Monday, 7 March 2016

गहन आत्मसंघर्ष

दोस्तों, आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, एक और पाखंड । आज एक-से-एक पुरूष पाखंडी सामने आयेंगे और नारी की स्वतंत्रता एवं नारी के सम्मान पर लम्बे-चौड़े भाषण देंगे, यह बात अलग है कि अगले तीन सौ चौसठ दिनों तक उनका आचरण ठीक उसके विपरीत होगा जैसा आज उन्होंने कहा है।फिर अगले साल महिला दिवस के आयोजन का समय आ जाएगा।

                      पहले चर्चा अपने पाखंड की। मैं एक पुरूष हूँ और पुरूष होने के नाते पुरूषवादी समाज का हिस्सा भी। दोहरे मानदंड मेरे भी हैं। शायद पुरूषवादी समाज द्वारा गढ़ी गई नैतिकता को मैं अबतक पूरी तरह से नहीं ठुकरा पाया हूँ, इसलिए नहीं कि मुझे इससे प्रेम है या मोह है; वरन् इसलिए कि यह मेरे संस्कारों में आबद्ध है और इसलिए भी कि नैतिकता के नए प्रतिमानों में वैसा प्रबल आकर्षण नहीं जो मुझे अपनी तरफ़ खींच ले। शायद ये बहुत विश्वास जगा नहीं पाते।

               देखा है मैंने अपने पापा को, छोटी-से-छोटी बातों पर माँ को डाँटते हुए, तब भी जब माँ सही थी। फ़र्क़ महसूस किया है मैंने शिद्दत के साथ, थाली और स्कूल के स्तर पर। डाँटता हूँ मैं भी अपनी पत्नी को बात-बेबात और मुझे लगता है कि मैं सही हूँ।झगड़ा करता हूँ मैं भी उससे। थोपता हूँ मैं भी अपने निर्णय उसके ऊपर वक़्त-बेवक्त।प्यार भी करता हूँ बेइंतहा उससे,इतना कि उसके सम्मान के साथ तनिक भी समझौता गँवारा नहीं है मुझे। चाहता हूँ इस प्यार के साथ अधिकार मैं भी, यह बात अलग है कि भावनाएँ अंदर ही दबी रह जाती हैं,उसका इज़हार नहीं कर पाता और कभी करता भी हूँ, तो उन शब्दों के माध्यम से,जो उसकी नज़रों में "अभिव्यक्ति है मेरे फ़्रस्ट्रेशन की"। 

                    बस इन्हीं सारे अहसासों के साथ लगा हूँ मैं, अपने रूढिबद्ध संस्कारों से मुक्त होने की कोशिश में। और, आप मुझसे अपेक्षा करते हैं कि मैं भी आप ही की तरह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाऊँ।ना, ना,ना: मुझसे नहीं होगा यह सब, कम-से-कम तबतक नहीं जबतक मैं अपने अंतर्विरोधों से बाहर नहीं निकल जाता। दुआ कीजिए मेरे लिए और बद्दुआ भी देना चाहें, तो स्वीकार है मुझे; पर तबतक के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की ज़िम्मेवारी मैं उन महिलाओं पर छोड़ता हूँ जो मुझ जैसे पाखंडियों से मुक्त होने के लिए छटपटा रही हैं, लड़ रही हैं, संघर्ष कर रही हैं और मुझ जैसे पाखंडी जिनके संघर्षों को डायल्यूट करने की कोशिश में लगे हैं!

Saturday, 5 March 2016

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरे

कन्हैया को अवतार मत बनाओ। उसे कृष्ण बनाने की कोशिश उतनी ही ग़लत है जितनी उसको देशद्रोही बताने की कोशिश। देश को न तो दूसरा केजरीवाल चाहिए और न ही दूसरा मोदी। अब देश किसी दूसरे केजरीवाल और मोदी को बर्दाश्त करने या झेलने की स्थिति में नहीं है। समस्याओं का रोमांटिक हल हमें नहीं चाहिए। रोमांटिसाइज करने की कोशिश समस्या की गंभीरता को समाप्त कर देती है।

              रही बात अभिव्यक्ति की आज़ादी की, ऐसी आज़ादी हमें केवल सरकार से ही नहीं चाहिए। ऐसी आज़ादी हम एंटी डिफेक्शन लाॅ से भी चाहते हैं। ऐसी ही आज़ादी हमें कांग्रेस, वामपंथी और दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों  के अंतर्गत भी चाहिए जो तब तक संभव नहीं है जबतक राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को सुनिश्चित नहीं किया जाता है और असहमति एवं विरोध के प्रति सम्मान नहीं प्रदर्शित किया जाता है। वामपंथ में अगर वैचारिक असहिष्णुता है, तो दक्षिणपंथ में तर्क की गुंजाइश का अभाव। इसीलिए अक्सर दक्षिणपंथ तर्क के ज़रिए विरोध को थामने में असामर्थ्य को महसूस कर व्यक्तिगत आक्षेप एवं चरित्र-हनन के एजेंडे को आक्रामक तरीक़े से उसका प्रतिरोध करने की कोशिश करता है। मूल मुद्दों से ध्यान भटका देता है। उधर वामपंथ को अभिव्यक्ति की आज़ादी सांगठनिक स्तर पर बर्दाश्त नहीं है और न ही उस स्थित में बर्दाश्त है जब सत्ता इसके हाथों में है। फिर वह इसे कुचल डालने में विश्वास करता है।कांग्रेस में बहुत हद तक यह आज़ादी है, पर तभीतक जबतक यह नेहरू-गाँधी परिवार के विरोध में नहीं जाता है।

                      हमें इन सबसे आज़ादी चाहिए। हमें ऐसी आज़ादी चाहिए जो हमें विचारधारा, राजनीतिक प्रतिबद्धता और देशद्रोही क़रार दिए जाने की चिंता किए बग़ैर अपनी बातों को रखने का अवसर दे। हमें आज़ादी चाहिए सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की, जिसमें बाधक है असहिष्णुता, व्यक्तिगत आक्षेप, चरित्र हनन और हिन्दू विरोधी- राष्ट्र विरोधी क़रार दिया जाना।

                       कन्हैया, आज तुम इसी आज़ादी के प्रतीक हो मेरे लिए। राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है, लेकिन समस्या तब आती है जब राजनीति प्रतीकों के दायरे में सिमट कर रह जाती है।क्या कन्हैया के साथ-साथ भारतीय राजनीति इन प्रतीकों से आगे बढ़ पाएगी: यह प्रश्न लगातार मथ रहा है मुझे? इसके लिए तुम्हें निकलना हो इन प्रतीकोँ के दायरे से बाहर।निकल पाओगे तुम, अन्यथा कहीं कल आने वाली पीढ़ी को भी तो इस आज़ादी के लिए संघर्ष को विवश नहीं कर दोगे तुम? यह विश्वासघात होगा उन लिबरल्स के साथ , जिन्होंने तुम्हारे संघर्ष को अपना माना, इसलिए नहीं कि उन्हें तुम्हारे या तुम्हारी विचारधारा के प्रति सहानुभूति थी, वरन् इसलिए कि यह ख़ुद उनका संघर्ष था और जेएनयूएसयू के अध्यक्ष और राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार होने के कारण तुम उनकी सहानुभूति एवं संवेदना के हक़दार बने तथा उनकी आवाज़ बनकर उभरे।

Monday, 29 February 2016

जेएनयू विवाद: अगर मैं चुप रहा, तो मेरा अहसास मुझे कोसेगा !

