Saturday, 28 November 2015
Tuesday, 24 November 2015
हाँ, मैं सुरक्षित हूँ!
हाँ, मैं सुरक्षित हूँ,
पूरी तरह से सुरक्षित;
क्या हुआ
जो इस सुरक्षा के लिए
मुझे निर्भर रहना पड़ रहा है
तुम्हारी कृपा-दृष्टि पर?
हाँ, मैं आजाद हूँ,
पूरी तरह से आज़ाद ;
क्या हुआ
जो इस आज़ादी के लिए
मुझे तुमसे इजाज़त लेनी पड़ रही है?
हाँ,भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी है,
पूरी तरह से अभिव्यक्ति की आज़ादी;
क्या हुआ
जो इसके लिए
अनुपम खेर जैसे 'देश-भक्तों' की
इजाज़त लेनी पड़ रही है?
हाँ, भारत सहिष्णु है,
पूरी तरह से सहिष्णु;
क्या हुआ
जो इस सहिष्णुता की परिभाषा
तुम्हारे द्वारा तय की जाएगी?
किसी आमिर, किसी शाहरुख़ के कहने से
भारत असहिष्णु नहीं हो जाएगा।
हम नेस्तनाबूद कर देंगे
इन अामीरों और शाहरुख़ों को,
हम भेज देंगे
उन्हें पाकिस्तान,
हम घोषित करेंगे
उन्हें राष्ट्रद्रोही
और पाकिस्तानी आईएसआई का एजेंट भी,
हम नहीं देखेंगे
वह मूवी
जिसमें इन्होंने एक्टिंग की है।
हमने आमिर को आमिर
और शाहरुख़ को शाहरुख़ बनाया,
इसे साबित कर देंगे हम
इन्हें बर्बाद कर।
हम साबित कर देंगे
कि ये काम कर रहे हैं
चीन और अमेरिका के इशारे पर।
हम सघन 'सहिष्णुता-अभियान'चलायेंगे
फ़ेसबुक पर
और साबित कर देंगे, कि
कितना "सहिष्णु" है भारत,
कितना "आज़ाद-ख़्याल" है भारत,
और कितना "सुरक्षित" है भारत?
Tuesday, 3 November 2015
इरफ़ान हबीब और संघ परिवार बढ़ती हुई असहिष्णुता
असहिष्णुता: इरफ़ान हबीब और संघ परिवार
सबसे पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं आरएसएस और आईएसआईएस की तुलना के पक्ष में नहीं हूँ। साथ ही, मेरा यह मानना है कि इतिहासकार इरफ़ान हबीब को ऐसे सरलीकरण से परहेज़ करना चाहिए था। ऐसे सरलीकरण कहीं-न-कहीं संघ और भाजपा को ख़ुद को जस्टिफाइ करने का मौक़ा देते हैं। पर, अब प्रश्न उठता है कि इरफ़ान हबीब ने क्या कहा? ऐसा कहना कहाँ तक उचित है?
इरफ़ान हबीब की टिप्पणी:
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"अगर मुसलमानों को देखने/समझने के उनके तरीक़े पर विचार किया जाय , तो अक़्ल के लिहाज़ से इस्लामिक स्टेट्स और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बहुत अंतर नहीं है"
इरफ़ान हबीब की इस टिप्पणी के सावधानीपूर्वक विश्लेषण की ज़रूरत है। साथ ही, इसे संदर्भ से अलगाकर नहीं देखा जाय। उनकी टिप्पणी के हर शब्द महत्वपूर्ण हैं:
१.यहाँ संघ और आईएसआईएस की तुलना तो की जा रही है, पर सीमित संदर्भों में।
२. यह तुलना मुसलमानों के प्रति दोनों के नज़रिए के विशेष संदर्भ में की जा रही है।
३. यहाँ बतलाया जा रहा है कि दोनों अगर एक-दूसरे के क़रीब पहुँचते हैं, तो अक़्ल के संदर्भ में।
४.इस संदर्भ में दोनों में बहुत अधिक अंतर नहीं है। इसस़़े इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि टिप्पणीकार दोनों के बीच के अंतर को समझ रहा है, पर उसका यह मानना है कि यह अंतर बहुत अधिक नहीं है।
क्या इरफ़ान हबीब ग़लत हैं?
