक लोकपाल नहीं है। उसकी सनक और पसन्द के आधार पर अनु• 356 के तहत् की जाने वाली अतिवादी कार्रवाई का औचित्य साबित नहीं किया जा सकता है।मंत्रिपरिषद से यह अपेक्षित है कि वह राज्यपाल की रिपोर्ट की समीक्षा करें और इसकी पुष्टि करे।
4.  गृह मंत्रालय उस नोडल एजेंसी की तरह काम करती है जो गवर्नर की रिपोर्ट को कैबिनेट के अनुमोदन के लिए भेजती है। अत: इसकी यह ज़िम्मेवारी बनती है कि वह इस रिपोर्ट को शब्दश: स्वीकार करने की बजाय़ सच्चाई की पड़ताल करे।
5.  गवर्नर महज़ इस आधार पर बहुमत के दावे को ख़ारिज और सरकार के गठन से इन्कार नहीं कर सकता है कि अवैधानिक एवं अनैतिक तरीक़े से बहुमत का प्रबंध किया गया है। 
6.  अनु• 164 मुख्यमंत्री की नियुक्ति और सरकार के गठन के संदर्भ में राज्यपाल की संवैधानिक ज़िम्मेवारी निर्धारित करता है। राज्यपाल से यह संवैधानिक अपेक्षा है कि वह सरकार गठन के हर सम्हाव विकल्पों की पड़ताल करे. इस बात की तबतक अनुमति नहीं दी जा सकती है कि कोई सरकार गठित न की जा सकेजबतक सभी संभव विकल्पों को तलाश नहीं लिया जाता है।
7.  सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर,2005 में अंतरिम आदेश देते हुए कहा कि चूँकि विस्तार से निर्णय देने में कुछ और समय लगेगा तथा नए सिरे से विधानसभा चुनाव के लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी हैइसीलिए भंग विधानसभा को पुनर्बहाल नहीं किया जा सकता है।
8.  अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर की भूमिका पर फ़ोकस किया और किस व्यक्ति को गवर्नर नियुक्त किया जाय एवं किसको नहींइस संदर्भ में पूर्व की अनुशंसाओं को दुहराया।
स्पष्ट है कि बिहार मामला इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि इसने राष्ट्रपति-शासन के संदर्भ में राज्यपाल के साथ-साथ संघीय कैबिनेट की समान रूप से ज़िम्मेवारी निर्धारित की तथा उन्हें यह दिशानिर्देश दिया कि वे राज्यपाल की रिपोर्ट को आँख मूँदकर स्वीकार करने की बजाय अपने स्तर पर उसकी सत्यता का परीक्षण करायें और फिर निर्णय लें। इस निर्णय के कारण इस बात की संभावना उत्पन्न होती  है कि केन्द्र सरकार किरकिरी से बचने के लिए राष्ट्रपति शासन की दिशा में पहल करने से पहले अतिरिक्त सावधानियाँ बरते।


                           
                 ================================
                भाग 10: संघवाद और अनु• 356 का प्रयोग
               ================================
पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक नए ट्रेंड को मजबूती से उभरते देखा जा सकता है और वह यह कि विभिन्न मसलों पर राजनीतिक दलों का क्या रूख होगावह इस बात से निर्धारित नहीं होता है कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या हैवरन् इस बात से निर्धारित होता है कि वर्तमान में वह दल सत्तारूढ दल की भूमिका में है या विपक्ष की भूमिका मेंयहाँ पर काँग्रेस या भाजपा की बात नहीं की जा रही है. बात की जा रही है सत्तापक्ष और विपक्ष की । हाल में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच एक बेहतर समझ और सहमति विकसित होती दिखाई पड़ रही है,जिसे महसूसा  जा सकता है। यह मौन सहमति है और सहमति का मसला है राष्ट्रहित,जनहित और संघवाद एवं इसके स्वरुप. सत्ता में आते ही राष्ट्रहित की चिंता सताने लगती है और विपक्ष में जाते ही जनहित की चिंतायद्यपि कई बार ओवरलैपिंग की स्थिति भी दिखाई पड़ती है एवं उस स्थिति में दोनों पक्षों की जनहित व राष्ट्रहित की परिभाषा अलग-अलग होती है.यह उनके राजनीतिक हितों के अनुरूप निर्धारित होती हैइसी प्रकार सत्ता-परिवर्तन के साथ ही संविधान और संघीय ढाँचे को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की चिंता का स्वरुप बदल जाता है. उनकी परिभाषा और उनकी चिंता  इस बात पर निर्भर करती है कि वे सत्तापक्ष में है या विपक्ष में। सत्ता में आते ही मज़बूत केन्द्र वाले संघीय ढाँचे की ख़ासियत और अहमियत समझ में आने लगती हैलेकिन विपक्ष में जाते ही इसकी सीमाओं और राज्यों की स्वायत्ता की अहमियत। ये बातें भाजपा हो या काँग्रेसदोनों पर समान रूप से लागू होती है। 
यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि भारत में केन्द्र- राज्य सम्बंध बहुत कुछ सत्तापक्ष और विपक्ष के संबंध पर निर्भर करता है। पिछले ढाई दशकों के दौरान गठबंधन सरकारलोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग दलों के बहुमतबोम्मई वाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशानिर्देश और राष्ट्रपति की सक्रियता ने ऐसी परिस्थितियों को निर्मित किया था जिनमें अनु• 356 के दुरूपयोग पर अंकुश लगा था और इस अंकुश की पृष्ठभूमि में राज्यों के पक्ष में केन्द्र-राज्य संबंध के संतुलन की बहाली संभव हो सकी थी। जिस तरीक़े से लोकसभा चुनाव के दौरान वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघवाद के मसले को उठाया थाउससे ऐसा लगा था कि आनेवाले समय में संघ-राज्य संबंध का राज्यों के पक्ष में कहीं बेहतर संतुलन संभव हो सकेगा। लेकिनगहराई से विचार करेंतो अंतर्विरोध भाजपा के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान के एजेंडे और उसकी प्रचार शैली में दिखता है। उसने एक ओर सहकारी संघवाद का नारा दिया, दूसरी ओर पिछले डेढ़ दशक के दौरान मतदाताओं के दक्षिणपंथी राजनीति की ओर बढ़ते रूझान की पृष्ठभूमि में काँग्रेस-मुक्त भारत का सपना देखा  जिसकी उस समय  ग्यारह राज्यों में सरकारें थीं। इसी प्रकार इस दौरान जिस भाषा का इस्तेमाल किया गयाउसमें विपक्ष के प्रति सम्मान का अभाव दिखता है और वह सत्तापक्ष एवं विपक्ष के बीच टकराव की संभावनाओं को बल प्रदान करता है। 
जिस तरीक़े से अरूणाचल और अब उत्तराखंड में विपक्षी दल काँग्रेस की राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए भाजपा के विधायकों ने काँग्रेस के असंतुष्ट विधायकों से हाथ मिलाया है और मौक़ा मिलते ही केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रपति शासन लागू किया है तथा अरूणाचल में राज्यपाल के पद का दुरूपयोग करते हुए भाजपा समर्थित सरकार का गठन करवाया हैनिश्चय ही वह इस ओर इशारा करता है कि सत्तारूढ़ दल लोकसभा में अपने बहुमत का लाभ उठाकर अपने राजनीतिक विरोधियों के सफ़ाए की रणनीति पर काम कर रही है। जहाँ विरोधी दल की सरकारें हैं, निश्चय ही उन राज्यों में इसके नकारात्मक संदेश गए हैं और वह यह कि मौक़ा मिलते ही केन्द्र सरकार उनकी सरकारों को भी अस्थिर कर राष्ट्रपति शासन की दिशा में पहल कर सकती है। इससे आने वाले समय में राजनीतिक और संसदीय परिदृश्य के कहीं अधिक जटिल होने की संभावना है। साथ हीसंघीय ढाँचे पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और संघ-राज्य संबंध में एक बार फिर से तनाव उभरकर सामने आयेंगे। इससे भी कहीं अधिक चिंता की बात यह है कि केन्द्र सरकार सरकारिया आयोगपूँछी कमीशन और बोम्मई वाद,1994 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशानिर्देशों की भी उपेक्षा कर रही है। इसके कारण आने वाले समय में सत्तारूढ़ दल द्वारा राज्यपाल के पद और अनु• 356 का अपने राजनीतिक हित में उपयोग का मसला संघ-राज्य संबंध में उत्पन्न होने वाले तनाव एवं टकराव के प्रमुख मसले के रूप में उभर कर सामने आएगा।
               