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अगर मैं चुप रहा, तो मेरा अहसास मुझे कोसेगा
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दोस्तों, आज दिनकर की ये पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं:
कौन केवल आत्मबल से जूझ सकता देह का संग्राम है,
आत्मबल का एक बस चलता नहीं पाशविकता  लेती जब खडग उठा।
पहली बार अपने आप पर वितृष्णा हो उठी। रवीश ने जब फ़ेसबुक छोड़ने का निर्णय लिया था, तो शायद मैंने रवीश से असहमति प्रदर्शित करते हुए बेमन से रवीश के इस निर्णय को स्वीकार किया था। मेरा मानना था कि रवीश को इनके बेहूदाना हरकत के समक्ष समर्पण नहीं करना चाहिए था, पर आज सोचता हूँ कि कितना मुश्किल रहा होगा रवीश के लिए यह निर्णय लेना। आज मैं भी ख़ुद को कुछ वैसी ही मन:स्थिति में पा रहा हूँ। बार-बार अपनी बेबसी का अहसास हो रहा है और बार-बार अटल जी की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं:
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा।
काल के कपाल पर , 
लिखता और मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ।
फिर शिव मंगल सिंह सुमन की ये पंक्तियाँ उत्प्रेरित करती हैं:
हार में कि जीत में,
किंचिंत नहीं भयभीत मैं,
कर्तव्य पथ पर जो मिला,
ये भी सही, वो भी सही।
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सबसे पहले  मैं अपने उन मित्रों को धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने मेरे पोस्ट से आहत होने और असहमत होने के बावजूद अपने प्रहारों को मुझ पर व्यक्तिगत और व्यावसायिक हमलों तक सीमित रखा। उससे आगे नहीं बढ़े । इस क्रम में कुछ सलाहें भी आई। शायद इन सबसे फ़र्क़ नहीं पड़ता, यदि उन्होंने तर्क-वितर्क के ज़रिए मुझे ग़लत साबित किया होता। लेकिन, उन्होंने व्यक्तिगत आक्षेप का रास्ता चुना और चरित्र हनन के ज़रिए मुझे चुप कराने की कोशिश की। 
                         खैर,...... सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ कि " पढ़ाना  मेरे लिए धर्म है, व्यवसाय नहीं।" Teaching is my religion and not my profession.  दूसरी बात यह कि आपने मेरे बारे में सोचा और मुझे सलाह दी,,  इसके लिए आपका बहुत -बहुत धन्यवाद । लेकिन, मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह आपकी चिंता का विषय नहीं होना चाहिए।  हाँ, मैं अपनी भूमिका के साथ न्याय कर पा रहा हूँ या नहीं,यह ज़रूर पब्लिक स्क्रूटनी का विषय हो सकता है और होना चाहिए। इस सन्दर्भ में मैं कुछ नहीं बोलूँगा:
बात बोलेगी,
हम नहीं!
इतना कहने के बाद मैं वापस लौटना चाहूँगा उन प्रश्नों की ओर, जो आपके द्वारा उठाए गए हैं। सबसे पहले "देशद्रोह" के आरोप पर।
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  देशद्रोह और मैं:
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आपमें से कुछ लोगों ने मेरे पोस्ट की व्याख्या करते हुए कहा कि मैं एंटी-नेशनल हूँ, मैं ग़द्दारों के साथ हूँ, किन्हीं को मुझसे जुड़े होने के कारण शर्म आने लगी, किन्हीं ने मुझे दिए हुए सम्मान को वापस लिया वग़ैरह-वग़ैरह । इस सन्दर्भ में मैं "अंधा-युग"नाटक में गांधारी के हवाले विदुर द्वारा कृष्ण को संबोधित ये पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा:
आस्था तुम लेते हो,
लेगा अनास्था कौन?
स्वीकार्य है मुझे, पर इस संदर्भ में मैं  अपने उस जवाब को उद्धृत करना चाहूँगा जो मैंने अपने एक छात्र को दिया:
""माफ़ी चाहूँगा कि मेरे कारण आपको ( मेरे शिष्य को नहीं क्योंकि मेरा शिष्य हर िस्थति में मुझ पर गर्व करेगा, अगर वो मुझे जानता है और अगर नहीं जानता, तो वह मेरा शिष्य नहीं है। सिर्फ़ पढ़ लेने से कोई मेरा शिष्य नहीं हो जाता। हाँ, बतौर एक गुरू यह मेरी विफलता अवश्य है।) शर्मिंदा होना पड़ा। मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है, पर इससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकता क्योंकि :
अगर मैं चुप रहा, तो मेरा अहसास मुझे कोसेगा।
मैं आपकी नज़रों में गिरकर रह सकता हूँ, पर अपनी नज़रों में नहीं। हाँ, किसी भी िस्थति में नहीं, चाहे इसकी जो परिणति हो। ये मेरे गुरू के दिए हुए संस्कार और मूल्य हैं जिस पर मुझे गर्व है और जिसकी रक्षा मैं हर क़ीमत पर करूँगा। 
एक बार फिर से आपकी आहत भावनाओं के लिए मैं माफ़ी चाहूँगा और आपसे सिर्फ़ इतना कहूँगा कि अगर कभी "अंधेर नगरी"के गोबरधन  दास की तरह मेरी ज़रूरत पड़े( वैसे भगवान न करें की आपको मेरी ज़रूरत पड़े),तो याद ज़रूर कीजिएगा।""
अब मैं वापस लौटता हूँ मूल प्रश्न पर। जिस परिप्रेक्ष्य में नौ फ़रवरी का वह पोस्ट लिखा गया, अगर उस परिप्रेक्ष्य को समझने की कोशिश की जाती या समस्याओं की समझ होती या फिर उसे समझने का प्रयास किया जाता, तो शायद ऐसी समस्या नहीं आती। लेकिन न तो आपके पास पोस्ट पढ़ने का समय है और न ही आप पूरा पोस्ट पढ़ते हैं, न समस्याओं की समझ है और न समस्याओं को समझने के लिए तैयार हैं, भाषा की िस्थति तो माशा अल्लाह है; फिर भी कमेंट करने के लिए आप तैयार रहते हैं। 
                 जिस देश के आप ठेकेदार बन बैठे हैं, किसने दी आपको यह ठेकेदारी? यह देश जितना आपका है, उससे रत्ती भर भी कम मेरा और उन लोगों का नहीं है जो आपसे असहमत हैं। आप अपने देश से जितना प्यार करते हैं, मैं उससे अगर अधिक नहीं, तनिक भी कम नहीं प्यार करता हूँ। हाँ, मेरे देश, मेरे धर्म  और मेरी संस्कृति ने आपकी तरह मुझे दूसरे देश एवं वहाँ के लोगों और दूसरे धर्म एवं संस्कृति का अपमान और अनादर करना नहीं सिखाया। न ही अपनी कुठा और भड़ास निकालने के लिए इन सबने मुझे दूसरों का चरित्र-हनन करना सिखाया।जानते हैं क्यों, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे देश, यहाँ के लोगों और मेरे धर्म का अपमान करे। मैं नहीं चाहता कि कोई मेरा चरित्र-हनन करे।अगर कोई ऐसा करता है, तो मुझे लगता है कि कहीं-न-कहीं कुछ कमियाँ हममें रह गई होंगी जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। तब फिर शायद दुबारा यह िस्थति न आए। इसीलिए बंद कीजिए यह गुंडई। देश,धर्म और संस्कृति के नाम पर इन सबको बदनाम करना। यह देश, यह संस्कृति, यह धर्म आप जैसे देश,धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों की बदौलत नहीं बचा हुआ है। यह बचा हुआ है उस सहिष्णुता और समन्वय की बदौलत, जो हज़ारों वर्षों से प्राण-तत्व के रूप में इसके केन्द्र में बना हुआ है और जिसने न केवल भारतीय समाज और संस्कृति के वैविध्य की रक्षा करते हुए इसे सामासिक स्वरूप प्रदान किया है, वरन् इसे संरक्षण भी प्रदान किया है और आगे भी प्रदान करता रहेगा। अगर आपको विचारधारा की लड़ाई लड़नी हो, तो विचारधारा के स्तर पर लड़िए। गुंडई की बदौलत नहीं  और सत्ता के संरक्षण की बदौलत नहीं। आज आप या आप-समर्थित विचारधारा सत्ता में हैं, कल बाहर होगी।गुंडई में आप टिकेंगे नहीं क्योंकि आप मुट्ठी भर ही हैं। 
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मैंने नौ फ़रवरी का पोस्ट क्यों लिखा?
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उस शाम  न्यूज़ चैनल से जब इस घटना की जानकारी मिली, तो मैंने विभिन्न चैनलों की तलाश के क्रम में इंडिया न्यूज़ और फिर नौ बजे से टाइम्स नाउ पर चलने वाले डिबेट को देखा। डिबेट को देखकर वितृष्णा हो उठी। एक ओर इस घटना ने खिन्न कर दिया, दूसरी ओर दीपक चौरसिया एवम् अर्णव गोस्वामी द्वारा एंकरिंग के तरीक़े ने। ऐसा लगा, जैसे ये लोग ख़ुद को संघ टाइप का देशभक्त साबित कर ही दम लेंगे। इस क्रम में सामने वाले को भाजपा प्रवक्ता के साथ मिलकर बोलने नहीं देना तथा मीडिया ट्रायल चलाना चौंका गया। मुझे लगा कि इस मसले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है, जेएनयू को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है और बहुत जल्द देशभक्ति का उन्माद पैदा किया जाएगा। इसी ख़तरे को भाँपते हुए मैंने नौ फ़रवरी वाला पोस्ट लिखा।