||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर संघ परिवार और आईएसआईएस की बारीकी से तुलना की जाए, तो ऊपरी स्तर पर इनमें चाहे जितनी भिन्नता हो, पर दोनों के मूल चरित्र में बहुत फ़र्क़ नहीं है। अगर मैं आस कह रहा हूँ, तो इसके पीछे पर्याप्त तर्क है:
१. दोनों ही संस्थाओं की सोच तार्किकता और बौद्धिकता का निषेध करती है तथा दोनों का ज़ोर आस्था और भावुकता पर है।
२.दोनों बहुलतावादी संस्कृति के विरूद्ध हैं और दोनों धर्म पर आधारित ऐसे राज्य के सृजन के पक्ष में हैं जिसमें धर्म आधारित क़ानून सर्वोच्च होगा।
३.हिंसा दोनों संगठनों के मूल चरित्र में है। आईएसआईएस हिंसा की चरम् िस्थति पर पहुँच चुकी है, जबकि संघ परिवार अभी हिंसा की आरंभिक अवस्था में जहाँ शस्त्र-पूजा की संस्कृति है। संघ की यह संस्कृति मालेगाँव ब्लास्ट के साथ अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है। साथ ही, जिस तरह से संघ से जुड़े भाजपा के नेता बयानबाज़ी कर रहे हैं, वह इसकी पुष्टि के लिए काफ़ी है।
अब सीधे आपके प्रश्न पर आता हूँ:
१. क्या यह सच नहीं है कि असहिष्णुता दोनों संगठनों के मूल में है? संघ असहिष्णुता के आरंभिक छोर पर है, तो आईएसआईएस अंतिम छोर पर।
२. क्या यह सच नहीं है कि मालेगांव के बाद संघ का चरमपंथ भी हिंसा के रास्ते पर चल पड़ा है?
३. क्या यह सच नहीं कि जिस तरह आईएसआईएस पान इस्लामिज्म की संकल्पना को लेकर चल रहा है और उसके पान-इस्लामिज्म के केंद्र में सुन्नी मौजूद हैं, ठीक उसी प्रकार संघ परिवार जिस हिंदु राष्ट्र की संकल्पना से प्रेरित है , उसके केन्द्र में सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों का वर्चस्व होगा । पिछड़ी जाति, दलितों, महिलाओं और अन्य धर्मावलंबियों की िस्थति वहाँ दोयम् दर्जे के नागरिक की होगी।
४.क्या यह सच नहीं है कि मोदी जी बहुमत की सरकार बनने के बाद इसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है? इन्हें लग रहा कि बहुमत का मतलब है कुछ भी करने की आज़ादी का मिल जाना।।
इसलिए यह चिंता केवल इरफ़ान हबीब जी की नहीं है, यह चिंता बौद्धिक समूह और सभ्य समाज की है कि क्या आरएसएस को आईएसआईएस बनने की छूट दी जाए? क्या डाॅ. गोबुल्स के इन अनुयायियों को झूठ की बुनियाद पर नफरत की राजनीति करने की छूट दी जाए? हाँ, हम असहिष्णुता के विरोध में औरसहिष्णुता के पक्ष में हैं; लेकिन "असहिष्णुता के प्रति सहिष्णुता" के पक्ष में नहीं। इन लोगों ने बुद्धिजीवियों की चिंताओं के प्रति सहानुभूति और समाधान का प्रदर्शन करते हुए उन चिंताओं का समाधान प्रस्तुत करने की बजाय इस पूरे-के-पूरे मसले का राजनीतिकरण करके गंध फैला रखा है।
आप उस इरफ़ान हबीब को हल्के में ले रहे हैं जिनके बिना मध्यकालीन भारतीय इतिहास की वहाँ पर परिकल्पना नहीं की जा सकती है जहाँ वह आज है, जिसने अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में रहते हुए हर प्रकार के कट्टरपंथ के विरूद्ध संघर्ष किया,जिसे वहाँ पसंद नहीं किया जाता रहा और जिस पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के द्वारा कई बार शारीरिक हमले भी किए गए।
कैसी सहिष्णुता है यह?