                     =============================
                    भाग 11 : संसदीय लोकतंत्र पर प्रभाव
                  =============================
केन्द्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए जिस तरह दोनों राज्यों की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के लिए जो प्रो-एक्टिव रोल निभाया और केन्द्र सरकार ने जिस तरह से इन घटनाक्रमों के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया दीउसने राजनीतिक संकट को संवैधानिक संकट में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके कारण केन्द्र सरकार की मंशा को लेकर सन्देह होता है। साथ हीसंसदीय लोकतंत्र पर इसके प्रतिकूल प्रभाव की संभावना है। एक तो अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल की भूमिका ने प्रांतीय सरकार के प्रभावी प्रकार्यन को प्रभावित करते हुए संघ-राज्य संबंध को प्रतिकूलत: प्रभावित कियादूसरी ओर स्पीकर की भूमिका ने स्पीकर पद की गरिमा और मर्यादा को दाँव पर लगाते हुए संसदीय लोकतंत्र को कलंकित किया है। इस आलोक में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या स्पीकर पद की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सुनिश्चित किए बिना संसदीय लोकतंत्र को बचाया जा सकता हैक्या ऐसे स्पीकर से सही तरीक़े से सदन की कार्यवाही के संचालन की अपेक्षा की जा सकती हैइसी प्रकार राज्यपाल पर संविधान की रक्षा की ज़िम्मेवारी हैअगर वही राज्यपाल केन्द्र के एजेंट में तब्दील होकर संविधान का गला घोंटने लगेंतो संसदीय लोकतंत्र को कैसे बचाया जा सकता है
केन्द्र सरकार की मनमानी कार्रवाई न केवल केन्द्र-राज्य संबंध में तनाव उत्पन्न करेगीवरन् सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता टकराव संसद की कार्यवाही और संसद के पटल पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सहयोग की संभावनाओं को धूमिल करेगा। विशेषकर तब जब केन्द्र में सत्तारूढ़ दल को राज्यसभा में बहुमत नहीं है और विपक्ष के सहयोग के बिना कोई महत्वपूर्ण विधायन मुश्किल है। यह सब संकेत है संसदीय राजनीति की भावी दिशा काजो आसान नहीं होने जा रही।

अनु. 356 आज़ाद भारत में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को आकार देने वाले उपकरण में तब्दील हो चुका है जो उनके राजनीतिक हित और एजेंडे के अनुकूल है. श्री मति इंदिरा गाँधी के समय अनु. 356 का इस्तेमाल न केवल अपने ही राजनीतिक दल के आन्तरिक असंतोष को दबाने के लिए किया गया, वरन समय-समय पर विपक्षी दलों को नियंत्रित करने के लिये भी, ताकि अपनी राजनीतिक बढ़त को सुनिश्चित किया जा सके,.. यह प्रवृत्ति पिछले दो दशक के दौरान कमजोर पड़ी थी, लेकिन ऐसा लग रहा है कि एक बार फिर से पुरानी प्रवृत्ति उभरती हुयी दिखाई पड़ रही है. ऐसा लगता है कि वर्तमान सरकार द्वारा इसका इस्तेमाल विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने के लिए किया जा रहा है और इतनी सावधानी बरती जा रही है ताकि संविधान और इससे जुडी संस्थाओं का इस्तेमाल अपना चेहरा छुपाने के लिए भी किया जा सके और अपने हित को साधने के लिए भी. कल अगर अरुणाचल की तर्ज़ पर उत्तराखंड में भी असंतुष्ट कांग्रेस सदस्य और भाजपा विधायक मिल कर वैकल्पिक सरकार का गठन करें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये. इस प्रकार विधानसभा के निलंबन के बहाने बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश का अनुपालन भी हो जायेगा और सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक हित भी सधेंगे. कांग्रेस का बैकफुट पर आना और उसके मनोबल का टूटना बोनस है निश्चय ही यह सत्तारूढ़ दल के लिए कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक बढ़त को सुनिश्चित करेगा, लेकिन .विपक्ष के साथ-साथ  संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान के भाव का अभाव आनेवाले समय में भारत के संसदीय लोकतंत्र के प्रभावी प्रकार्यन को प्रतिकूलत: प्रभावित करेगा .



Friday, 8 April 2016

संवैधानिक संकट भाग-4 : अरूणाचल से उत्तराखंड तक

                      ========================
                     भाग 6: राज्यपाल की भूमिका
                  ========================
राज्यपाल की भूमिका को लेकर उठने वाले प्रश्नों को निम्न सन्दर्भों में देखा जा सकता है:
1.  क्या राज्यपाल स्वविवेक से विधान सभा का सत्र बुला सकता है और उसके एजेंडे को निर्धारित कर सकता है?
2.  उसके स्वविवेक का दायरा कितना विस्तृत है?
प्रश्न यह उठता है कि अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल द्वारा विधानसभा के सत्र को पूर्व-निर्धारित करने और स्पीकर की बर्खास्तगी के प्रश्न पर विचार करने के संदर्भ में दिए गए निर्देश को कहाँ तक उचित माना जा सकता है? इस प्रश्न पर विचार से पहले संवैधानिक उपबंधों को देखे जाने की आवश्यकता है। 
संवैधानिक उपबंध:

1.  अनुच्छेद 174(1) विधानसभा या विधानपरिषद का सत्र बुलानेस्थगित करने और सत्रावसान की घोषणा के लिए राज्यपाल को अधिकृत करता है।
2.  अनुच्छेद 175(2) राज्यपाल को सदन को संदेश भेजने और किसी विशेष मसले पर विचार करने का निर्देश देने के लिए अधिकृत करता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या राज्यपाल अनु• (174-175)द्वारा प्रदत्त शक्ति का स्वविवेक से इस्तेमाल कर सकता है या फिर उसे अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर करना है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर विचार के क्रम में यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल के स्वविवेक का दायरा असीमित नहींसीमित है। वह स्वविवेक का इस्तेमाल उन्हीं संदर्भों में कर सकता है जिसका संविधान में स्पष्ट उल्लेख हुआ है। साथ हीवह मनमाने तरीक़े से अपनी इच्छा और पसंद के मुताबिक़ स्वविवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। यह अनिवार्यत: संवैधानिक सिद्धांतों आधारित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अगर मुख्यमंत्री विधानसभा का विश्वास खो चुका है या फिर उसके विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया हैलेकिन वह सत्र को पूर्व-निर्धारित करने के पक्ष में नहीं हैवैसी स्थिति में भी राज्यपाल स्वविवेक का इस्तेमाल कर सकता है।


=================================================
पूँछी कमीशन और विधानसभा के सत्र बुलाने का राज्यपाल का अधिकार
=================================================
केंद्र-राज्य सम्बंध पर गठित दूसरे आयोग: पूँछी कमीशन ने विधानसभा के सत्र बुलानेउसे स्थगित करने और सत्रावसान की करने से संबंधित राज्यपाल के अधिकार को स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्यपाल के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह तब तक अपेक्षित है और वह उस सलाह से तब तक बँधे हुआ है जब तक मंत्रिपरिषद को विधानसभा का विश्वास हासिल है और यह सलाह असंवैधानिक नहीं है। राज्यपाल तभी इस सलाह की अनदेखी कर सकता है जब मंत्रिपरिषद ने विधानसभा के विश्वास को खो दिया हो या यह सलाह संविधान का अतिक्रमण करती हो या फिर जहाँ राज्यपाल को स्वविवेक से काम करने की अनुमति हो। सरकारिया कमीशन के मुताबिक़ यदि मुख्यमंत्री विश्वास मत-परीक्षण (Floor Test) हेतु विधानसभा का सत्र आहूत करने से इन्कार करता हैवैसी स्थिति में भी राज्यपाल इस उद्देश्य से विधानसभा का सत्र आहूत कर सकता है।अगर अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित सूचना दी गई है और मंत्रिपरिषद सत्रावसान की सलाह देतो राज्यपाल इस सलाह को सीधे-सीधे स्वीकार नहीं करेगा।अगर राज्यपाल को यह लगता है कि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की ओर से मिलने वाली वैधानिक चुनौती का प्रतिनिधित्व करता हैतो वह मुख्यमंत्री को सत्रावसान का विचार त्याग कर अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने का निर्देश दे सकता है।
जहाँ तक विधानसभा भंग करने का प्रश्न हैतो पूँछी कमीशन ने सरकारिया आयोग की अनुशंसाएँ को ही दुहराया है।राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह से बँधा हुआ है। लेकिन,विधानसभा का विश्वास खो चुके मुख्यमंत्री की सलाह को स्वीकारने की बजाए वह वैकल्पिक सरकार गठन की संभावनाओं का पता लगाएगा और ऐसा संभव न हो पाने पर विधानसभा भंग करेगा।
===============================
राज्यपाल का विवेकाधिकार और पूँछी कमीशन
===============================
राज्यपाल के विवेकाधिकार के सन्दर्भ में सामान्य धारणा यह है कि राज्यपाल के विवेकाधिकार का दायरा अपरिभाषित और अत्यंत व्यापक है। वह उन परिस्थितियों में भी विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर सकता है जिनका संविधान में उल्लेख नहीं हुआ है। इससे सम्बंधित संवैधानिक उपबंध निम्न हैं:


 संवैधानिक उपबंध:

1.  अनु• 163 (1) स्वविवेक से भिन्न मामलों में राज्यपाल से मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा करता है।
2.  अनु• 163 (2) स्वविवेक से संबंधित मामलों में गवर्नर के निर्णय को अंतिम घोषित करता है जिसे किसी भी आधार पर प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता है।
3.  अनु• 163 (3) मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह को न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे से बाहर रखता है।
इस आलोक में पूँछी कमीशन का मानना है कि इस धारणा को ख़ारिज किया जाना चाहिए कि राज्यपाल को व्यापक संदर्भों में स्वविवेक का अधिकार है। इसकी दृष्टि में अनु• 163(2) राज्यपाल को सीमित परिप्रेक्ष्य में स्वविवेक से काम करने का प्रावधान करता है।यह राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह की अनदेखी कर या इस सलाह के बिना काम करने का विशेषाधिकार नहीं प्रदान करता है। जिन संदर्भों में राज्यपाल को विवेकाधिकार प्रदान भी करता हैवहाँ भी वह इसका इस्तेमाल अपनी पसन्द-नापसन्द के अनुसार या मनमाने तरीक़े से नहीं कर सकता है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप तार्किक तरीक़े से सावधानीपूर्वक करे।
==============================
राज्यपाल की भूमिका को लेकर उठते प्रश्न:
==============================
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में अगर अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल की भूमिका के प्रश्न पर विचार करेंतो इस संदर्भ में निम्न बातें कहीं जा सकती हैं:
1.  राज्यपाल ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर बिना मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद से विचार-विमर्श किए विधानसभा की प्रस्तावित सत्र को पूर्व-निर्धारित करने का जो निर्णय लियाउससे बचा जा सकता था। वे मुख्यमंत्री के साथ विचार-विमर्श करने के बाद भी ऐसा निर्णय ले सकते थे। ऐसी स्थिति में अवांछित स्थिति को टाला जा सकता था और उन पर प्रश्न उठा पाना मुश्किल होता। 
2.  राज्यपाल ने विधानसभाध्यक्ष की बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर विचार करने के पूर्व चौदह दिन की पूर्व-सूचना की संवैधानिक अपेक्षा को पूरा नहीं किया जो संवैधानिक रूप से ग़लत हैयद्यपि राज्यपाल इस बात से इन्कार करते हैं।
3.  राज्यपाल द्वारा सत्र के एजेंडे के संदर्भ में जो स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गएवे भी ग़लत थे। संसदीय परम्परा के अनुसार सत्र से संबंधित कोई भी सूचना और विधानसभा की कार्यवाही के संदर्भ में एजेंडे के निर्धारण में संसदीय कार्य मंत्रालय की भूमिका होती है और उसी के द्वारा इस संदर्भ में सूचनाएँ प्रेषित की जाती हैं।
4.  काँग्रेस के सोलह विधायकों ने असंतुष्ट सदस्यों में शामिल विधानसभा-उपाध्यक्ष को उनके पद से हटाने के संदर्भ में सूचना दी जिसकी अनदेखी करते हुए उन्हें ही सोलह-सत्रह दिसम्बर की प्रस्तावित बैठक की अध्यक्षता की ज़िम्मेवारी सौंपी गई। यह ग़लत था।
5.  अरूणाचल के राज्यपाल ने बोम्मई केस,1994 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस निर्देश की भी अनदेखी की जिसमें यह गया गया कि बहुमत का निर्धारण विधानसभा के फ़्लोर पर होगान कि राजभवन में विधायकों के पैरेड के ज़रिए या फिर किसी अन्य तरीक़े से।
6.  राज्यपाल की भूमिका को देखकर प्रथम दृष्ट्या ऐसा लगता है कि अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल स्वयं भी प्रमुख विपक्षी दल भाजपा और असंतुष्ट काँग्रेसी विधायकों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को अपदस्थ करने की कोशिश में लगे थे।
इसे इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है। मार्च, 2016 में अरूणाचल जैसी परिस्थिति ही उत्तराखंड में भी उत्पन्न हुई हैलेकिन उत्तराखंड के राज्यपाल ने विपक्षी दल और असंतुष्टों के खेल में शामिल होने की बजाय मुख्यमंत्री हरीश रावत को 28 मार्च तक अपना बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया।
                       
          ========================================
          भाग 7: अनुच्छेद 356 और राष्ट्रपति शासन की संकल्पना
         =========================================

"संवैधानिक मशीनरी की विफलता" से आशय:
**********************************
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 365 संवैधानिक मशीनरी की विफलता को परिभाषित करता है। इसके अनुसार संविधान के विभिन्न उपबंधों के अधीन रहते हुए यदि केन्द्र सरकार के द्वारा राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है और राज्य सरकार उन निर्देशों के अनुपालन में असमर्थ रहती हैतो माना जाएगा कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी पूरी तरह से विफल है। भारतीय संविधान के निम्न उपबंधों के अनुरूप केन्द्र सरकार के द्वारा राज्य सरकार को निर्देश दिया जा सकता है:
1.  अनु• 256 के अधीन रहते हुए केंद्र सरकार अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दे सकती है।
2.  अनु• 257 के अधीन केन्द्र सरकार राष्ट्रीय महत्व के संचाररेलवे,हाइवे और वाटर वे के निर्माण एवं रखरखाव हेतु राज्यों को निर्देश दे सकती है।
3.  अनु• 355 केन्द्र से यह अपेक्षा करता है कि वह बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक उपद्रव से राज्य की रक्षा करेगा और संवैधानिक उपबंधों के अनुरूप राज्य के शासन का चलाया जाना सुनिश्चित करेगा। ज़रूरत पड़ने पर वह इस संदर्भ में राज्य सरकार को निर्देश भी दे सकती है।
इसके अलावा त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में किसी भी राजनीतिक समूह के द्वारा सरकार-गठन में विफलता,सरकार द्वारा विधानसभा का विश्वास खोनावैकल्पिक सरकार का गठन संभव नहीं हो पानागठबंधन में बिखराव,दल-बदल आदि जैसे राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारण भी संवैधानिक मशीनरी के अनुरूप शासन के संचालन की संभावना को मुश्किल बनाते हैं।

अनुच्छेद 356:राष्ट्रपति-शासन की उद्घोषणा और इससे संबंधित प्रक्रिया:
*******************************************************
ऐसी स्थिति में राज्यपाल संवैधानिक मशीनरी की विफलता के संदर्भ में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उनसे अनु• 365 को अनु• 356 से जोड़ते हुए राज्य में राष्ट्रपति-शासन लागू किए जाने की अनुशंसा करेगा। यहाँ पर यह ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए राज्यपाल स्वविवेक का सहारा लेगा। इसके लिए उसे कैबिनेट की सलाह की ज़रूरत नहीं है। यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा के लिए राष्ट्रपति का समाधान महत्वपूर्ण है। इसके लिए राज्यपाल की रिपोर्ट को भी आधार बनाया जा सकता है और बिना इस रिपोर्ट के भी राष्ट्रपति अन्य स्रोतों से इस निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं। राज्यपाल के विपरीत राष्ट्रपति संघीय कैबिनेट की सलाह से बँधे होते हैं। हाँअनु• 74(1परंतुक) के प्रावधानों के तहत् वे संघीय कैबिनेट से पुनर्विचार की अपेक्षा कर सकते हैं और इस संदर्भ में संघीय कैबिनेट से स्पष्टीकरण की अपेक्षा कर सकते हैं।
राष्ट्रपति-शासन की उद्घोषणा से संबंधित प्रस्ताव को दो माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से सामान्य बहुमत से अलग-अलग पारित करवाया जाना आवश्यक है। यदि दूसरा सदन सत्र में नहीं हैतो दूसरे सदन के सत्र शुरू होने के तीस दिनों के भीतर इस प्रस्ताव को पारित करवाया जाना आवश्यक है। दूसरी बात यह कि राष्ट्रपति कभी भी इसे वापस ले सकते हैं। वापस लेने के लिए संसदीय अनुमोदन की ज़रूरत नहीं पड़ती है। राष्ट्रपति शासन की अवधि छह माह की होती है। इसके आगे राष्ट्रपति शासन को जारी रखने के लिए इससे संबंधित प्रस्ताव को दुबारा संसद से पारित करवाया जाना आवश्यक होता है। यदि राष्ट्रपति-शासन को एक साल से आगे बढ़ाया जा ना हैतो इसकी दो शर्तें हैं:
1.  या तो पूरे देश या पूरे राज्य या फिर राज्य के किसी हिस्से में आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो।
2.  चुनाव आयोग ने यह लिख कर दिया हो कि वर्तमान परिस्थितियों में राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवा पाना संभव नहीं है।

राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा का प्रभाव:
*******************************
राष्ट्रपति-शासन की स्थिति में राज्यपाल की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के हाथों संकेंद्रित हो जाती है और राष्ट्रपति किसी व्यक्ति या प्राधिकार के माध्यम से अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार विधानमंडल की अधिकारिता संसद में संकेंद्रित हो जाती है। राष्ट्रपति राज्य की किसी संस्था या प्राधिकार के संदर्भ में संविधान के किसी प्रावधान को निलम्बित करने की घोषणा कर सकता है ताकि उद्घोषणा के प्रभावी प्रवर्तन को सुनिश्चित किया जा सके। लेकिनइस उद्घोषणा का न्यायपालिका की शक्ति और प्राधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जहाँ तक राष्ट्रपति शासन के दौरान बनाए गए क़ानूनों का प्रश्न हैतो सामान्य स्थिति की पुनर्बहाली के साथ राज्य विधानसभा द्वारा उसमें संशोधन किया जा सकेगा।

अनुच्छेद 356: भारत शासन अधिनियम,1935 से संविधान सभा की बहस तक :
***************************************************************
राष्ट्रपति-शासन की संकल्पना 1935 के भारत शासन अधिनियम से ली गई है जिसे उस दौर में राष्ट्रवादियों ने अलोकतांत्रिक क़रार दिया था।इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई प्रांतीय गवर्नर इस बात से संतुष्ट होता कि प्रांतीय सरकार का संचालन अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप संभव नहीं हो पा रहा हैतो वह प्रांतीय सरकार की सारी शक्तियाँ अपने हाथों में ले लेता। उदार लोकतांत्रिक संविधान वाले देशों में पाकिस्तान और भारत ऐसे अपवाद देश हैं जहाँ पर इस तरह के प्रावधान मौजूद हैं जो संघीय व्यवस्था की मौजूदगी के बावजूद लोगों के द्वारा लोकतांत्रिक तरीक़े से निर्वाचित प्रांतीय सरकार के अस्तित्व एवं भविष्य को अनिर्वाचित राज्यपाल और केंद्र के हवाले कर देते हैं। दुनिया में अन्यत्र कहीं भी ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है।
अब यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आज़ादी के पहले राष्ट्रवादियों ने जिन प्रावधानों को अलोकतांत्रिक बताकर ख़ारिज कर दिया थाउन्हीं प्रावधानों को उन्होंने संविधान सभा में शामिल क्यों कियाइसे तदयुगीन परिप्रेक्ष्य में देखें जाने की ज़रूरत है । उस समय भारत आज़ाद भर हुआ था। सरदार पटेल के नेतृत्व में पाँच सौ से अधिक देसी रियासतों को मिलाकर इसे भौगोलिक इकाई का रूप दिया गया था। इस भौगोलिक एकीकरण को  राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के ज़रिए सुदृढ़ीकरण की चुनौती भारत के नीति-निर्माताओं के समक्ष थी और विघटनकारी शक्तियों के सिर उठाने का ख़तरा मौजूद था। ऐसी स्थिति में मज़बूत केंद्रीय शक्ति की ज़रूरत थी जो विघटनकारी तत्वों पर अंकुश रखने में सक्षम हो सके। इसी आलोक में अनु• 356 के विशेष प्रावधान के ज़रिए मज़बूत केंद्र की बुनियाद रखी गईलेकिन इसके दुरूपयोग की आशंका संविधान-निर्माताओं को भी थी जिसकी पुष्टि संविधान सभा की बहसों से होती है। अबतक सौ से अधिक बार इस प्रावधान का इस्तेमालन्यायमूर्ति जीवनरेड्डी के अनुसार अधिकांश मामलों में इसकी संवैधानिकता को लेकर संदेह और इसका संघ-राज्य संबंध के सर्वाधिक विवादास्पद मसले के रूप में उभरना इस बात की पुष्टि करता है कि ये आशंकायें निराधार नहीं थीं।यदि भारतीय संविधान के किसी प्रावधान का सर्वाधिक दुरूपयोग हुआ हैतो वह अनु• 356 है।
जब संविधान सभा की बहस में राजनीतिक लाभों के लिए अनु• 356 के दुरूपयोग की आशंका जताई गईतो प्रारूप समिति के अध्यक्ष डाॅ• अम्बेडकर ने इसे "संविधान का मृतप्राय" हिस्सा (A Dead Letter Of Constitution)बतलाते हुए यह उम्मीद जताई थी कि " संविधान के इस अनुच्छेद के प्रयोग की कभी ज़रूरत नहीं पड़ेगी और यह अप्रचलित क़ानून बना रहेगा।अगर कभी इसके प्रयोग की ज़रूरत भी पड़ीतो मैं उम्मीद करता हूँ कि राष्ट्रपतिजिन्हें इस प्रकार की शक्ति से लैश किया गया हैप्रांतीय प्रशासन को निलम्बित करने से पूर्व समुचित सावधानियाँ बरतेंगे। मैं आशा करता हूँ कि पहले वे उस प्रांतीय सरकार को चेतावनी देंगेजिसने ग़लती की हैकि संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप प्रांतीय शासन का संचालन नहीं हो पा रहा है। अगर यह चेतावनी कारगर नहीं रहती हैतो वे राज्य में नए सिरे से चुनाव का आदेश देंगे ताकि उस प्रांत के लोगों को अपने स्तर पर उस मसले को निपटाने दिया जाय। अगर इन दोनों विकल्पों को आज़माना संभव नहीं रह जाता हैतभी वे इस अनुच्छेद का सहारा लेंगे।" स्पष्ट है कि डाॅ• अम्बेडकर ने अनु• 355 के तहत् दी जाने वाली चेतावनी और फिर चुनाव की संभावनाओं को अनु• 356 से बेहतर विकल्प और उसके पूर्व शर्त्त के रूप में देखायह बात अलग है कि पिछले छियालीस साल का अनुभव इसके कहीं विपरीत रहा।
विभिन्न आयोगों की सिफ़ारिशें:
*************************
केन्द्र-राज्य संबंध पर विचार के लिए गठित आयोगों से लेकर संविधान समीक्षा आयोग तक ने अनु• 356 के सन्दर्भ में अपने-अपने सुझाव दिए। राजमन्नार समिति ने यदि इस प्रावधान को समाप्त किए जाने की सिफ़ारिश कीतो आरएस• सरकारिया की अध्यक्षता में गठित केन्द्र-राज्य संबंध पर प्रथम आयोग ने डॉ• अम्बेडकर के रूख को दुहराते हुए इसे अंतिम विकल्प बतलाया। साथ हीयह सुझाव दिया कि पारदर्शिता के मद्देनज़र राज्यपाल की रिपोर्ट संसद के समक्ष रखी जाएराष्ट्रपति की उद्घोषणा में अनु• 356 के प्रयोग के कारणों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए तथा उद्घोषणा के संसद द्वारा अनुमोदन से पहले विधानसभा को भंग करने से परहेज़ किया जाए। फिर एम• एन• वेंकटचेलैय्या की अध्यक्षता में संविधान समीक्षा पर गठित राष्ट्रीय आयोग ने जहाँ इन्हीं सुझावों को दुहरायावहीं मदन मोहन पूँछी की अध्यक्षता में केन्द्र-राज्य संबंध पर गठित दूसरे आयोग ने1994 में बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों को संविधान-संशोधन के ज़रिए संवैधानिक स्वरूप प्रदान करने का सुझाव दिया।