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सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन:
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अब प्रश्न उठता है कि क्या अफ़ज़ल की बरसी पर ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन ग़लत था? इसमें मुझे कुछ भी ग़लत नहीं दिखता। यह एक प्रकार का विरोध-प्रदर्शन है और ऐसे विरोध-प्रदर्शन की हर किसी को आज़ादी है। विशेष रूप से जेएनयू में ऐसे विरोध-प्रदर्शन के लिए हमेशा से लोकतांत्रिक स्पेस रहा है और ऐसे विरोध-प्रदर्शन हमेशा होते रहे हैं।
अब दूसरा प्रश्न उठता है कि इस विरोध-प्रदर्शन का आयोजन किसके द्वारा किया गया? मुख्यधारा में शामिल किसी लेफ़्ट संगठन या अन्य  किसी भी छात्र-संगठन ने इस विरोध- प्रदर्शन का आयोजन नहीं किया था। इस कार्यक्रम का आयोजन क़रीब दस छात्रों द्वारा किया गया जो संभवत: अतिवादी वाम छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन से जुड़े रहे हैं जो अल्पज्ञात संगठन है और  जिसके सदस्यों की संख्या बामुश्किल पचास भी नहीं पहुँचेगी। हाँ, एबीवीपी द्वारा इस कार्यक्रम के आयोजन के विरोध के मद्देनज़र ऐसे आयोजन को लेफ़्ट का नैतिक समर्थन रहा हो, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसी अंडरस्टैंडिंग जेएनयू में देखी जाती रही है। मैं इसे भी ग़लत नहीं मानता हूँ।सोच, विचार और मत-भिन्नताओं के बीच संवाद की यह िस्थति सार्थक बहस की संभावनाओं को बल प्रदान करती है।
                        
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सांस्कृतिक कार्यक्रम या राजनीतिक कार्यक्रम?
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दरअसल इस कार्यक्रम का आयोजन अफ़ज़ल की बरसी पर उसकी फाँसी का विरोध करने के लिए किया गया । इससे बचा जा सकता था, पर पिछले तीन वर्षों से छात्रों के एक छोटे से समूह के द्वारा अफ़ज़ल की फाँसी की बरसी पर ऐसे आयोजनों की परिपाटी रही है। यह एक प्रकार का राजनीतिक कार्यक्रम था जिसके बारे में आयोजकों को पता था कि उन्हें इसके लिए विश्वविद्यालय-प्रशासन की अनुमति नहीं मिलेगी।शायद इसीलिए आयोजकों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर  अनुमति ली। इसकी भनक  एबीवीपी को मिली और उसने दक्षिणपंथी विचारधारा और संघ परिवार से जुड़े जेएनयू के कुलपति पर दबाव डालकर प्रोग्राम शुरू होने के ठीक पंद्रह मिनट पहले इस अनुमति को रद्द करवाया। इसके बावजूद आयोजकों ने तयशुदा समय पर प्रोग्राम का आयोजन किया। समस्या यहीं पर आकर उलझी।
                 एबीवीपी इस कार्यक्रम को न होने देना चाहती थी और हर स्थिति में अवरूद्ध करने पर आमदा थी। उसने इस संदर्भ में पुलिस और मीडिया को भी सूचित किया। दोनों पक्षों में तनातनी के  बीच एबीवीपी की ओर से स्लोगन लगाए गए और इधर से भी। इधर के  कुछ लोगों ने एंटी-इंडिया स्लोगन भी लगाया। अबतक के संकेत इशारा करते हैं कि कश्मीर की आज़ादी और भारत की बर्बादी का नारा लगाने वाले कैम्पस के बाहर के लोग थे जिन्हें अबतक पहचाना नहीं जा सका है।। हो सकता है कि कुछ कैम्पस के भीतर के भी हों, पर अब तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
 
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सत्तारूढ भाजपा-सत्तारूढ कांग्रेस का फ़र्क़:                   
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भाजपा के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से अबतक एबीवीपी भाजपा के सहारे कैंपस  की राजनीति में और संघ एवम् भाजपा एबीवीपी के सहारे बौद्धिक वर्चस्व की लड़ाई में अपनी मज़बूत एवं प्रभावी उपस्थिति को सुनिश्चित करना चाहते हैं, बिना इस बात को समझे कि बौद्धिक लड़ाई बौद्धिक स्तर पर और राजनीतिक स्तर पर लड़ी जानी चाहिए। इसके कारण संघ, भाजपा और एबीवीपी के बीच एक नापाक गठबंधन बन रहा है जो कैम्पस के माहौल को भी गंदा कर रहा है और उसका राजनीतिकरण भी कर रहा है। इससे कैम्पस और बाहर का फ़र्क़ भी मिटता जा रहा है।
ऐसा नहीं कि पहले ऐसा नहीं होता था। पर, फ़र्क़ यह है कि कांग्रेस सरकारों की दौर में भी ऐसा होता रहा, पर न तो इस तरह की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई और न ही इस तरह का गठबंधन विकसित हुआ। इसे निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:
पहली बात यह कि कांग्रेस से सम्बद्ध छात्र संगठन एनएसयूआई को मुख्यधारा की छात्र राजनीति में प्रभावी उपस्थिति के कारण अपने मातृ-संगठन से वैसे अतिरिक्त सपोर्ट की ज़रूरत नहीं पड़ी जैसी ज़रूरत भाजपा से एबीवीपी को महसूस हो रही है। 
दूसरी बात यह कि कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा नहीं रही है।  वामपंथी विचारधारा इसके वैचारिक प्रेरणास्रोत के रूप में मौजूद रही है । इसके विचारधारा के स्तर पर वामपंथ को  वैचारिक समर्थन दिया। अत: प्रत्यक्ष रूप से न जुड़े होने के कारण काँग्रेस पर उस तरह के आरोप नहीं लगाए जा सकते हैं, जैसा संघ की दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रत्यक्ष जुड़ाव के कारण भाजपा पर लगाए जाते रहे हैं।
तीसरी बात यह कि जिस समय कांग्रेस ने वामपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित किया, उस समय प्रतिरोधी विचारधारा बहुत मज़बूत और प्रभावी स्थिति में नहीं थी। साथ ही,मुख्यधारा में प्रभावी वैचारिक उपस्थिति के कारण उसे उस फोर्सफुल सपोर्ट की ज़रूरत भी नहीं थी जैसी ज़रूरत आज दक्षिणपंथी विचारधारा को है।
चौथी बात यह कि उस समय काँग्रेस  को इतनी जल्दबाज़ी भी नहीं थी क्योंकि उसे पता था कि उसे सत्ता में रहना है। पर, भाजपा के व्यवहार से ऐसा लगता है कि उसे ख़ुद यह विश्वास नहीं कि वह कितने दिन सत्ता में रहेगी? शायद इसीलिए वह जल्दबाज़ी में है।
पाँचवीं बात यह कि भाजपा वामपंथी बौद्धिक वर्चस्व को तर्क, बौद्धिकता और वैज्ञानिक सोच की बजाय आस्था और भावुकता के धरातल पर चुनौती देना चाहती है। उसे यह नहीं पता है कि इसे बौद्धिक चुनौती बौद्धिकता के धरातल पर ही दी जा सकती है जिसमें भाजपा और संघ परिवार सक्षम नहीं है। प्रमाण है जेएनयू संकट के प्रति वामपंथ की प्रतिक्रिया। जहाँ वामपंथ राष्ट्रवाद, सेडिशन और फ़्रीडम आॅफ स्पीच पर व्यापक बहस छेड़कर बौद्धिक बढ़त हासिल कर रही है, वहीं दक्षिणपंथ सत्ता, पुलिस, प्रशासन, मीडिया और संसद के सहारे आम भारतीयों में एंटी-नेशनल स्लोगन के माध्यम से देशभक्ति एवं महिषासुर-प्रकरण के माध्यम से हिन्दू-आस्था को उभारने की कोशिश कर रही है।