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ये किस प्रकार की सहिष्णुता है कि असहमति-प्रदर्शन के लिए के. सुदर्शन राव के नेतृत्व वाले भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने सलाहकार पैनल को भंग कर दिया जिसमें इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर शामिल थी।
क्या यह सच नहीं है कि आज जो भी लोग इनसे असहमत हैं,उनके विरुद्ध संघ,भाजपा,केंद्र सरकार, मोदी जी और भाजपा नेताओं के साथ-साथ उनके समर्थकों ने इनके विरूद्ध चरित्र हनन अभियान चला रखा है। रोमिला थापर ने आपात काल का विरोध किया, १९८४ के सिख-विरोधी दंगे के विरूद्ध सड़कों पर उतरीं, नंदीग्राम में सीपीएम का खुलकर विरोध किया और दो-दो बार यूपीए सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्म सम्मान ठुकराया; फिर भी ये पूछते हैं तब क्यों नहीं किया, उस समय तो ऐसी इंटेंसिटी नहीं थी? कृष्णा सोबती ने २०१० में पद्म सम्मान लेने से इन्कार कर दिया, पर ये इन्हें कांग्रेसी/वामपंथी नज़र आते हैं और उनके इशारे पर काम करते दिखाई पड़ते हैं।
Thursday, 22 October 2015
कैसी विरासत?
""एक ओर यूरोपियन माइग्रेंट क्राइसिस की मानवीय त्रासदी का प्रतीक बनकर आया सीरियाई बच्चा, दूसरी ओर हरियाणा के फ़रीदाबाद में दलित-आगज़नी काण्ड के शिकार बच्चे। कैसी विडम्बना है कि प्राकृतिक त्रासदी के शिकार उस बच्चे के प्रति भारत सहित पूरी की पूरी दुनिया ने अपनी पूरी संवेदना उड़ेल दी, लेकिन अपने घर के इस बच्चे के प्रति न तो हमारी संवेदना जग पा रही है है, न हमारे नेतृत्व वर्ग की। रही मीडिया की बात, तो वह टीआरपी की चिंता से आगे बढ़कर सोच पाने में असफल है। उसके ध्यान को आकृष्ट करने के लिए किसी गाय, किसी सुधीन्द्र कुलकर्णी,किसी अख़लाक़ या फिर किसी दामिनी का होना आवश्यक है। किसी जीतेन्द्र, वो भी हरियाणा का (यूपी या बिहार का होता, तो बात कुछ और होती) और वो भी दलित....... क्या आकर्षण हो सकता है इनमें? अच्छा किया जो मीडिया ने इस मसले को हासिए पर धकेल दिया। हमारे नेतृत्व वर्ग के लिए भी उसमें विशेष आकर्षण नहीं था। सही मायने में दलितों की िस्थति कुत्तों वाली ही रही है पारंपरिक भारतीय समाज में। जनरल साहब ने ग़लत थोड़े ही कहा, फ़िज़ूल बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है। वो तो भला हो बिहार चुनाव का, देर से ही सही , इस पर चर्चा तो शुरू हुई और सीबीआई की जाँच तो बैठी। हो सकता है कि तीसरे चरण का चुनाव आते-आते यह मसला और गरमाए। पता नहीं, हम भारतीयों का सीबीआई पर कितना अधिक विश्वास है कि इसके द्वारा जाँच की बात सामने आते ही मसला ठंडा होने लगता है, जबकि हम जानते हैं कि कुछ होने वाला नहीं है।
ख़ुशी की बात है कि यह मसला दलित-ग़ैर दलित का नहीं है। मसला पैसे की लेन-देन का है जिसे ज़बरन विरोधी दल दलित का मसला बतलाकर राजनीतिक रूप देने की कोशिश कर रहे हैं।बस बहुत याद आते हैं महाभोज के दा साहब और बिसू भी। खैर, इस मसले पर चर्चा के क्रम में उन्हें याद करने का क्या औचित्य और क्या प्रासंगिकता? मैं भी कितनी बहकी-बहकी बातें करने लगता हूँ?शायद जीतेंद्र ने पुलिस प्रोटेक्शन की माँग भी की थी और उसका पूरा परिवार पुलिस प्रोटेक्शन में था, पर क्या फ़र्क़ पड़ता है? हरियाणा बिहार थोड़े है जो वहाँ जंगलराज के बारे में सोचा जा सके। वहाँ तो संघ के दूत खट्टर साहब का रामराज्य है। वहाँ जंगलराज की बात सोचना भी पाप है। देशद्रोहियों, तुम्हें नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी।""
बस इतना ही सोचता हूँ, झारखंड में पाँच महिलाओं को डायन बतलाकर पीट-पीट कर हत्या,दाभोलकर.....मुरूगन......कलबुर्गी.......पत्रकार नरेंद्र.........आईपीएस नरेंद्र.......अख़लाक़........और अब जीतेंद्र...... सरकार किसी की भी हो, परिणाम तो यही होना है। कौन-सी विरासत हम छोड़ने जा रहे हैं अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए? क्या जवाब देंगे हम अपने बच्चों को?