Thursday, 7 April 2016

Samvaidhanik Sankat: Arunachal Se Uttarakhand Tak PART THREE

               ================================
                भाग 3: राजनीतिक अस्थिरता और छोटे राज्य
               =================================
अरूणाचल प्रदेश और उसके बाद उत्तराखंड: दोनों छोटे राज्यदोनों जगहों पर विधानसभा का छोटा आकार, दोनों सत्तारूढ़ दल की आंतरिक गुटबाज़ी और विपक्षी दल की नकारात्मक अवसरवादी राजनीति के शिकार: ये कॉमन ट्रेंड के रूप में दोनों जगहों पर मौजूद हैं.। छोटेराज्यों में न तो ऐसा पहली बार हुआ है और न ही अंतिम बार( तबतक जबतक दलबदल क़ानून के वर्तमान प्रावधानों को बदला नहीं जाता है)। अब तक का अनुभव यह बतलाता है कि छोटे राज्य बड़े राज्यों की तुलना में राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक अस्थिर होते हैं। दो चीज़ें छोटे राज्यों को कहीं अधिक अस्थिर बनाती हैं:
1• दलबदल क़ानून का स्वरूप ऐसा है जो छोटे राज्यों में दल-बदल पर अंकुश लगाने की बजाय उसे प्रोत्साहन देता है। इसीलिए वहाँ कम अंतरालों पर नेतृत्व-परिवर्तन की बारंबारता अधिक है।
2• मज़बूत केन्द्र पर आधारित संघवाद का माॅडल राज्य की कमज़ोर वित्तीय स्थिति के साथ मिलकर छोटे राज्यों को निष्ठा-परिवर्तन के लिए उत्प्रेरित करते हैं। 
उपरोक्त दोनों कारक मिलकर छोटे राज्यों को केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के कुचक्र का शिकार बनाते हैं।
                    =====================
                      भाग 4 : दल-बदल क़ानून
                    =====================
1985 में दल-बदल पर प्रभावी तरीक़े से अंकुश लगाने और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता की चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए बावनवें संविधान- संशोधन के ज़रिए भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसके तहत् दसवीं अनुसूची के दल-बदल से संबंधित प्रावधानों को अनु• 102(2) और अनु• 191(2), जिसे बावनवें संशोधन के ज़रिए ही संविधान में जोड़ा गया थाके साथ जोड़कर पढ़े जाने का प्रावधान किया गया।



दलबदल से आशय:
***************
इस अधिनियम के ज़रिए दल-बदल को परिभाषित करते हुए कहा गया कि किसी व्यक्ति की संसद या विधान मंडल की सदस्यता समाप्त हो जाएगी यदि वह:
1.  संसद या विधान मंडल का कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी से त्यागपत्र दे देता है या फिर 
2.  किसी मसले पर वोटिंग के मद्देनज़र पार्टी-ह्विप का उल्लंघन करता है और इसके पंद्रह दिनों के भीतर उसे पार्टी की ओर से माफ़ी नहीं मिल जाती है
3.  निर्दलीय सदस्य के रूप में चुने जाने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है
4.  मनोनीत सदस्य है और मनोनयन के छह माह बादजब उसे पार्टी या निर्दलीय सदस्य के रूप में मान्यता मिल जाती हैकिसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न निर्णयों और आदेशों के ज़रिए यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रूप से अपने राजनीतिक दलों का विरोध या फिर किसी दूसरे राजनीतिक दल के प्रति समर्थन का इज़हार करता हैतो इसे "दल से त्यागपत्र" माना जाएगा।

दल-बदल क़ानून के अपवाद:
*********************
यदि कोई व्यक्ति निम्न  स्थितियों में अपने मूल राजनीतिक दल को छोड़ता हैतो उस पर न तो दल-बदल क़ानून लागू होगा और न ही उसकी सदस्यता ही समाप्त होगी। ये स्थितियाँ हैं:
1.  यदि किसी व्यक्ति को स्पीकरडिप्टी स्पीकरसभापति या उपसभापति चुना जाता है और चुने जाने के बाद वह अपने मूल राजनीतिक दल से इस्तीफ़ा देता है तथा पद छोड़ते ही वह दुबारा अपने मूल राजनीतिक दल में शामिल होता है। ऐसा प्रावधान स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के पद को अराजनीतिक स्वरूप प्रदान करने के लिए किया गया है ताकि इन पदों की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता को सुनिश्चित किया जा सके।
2.  अगर किसी राजनीतिक दल के न्यूनतम दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होते हैंतो इसे विलय माना जाएगा और ऐसी स्थिति में दल-बदल क़ानून प्रभावी नहीं होगा।
3.  विलय की स्थिति में यदि कोई सदस्य अपने मूल राजनीतिक दल से सम्बंध बनाए रखना चाहता हैतो उसकी सदस्यता अप्रभावित रहेगी।
4.  मूल अनुसूची में एक-तिहाई सदस्यों द्वारा अपने मूल राजनीतिक दल से सम्बंध-विच्छेद को विभाजन माना गया और इसे भी दल-बदल क़ानून के दायरे से बाहर माना गया। लेकिन,91वें संविधान संशोधन अधिनियम,2003 के ज़रिए विभाजन वाले प्रावधान को हटा दिया गया। मतलब अब दल-बदल क़ानून इस संदर्भ में प्रभावी होगा।


पारा और सुप्रीम कोर्ट :
*******************
इस अधिनियम का पारा दल-बदल से संबंधित मामलों में स्पीकर के निर्णय को अंतिम मानता था और इसे न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे से बाहर रखता था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मूल ढाँचे की संकल्पना के प्रतिकूल मानते हुए असंवैधानिक घोषित किया। अब न्यायालय द्वारा स्पीकर के निर्णय की समीक्षा संभव है। लेकिनस्पीकर के निर्णय के आने के पहले न्यायिक हस्तक्षेप से परहेज़ किया जा सकता है। एक बार स्पीकर का फ़ैसला आ जाता हैतो उसके फ़ैसले के विरूद्ध अनु• 136 और अनु• 226-227 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट में अपील की जा सकती है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी और दल-बदल क़ानून
***********************************
यह अधिनियम संसद और विधानमंडल के सदस्यों को पार्टी-ह्विप से बाँधता है और उसके उल्लंघन की स्थिति में उनकी सदस्यता को ख़तरे में डालता है जिसके कारण कोई व्यक्ति अपने दल से भिन्न विचार न तो रख सकता है और न ही प्रकट कर सकता है। इससे सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है। इसी आलोक में किहोतो होल्लोहान बनाम् जाचिल्हू एवं अन्य विवाद,1992 में पाँच सदस्यीय संवैधानिक बैंच ने यह स्पष्ट किया कि यह अधिनियम किसी अधिकारआज़ादी या संसदीय लोकतंत्र के मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं करता है।


अबतक का अनुभव :
****************
अबतक संसद और विधानमंडल के स्तर पर दल-बदल क़ानून के क्रियान्वयन को देखा जाएतो 2008-09 तक लोकसभा और राज्यसभा में दल-बदल से संबंधित क्रमश: बासठ और चार मामले सामने अाए। इनमें लोकसभा के छब्बीस सदस्यों को अयोग्य घोषित किया गयालोकसभा और राज्यसभा के अन्य सभी मामलों में आरोपित सदस्यों की सदस्यता को बरक़रार रखा गया। जहाँ तक राज्य विधानसभा का प्रश्न हैतो 2004 तक दल-बदल से संबंधित 262 मामले स्पीकर के समक्ष सामने आए जिनमें 113 मामलों में सदस्यता बरक़रार रखी गई और अन्य मामलों में सदस्यता समाप्त कर दी गई। राज्य विधानसभा के मामलों में यह देखा गया कि स्पीकर के द्वारा दिए गए निर्णय स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता की बजाय उनकी दलीय प्रतिबद्धता और राजनीतिक पक्षधरता की ओर इशारा करते हैं। किसी मामले में स्पीकर ने नैसर्गिक न्याय की संकल्पना का उल्लंघन करते हुए प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिए बग़ैर जल्दबाज़ी में उनकी सदस्यता रद्द कर दीतो किसी मामले में जान-बूझकर अपने फ़ैसले को लटकाए रखा ताकि उनके दल को फ़ायदा हो। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत में स्पीकर का पद अराजनीतिक नहीं रह जाता है। स्पीकर का पद ग्रहण करने के बावजूद उनका अपने मूल राजनीतिक दल से सम्बंध बना रहता है और वे राजनीतिक गतिविधियों में अपनी सक्रियता बनाए रखते हैं। समस्या की जड़ यही है और समाधान की संभावना भी इसी में निहित है।
               