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अफजल की फाँसी का विरोध कहाँ तक उचित?
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हाल में पहले अफ़ज़ल और फिर याकूब मेनन को फाँसी ने मृत्युदंड पर नए सिरे से बहस को जन्म दिया है। इस बहस के आलोक में उन लोगों के लिए ऐसे आयोजनों की अहमियत को समझा जाना चाहिए जो मृत्युदंड के विरोध में थे या जिन्हें यह लगता था कि अफ़ज़ल की फाँसी ग़लत थी और जो नहीं चाहते थे कि  फिर कोई अफ़ज़ल हो। लेकिन, यह भी सच है कि इस कार्यक्रम के ज़रिए अफ़ज़ल गुरू की मौत को गौरवान्वित किया गया। 
अब प्रश्न यह उठता है कि अफ़ज़ल की फाँसी का विरोध और  इस सन्दर्भ में न्यायपालिका के फ़ैसले की आलोचना क्या उचित है? मुझे लगता है और मुझे ही नहीं, बहुतों को लगता है कि अफ़ज़ल गुरू मामले में सुप्रीम कोर्ट से चूक हुई है। भूतपूर्व गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने भी दबी ज़ुबान से इस बात को स्वीकार किया है। इसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
पहली बात यह कि संसद पर आतंकी हमले में अफजल गुरू की सीधी संलिप्तता नहीं थी, पर, षड्यंत्र करने में उसे आरोपित किया गया था।इसका मतलब यह नहीं कि वह निर्दोष था। 
दूसरी बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अफ़ज़ल गुरू के मामले में निर्णय देते हुए कहा कि उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य तो नहीं हैं, पर परिस्थतियाँ  उस ओर ही इशारा कर रही हैं।
तीसरी बात यह कि उसे मृत्युदंड देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने "सामूहिक चेतना" का हवाला दिया और इसके आधार पर अपने निर्णय को जस्टिफाइ किया। 
चौथी बात यह कि उपरोक्त तथ्यों के आलोक में उसे जो सज़ा दी गई, वह उसके द्वारा किए गए अपराध की तुलना में ज़्यादा थी।
पाँचवी बात यह कि फाँसी देने के पहले न तो उसके परिवार वालों को  उससे मिलने दिया गया और न ही फाँसी देने के बाद उसके पार्थिव शरीर को ही उसके परिवार वालों को सौंपा गया।
छठी बात यह कि आतंकी हमलों में प्रत्यक्ष रूप से संलिप्तता के बावजूद अकाली दल के समर्थन और अफ़ज़ल गुरू को फाँसी के लिए दबाव बनाने वाली भाजपा के इस मसले पर नरम रूख के कारण राजाओना और भुल्लर के साथ रियायत बरती गई, जबकि संभावित लोकसभा चुनाव में भाजपा कहीं इसे चुनावी मुद्दा न बना ले और इसका उसे राजनीतिक लाभ न मिले, इसे सुनिश्चित करने के लिए यूपीए सरकार ने कसाब और अफ़ज़ल गुरू को कुछ दिनों के अंतराल पर अफ़रा-तफ़री में फाँसी पर चढ़ाया। 
इस आलोक में फाँसी का विरोध उचित ही जान पड़ता है, लेकिन मेरी नज़रों में आज इस मुद्दे की अहमियत सिर्फ़ इतनी है कि:
1.भविष्य में अफ़ज़ल वाली घटना न दुहराए।
2.फाँसी की सज़ा समाप्त हो।
3. जब तक फाँसी की सज़ा समाप्त नहीं होती,
    तब तक फाँसी के पूर्व की सारी
    औपचारिकताओं का निर्वाह अनिवार्यत: हो।
अब प्रश्न उठता है कि क्या अफ़ज़ल को फाँसी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना ग़लत है? क्या इसे राजद्रोह माना जाए या फिर देशद्रोह? मेरी नज़रों में न तो अफ़ज़ल की फाँसी का विरोध ग़लत है और न ही सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना ही राजद्रोह है। देशद्रोह तो क़तई नहीं। अगर ऐसा है, तो एनजेएसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा "अनिर्वाचितों का आतंक" ( Tyranny Of The Unelected)  कहते हुए आलोचना को उचित कैसे ठहराया जा सकता है? अगर अफजल की फाँसी को "न्यायिक हत्या" ( Judicial Killing) कहना देशद्रोह है, तो अफ़ज़ल को शहीद मानने वाले और "न्याय का उपहार/मज़ाक़"( A Travesty Of Justice) कहकर आलोचना करने वाली पीडीपी के साथ गठबंधन को देशभक्ति का उदाहरण कैसे माना जा सकता है?हाँ, यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि आलोचना करते वक़्त भाषा मर्यादित और संयमित होनी चाहिए तथा यह न्यायपालिका की आलोचना तक सीमित रहे, न कि न्यायपालिका की अवमानना करे।

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एंटी-इंडिया स्लोगन कहाँ तक उचित ?
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अब प्रश्न उठता है कि  जेएनयू में नौ फ़रवरी की रात जो एंटी-इंडिया स्लोगन लगे , उसे क्या माना जाय? सबसे पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि एंटी-इंडिया-स्लोगन लगाए जाने की जितनी आलोचना की जाए,वह उतना ही कम है। दूसरी बात यह कि दोषियों की पहचान की जाए और उनके विरूद्ध कार्यवाही हो, चाहे वे जेएनयू के हों या फिर बाहर के। तीसरी बात यह कि इस बहाने पूरे जेएनयू को बदनाम किया जाना, जेएनयू के छात्रों की गिरफ़्तारी और पुलिसिया कार्यवाही के ज़रिए पूरे जेएनयू के छात्रों को आतंकित किया जाना ग़लत है। विशेषकर इस प्रकरण में दिल्ली पुलिस, जेएनयू प्रशासन, भाजपा, एबीवीपी, इलेक्ट्रानिक मीडिया,गृहमंत्री और मानव संसाधन मंत्री जो भूमिका रही और इनके बीच के मूक गठबंधन ने जिस तरह का माहौल सृजित किया उसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम है।
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कन्हैया की गिरफ़्तारी:
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अब प्रश्न यह उठता है कि जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ़्तारी अनावश्यक थी। इससे केन्द्र सरकार की टकराव की राजनीति का पता चलता है। यह भी पता चलता है कि केन्द्र सरकार इस घटना का इस्तेमाल अपने लिए आँखों की किरकिरी बन चुके जेएनयू को हाशिए पर ले जाने , कैम्पस की छात्र राजनीति में वामपंथी वर्चस्व की समाप्ति, एबीवीपी को कैम्पस की राजनीति को मज़बूती से स्थापित करने और वामपंथ के बौद्धिक वर्चस्व को समाप्त करते हुए दक्षिणपंथी विचारधारा को बौद्धिक परिवेश की मुख्यधारा में स्थापित करने के उद्देश्यों से परिचालित है। साथ ही, इसके ज़रिए वह अपने राजनीतिक विरोधियों और अपने से असहमत लोगों को कड़ा संदेश देना चाहते हैं। यही वह बिंदु है जिसने कन्हैया की गिरफ़्तारी के बाद छात्रों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों 
और संघ-भाजपा विरोधियों को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ मिलकर संघ,भाजपा कन्हैया को बिना किसी प्रमाण के फ़र्ज़ी वीडियो के आधार पर बदनाम करने, उसे देशद्रोही साबित करने, जैश-ए-मोहम्मद से लिंकेज और अब विदेशी लिंकेज साबित करने के प्रयासों से इसकी पुष्टि होती है। जब कन्हैया पर सरकार कमज़ोर पड़ने लगी, तो उसने उमर ख़ालिद के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया।