Friday, 2 October 2015
विचित्र दुविधा
विचित्र दुविधा
आज किसे याद करूँ :
"दादरी" तुम्हें या बापू को?
बापू, जो दूसरे नाम हैं
भारतीय संस्कृति की समन्वय और सहिष्णुता के,
हैं उसके आधुनिक संस्करण के मूर्तिमान रूप,
या फिर "दादरी" तुम्हें
जिसने पहले बापू की हत्या की
और अब आमदा हो
उन मूल्यों एवं आदर्शों की हत्या पे,
जिसे बाद में गाँधीवाद कहा गया,
जिसे गाँधी ने भारतीय संस्कृति से ग्रहण किया,
किया जिसे परिष्कृत और परिमार्जित ?
नहीं, "दादरी"
पहले तुम,
तुम इसीलिए कि
गाँधी तो मर चुके हैं,
तुमने तो उन्हें एक बार मारा था,
पर पिछले सड़सठ वर्षों से
हम सब मिलकर रोज़ मार रहे हैं उसे,
विवश कर रहे हैं उसे
घुट-घुटकर मरने के लिए,
तुमने तो हमारे काम को आसान कर दिया था।
पर, अब नहीं,
अब अहसास हो गया है
कि तुम मुझे मारना चाहते हो।
पर, "दादरी"
कैसे याद करूँ तुम्हें?
तुम तो प्रतीक हो विभाजनकारी मानसिकता के,
उस असहिष्णुता की संस्कृति के,
जो पैर पसार रही है पूरी दुनिया में
वैश्वीकरण की पृष्ठभूमि में,
जो ख़ाक करने की सोच रखती है
हमें और हमारी संस्कृति को,
जो लीलने को तत्पर है
गंगा-जमुनी तहज़ीब को।
अब तुम्हीं बतलाओ "दादरी"
कैसे याद करूँ तुम्हें?
तुम तो मानस संतान हो
"हिटलर" की,
ऐसी सन्तान
जो उसके पहले से विद्यमान है,
जो कभी क्रूसेड के रूप में प्रकट होती है,
तो कभी लादेन और आईएसआईएस रूप में,
कभी तुम गोधरा के रूप में प्रकट होती हो,
तो कभी सिख विरोधी दंगे के रूप में।
अरी "दादरी"
तुमने कलंकित किया है हमें
हमारी संस्कृति को,
और सबसे बढ़कर भारतीयता को।
तुमने तो
कलंकित किया है
बापू के देश को,
बापू के वेश को
और बापू की सोच को।
तुमने कलंकित किया है उस कबीर को,
जिन्होंने कहा था:
"माँस-माँस तो एक है
जस बकरी, तस गाय।"
तुम्हारी संस्कृति "भारतीय" नहीं हो सकती,
संभव नहीं इसका भारतीय होना,
तुम भला गाय और बकरी के अभेदत्व को क्या जानो?
तुम्हें तो बक़रीद पर बकरी के मारे जाने से कोफ़्त है,
दशहरे की बलि तुम्हें कहाँ याद रहती?
घर में बैठ कर मटन- चिकन खाने से तुझे परहेज़ न हो, पर
फ़ेसबुक पर अहिंसावाद के प्रति
तुम्हारी प्रतिबद्धता के आगे
गाँधी भी शर्मिंदा होते हैं।
नहीं,अब और नहीं
हमें आगे आना ही होगा,
नफरत को भुलाना ही होगा,
देश को बचाना ही होगा।
"दादरी" तुम्हें या बापू को?
बापू, जो दूसरे नाम हैं
भारतीय संस्कृति की समन्वय और सहिष्णुता के,
हैं उसके आधुनिक संस्करण के मूर्तिमान रूप,
या फिर "दादरी" तुम्हें
जिसने पहले बापू की हत्या की
और अब आमदा हो
उन मूल्यों एवं आदर्शों की हत्या पे,
जिसे बाद में गाँधीवाद कहा गया,
जिसे गाँधी ने भारतीय संस्कृति से ग्रहण किया,
किया जिसे परिष्कृत और परिमार्जित ?