               
दल-बदल क़ानून से संबंधित प्रमुख सुझाव:
********************************
1.  1990 में चुनाव-सुधार के प्रश्न पर विचार के लिए गठित दिनेश गोस्वामी समिति ने यह सुझाव दिया कि दल-बदल क़ानून से संबंधित प्रावधानों को केवल विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव तक सीमित किया जाय जिससे सरकार की स्थिरता और अस्तित्व पर प्रभाव पड़ता है।
2.  अपने वर्तमान स्वरूप में दल-बदल क़ानून व्यक्तिगत स्तर पर दल-बदल पर तो रोक लगाता हैलेकिन सामूहिक दल-बदल के संदर्भ में अप्रभावी है। इसी प्रकार यह छोटे राज्यों और छोटे राजनीतिक दलों के संदर्भ में अप्रभावी हैजैसा हाल में अरूणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के मामले में देखने को मिला। इसके मद्देनज़र दल-बदल क़ानून में संशोधन करते हुए इसे हर स्थिति में प्रभावी बनाया जाए। मतलब यह कि दल-बदल की स्थिति में सदस्यों की सदस्यता समाप्त हो जाए।
3.  दल-बदल क़ानून उस स्थिति में भी अप्रभावी है जब संसद या विधानसभा भंग होने वाली है या आम चुनाव सालभर के अंदर प्रस्तावित है। ऐसी स्थिति में सदस्यता की समाप्ति नाममात्र के दंड में तब्दील हो जाती है। इस संदर्भ मेंँ विधान समीक्षा पर गठित वेंकटचेलैय्या राष्ट्रीय आयोग ने यह सुझाव दिया कि दल-बदलुओं को सदन के शेष कार्यकाल तक मंत्रिपद या अन्य कोई भी लाभ का पद धारण करने से रोका जाए। साथ हीविश्वास या अविश्वास प्रस्ताव के संदर्भ में दल-बदलुओं के वोट की गणना न की जाए।
4.  पार्टी-ह्विप के कारण कई बार सदस्य अपने विचारों और अपने क्षेत्र के मतदाताओं के हितों से संबंधित मुद्दों पर भी खुलकर स्टैंड नही ले पाते हैं। 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में यह सुझाव दिया कि राजनीतिक दल तभी ह्विप जारी करें जब सरकार ख़तरे में हो।
5.  विधि आयोग ने यह सुझाव दिया कि अगर चुनाव-पूर्व गठबंधन के सहयोगी दल चुनाव के पहले चुनाव आयोग को ऐसे गठबंधन के बारे में सूचना देते हैंतो दल-बदल क़ानून को चुनाव-पूर्व गठबंधन के संदर्भ में भी प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके पीछे तर्क यह है कि जनप्रतिनिधियों का चुनाव पार्टी के उन कार्यक्रमों के आधार पर होता है जिनका विस्तार चुनाव-पूर्व गठबंधन के उन सहयोगियों तक होता है।
6.   दल-बदल से संबंधित मामलों में निर्रहर्ता के प्रश्न पर विचार के लिए स्पीकर को अधिकारिता दी गई है। लेकिनसमस्या यह है कि न तो इसके लिए किसी समय-सीमा का निर्धारण किया गया है और न ही स्पीकर का पद अराजनीतिक पद है। इसीलिए अक्सर स्पीकर पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगता है। इसी आलोक में दिनेश गोस्वामी समिति,1990 और वेंकटचेलैय्या संविधान समीक्षा आयोग,2002 के साथ-साथ चुनाव आयोग ने एकाधिक अवसरों पर यह सुझाव दिया कि दल-बदल से संबंधित मामलों में भी निर्रहर्ता के प्रश्न पर विचार की प्रक्रिया लाभ के पद के आधार पर निर्रहर्ता पर विचार-प्रक्रिया के समान हो। यह अधिकारिता स्पीकर से लेकर राष्ट्रपति या राज्यपाल को सौंपी जाए और वे चुनाव आयोग की सलाह पर इस संदर्भ में निर्णय दें।विधि आयोग का मानना है कि जनप्रतिनिधियों को मतदाताओं को धोखा देने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि मतदाता उम्मीदवार के साथ-साथ राजनीतिक दल के घोषणा-पत्र के आधार पर भी मतदान करते हैं। विधि आयोग का यह भी सुझाव है कि राजनीतिक दलों के घोषणापत्र को सांविधिक मान्यता प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे घोषणापत्र की उपेक्षा नहीं कर सके और जनादेश के अनुरूप काम कर सके।


              ===================================
               भाग 5: दल-बदल क़ानून और स्पीकर की भूमिका
              ===================================
संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत स्पीकर को संसदीय लोकतंत्र के अभिभावक के रूप में देखा गया है। शायद इसीलिए वरीयता-क्रम में स्पीकर को राष्ट्रपतिउपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बाद सबसे ऊपर स्थान दिया गया है। दल-बदल अधिनियम स्पीकर की इस भूमिका को विस्तार भी देता है और मज़बूती भी प्रदान करता है। यह अधिनियम स्पीकर को दल-बदल से संबंधित निर्रहर्ता के मामलों में अर्द्ध-न्यायिक शक्तियाँ प्रदान करता हैलेकिन वह इसका इस्तेमाल मनमाने तरीक़े से या स्वविवेक से नहीं कर सकता है। उसे अपने इन अधिकारों का इस्तेमाल दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप तथ्यों के आलोक में करना होता है। स्पीकर की यह शक्ति न्यायिक प्रकृति की हैऔर इसीलिए यह निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन होता है। यहाँ पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि स्पीकर ऐसे मामलों की स्वेच्छा से सुनवाई नहीं कर सकता है। वह तभी इस मामले पर विचार करेगा जब दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप निर्रहर्ता के संदर्भ में उसके पास शिकायतें आयेंगीं। 
अगर स्पीकर दल-बदल से संबंधित शिकायतों के निबटारे में असफल रहता हैतो यह केवल प्रक्रियागत अवैधानिकता नहींं हैवरन् यह क्षेत्राधिकारगत अवैधानिकता है और संवैधानिक अपेक्षाओं के विपरीत भी है।अत: सुप्रीम कोर्ट अनु• 136 के प्रावधानों के तहत् क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटियों के आधार पर विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) को अनुमति दे सकता है।हरियाणा विधानसभा ( दल-बदल के आधार पर सदस्यों की निर्रहर्ता ) नियम, 1986 प्राकृतिक न्याय की संकल्पना पर ज़ोर देता हैलेकिन यह केस की तथ्यात्मकता पर निर्भर करता है। यहाँ पर इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि स्पीकर को अपने निर्णय की समीक्षा का अधिकार नहीं है।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में देखा जायतो दल-बदल क़ानून के संदर्भ में स्पीकर की भूमिका को या तो पुनर्परिभाषित करने की ज़रुरत है या फिर उसे किसी अन्य प्राधिकारी को हस्तांतरित करने की ज़रुरत है जिस पर विस्तार से चर्चा पहले ही की जा चुकी है.एक विकल्प दल-बदल क़ानून से संबंधित मामलों के निष्पादन के लिए एक स्वतंत्र मैकेनिज़्म के  विकास का हो सकता है. यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि दल-बदल के संदर्भ में स्पीकर की अधिकारिता को राष्ट्रपति और राज्यपाल को सौंपने से इससे जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान तो हो जाएगापर स्पीकर पद से जुड़ी हुई समस्याएँ बनी रहेंगीं। हाल में सामान्य विधेयकों को स्पीकर की सहायता से धन विधेयक के रूप में पेश करने एवं इसके अनुमोदन से संबंधित विवादों के परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जा सकता है।
==============================
ब्रिटिश स्पीकर से भारतीय स्पीकर की तुलना:
==============================
स्पीकर पद के अबतक के अनुभवों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि ब्रिटिश अनुभवों के आलोक में भारत में भी स्पीकर पद को अराजनीतिक स्वरूप प्रदान किया जाना समाधान के मार्ग को प्रशस्त कर सकता है। इस आलोक में भारतीय स्पीकर की ब्रिटिश स्पीकर से तुलना रोचक हो सकती है:
1.  ब्रिटेन में स्पीकर चुने जाने के साथ मूल राजनीतिक दल से सम्बंध विच्छेद करने की परिपाटी रही है जिसके कारण स्पीकर का पद दलगत राजनीति से परे होता है और उसके राजनीतिकरण की संभावना भी नहीं होती है। इसके विपरीत भारत में ऐसी परिपाटी का अभाव है।आज़ादी के पहले विट्ठल भाई पटेल और आज़ादी के बाद नीलम संजीव रेड्डी(1967) ही ऐसे स्पीकर रहे हैं जिन्होंने अपने मूल राजनीतिक दल से सम्बंध तोड़ा है। 2008 में जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार से समर्थन वापस ले लियातो उसने तत्कालीन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी पर स्पीकर पद छोड़ने या पार्टी से त्यागपत्र देने के लिए दबाव डाला और उनके द्वारा ऐसा करने से इन्कार करने पर उन्हें बर्खास्त कर दिया। सोमनाथ चटर्जी प्रकरण स्पीकर पद के राजनीतिक स्वरूप और इस संदर्भ में राजनीतिक दलों की सोच को सामने लाता है। इससे स्पीकर पद की गरिमा और निष्पक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
2.  ब्रिटिश संसदीय परम्परा में " वन्स द स्पीकरआलवेज द स्पीकर" की संकल्पना है। मतलब यह कि यदि किसी व्यक्ति को स्पीकर चुना जाता हैतो वह हमेशा के लिए स्पीकर बन जाता है।इसीलिए ब्रिटेन में कई लोगों को तीन या उससे भी अधिक बार स्पीकर बनने का मौक़ा मिला है। लेकिनभारत में अब तक किसी व्यक्ति को तीसरी बार स्पीकर बनने का मौक़ा नहीं मिला है।
3.  ब्रिटेन में स्पीकर निर्वाचित होने पर सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की परम्परा रही है। मतलब यह कि स्पीकर चुनाव-अभियान में शामिल नहीं होता हैकिसी राजनीतिक मसले पर स्टैंड नहीं लेता है और उसके चुनाव में उम्मीदवार होने पर उसके विरूद्ध कोई राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा करता हैयद्यपि इस संदर्भ में कोई संवैधानिक या वैधानिक उपबंध नहीं है। भारत में अब तक ऐसी परम्परा विकसित नहीं हो पाई है।
4.  ब्रिटिश हाउस ऑफ कामन्स में स्पीकर किसी प्रस्ताव के प्रस्तावकों को अपने विवेक से बुला सकते हैंपर भारत में स्पीकर को स्वविवेक से किसी प्रस्ताव को पेश करने की अनुमति देने का अधिकार नहीं है। प्रस्तावक संसद की कार्यवाही सूची के अनुरूप ही प्रस्ताव पेश कर सकता है। उन्हें प्रस्ताव पेश करते हुए स्पीच देने की अनुमति नहीं होती है।
5.  भारत में स्पीकर पद का उम्मीदवार स्पीकर पद स्वीकारने की अपनी इच्छा का इज़हार करते हुए स्पीच नहीं देता है।लेकिन, ब्रिटेन में ऐसी परंपरा रही है.
6.  ब्रिटेन में स्पीकर पद हेतु किसी व्यक्ति का नाम प्रस्ताव और उस प्रस्ताव का समर्थन करने वाला व्यक्ति अनिवार्यत: ग़ैर-सरकारी सदस्य होना चाहिए। इसके विपरीत भारत में सरकारी और ग़ैर-सरकारीकोई भी सदस्य स्पीकर पद हेतु नाम प्रस्तावित कर सकता है। 
7.  ब्रिटिश हाउस आॅफ कामन्स में नवनिर्वाचित व्यक्ति को चेयर अर्थात् निर्धारित स्थान तक प्रस्तावक और समर्थक के द्वारा ले जाया जाता हैजबकि भारत में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता द्वारा नवनिर्वाचित स्पीकर को उसके लिए निर्धारित स्थान तक ले जाया जाता है।
8.  भारत में नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ पहले दिलाई जाती है और स्पीकर का चुनाव बाद में होता है। नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाने और स्पीकर के चुनाव हेतु ही प्रोटेम स्पीकर की परिकल्पना की गई है। इसके विपरीत ब्रिटेन में स्पीकर का चुनाव पहले होता है और फिर नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाई जाती है।
9.  ब्रिटेन में यह परम्परा रही है कि स्पीकर पद से मुक्त होते ही उसे हाउस आॅफ लार्ड्स का सदस्य नामांकित किया जाता हैलेकिन भारत में ऐसी कोई परम्परा नहीं है।