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कन्हैया पर राजद्रोह का आरोप:
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अब प्रश्न यह उठता है कि कन्हैया, ख़ालिद और अबनिंरबन पर भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 124A के तहत् राजद्रोह का आरोप लगाना कहाँ तक उचित है? थोड़ी देर के लिए मैं मानकर चल रहा हूँ कि कन्हैया सहित इनलोगों ने भारत-विरोधी नारे लगाए, फिर भी इनलोगों के विरूद्ध राजद्रोह से संबंधित इस धारा को लगाया जाना ग़लत है। सुप्रीम कोर्ट ने केदार नाथ सिंह बनाम् बिहार सरकार वाद,1962 में यह निर्णय दिया और बलवंत सिंह एवं अन्य बनाम् पंजाब राज्य वाद, 1995 सहित कई मामलों में दुहराया कि महज़ देश-विरोधी नारे मात्र लगाने से किसी पर राजद्रोह का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। राजद्रोह का आरोप तब तक नहीं लगेगा जबतक यह प्रमाणित नहीं हो जाता है कि उसकी यह गतिविधि राज्य के विरूद्ध हिंसा की ओर न ले जाय।और हिंसा की यह बात सिर्फ़ परसेप्शन न हो वरन् उसका ठोस आधार हो। इसीलिए देर-सबेर कन्हैया सहित इन लोगों पर राजद्रोह का आरोप वापस लेना ही होगा। 
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अब प्रश्न यह उठता है कि क्या राजद्रोह का आरोप वापस लिए जाने की स्थिति में क्या माननीय गृहमंत्री,माननीय  मानव संसाधन मंत्री, कमिश्नर(दिल्ली पुलिस) और संघ परिवार, भाजपा, एबीवीपी और इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया के स्वयंभू न्यायाधीश देशभक्तगण कन्हैया, उसके परिवारवाले  एवं उसके साथियों, जेएनयू समुदाय, सोशल मीडिया पर हम जैसे गाली सुनने वालों और देश की जनता से माफ़ी माँगेंगे और ख़ुद को शर्मिंदा महसूस करेंगे? कदापि नहीं, क्योंकि माफ़ी माँगने का माद्दा उन्माद पैदा करने वालों में नहीं होता।
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राष्ट्र और राष्ट्रवाद के दुश्मन
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आप "राष्ट्र" और आपके "राष्ट्रवाद" का दुश्मन कोई और नहीं, आप ख़ुद हैं। जानते हो क्यों? क्योंकि न तो आपको  युद्ध के नियम मालूम हैं, न उसके प्रति इतना सम्मान का भाव कि आप उन्हें जान सकें और न ही आपको ये पता है कि आपके विरोधी कहाँ पर प्रहार कर रहे हैं? बस हवा में तलवार भाँजे जा रहे हैं? मेरे देश को बचाना आपके वश में नहीं है। छोड़ दो इन्हें हमारे भरोसे। इतने पर भी अपने ख़ून-पसीने से सींच लेंगे हम। हाँ, यह ज़रूर है कि वह तुम्हारा "राष्ट्र" नहीं होगा। तुम्हारा "राष्ट्र" कभी नहीं होगा क्योंकि तुम्हारे "राष्ट्र" में दुर्गा की पूजा की इजाज़त तो है, पर महिषासुर की पूजा की नहीं। भारत जब भी होगा, "बापू के सपनों का भारत" ही होगा। इसके लिए चाहे मैं रहूँ या न रहूँ! मैं तुम्हारी नज़रों में तो गिर सकता हूँ, पर अपनी नज़रों में नहीं!
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फ़र्क़ क्या है: आपमें और मुझमें?
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जानते हैं मित्र, क्या फ़र्क़ है आपमें और मुझमें? आप जेएनयू के भीतर "एंटी-नेशनल स्लोगन" को अहम् मान रहे हैं और आपका मानना है कि कठोरतम कार्रवाई के ज़रिए इस पर अंकुश लगाया जा सकता है। आप इस बात को या तो नहीं समझ रहे या फिर समझते हुए भी इसकी अनदेखी कर रहे हैं कि "देशभक्ति एक बहाना है। वास्तविक कारण है रोहित मामले से ध्यान भटकाना, संघ एवं भाजपा की आँख की किरकरी बने जेएनयू से वामपंथी वर्चस्व का अंत( जिसका सुनहरा अवसर एंटी-नेशनल स्लोगन ने प्रदान किया है) और उन लोगों को ( चाहे वे छात्र हों या शिक्षक या बुद्धिजीवी समूह) एक सख़्त संदेश देना जो संघ एवं भाजपा के एजेंडे को लागू करने के रास्ते में बाधा बने हुए हैं। साथ ही, काँग्रेस-मुक्त भारत के सपने को व्यावहारिक धरातल पर विपक्ष एवं विरोध-मुक्त भारत के एजेंडे में तब्दील करना, ताकि दक्षिणपंथ के राजनीतिक- बौद्धिक प्रभुत्व को न केवल सुनिश्चित किया जा सके, वरन् उसे विरोध-मुक्त किया जा सके। इन सबमें सहायक है देशभक्ति और राष्ट्रवाद। लेकिन, इस दृष्टिकोण के अपने ख़तरे हैं:
पहला, यह भारत जैसे विविधता से भरे समाज एवं संस्कृति के ताने-बाने को कमज़ोर करेगा तथा इसके लिए उपयुक्त बहुलतावादी राष्ट्रवाद को छिन्न-भिन्न करेगा।
दूसरी, यह अल्पसंख्यकों, आदिवासी जनजातियों और दलितों के हितों को ख़तरे में डालेगा। इससे हिन्दुओं का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होगा एवं सवर्ण हिन्दुओं के प्रभुत्व वाले धर्म केंद्रित राष्ट्रवाद की प्रतिष्ठा होगी जिसे आईआईटी, चेन्नई के अम्बेडकर-पेरियार स्टडी ग्रुप और हैदराबाद विश्वविद्यालय के रोहित वेमुला आत्महत्या प्रकरण से सशक्त चुनौती मिल रही थी। इनके लिए देशभक्ति और राष्ट्रवाद का उन्माद इसकी बेहतर काट हो सकता है।
तीसरा, यह भारतीय लोकतंत्र के भविष्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है और देश 1975 की तरह एक बार फिर से अधिनायकवाद के ख़तरे की ओर बढ़ सकता है।
चौथा, जादवपुर युनिवर्सिटी की घटना (16 फ़रवरी) इस बात का प्रमाण है कि इसके प्रति व्यापक प्रतिक्रिया की संभावना देश को बिखराव की ओर भी ले जा सकती  है।
पाँचवाँ, यह विश्वविद्यालय की स्वायत्ता में हस्तक्षेप को संस्थागत स्वरूप प्रदान करेगा। एफटीआईआई प्रकरण,आईटी बीएचयू से रैमन मैग्सैसे अवार्ड प्राप्त संदीप पाण्डेय को नक्सली बतलाकर बर्खास्त किया जाना, आईआईटी-चेन्नई, हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रकरण और अब जेएनयू प्रकरण इसके प्रमाण हैं तथा मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यह मसला यहीं पर समाप्त नहीं होने जा रहा है।
                    
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क्या होना चाहिए था?
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  अब निश्चय ही आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि आख़िर होना क्या चाहिए? तो, इस संदर्भ में मैं कहना चाहूँगा कि:
पहला, एंटी-नेशनल स्लोगन के मसले पर सरकार को प्रो-एक्टिव रोल से परहेज़ करना चाहिए था। 
दूसरा, जेएनयू प्रशासन द्वारा गठित जाँच समिति की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना चाहिए थी और उसके द्वारा की जाने वाली कार्यवाही का इंतज़ार करना चाहिए था।
तीसरी, ज़रूरत पड़ने पर उस रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही करने की दिशा में पहल की जा सकती थी।
चौथा, सरकार के ज़िम्मेवार पद पर बैठे लोगों,सत्तारूढ दल से जुड़े संगठनों और नेताओं तथा दिल्ली पुलिस को अनावश्यक बयानबाज़ी से परहेज़ करना चाहिए था।
पाँचवाँ, जेएनयू प्रशासन, इससे जुड़े शिक्षकों एवं छात्र- संगठनों को वार्ता इनगेज करने की दिशा में पहल भी अपेक्षित थी।
छठा, इस प्रक्रिया में उन छात्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए था जो ऐसी गतिविधियों में संलग्न थे। इससे समस्या की मूल जड़ों तक पहुँचने और उसके समाधान पर समावेशी विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिलती।
इससे समस्या को गंभीर होने से रोका भी जा सकता था और समय रहते इस पर अंकुश लगाने की दिशा में प्रभावी पहल भी संभव हो पाती। साथ ही, इस तरह की घटना को फैलने से रोका भी जा सकता था।
मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि जब दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों को अलगाववादियों के समर्थक राजनीतिक दल पीडीपी के साथ सरकार बनाने से परहेज़ नहीं है, कश्मीर एवम् उत्तर-पूर्व के विद्रोहियों से बात करने से परहेज़ नहीं है, नागा विद्रोहियों से बात करने हम सिंगापुर जा सकते हैं और नक्सलियों के साथ हम वार्ता की मेज़ पर बैठ सकते हैं; तो फिर इनको मौक़ा देने से परहेज़ क्यों ? उन्हें अपनी बातों को कहने का मौक़ा दिए बग़ैर आप कैसे इस पर अंकुश लगायेंगे? कम-से-कम सरकार का यह रवैया तो किसी सार्थक दिशा की ओर ले जाने वाला नहीं है।
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और अंत में••••••••
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मैं तो नहीं रूकने वाला। मैंने न तो अपनी आत्मा को बेचा है और न ही मुझे कोई बरगला सकता। रही बात आपकी, तो वो आप जानें। मैं तो सिर्फ़ इतना कहूँगा:
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध;
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी उनका भी अपराध!