नहीं, "दादरी"
पहले तुम,
तुम इसीलिए कि
गाँधी तो मर चुके हैं,
तुमने तो उन्हें एक बार मारा था,
पर पिछले सड़सठ वर्षों से
हम सब मिलकर रोज़ मार रहे हैं उसे,
विवश कर रहे हैं उसे
घुट-घुटकर मरने के लिए,
तुमने तो हमारे काम को आसान कर दिया था।
पर, अब नहीं,
अब अहसास हो गया है
कि तुम मुझे मारना चाहते हो।
पर, "दादरी"
कैसे याद करूँ तुम्हें?
तुम तो प्रतीक हो विभाजनकारी मानसिकता के,
उस असहिष्णुता की संस्कृति के,
जो पैर पसार रही है पूरी दुनिया में
वैश्वीकरण की पृष्ठभूमि में,
जो ख़ाक करने की सोच रखती है
हमें और हमारी संस्कृति को,
जो लीलने को तत्पर है
गंगा-जमुनी तहज़ीब को।
अब तुम्हीं बतलाओ "दादरी"
कैसे याद करूँ तुम्हें?
तुम तो मानस संतान हो
"हिटलर" की,
ऐसी सन्तान
जो उसके पहले से विद्यमान है,
जो कभी क्रूसेड के रूप में प्रकट होती है,
तो कभी लादेन और आईएसआईएस रूप में,
कभी तुम गोधरा के रूप में प्रकट होती हो,
तो कभी सिख विरोधी दंगे के रूप में।
अरी "दादरी"
तुमने कलंकित किया है हमें
हमारी संस्कृति को,
और सबसे बढ़कर भारतीयता को।
तुमने तो
कलंकित किया है
बापू के देश को,
बापू के वेश को
और बापू की सोच को।
तुमने कलंकित किया है उस कबीर को,
जिन्होंने कहा था:
"माँस-माँस तो एक है
जस बकरी, तस गाय।"
तुम्हारी संस्कृति "भारतीय" नहीं हो सकती,
संभव नहीं इसका भारतीय होना,
तुम भला गाय और बकरी के अभेदत्व को क्या जानो?
तुम्हें तो बक़रीद पर बकरी के मारे जाने से कोफ़्त है,
दशहरे की बलि तुम्हें कहाँ याद रहती?
घर में बैठ कर मटन- चिकन खाने से तुझे परहेज़ न हो, पर
फ़ेसबुक पर अहिंसावाद के प्रति
तुम्हारी प्रतिबद्धता के आगे
गाँधी भी शर्मिंदा होते हैं।
नहीं,अब और नहीं
हमें आगे आना ही होगा,
नफरत को भुलाना ही होगा,
देश को बचाना ही होगा।
"अख़लाक़ मर नहीं सकता"
"अख़लाक़ मर नहीं सकता"
""दादरी में एक मुसलमान को बीफ खाने के आरोप में मारते-मारते मार डाला गया एक भीड़ के द्वारा नहीं, "जुलूस" के द्वारा। यह तो होना ही चाहिए था। बहुत पहले होना चाहिए था। झारखंड में भी हमने कोशिश की थी, पर झारखंडियों के साथ-साथ बिहारियों ने धोखा दे दिया। इन ससुरे मुसलमानों के साथ तो यही होना चाहिए। १९४७ में पाकिस्तान लेने के बाद भी भारत में डटे रहे, हम जैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्षों ने उन्हें तुष्ट करना चाहा और आज आलम यह है कि वे भारत को पाकिस्तान बनाने पर आमदा हैं। देखो, अंतिम बार कह रहा हूँ:अगर भारत में रहना है, तो हमारी शर्तों को स्वीकार करना होगा। दोयम् दर्जे की नागरिकता स्वीकार करनी होगी। तुम क्या खाओगे और क्या नहीं खाओगे, इसे मैं निर्धारित करूँगा।""
"क्यों रवीश, इतनी हायतौबा क्यों? कहाँ थे उस समय तुम, जब कश्मीरी पंडितों के साथ ज़्यादती हुई? क्यों नहीं खड़े होते तुम, जब इस्लामी आतंकी बेवजह जान लेते हैं मासूमों की?"