=============================================
स्पीकर पद को अराजनीतिक स्वरूप प्रदान करने से संबंधित सुझाव:
==============================================
स्पष्ट है कि ब्रिटेन में स्पीकर की गरिमा और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने लिए संसदीय परम्पराओं का पर्याप्त विकास हुआ है। इसके लिए भविष्य में स्पीकर के हितों को भी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त उपबंध किए गए हैं। लेकिनभारत में अबतक ऐसा संभव नहीं हो सका है। भारत में स्पीकर के हितों के संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए बिना ही उससे यह अपेक्षा की गई है कि वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त रहकर अपने दायित्वों का निष्पादन करेजबकि ऐसा तबतक संंभव नहीं है जबतक राजनीतिक दलों पर उसकी निर्भरता समाप्त नहीं की जाती है,, उसके साथ उनका संबंध-विच्छेद नहीं होता है और उसके हितों के संरक्षण को सुनिश्चित नहीं किया जाता है।

Wednesday, 6 April 2016

भाग 2: उत्तराखंड संकट

                      ==================
                       भाग 2: उत्तराखंड संकट
                      ==================
अरूणाचल प्रदेश की तरह ही उत्तराखंड में भी काँग्रेस राजनीतिक अंतर्कलह के प्रबंधन में एक बार फिर से विफल रही। उसकी इस विफलता का लाभ एक बार फिर से मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने उठाया। एक बार फिर से सत्तारूढ़ दल का आंतरिक राजनीतिक संकट संवैधानिक संकट में रूपांतरित हुआ। अरूणाचल की तरह ही विधानसभा के स्पीकर की विवादास्पद भूमिकाउनके द्वारा सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक हितों को संरक्षित करने के लिए काम करनामुख्यमंत्री का अक्खड़पन और केन्द्र सरकार का राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए उतावलापन: सब कुछ यहाँ पर भी मौजूद था। 