Sunday, 31 January 2016

"अनुपम खेर : आप तो ऐसे न थे"

""अनुपम खेर जी, आपसे ये उम्मीद नहीं थी. आपने तो शासन करने की मोदी जी की क्षमता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। अल्पसंख्यक मुसलमान  तो पहले से ही अपनी असुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं को अभिव्यक्ति दे रहे थे , अब बहुसंख्यक हिन्दुओं को भी असुरक्षा का अहसास होने लगा। 
                                                 आपने तो उन  लोगों को भी दुविधा में डाल दिया जो कल तक आमिर और शाहरुख को असहिष्णुता और असुरक्षा सम्बन्धी अहसासों की अभिव्यक्ति के कारण देशद्रोही की संज्ञा दे रहे थे और पाकिस्तान भेजने की बात कर रहे थे।  मेरी चिंता यह है की अगर कहीं वो आपको नेपाल भेजने लगे, तो फिर आपकी समस्याएं और बढ़ जाएँगी क्योंकि वोहन की स्थिति आजकल ठीक नहीं है।  भारत और भारतियों के नाम पर ही नेपाली भड़क जा रहे हैं।  हाँ, अगर मधेशी बहुल इलाके में भेंजे , तो थोड़ी राहत होगी।                                                                                    
                                                  पर, घबराएँ नहीं, हम सब आपके साथ हैं।असुरक्षा के आपके अहसास को दूर करने और आपकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने की हरसंभव कोशिश करूँगा ।  मैं मोदी सरकार से यह मांग करता हूँ कि आपकी हरसंभव सुरक्षा सुनिश्चित की जाये और असुरक्षा के आपके एहसास को दूर करने के लिए उचित कदम उठाये जायें।  अगर ज़रुरत पड़ी,तो धर्मनिरपेक्षों और तथाकथित धर्मनिरपेक्षों को दण्डित भी किया जाये। इसके लिए अगर ज़रुरत पड़े ,तो आपको भारत-रत्न भी ऑफर किया जाये। वैसे आप चाहें तो इसके विरोध में आप अपना पद्म भी  वापस   कर सकते   हैं। आपके इस संघर्ष में मैं आपके साथ हूँ। ""

Saturday, 30 January 2016

"गाँधी को गोडसे ने नहीं मारा!"

बापू, हम सब आपके गुनाहगार हैं। हम सबने आपकी हत्या की है।आपको गोडसे नहीं मारा।ज़रूर ग़लतफ़हमी हुई है लोगों से। गोडसे तो मोहरा बना। उसे तो नाहक ही सज़ा मिली। वास्तव में जो हत्यारे थे वे बच निकले। आज भी वे फल-फूल रहे हैं। चलें, थोड़ी देर के लिए मान ही लेते हैं कि आपको गोडसे ने ही मारा, तो क्या गोडसे को फाँसी के साथ मर गया गोडसे,नहीं न? तो फिर••••••••••• गोडसे ने तो सिर्फ़ एक बार मारा था आपको, हम सब तो बार-बार मार रहे हैं आपको। जब कभी ज़रूरत पड़ती, आपका इस्तेमाल करते हैं और जैसे ही ज़रूरत समाप्त होती है, कभी आपको धकियाते हैं और कभी आपकी सोच को। आपके प्रति ऐसी सोच यत्र-तत्र-सर्वत्र मौजूद है। देखें न,हम भारतवासी आपका कितना सम्मान करते हैं? आपके नाम पर लोकोक्ति और मुहावरे चल पड़े हैं: मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी, अब गाँधी बनने से काम नहीं चलेगा, आज गाँधी भी  होते, तो ऐसा ही करते वग़ैरह - वग़ैरह।बापू, आप हमारा इशारा नहीं समझ रहे हैं। जानते हैं आप, हम भारतीय आपको याद क्यों करते हैं? क्योंकि, आपके नाम पर साल में एक दिन छुट्टी मिल जाती है। अन्यथा सालों भर, तीन सौ चौसठों दिन डाक विभाग के बहाने हम तो आपके मुँह पर कालिख पोतते रहते हैं।
दरअसल बापू, गोडसे कोई व्यक्ति नहीं था। गोडसे एक सोच था, ऐसी सोच जो समय के साथ प्रभावी होती चली गई, जो सोच कभी १९८४ में दिखती है, तो कभी २००२ में और कभी २०१५ में। यह सोच कभी समाप्त नहीं हुई। अत: ज़रूरत इस सोच से लड़ने की है। यह सोच काँग्रेस में भी है और भाजपा में भी। यह सोच वामपंथियों के यहाँ भी है और आपाइटों के यहाँ भी। इस सोच से लड़ने की क़ीमत है और वही व्यक्ति इस सोच के साथ लड़ सकता है जो इसकी क़ीमत चुकाने के लिए तैयार है।

Tuesday, 12 January 2016

बीपीएससी मुख्य परीक्षा ट्रेंड एनालाइसिस पार्ट थ्री: भूगोल एवं अर्थव्यवस्था खंड

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भूगोल एवं अर्थव्यवस्था खंड
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बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा में भूगोल एवं अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रश्नों को एक ही खंड में रखा गया है। सामान्यत: इस खंड से जो भी प्रश्न पूछे जाते हैं, उनके आधार पर निम्न बातें कही जा सकती हैं:
A. भारत एवं बिहार का भूगोल:
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भूगोल खंड से प्रश्न सामान्यत: तीन हिस्सों से पूछे जाते हैं:
1. भौतिक एवं पर्यावरण-भूगोल
2. आपदा और आपदा-प्रबंधन
3. मानव एवं आर्थिक भूगोल
भौतिक एवं पर्यावरण भूगोल के अंतर्गत
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प्राकृतिक विविधता,मानसून, मौसम-पूर्वानुमान, जल-संसाधन प्रबंधन, राष्ट्रीय जल नीति-2012,वायु-प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, लीमा एवं पेरिस सम्मेलन आदि महत्वपूर्ण हैं।
आपदा और आपदा-प्रबंधन के अंतर्गत
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प्राकृतिक आपदा,बाढ़, सूखा,भूकम्प और चेन्नई आपदा आदि को विशेष रूप से तैयार करें। इसके कारण और प्रभाव, विशेष रूप से मानव निर्मित पक्ष तथा बिहार को तैयार करें।
मानव एवं आर्थिक भूगोल के अंतर्गत
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जनगणना-2011, कन्या भ्रूण-हत्या,शहरीकरण-प्रबंधन,स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, अमृत परियोजना, सौर ऊर्जा एवं इसके संदर्भ में हाल की प्रगति(बिहार के विशेष संदर्भ में), ठोस कचरा-प्रबंधन आदि टाॅपिक महत्वपूर्ण हैं।
B. भारतीय अर्थव्यवस्था :
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अर्थव्यवस्था खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों को निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. सामाजिक एवं आर्थिक विकास
2. आयोजन 
3. कृषि,उद्योग एवं व्यापार
4. सार्वजनिक वित्त
सामाजिक एवं आर्थिक विकास के अंतर्गत 
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जीडीपी आकलन विधि में संशोधन, ग़रीबी, बेरोज़गारी,समावेशी विकास, सतत् विकास, जनांकिकीय लाभांश तथा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं समावेशन से संबंधित सरकारी योजनाएँ एवं कार्यक्रम शामिल हैं।
सरकारी योजनाएँ एवं कार्यक्रम के अंतर्गत जनधन स्कीम, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन-ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ:बेटी पढ़ाओ,स्वच्छ भारत मिशन आदि शामिल हैं।
आयोजन के अंतर्गत
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बारहवीं पंचवर्षीय योजना, आयोजन एवं समावेशी विकास,स्वतंत्र भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में योजना आयोग की भूमिका का मूल्याँकन, आयोजन की प्रासंगिकता, योजना आयोग-नीति आयोग तुलना,नीति आयोग के गठन का औचित्य, नीति आयोग: विविध पक्ष, विशेष राज्य के दर्जे की समाप्ति का प्रश्न और बिहार, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि(BRGF) की समाप्ति और इसका बिहार के विकास पर असर आदि महत्वपूर्ण हैं।
कृषि,उद्योग एवं व्यापार के अंतर्गत
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बिहार में भूमि-सुधार, भूमि-अधिग्रहण विवाद,कृषि अर्थव्यवस्था में िस्थरता ,दूसरी हरित क्रांति एवं पहली हरित क्रांति के सबक़ , नई ऊर्वरक सब्सिडी नीति, नई यूरिया नीति, कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ, कृषि क्षेत्र का विकास एवं जेनेटिकली माॅडिफाइड क्राॅप्स, किसानों की बढ़ती आत्महत्या , आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के आलोक में कृषि क्षेत्र, बिहार में कृषि क्षेत्र के विकास की रणनीति एवं इसके समक्ष मौजूद चुनौतियाँ आदि महत्वपूर्ण है।
उद्योग के अंतर्गत लघु उद्योगों का योगदान एवं महत्व, बिहार में कृषि आधारित उद्योगों के की संभावनाएँ, राष्ट्रीय विनिर्माण नीति-2011, मेक इन इंडिया, मेक इन इंडिया: रक्षा क्षेत्र का विशेष संदर्भ, खाद्य प्रसंस्करण आदि महत्वपूर्ण हैं।
व्यापार के अंतर्गत नवीन पंचवर्षीय व्यापार नीति (२०१५-२०), विश्व व्यापार संगठन: दोहा दौर एवं नैराबी सम्मेलन,२०१५; ट्रिप्स विवाद आदि टाॅपिक महत्वपूर्ण हैं।
सार्वजनिक वित्त के अंतर्गत
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वस्तु एवं सेवा कर : संबंधित विवाद,सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें एवं इसका सार्वजनिक वित्त पर प्रभाव, चौदहवाँ वित्त आयोग, तेरहवें वित्त आयोग से तुलना आदि महत्वपूर्ण हैं।
स्रोत-सामग्री:
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१. सार्थक बिहार मुख्य परीक्षा सामान्य
अध्ययन स्पेशल: कुमार सर्वेश, संजय कुमार
सिंह एवं अन्य।
२. भारतीय अर्थव्यवस्था : कुमार सर्वेश
सार्थक प्रकाशन