यह तस्वीर है उसी भारत की, जिसका सपना कभी गाँधी और नेहरू ने देखा था और जिसका सपना देख-देख हम और आप बड़े हुए। गोडसे ने तो गाँधी को एक बार मारा था, फिर भी गाँधीवाद जीवित रहा क्योंकि हमें गाँधी नहीं, गाँधीवाद नहीं , भारतीय संस्कृति से प्यार था; पर समय के साथ हमने गाँधी को भुलाया, गाँधीवाद को भुलाया और अब हम आमदा हैं भारतीय संस्कृति को भुलाने पर। लेकिन, ध्यान रखना, इसे बदल पाना , इसकी मनमानी व्याख्या, इसे भुलाना तुम्हारे वश में नहीं।
एक व्यक्ति था अख़लाक़, पर अब वह प्रतीक में तब्दील हो चुका है तुम्हारे वहशीपन का, तुम्हारी दरिंदगी का और तुम्हारे डर का। हाँ, तुम्हें अटपटा लग रहा होगा, पर यह सच है कि वह प्रतीक है तुम्हारे डर का। वह प्रतीक है असहिष्णुता का और इस बात का कि वह भारतीय संस्कृति ख़तरे में है जिसके केन्द्र में है वैष्णव धर्म और वैष्णव संस्कार, सहिष्णुता और समन्वय जिसका प्राण तत्व है। तुमने अख़लाक़ को नहीं मारा, तुमने मारने की कोशिश की भारतीय संस्कृति के मूल्य को । तुमने नकारने की कोशिश की है उस बुनियाद को, जिस पर तुम खड़े होने की कोशिश कर रहे हो। ध्यान रखना कि फ़ेसबुक पर न तो इतिहास लिखे जा सकते हैं और न ही इतिहास को मिटाया जा सकता है। अरे लिखने और मिटाने की बात छोड़ दो, इतिहास समझा भी नहीं जा सकता। और, तुम तो निरे अनाड़ी ठहरे जो फ़ेसबुक पर इतिहास समझते भी हैं, लिखते भी है और मिटाते भी हैं।अरे, तुम भगत सिंह की बात करते हो, पटेल की बात करते हो, सुभाष की बात करते हो; पर ये सब तुम्हारे लिए मोहरे हैं जिनका तुम अपने तरीक़े से इस्तेमाल करना चाहते हो। न इन्हें तुम समझते हो और न ही समझना चाहते हो।बस इतना कहूँगा और इसके ज़रिए खुली चुनौती दूँगा:
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजुएँ क़ातिल में है।
Friday, 4 September 2015
"गुरुदेव को समर्पित"
गुरुदेव को समर्पित !
श्रद्धांजलि
उस गुरू को,
जिसने मुझे सिरजा,
जिसने मुझे बनाया,
जिसने मुझे संस्कार दिए,
और
जिसकी बदौलत संभव हो सका
वहाँ खड़ा होना,
जहाँ पर आज मैं खड़ा हूँ,
जिसके कारण डटा रह सका मैं
जीवन-समर में,
अपनी शर्तों पर
और अपनी शर्तों के साथ।
श्रद्धांजलि
उस गुरू को,
जिसने मेरे गूँगेपन को स्वर दिया,
िजसने मुझ अंधे को दृष्टि दी,
और दी सम्वेदना
और दिए अहसास
ताकि महसूस कर सकूँ
दूसरे की वेदना को,
दी जिसने ऐसी इच्छाशक्ति
जिसकी बदौलत
झेल सकूँ उस पीड़ा को,
जो होती है दूसरों के शागिर्द बनने पर।
इस क्रम में
मैं
गिरा भी,
टूटा भी,
बिखरा भी,
पर डटा रहा मैं संघर्ष-पथ पर,
बिना समर्पण किए
अविचल प्रतिपल अनवरत्!
श्रद्धांजलि:
कैसी,कैसे और किस तरह?
श्रद्धांजलि
उन मूल्यों को अपनाकर,
जिसके साथ उसने जीने की कोशिश की;
श्रद्धांजलि
उसको ज़िन्दा रखने के आग्रह के साथ,
श्रद्धांजलि
हर क्षण,हर पल
उसको याद करते हुए!
पुष्पांजलि
उन गुरुओं को,
उन छात्रों को,
उन मित्रों को,
उन सगे-संबंधियों को,
अपने बच्चों को
और अपनी जीवन-संगिनी को,
जिसने जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर
सँवारा मुझे,
सँभाला मुझे,
सिखाया मुझे।
और इन सबसे परे
शुक्रगुज़ार हूँ
उन आलोचकों का,
जिन्होंने मुझे रूकने न दिया,
झुकने न दिया।
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