==================
गहराता राजनीतिक संकट:
==================
उत्तराखंड की राजनीति पर अगर विचार करेंतो चाहे भाजपा हो या काँग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों को गुटबंदी की समस्या से जूझना पड़ा है।विजय बहुगुणा जब मुख्यमंत्री थेतब हरीश रावत ने भी इसी गुटबंदी की बदौलत काँग्रेस नेतृत्व को बहुगुणा को हटाने और ख़ुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए विवश किया था। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही उनके विरोधी मौक़े की तलाश में थे। लोकसभा चुनाव के समय से ही काँग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सतपाल महाराज अपने समर्थकों के सहारे रावत सरकार को अपदस्थ करने कोशिश में लगे थेपर उन्हें विभिन्न कारणों से मौक़ा नहीं मिल पा रहा था। उन्हें मौक़ा तब मिला जब भूतपूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने काँग्रेस नेतृत्व की उपेक्षा से आहत होकर अपने असंतोष को विद्रोह की परिणति तक से जाने का निर्णय लिया। उन्हें अवसर मिला हरीश रावत द्वारा फ़रवरी,2016 में बहुगुणा समर्थक सुबोध उनियाल को मंत्री बनाने के प्रश्न पर बनी सहमति से मुकरने के कारण।
======================
आंतरिक गुटबंदी के विविध पक्ष
======================
कोई भी राजनीतिक दल आंतरिक गुटबंदी से अछूता नहीं होता है। इस आंतरिक गुटबंदी के हमेशा नकारात्मक पक्ष ही नहीं होते हैं। दरअसल किसी भी राजनीतिक दल के विभिन्न गुट दरअसल उस राजनीतिक दल की आंतरिक लोचशीलता को दर्शाते हैं जिसके सहारे कोई भी राजनीतिक दल ख़ुद को जनमत के अनुरूप ढालनें में सक्षम होता है और इससे उसका स्वरूप भी कहीं अधिक प्रातिनिधिक होता है। साथ हीयह पार्टी को भी जीवंत बनाता है। लेकिनसमस्या तब आती है जब आंतरिक गुटबंदी में बढ़त हासिल करने वाला अन्य गुटों को हाशिए पर पहुँचाने की कोशिश करता हुआ अपने समर्थकों हर जगह पर क़ाबिज़ कराता है। सत्ता में साझेदारी/ हिस्सेदारी गुटबंदी को पार्टी विरोधी रूख अख़्तियार करने से रोकता है और अगर ऐसा न होतो असंतोष की परिणति विद्रोह के रूप में होती है। अरूणाचल और उत्तराखंड संकट के मूल में यही है और काँग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की विफलता इस बात में है कि उसने गुटीय संतुलन को सुनिश्चित करने की बजाय किसी विशेष गुट के प्रति अपने झुकाव को प्रदर्शित किया। वैसे इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि काँग्रेस नेतृत्व के स्तर पर संक्रमण की दौर से गुज़र रहा है और अक्सर ऐसी स्थिति में शीर्ष नेतृत्व कमज़ोर और अप्रभावी नज़र आता हैख़ासकर तब जब नया नेतृत्व राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व न हो। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है।
==========================
राष्ट्रपति-शासन लगाए जाने का आधार
==========================
केन्द्र सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की घोषणा करते हुए इसके पक्ष में निम्न तर्क दिए:
1• रावत सरकार द्वारा स्पीकर के सहयोग से विनियोग विधेयक पारित करवाना और इस क्रम में विनियोग विधेयक पर नौ बाग़ी काँग्रेस विधायकों और छब्बीस भाजपा विधायकों की माँग की स्पीकर द्वारा अनदेखी। भाजपा का मानना है कि रावत सरकार उसी दिन अल्पमत में आ गई थी।
2•स्टिंग आपरेशन की कथित सीडी•, जिसमें मुख्यमंत्री हरीश रावत को विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त करते दिखाया गया है। केन्द्र सरकार का यह दावा है कि उसने चंडीगढ़ के फाॅरेंसिक लैब से उस सीडी की जाँच करवाई जिसमें सीडी को सही पाया गया।
3• स्पीकर का असंवैधानिक आचरण
4• राज्यपाल की रिपोर्टजिसमें उत्तराखंड की राजनीतिक स्थिति को अस्थिर बताया गया और विश्वास मत के दौरान हंगामें की आशंका जताई गई।
==============
कुछ अनुत्तरित प्रश्न
==============
अब कुछ प्रश्न ऐसे उभरकर सामने आते हैं जिन्हें वित्त मंत्री के ब्लाॅग ने सुलझाने की बजाय उलझा दिया है। वित्तमंत्री ने विनियोग विधेयक विवाद का हवाला देते हुए कहा कि विनियोग विधेयक बत्तीस वोटों के मुक़ाबले पैंतीस वोटों से ख़ारिज कर दिया गयाजबकि अबतक यह जानकारी सामने आई थी कि भाजपा और काँग्रेस के असंतुष्ट सदस्यों की माँग के बावजूद स्पीकर ने विनियोग विधेयक को ध्वनिमत से पारित घोषित कर दिया। सवाल यह उठता है कि अगर वित्तमंत्री का दावा सही हैतो (18-26) मार्च के बीच राज्यपाल और केन्द्र सरकार हाथ-पर-हाथ डालकर बैठे क्यों रहेक्यों नहीं कार्यवाही की गईदूसरी बात यह कि भाजपा विधायकों और काँग्रेस के असंतुष्ट सदस्य क्या कर रहे थेउन्होंने कोर्ट की ओर रूख क्यों नहीं किया?
तीसरी बात यह कि जब अट्ठाइस मार्च को बहुमत परीक्षण प्रस्तावित थातो फिर क्यों नहीं बहुमत परीक्षण के परिणाम का इंतज़ार किया गया गयायह जानते हुए कि फ़्लोर टेस्ट संसदीय लोकतंत्र की उस मूल संकल्पना की उपज है जो मानती है कि सरकार अपना औचित्य और अधिकारिता विधायिका के विश्वास से ग्रहण करती है?
वित्त मंत्री ने दूसरा प्रश्न यह उठाया कि राज्यपाल के दो-तीन दिनों के अंदर बहुमत साबित करने के बारंबार आग्रह के बावजूद मुख्यमंत्री ने उनकी एक नहीं सुनीजबकि वास्तविकता यह है कि राज्यपाल ने विनियोग विधेयक से संबंधित शिकायत के मद्देनज़र बीस मार्च को ही अट्ठाइस मार्च तक बहुमत साबित करने के निर्देश दिए।
वित्तमंत्री ने तीसरा मसला विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त से संबंधित स्टिंग का उठाया। यहाँ पर भी स्टिंग वीडियो तैयार करने से लेकर उसे दिल्ली भेजनेफिर दिल्ली से चंडीगढ़ भेजनेचंडीगढ़ में जाँचजाँच के पश्चात् रिपोर्ट का उसी दिन दिल्ली आना तथा कैबिनेट की मीटिंग के बाद राष्ट्रपति शासन का निर्णय सारी प्रक्रियाएँ छब्बीस मार्च को ही पूरी की गई जो संदेह पैदा करता है।दूसरी बात यह कि बिहार विधानसभा भंग मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्तशब्दों में करा था कि राज्यपाल का काम यह देखना नहीं है कि विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त हो रही है अथवा नहींतीसरी बात यह कि अगर ऐसा हुआ हैतो हरीश रावत के ख़िलाफ़ प्राथमिकी क्यों क्यों नहीं की गईये तमाम प्रश्न उत्तर की माँग करते हैं।
=====================
स्पीकर की विवादास्पद भूमिका
=====================
उत्तराखंड के स्पीकर की भूमिका भी अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा के स्पीकर की तरह विवादास्पद रही जिसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1• विनियोग विधेयक पर विधायकों की माँगों के बावजूद मत-विभाजन न करवाना। यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि क्या स्पीकर मतविभाजन की सदस्यों की माँग स्वीकारने के लिए बाध्य हैं?
2• अरूणाचल प्रदेश के स्पीकर की तुलना में उत्तराखंड के स्पीकर ने दल-बदल के मसले पर विचार करते हुए आरोपित सदस्यों को अपना पक्ष रखने का तो मौक़ा दियापर इन्हें आरंभ में (26 मार्च को ) निलम्बित और सत्ताइस मार्च को बर्खास्त करते वक़्त पहले से लम्बित भाजपा विधायक से संबंधित मामले पर कारर्वाई न करने की चूक की जिससे उनकी राजनीतिक पक्षधरता के संकेत मिले और लगा कि वे मुख्यमंत्री के साथ मिले हुए हैं। 
3• स्पीकर द्वारा कांग्रेस के असंतुष्ट एवं विद्रोही सदस्यों को अयोग्य तब ठहराया गया जब उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने की घोषणा की जा चुकी थी। स्पीकर ने यह कहते हुए अपने फ़ैसले का बचाव किया कि उन्हें केन्द्र सरकार के इस फ़ैसले के संदर्भ में औपचारिक रूप से कोई सूचना नहीं मिली है।
======================================
उत्तराखंड का संवैधानिक संकट और हाईकोर्ट का फ़ैसला:
======================================
उत्तराखंड की बर्खास्त सरकार ने बर्खास्तगी के ख़िलाफ़तो दलबदल क़ानून के तहत् अयोग्य घोषित किए गए काँग्रेस के असंतुष्ट सदस्यों ने स्पीकर के निर्णय के विरूद्ध उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील की।हाईकोर्ट के एक सदस्यीय बैंच ने हरीश रावत को 31 मार्च को विश्वास मत का हासिल करने का निर्देश दिया। इस बहुमत परीक्षण में स्पीकर द्वारा अयोग्य घोषित किए गए सदस्योंको इस निर्देश के साथ मतदान की अनुमति दी कि इनके मत अलग रखें जायेंगे और उन मतों की गणना तभी की जाएगी जब हाईकोर्ट द्वारा इस मामले में अंतिम आदेश दिया जाएगा। कोर्ट ने इस बहुमत परीक्षण की कार्यवाही के पर्यवेक्षण के लिए अपनी ओर से विशेष पर्यवेक्षक भेजे जाने की बात की जो पूरी कार्यवाही की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
हाईकोर्ट के इस फ़ैसले में कई विसंगतियाँ थी जिन्हें निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1• सवाल यह उठता है कि जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू है और इसी उद्घोषणा के तहत् राज्य विधानसभा को निलंबित रखा गया हैतो बिना राष्ट्रपति शासन हटाए और विधानसभा के निलंबन को समाप्त किए इस निर्णय को कैसे क्रियान्वित किया जा सकता है?
2• एक बर्खास्त सरकार को पुनर्बहाल किए बिना कैसे बहुमत परीक्षण का निर्देश दिया जा सकता है
3• हाईकोर्ट ने एक ओर अयोग्य घोषित सदस्यों की अयोग्यता के संदर्भ में स्पीकर के निर्णय पर रोक लगाने से इन्कार कियादूसरी ओर कोई सदस्य अयोग्य रहते हुए कैसे बहुमत परीक्षण में शामिल हो सकता है?
निर्णय की इन्हीं विसंगतियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट के दो सदस्यीय बैंच ने सात अप्रैल तक एक सदस्यीय बैंच के बहुमत परीक्षण के निर्णय पर रोक लगाई और अगली सुनवाई की तारीख छह अप्रैल निर्धारित की।