Thursday, 7 January 2016

नेपाल: पहले निकटस्थ पड़ोस की भारतीय नीति की त्रासदी

         नेपाल: "पहले निकटस्थ पड़ोस" की 
               भारतीय नीति की त्रासदी
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मुझसे अगर कोई पूछे कि नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्रित्व काल के पिछले उन्नीस महीने के दौरान विदेश नीति के मोर्चे पर की गई पहलों में आप किस क़दम को मास्टर स्ट्रोक के रूप में देखते हैं, तो निश्चय ही मेरा जवाब होगा अपने शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया जाना। यह शायद सबसे महत्वपूर्ण पहल थी जिसके ज़रिए उन्होंने पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध को अनौपचारिक टच देते हुए विदेश नीति को नई दिशा और नई गति देने की कोशिश की थी। साथ ही, इस बात का संकेत भी देने का प्रयास किया गया कि अब छोटे पड़ोसी देश भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकता में शीर्ष पर होंगे।
"पहले नज़दीक़ पड़ोस" की नीति:
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"मोदी डाॅक्ट्रिन"(अगर ऐसा कुछ है,) गुजराल डाॅक्ट्रिन से इस मायने में भिन्न है कि यह पड़ोसी देशों के साथ "एकतरफ़ा रियायतों" की जगह समानता पर आधारित संबंधों की प्रस्तावना करता है जो पड़ोसी देशों में विद्यमान हीनभावना तथा पहचान के संकट के साथ-साथ "बड़े भाई" की भूमिका से संबंधित उनकी आशंकाओं के निवारण में समर्थ है। यह अगर मोदी डाॅक्ट्रिन की शक्ति है, तो सीमा भी। सीमा इसलिए कि यह दक्षिण एशियाई राष्ट्र के इस सच की अनदेखी करता है:"अगर दक्षिण एशियाई राष्ट्र आकार-प्रकार या फिर किसी भी दृष्टि से भारत के समकक्ष नहीं हैं, तो फिर उनके साथ समानता पर आधारित सम्बंधों की स्थापना की दिशा में पहल बेमानी है।"
दरअसल आवश्यकता थी गुजराल डाॅक्ट्रिन की एकतरफ़ा रियायतों की नीति को समानता पर आधारित संबंधों के ज़रिए समर्थन प्रदान करने की, ताकि पारस्परिक संदेह और अविश्वास को दूर करते हुए पारस्परिक विश्वास की बहाली को सुनिश्चित किया जा सके और भारत के पड़ोसी देशों को भारतीय हितों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील बनाया जा सके। लेकिन, वर्तमान सरकार की आक्रामक विदेश नीति, जो आर्थिक हितों और सुरक्षा चिंताओं को विदेश नीति के केन्द्र में रखती है और हर क़ीमत पर जल्दबाज़ी में बिना समय दिए उसका त्वरित समाधान चाहती है, कहीं-न-कहीं इस ज़मीनी वास्तविकता की अनदेखी करती है। 
निकटस्थ पड़ोस नीति का व्यावहारिक पक्ष:
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नवनिर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री ने जब अपनी विदेश यात्रा की शुरूआत भूटान और नेपाल से की, तो इससे पड़ोस में उत्साह का माहौल भी बना और सकारात्मक संदेश भी पहुँचा। लेकिन, शीघ्र ही यह उत्साह थमता भी दिखाई पड़ा। अफ़ग़ानिस्तान और श्रीलंका में क्रमश: अशरफ़ घानी और महिंदा राजपक्षे की भारत-विरोधी नीतियों के कारण भारत को प्रतिकूल परिसि्थतियों का सामना करना पड़ा, यद्यपि फ़रवरी,2015 में श्रीलंका में सत्ता-परिवर्तन और नवम्बर,2015 तक आते-आते पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान नीति की प्रतिक्रिया में अफ़ग़ान सरकार के रूख में परिवर्तन के बाद भारत के लिए अनुकूल परिस्िथतियाँ बनी हैं। जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है, तो पिछले सोलह महीने का अनुभव यह बतलाता है कि वर्तमान में भारत की कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। हम अभी "ट्रायल एंड एरर" की नहीं, "एरर एंड एरर" की नीति पर चल रहे हैं और पता नहीं कबतक इस नीति पर चलते रहेंगे? मालदीव रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के बावजूद भारतीय विदेश नीति में उपेक्षित और तिरस्कृत है। वहाँ मोदी सरकार ने चीन को "वाक ओवर" दे रखा है। उपलब्धि के नाम पर बंगलादेश और म्याँमार है, पर उसे भी पिछली सरकार की विदेश नीति की निरंतरता में देखे जाने की ज़रूरत है। जिस लैंड बार्डर एग्रीमेंट को भारतीय संसद की अनुमति को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, दरअसल वह भी पिछली सरकार की उपलब्धि है जो विपक्ष में रहते हुए भाजपा की नकारात्मक भूमिका के कारण अटका बुआ था। जहाँ तक नेपाल की बात है, तो इसे निकटस्थ पड़ोस के प्रति भारतीय नीति की त्रासदी की संज्ञा दी जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
नेपाल: निकटस्थ पड़ोस नीति की त्रासदी
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नेपाल पर चर्चा शुरू करने के पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक प्रतीत होता है कि नेपाल भारत का ऐसा पड़ोसी देश है जिसने 1950 के दशक से ही भारत के विरूद्ध चीनी कार्ड का प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल किया है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की है। भारत की नेपाल नीति को निर्धारित करते समय इस बात को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि नेपाल के साथ भारत ने अक्सर बड़े भाई वाली भूमिका निभाई है और जब-तब हाथ मरोड़ने की कोशिश की है। तीसरी बात यह कि भारत और चीन के बीच बफ़र स्टेट के रूप में नेपाल की भूमिका उसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना देती है। चौथी बात यह कि भारत की नेपाल नीति हमेशा से लुँज-पुँज रही है और इस कारण नेपाल की भारत पर निर्भरता के बावजूद नेपाल-भारत द्विपक्षीय संबंध कभी बहुत बेहतर नहीं रहा है। भारत-विरोधी शक्तियाँ नेपाल में हमेशा से सक्रिय रही हैं।
पहली नेपाल यात्रा,अगस्त 2014:
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प्रधानमंत्री बनने के बाद छह महीने के अंदर मोदी जी को दो बार नेपाल की यात्रा करनी पड़ी। अगस्त,2014 में पहली बार मोदी जी नेपाल दौरे पर गए । भूटान के बाद यह उनका दूसरा विदेशी दौरा था। इस यात्रा के दौरान उन्होंने द्विपक्षीय संबंध को जो अनौपचारिक रूप देने का प्रयास किया और जिस तरह से उनकी इस यात्रा विभिन्न राजनीतिक दलों और उसके नेताओं (यहाँ तक कि माओवादी दल के प्रमुख प्रचंड भी )की ओर से ज़बरदस्त रेस्पान्स मिला, निश्चय ही उसने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा से लैस करते हुए इसमें नई गरमाहट पैदा की। 
दूसरी नेपाल यात्रा,नवम्बर,2014:
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लेकिन, समस्या की शुरूआत भी इसी पृष्ठभूमि में हुई।नवम्बर,2014 में काठमांडू में आयोजित सार्क सम्मिट में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को काठमांडू जाना था। इस दौरान वे जनकपुर में पब्लिक मीटिंग को सम्बोधित करना चाहते थे और उसी दौरान लड़कियों के बीच साइकिल का वितरण उनके द्वारा किया जाना था। लेकिन, इस कार्यक्रम को अनुमति के प्रश्न के राजनीतिकरण की पृष्ठभूमि में नेपाल की सरकार ने अंतिम समय में अनुमति देने से इन्कार किया। इसने नेपाली मधेशियों को नाराज़ किया और वे इसका विरोध करते हुए सड़कों पर उतरे। उन्होंने नेपाल सरकार के विरोध में और भारत के साथ-साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में नारे लगाए। इसका असर कहीं-न-कहीं द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा।
नेपाल-भूकम्प प्रकरण:
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अप्रैल,2015 में आए नेपाल भूकम्प ने भी द्विपक्षीय संबंधों को ज़बरदस्त झटका दिया। राहत और बचाव के संदर्भ में भारत की ओर से जो त्वरित प्रतिक्रिया आई और जो प्रो-एक्टिव स्टेप्स लिए गए, उम्मीद की जा रही थी कि यह क़दम द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूती देगा, लेकिन हुआ ठीक उलटा। जिस तरह से भूकम्प-राहत एवं बचाव सहायता पर मीडिया और सोशल मीडिया में भारतीयों की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं, उससे ऐसा लगा कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश था जो राहत एवं बचाव कार्य में नेपाल को सहायता प्रदान कर रहा है। इस क्रम में सोशल मीडिया में ऐसी टिप्पणियों और फ़ोटोग्राफ़ की बाढ़-सी दिखाई पड़ी जिससे नेपाल की संप्रभुता के प्रति असम्मान और अनादर का भाव प्रकट होता हो। इसकी नेपाल में व्यापक प्रतिक्रिया हुई और अंततः नेपाली दबाव में भारत को अपना राहत एवं बचाव दल वापस बुलाना पड़ा जिससे भारत की काफ़ी फ़ज़ीहत हुई। इस पूरे प्रकरण में भारत की औपचारिक प्रतिक्रिया भी बहुत कुछ इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया वाली ही रही।
नेपाली संविधान का निर्माण:
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नेपाल के नये संविधान के निर्माण की प्रक्रिया 2006 में शुरू हुई और सितम्बर,2016 में पूरी हुई। इस क्रम में तीन महत्वपूर्ण मसलों पर मतभेद उभरकर सामने आए: संघवाद, राज्यों की संख्या, चुनाव-पद्धति और राजनीतिक व्यवस्था: संसदीय प्रणाली या अध्यक्षात्मक व्यवस्था। आरम्भ से ही भारत नृजातीय पहचान पर आधारित संघीय ढाँचे, संसदीय व्यवस्था और धर्मनिरपेक्ष नेपाल के पक्ष में रहा है। लेकिन, केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार बनने के बाद से भारत ने धर्मनिरपेक्ष नेपाल के प्रश्न पर चुप्पी साध ली और संघ परिवार ने हिन्दू राष्ट्र के रूप में नेपाल की पहचान को बनाए रखने के लिए प्रयास शुरू किए जिसका नेपाल के सेक्यूलर तबके तक ग़लत संदेश गया और इसके द्वारा ऐसे प्रयासों का ज़बरदस्त विरोध किया गया। लीक दस्तावेज़ यहाँ तक बतलाते हैं कि हिन्दू राष्ट्र के रूप में नेपाल की पहचान को क़ायम रखने के लिए मोदी सरकार ने नेपाल को संदेश भी भेजा।
खैर, इन तमाम मतभेदों के बावजूद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत ने नेपाल को यह संदेश देने की कोशिश की कि वह संविधान के निर्माण को नेपाल का आंतरिक मसला मानता है और इसमें वह कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। नेपाल ने भी औपचारिक और अनौपचारिक रूप से भारत को यह आश्वस्त किया कि वह भारत की चिंताओं का ध्यान रखेगा। पर, सितम्बर,2015 में जब नेपाल ने अपने संविधान को अंतिम रूप दिया, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हुआ। भारत ने नेपाल को सात सूत्री दिशानिर्देश दिए और इसके अनुरूप संविधान में संशोधन करने के लिए कहा। ये दिशानिर्देश संघीय ढाँचे, राज्यों के निर्माण एवं इसके स्वरूप तथा नागरिकता संबंधी प्रावधानों से संबंधित थे । यह सच है कि नेपाल ने वादाखिलाफी की; फिर भी नेपाल का संविधान कैसा हो, इसका निर्णय नेपाल की जनता के द्वारा होना चाहिए, न कि भारत के द्वारा। इसीलिए इसे भारत की सबसे भयंकर भूल के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए।
भारत की चूक:
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नेपाल मामले में भारत ने कूटनीतिक अपरिपक्वता का परिचय देते हुए कई भूलें की जिसकी भारी क़ीमत भारत को आने वाले समय में चुकानी पड़ सकती है। आज मधेशियों के अलावा सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के द्वारा भारत का विरोध किया जा रहा है और नेपाल मेंँ मौजूद मधेशी संकट के लिए पूरी तरह से भारत को ज़िम्मेवार माना जा रहा है। यद्यपि ऐसा माना जाना उचित नहीं है, तथापि भारत को इस ज़िम्मेवारी से मुक्त भी नहीं किया जा सकता है। नेपाल मेंँ भारत- विरोधी भावनाएँ चरम् पर हैं और प्रतिक्रिया में नेपाल चीन के क़रीब जा रहा है। यद्यपि चीन नेपाल में भारत का स्थान नहीं ले सकता है, फिर भी नेपाल में चीन के लिए स्पेस क्रिएट होता जा रहा है। इसके कारण नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नेपाल का नया संविधान है जो भारत की बजाय चीनी अपेक्षाओं कहीं अधिक क़रीब है और जो आने वाले समय में चीन के प्रभाव को बढ़ाने वाला एवं भारत के प्रभाव को सीमित करने वाला साबित हो सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के लिए नेपाल तेज़ी से दूसरा पूर्वी पाकिस्तान और श्रीलंका बनने की राह पर तेज़ी से अग्रसर है, यदि समय रहते िस्थति को क़ाबू में नहीं किया गया। अगर आज नेपाल में भारत के सामरिक हित दाँव पर लगे चुके हैं, तो इसके लिए भारत की रणनीतिक भूलों को ज़िम्मेवार माना जा सकता है:
1.भारत द्वारा बैंक चैनल डिप्लोमेसी की उपेक्षा
2.नेपाली आश्वासन पर भारत द्वारा आँख मूँदकर
   भरोसा करना
3.नए संविधान के मसले पर भारत का
   आक्रामक रूख
4.भारत के ख़ुफ़िया तंत्र का पूरी तरह से विफल
   होना
5.नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी (वास्तव में ऐसा
   हो अथवा नहीं, पर इसको लेकर नेपाल में
   स्ट्रांग परसेप्शन बन चुका है।)
आज नेपाल भारत से यह अपेक्षा करता है कि वह मधेशियों के बीच अपने गुडविल का इस्तेमाल करते हुए मधेशी संकट, जिसके अलगाववादी रूप लेने के संकेत मिल रहे हैं,से बाहर निकलने में उसकी मदद करे। यह भारत के लिए अपने गुडविल और खोए हुए विश्वास की पुनर्बहाली हेतु एक अवसर भी है और यह भारत के हित में भी है ।